यह सच है मनुष्य के जीवन क्षेत्र से जुड़े सभी क्रियाकलापों में उसके कर्म की प्रधानता रहती है। वह प्रत्येक कर्म में तल्लीनता से कार्य करता है तो सफलता रूपी जीत उसके कर्म का आधार होती है। यदि कर्म करने में आलस्य या आराम को प्रमुखता दी जाती है और वांछना वह यह करें कि काम हो जाएगा, लोग कर देंगे। तो यह सोच उसके लिए छलावा है। जीत तो बहुत दूर की बात है। हार का सामना ही उसे करना पड़ेगा वह कभी किसी क्षेत्र में कामयाब नहीं हो सकता। बड़े-बड़े ज्ञानी महात्मा, साधु- संत, ईश्वरीय सत्तात्मक ग्रन्थों के ज्ञाता है। उन्होंने भोगा है और इसीलिए उपदेशों से जन-जन को यही संदेश देते हैं-" सकल पदारथ है जग माहीं। कर्महीन कछु पावत नाहीं "। इसी बात को आगे बढ़कर कहते हैं-" जो जस करें सो तस फल चाखा"। माना भाग और प्रतिकूल परिस्थितियों में कर्म करने के बाद भी जीवन क्षेत्र में हर का मुंह देखना पड़ता है पर हम मनुष्य हैं श्रीमद् भगवद्गीता भी यही कहती है-- जय- पराजय, लाभ- हानि, सुख- दु:ख को समान मानकर, राग- द्वेष छोड़कर कर्तव्य- कर्म करना ही निष्काम कर्म योग है ;क्योंकि कर्म पर ही हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। जब कर्म सोच विचार कर किया है तो जीत तो निश्चित होगी ही।
- डॉ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
जीत कर्म का और हार कमी का आधार है। यह कथन मानव जीवन की गहरी सच्चाई को उजागर करता है। जीत कभी आकस्मिक नहीं होती बल्कि वह निरंतर श्रम, अनुशासन, साहस और सत्य के प्रति निष्ठा का परिणाम होती है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करता है, तब उसकी जीत केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और नैतिक महत्व भी ग्रहण कर लेती है। ऐसी जीत व्यक्ति को विनम्र बनाती है और उसे और अधिक उत्तरदेह बनकर कार्य करने की प्रेरणा देती है। इसके विपरीत पराजय को यदि सही दृष्टि से समझा जाए तो वह निराशा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर होती है। पराजय यह बताती है कि प्रयास में कहीं न कहीं कमी रह गई, जिसे पहचानकर सुधारा जा सकता है। जो व्यक्ति हार से घबराता नहीं, बल्कि उससे सीख लेता है, वही भविष्य में अधिक परिपक्व, जागरूक और दृढ़ बनता है। हार अर्थात पराजय व्यक्ति के भीतर धैर्य, सहनशीलता और विवेक को विकसित करती है। इस प्रकार विजय और पराजय दोनों ही जीवन के आवश्यक अंग हैं। विजय अर्थात जीत कर्म की पुष्टि है और पराजय अर्थात हार सुधार का संकेत है। जो व्यक्ति निरंतर कर्मपथ पर डटा रहता है, कमियों को स्वीकार करता है और सत्य से समझौता नहीं करता, वही अंततः वास्तविक और स्थायी विजय प्राप्त करता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
कहते हैं न ,कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जो जस करहि सो तस फल चाखा । जी हां दृढ़ निश्चय व अनवरत परिश्रम से मिलती है जीत ,इसी को हम कर्म कहते हैं ।गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कर्म का योग गाया ।इसके विपरीत हार का तातपर्य तो यही है कि जीत का प्रयास पूरे मन से पूरे मनोयोग से नही किया गया ,कुछ तो कमी रह गयी ।हार से निराश नही होना चाहिये बल्कि उससे सीख लेते हुए जीवन मे आगे बढ़ना चाहिए पुनः प्रयास करना चाहिए ,हार का कारण ढूढने की कोशिश करते हुए सुधार करना चाहिए ,कहते हैं न ,कि गिरते है शह-सवार ही मैदाने जंग में । हारने के बाद भी अपना आत्मविश्वास अपना हौसला बचाकर रखना चाहिए ताकि पुनः तैयार हों सके ,जीत का स्वागत करने के लिए ।
- सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
जीत जहां खुशी देकर जाती है, हार नया सबक सिखाती है।। सफलता या जीत संयोग से नहीं बल्कि सही कर्म, मेहनत एवं प्रयासों से प्राप्त होती है। जीत भाग्य का नहीं, कर्मों का खेल है जैसा हम कर्म करेंगे वैसा हमें फल प्राप्त होगा। जीत कर्म के माध्यम से ही संभव है निरंतर प्रयास मेहनत इच्छा शक्ति सफलता की नींव है। भगवत गीता का भी यही उपदेश है जीत प्राप्त करने के लिए सार्थक कर्म करना आवश्यक है। सुख-दुख, लाभ- हानि मैं समभाव रखकर निष्पक्ष भाव से अपने कर्तव्य- कर्म को करना ही जीत आधार है। हार का मुख्य आधार मानसिक कमजोरी, सही समय पर सही फैसला नहीं लेना, आत्मविश्वास की कमी,अनुचित तैयारी, निराशावादी सोच, या समय के पहले ही हार मान लेना आदि कारण है। जीवन में हार को जीत की पहली सीडी मानकर आगे बढ़ना है।हार एक अस्थाई अवस्था है, जो बेहतर प्रयास से जीत में बदला जा सकता है।
