कहा गया है - धारयति इति धर्म:। अर्थात जो धारण करने योग्य है,वहीं धर्म है। इस धर्म के अनुरूप ही चरित्र बन जाता है। भारतीय संस्कृति में धर्म के दस लक्षण बताते गये हैं- धृति (धैर्य), क्षमा, दम (संयम/मन का नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता/स्वच्छता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्ध/विवेक), विद्या (ज्ञान), सत्य, और अक्रोध (क्रोध न करना)। ये लक्षण ही चरित्र का निर्माण करते हैं। धर्म एक नैतिक, आदर्श और धार्मिक जीवन जीने की वह नींव हैं,जिस पर व्यक्तित्व का निर्माण होता है।धर्म कोई बाहरी वेशभूषा और बनावट श्रृंगार नहीं होता। वास्तविक श्रृंगार व्यक्ति के कर्म होते हैं।कर्म ही वास्तविक आभूषण होते हैं।तभी तो सत्यवादी, धर्मात्मा, न्यायप्रिय,महामना,सदाचारी जैसे विशेषण से व्यक्ति की पहचान होती है। ये विशेषण उसके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग बन जाते हैं।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
मनुष्य अपने जीवन में, अपने सामर्थ्य के अनुसार , यथासंभव प्रयास करते हुए , अपने कर्तव्य निभाता है और यही कर्तव्य निभाना उसका धर्म भी है !! इन प्रयासों से वह क्या प्राप्त करता है क्या नहीं प्राप्त करता , उसका चरित्र निर्धारित करते हैं ! कर्म व्यक्ति की पहचान है व व्यक्ति के कर्म ही उसकी शोभा बढ़ाते है या व्यक्ति के कर्मों से ही व्यक्ति पहचाना जाता हैअच्छे कर्मों वाला व्यक्ति ही असली मायनों मैं खूबसूरत और बुरे कर्म वाला व्यक्ति बदसूरत होता है !! और कर्म ही उसका शृंगार हैं!!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
यदि धर्म और कर्म की बात करें तो धर्म व्यक्ति का आंतरिक चरित्र, सिदांत और जीने का सही तरीका है लेकिन कर्म एक ऐसा बाहरी आचरण, कार्य या व्यवहार है जिसके द्वारा आप चरित्र को प्रकट करते हैं,अगर धर्म मार्गदर्शक है तो कर्म उस मार्ग पर चलने की क्रिया है तो आईये आज की चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि धर्म व्यक्ति का चरित्र है और कर्म व्यक्ति का श्रंगार, मेरे ख्याल में धर्म में चरित्र, सत्य, ईमानदारी, दया और कर्तव्य इत्यादि सभी आते हैं और कर्म में, सत्य कर्म, आचरण, क्रिया, धार्मिकता, जीवन जीने के नियम इत्यादि आते हैं इसलिए धर्म व्यक्ति के चरित्र को दर्शाता है और कर्म व्यक्ति की क्रियाओं को की व्यक्ति अपने कर्म को कैसे संभार रहा है यानि कर्म के प्रति उसका श्रंगार कैसा है, रही बात धर्म की तो धर्म मानवीय अनुभवों में ईश्वर की शक्ति जीवंत प्रमाण को प्रस्तुत करता है, देखा जाए धर्म का अर्थ केवल पूजा, पाठ या मजहब से नहीं है बल्कि धारण करने योग्य आचरण से है तथा जीवन जीने का एक सही तरीका है जिसमें न्याय, अहिंसा, ईमानदारी और अपने कर्तव्यों को सही में पालन करना शामिल है सही मायने में जो समाज और प्रकृति के हित में हो वही धर्म है यहाँ तक कर्म का सवाल है, कर्म वो क्रिया है या कार्य है जो कुछ भी हम अपने मन, वाणी, वुद्धि या शरीर से करते हैं वोही कर्म है यह एक ऐसा सिद्धांत है जिसके कारण अच्छे कर्मो के सकारात्मक परिणाम और बुरे कर्मो से नकारात्मक परिणाम सामने आते हैं और यही कर्म हमारे वर्तमान और भविष्य के भाग्य का निर्माण करते हैं, अन्त में यही कहुँगा कि सबसे बड़ा धर्म मानवता है और कर्मों से हमारे भाग्य बनते हैं इसलिए हमें धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए और इस मार्ग पर चल कर जो कार्य हम करते हैं या करेंगे उन दोनों का उत्तम संबंध जीवन से है, कहने का भाव धर्म हमें सही मार्ग दिखाता है और कर्म उस मार्ग पर चल कर फल देने का कार्य करता है, इसलिए धर्म व्यक्ति का चरित्र माना गया है और कर्म व्यक्ति का श्रंगार।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