जीवन लक्ष्य जीत का,
चाहे माने कर्म का आधार।
कर्म अच्छे करते रहे ,
बनेगा सफलता काआधार।।
- रविंद्र जैन रूपम
धार - मध्य प्रदेश
अनूठी संकल्पना - - निःसंदेह कर्म से ही जीत है। कर्म में ही जीत छिपी है। "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा" - - बडी ही सटीक और मार्गदर्शक पंक्तियां हैं जीवन प्रवाह के लिये। हार कमी का आधार है - - यह भी सच्ची सच्चाई है। अपनी कमियों को छिपाना मन की हार है।" मन के हारे हार है मन के जीते जीत" जिसने मन को जीत लिया समझ लीजिए उसमें ब्रम्हांड की हर शै को जीतने की शक्ति। दुनियां की कोई शक्ति उसे हरा नहीं सकती। हार को स्वीकार करें - - सच्चे मन से। दुनिया में कोई नहीं है ऐसा जिसने जिंदगी में हार का स्वाद न चखा हो लेकिन याद रखें" गिरते हैं शहसवार ही मैदान ए जंग में"। किताबें बोलती हैं कि गिरना गिर कर उठना चलना जीवन की स्वाभाविक चाल है - - जरूरत इस बात की है कि गिरने को अपनी कमी मान करे हतोत्साहित न हों बल्कि हार से सबक लेकर दुगने जोश से आगे बढे - - नये संकल्पों के साथ। हार को अपनी कमी का आधार न माने बल्कि एक विश्वास की जलती लौ बनाकर आगे बढें। जो हार नहीं मानते उनका साथ पूरी कायनात देती है
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
अपने लक्ष्य की सफलता ही जीत है। जीत के लिए संबंधित कार्य में निपुण होना मुख्य आधार होता है और इस निपुणता के लिए कड़ी मेहनत यानी सतत अभ्यास और गहन अध्ययन नितांत आवश्यक है। गहन अध्ययन से लक्ष्य से संबंधित हर सुक्ष्मता का ज्ञान अर्जित करने की पहल होगी और सतत अभ्यास से हर विकल्प को समझने और साधने में पारंगत होने का अवसर। इससे मनोबल बढ़ेगा। शक्ति बल बढ़ेगा और परिपक्वता भी। इस सबका जो दायरा है, क्रियाशीलता है यानी कि कार्यान्वयन है, यही कर्म है। यह जितना सशक्त, शुचितामय और सही होगा, जीत का आधार बनकर, जीत सुनिश्चित करेगा और इसके विपरीत इसमें जो कमी होगी वह हार का कारण बनेगा। कहा गया है असफलता यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास सच्चे मन से नहीं हुआ। अत: सार यही कि किसी भी कार्य में सफल होने के लिए पहले लक्ष्य, फिर समर्पित भाव से कर्म बहुत आवश्यक होता है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
निःसंदेह कर्म से ही जीत है. बिना कर्म के तो जीत का अस्तित्व ही नहीं है. जीवन प्रवाह के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है.हार कमी का आधार है, यह भी सच्ची सच्चाई है. बिना कमी के हार नहीं हो सकती, अतः हार को ही संबल बनाकर दुबारा जीत की कोशिश की जाए. जीत के लिए अपनी कमियों को स्वीकारना होगा. जीत या हार, दोनों स्वीकार, बस मन से नहीं हारना चाहिए. मन के हारे हार है मन के जीते जीत. मन को जीत अखिल ब्रम्हांड को जीतने की शक्ति है. गिरना, गिर कर उठना, उठ कर चलना, चल कर दौड़ना ही जीवन की स्वाभाविक चाल है. हार को उपहार बनाकर नये संकल्पों के साथ आगे बढ़ा जाए. हार को अपनी कमी का आधार न माने बल्कि विश्वास की मशाल जलाई जाए. विश्वास की मशाल ही हार के मलाल को बुझाएगी, जीत की आशा को जगाएगी. जीत की आशा से किए गए कर्म जीत का आधार बनते हैं.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
जीवन में किए गए कर्मों के आधार पर हमें वांछित फल या जीत मिलती है !! जीत उन्हें ही मिलती है , जो सामर्थ्य के अनुसार , कुछ पाने या हासिल करने की लिए संघर्ष करते है , या कर्म करते हैं !! जो कर्म ही नहीं करते , उनका जीत से कोई रिश्ता नहीं होता !! जब प्रयासों मैं या कर्मों में कहीं कमी आ जाती है , तो वह हार का आधार बनता है ! लक्ष्य निर्धारित कर , उसे प्राप्त करने के लिए सार्थक प्रयास किए जाएं, तो जीत निश्चित है ! कर्मों की कमी में ही हार है ! व्यक्ति को हार से निराश होकर प्रयास छोड़ने नहीं चाहिए अपितु अपनी कमियों का विश्लेषण कर , स्वयं को सुधारना चाहिए , तभी जीत निश्चित ही मिलेगी क्योंकि ......
मन के हारे हार है ,
मन के जीते जीत !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
हम कर्म नहीं करेंगे तो जीतेंगे कैसे ? दौड़ेगे तभी तो हारेंगे या जीतेंगे.यानी जीत का आधार दौड़ है. दौड़ का आधार जीत नहीं. पढ़ेंगे तभी पास होंगे. पास का आधार पढ़ाई है. फसल की बुवाई होंगी तभी तो फल की प्राप्ति होगी. हम फसल बोये ही नहीं तो फल की आशा कैसे कर सकते हैं. इसलिए कर्म ही फल यानी जीत का आधार है. कर्म का आधार जीत नहीं. ठीक उसी तरह कमी हार का आधार है हार कमी का आधार नहीं. जब किसी चीज में हमारी हार होती है इसका साफ मतलब है कि हममें कोई न कोई कमी अवश्य है. इसलिये हमारी हार हुई है.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकता - प. बंगाल
यह पंक्ति जीवन का गूढ़ सत्य अपने भीतर समेटे हुए है। मनुष्य के जीवन में जीत और हार दोनों ही अनिवार्य अनुभव हैं, परंतु इन दोनों के मूल में हमारे कर्म और हमारी कमियाँ ही निहित होती हैं। जीत केवल संयोग या भाग्य का परिणाम नहीं होती, बल्कि वह निरंतर परिश्रम, दृढ़ निश्चय, अनुशासन और सही दिशा में किए गए कर्मों का प्रतिफल होती है। जब व्यक्ति पूरे मनोयोग, निष्ठा और समर्पण के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है, तो सफलता स्वयं उसके चरण चूमती है। इस प्रकार जीत कर्म की सुदृढ़ नींव पर ही खड़ी होती है। इसके विपरीत, हार हमें हमारी कमजोरियों और कमियों का बोध कराती है। हार यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं प्रयासों में कमी रह गई, या दृष्टिकोण में सुधार की आवश्यकता है। हार असफलता नहीं, बल्कि आत्मविश्लेषण का अवसर होती है। यह हमें सिखाती है कि हम अपनी कमियों को पहचानें, उन्हें दूर करें और स्वयं को और अधिक सक्षम बनाएं। इस दृष्टि से हार भी जीवन की एक महत्वपूर्ण शिक्षक है, जो हमें आगे की जीत के लिए तैयार करती है। जीवन में वही व्यक्ति सच्चा विजेता होता है, जो हार से निराश न होकर उससे सीख लेता है और अपने कर्मों को और अधिक सशक्त बनाता है। यदि व्यक्ति हार को अपनी नियति मान ले, तो वह ठहर जाता है; परंतु यदि वह उसे एक प्रेरणा के रूप में स्वीकार करे, तो वही हार आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी जीत का आधार बनती है। अतः यह स्पष्ट है कि जीत हमारे श्रेष्ठ कर्मों का परिणाम है और हार हमारी कमियों का दर्पण। इसलिए हमें हार से घबराने के स्थान पर अपने कर्मों को सुधारने और निरंतर आगे बढ़ने का संकल्प लेना चाहिए। यही जीवन की सफलता का सच्चा मार्ग है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
जी यह सत्य है कि जीवन में हमारी सफलता का मूल आधार कर्म ही है क्योंकि कर्म के बिना जीवन की सार्थकता नहीं, कर्म के बिना भविष्य का निर्माण असंभव है। कर्म के बिना जीवन की परिभाषा नहीं, उपयोगिता नहीं, सब कुछ अर्थहीन है। कर्म से ही वास्तविक खुशी मिलती है जीवन सुन्दर, सुखमय बनता है। जब जीवन में कर्म के प्रति निष्ठा ही नहीं है तो वह व्यक्ति की सबसे बड़ी कमी बन जाती है। यही कमी उसकी हार है। लेकिन जो व्यक्ति अपनी कमियों से सबक लेकर सफल भविष्य की आशा रखता हुआ अच्छे कर्म को मूल उद्देश्य के अनुरूप जीवन ध्येय मानता है वह हार को जीत में अवश्य बदलता है। 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत' हार मानना हमारी मानसिक दुर्बलता है,और कर्मशील बनकर लगातार संघर्ष सदैव जीत का पर्याय,सूचक है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
किसी भी कार्य की पूर्णता हेतु कर्म करना आवश्यक है। तभी सफलता अर्थात जीत हासिल होती है। इसीलिए कह सकते हैं कि जीत कर्म का आधार है। कई बार पूर्ण प्रयास के बाद भी कार्य सफल नहीं होता इसका मतलब कहीं न कहीं कोई कमी रह गई। उस कमी का पता करके यदि संभव हो तो पुनः सफलता हेतु प्रयास किया जा सकता है। मगर यह बात निश्चित है कि हार कमी का आधार है।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
जब हम कोई भी कार्य करते हैं तो उसमें हार या जीत संभव है लेकिन अगर हम अपनी लगन, मेहनत व सही दिशा में प्रयास जारी रखें तो जीत लगभग तय होती है दुसरी तरफ,हार अभ्यास की कमी मानसिक दृढ़ता की कमी या गलत रणनीतीयों के कारण हो सकती है इसके अतिरिक्त आत्मविश्वास की कमी या अंहकार भी इसके मुख्य कारण हैं तो आईये आज की चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि जीत कर्म का आधार है और हार कमी का आधार है, मेरा मानना है कि जीत सचमुच कर्म का आधार ही है, क्योंकि जैसे इंसान कर्म करता है वैसा ही फल पाता है, कहने का भाव कर्म के आधार पर ही जीवन में जीत या हार का फैसला होता है क्योंकि कर्म से भाग्य बनता है बिगडता है अगर सही दिशा में मेहनत और निरंतर प्रयास किया जाए तो भाग्य को बदला जा सकता है, कहने का भाव कर्म ही भाग्य का निर्माता है यदि निरंतर कर्म नहीं किया जाए तो विरासत में मिली सफलता भी खत्म हो सकती है इसलिए दूनिया में कोई किसी को सुख, दुख नही देता सब अपने पूर्व और वर्तमान कर्मों का खेल होता है सरल शब्दों में कह सकते हैं कि कर्म ही जीवन की आधारशिला है जो सफलता और विफलता निधारित करती है, जिससे साफ प्रकट होता है कि जीत कर्म का आधार है और हार कर्मों में कमी का आधार है, अन्त में यही कहुँगा कि अपने वर्तमान कर्मों को सुधार कर हम अपने भाग्य को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं लेकिन कर्मों को अनदेखा करके, जीत संभव नहीं हो सकती इसलिए हार तभी होती है जब हम कर्मों की अनदेखी करते हैं।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
यह बात सत्य है। जिसने सच्ची साधना की है, उसे आज नहीं तो कल जीत हासिल हुई है और यह सच्ची साधना हमारे अपने कर्म हैं। जिसके भी मन में आलस्य ने स्थान ले लिया,निश्चित ही उसके कर्म अर्थात साधना में भी कमी आ जाती है। ऐसे में हार मिलने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हमारे अपने कर्म ही हमारे अपने भविष्य में प्राप्त होने वाले जीत और हार को लिखते हैं।तो यह कहना कि सब हमारे भाग्य में लिखा था, हमारे आलस्यता का परिचय ही देते हैं। हमें सतत् प्रयत्नशील रहना ही चाहिए।आशा की लौ जगाए रखना चाहिए।
मन! तुम उन्नत पथ बढ़ो,मत हो कभी उदास।
जीत-हार दोनों यहीं,जीवन में है वास।।
जीवन में है वास,आज यदि दुख सुख है कल।
मत लाना ठहराव,मित्र!तू बढ़ता ही चल।।
सब करतें संघर्ष,धैर्य ही होता है धन।
करते रहो प्रयास,बुझो मत जागो रे मन।।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
जीत कर्म का आधार है, क्योंकि सफलता हमारे प्रयास, लगन और निरंतर मेहनत से ही मिलती है। वहीं हार कमी का आधार है, क्योंकि असफलता हमें अपनी कमियों को पहचानने, उन्हें सुधारने और स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर देती है। जीत हमें आत्मविश्वास देती है और हार हमें अनुभव व समझ। दोनों ही जीवन के आवश्यक पड़ाव हैं, जो हमें परिपक्व, मजबूत और सफल इंसान बनाते हैं।
ReplyDelete- सुनीता गुप्ता कानपुर
(WhatsApp से साभार)