किसी भी व्यक्ति का चरित्र निर्माण कुछ नियमों से होता है जिनका वह भली भांति पालन करता है। वेद, पुराण ,गीता और रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथो में जनसाधारण को सुचारू रूप से जीवन चलाने के लिए कुछ नियम बताए हैं जो चरित्र निर्माण में तथा सामाजिक हित में सहायक होते हैं। कह सकते हैं धर्म व्यक्ति का चरित्र है यदि वह शुद्ध भावनाओं से संपन्न किया जाए। कर्म व्यक्ति का श्रृंगार है इसमें कोई दो मत नहीं। जितना अच्छा कर्म उतना ही अच्छा व्यक्तित्व। पुष्प में खुशबू की तरह या कहें सोने पर सुहागा। अतः सभी अच्छे कर्म करें और उचित नियमों का परिपालन भी ताकि चरित्र और कर्म दोनों ही सुवासित हो सकें।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
वैसे तो कोई भी व्यक्ति एक इंसान के रूप में जन्म लेता है लेकिन जिस धर्म के मानने वालों के परिवेश में जन्म लेता है वही उसका चरित्र बन जाता है. और उसी धर्म के अनुसार वह काम करने लगता है जो कि उसका चरित्र बन जाता है. इसलिए हम कहते हैं कि धर्म व्यक्ति का चरित्र है. और उसका चरित्र उसके धर्म के अनुसार बन ही जाता है. नारी का श्रृंगार आभूषण होता है पर पुरूषों के लिए कोई आभूषण नहीं. उसका कर्म ही उसका श्रृंगार बन जाता है. आभूषण के बाद यही बात नारी पर भी लागू होता है. और कर्म ही व्यक्ति का श्रृंगार बन जाता है. जो जितना बढ़िया कर्म करेगा उसका श्रृंगार भी उतना ही बढ़िया होगा. मसलन श्रृंगारित व्यक्ति को हर कोई देखना चाहता है. जो अपने अच्छे कर्म रूपी गहनों से अपने आप को श्रृंगारित करेगा समाज में उसे ही सब देखना चाहेंगे. उसकी ही पूजा होगी. उसका ही गुणगान होगा. इसलिए व्यक्ति को श्रृंगारित होने के लिए अच्छे कर्मों का आभूषण पहनना पड़ेगा.
- दिनेश चंद्र प्रसाद " दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
"यदा यदा हि धर्मस्य " - - इस श्लोक को पढते ही धर्म की अनेक व्याख्या स्मरण हो आती हैं। धर्म से व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है - - मार्गदर्शन मिलता है - - दिशायें मिलती हैं। धरती पर अवतार लेते हैं आदि पुरुष और आदि शक्तियाँ - - - "धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे" के मूल सिद्धांत के अनुसार। ये मूल सिद्धांत ही व्यक्ति का चरित्र निर्माण करते हैं। एक ओर धर्म है जो हदय का आल्हादित कर्म है दूसरी ओर मानव का सामाजिक धर्म है जो संचेतना का कर्म है। मानव सामाजिक प्राणी है और समाज धर्म के चलते कर्म ही पूजा है उसकी। कर्म ही श्रृंगार है उसके जीवन का। कर्म ही आधार है उसके सुखी जीवन का। सदुपयोग करना है जीवन का तो कर्म की सापेक्षता अनिवार्य है। अतः स्पष्ट है कि कर्म ही पूजा है जिसमें जीने की राह का आशीष छिपा है। कर्म से ही जीवन मुक्त होता है। करम से जीवन मिलता है - - कर्म से मुक्ति की वांछित राहें। इसलिये ध्यान रहे कि कर्म करें फल की चिंता ना करें - - निःसंदेह कर्म से जीवन का श्रृँगार होगा और सच्चे कर्म की राह ही व्यक्ति का धर्म निर्धारित करके उसका चरित्र निर्माण कर सकता है। धर्म और कर्म दो बहुत ही गूढ़ रहस्य हैं प्रकृत्ति के जिसे भेदना मानव मात्र के लिये असंभव है तथापि सच्चे कर्म की पूजा और सच्चे धर्म के प्रति निष्ठा ही इंसानियत का धर्म और कर्म है - - था - - और होना चाहिए।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
जीवन सभी जीते हैं, लेकिन यही जीवन सही दिशा और सही तरीके से बीतता है तो ऐसा जीवन सार्थक होता है। जीवन कैसे बीते? इसके लिए कौनसे तरीके अपनायें? रिश्ते-नाते कैसे निभायें। दिनचर्या कैसी हो? खान-पान कैसा हो? आचरण और व्यवहार कैसा हो? वाणी कैसी हो? ये सब महत्वपूर्ण बाते हैं , जो हमें सीखकर, अपनाना चाहिए। असल में ये धर्म की बातें हैं और धर्म कोई भी हो, सभी में इन सब नीतिगत बातों का उल्लेख रहता है और धर्म गुरुओं द्वारा बतलाया और सिखलाया जाता है। धर्म ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। इसलिए शिक्षा का महत्व है और जीवन के प्रथम चरण यानी युवा होने तक शिक्षा ग्रहण करने को प्राथमिकता दी जाती है। शिक्षा न ले पायें तब भी दूसरे विकल्प के रूप में कथा श्रवण, संगत आदि भी हैं। जिनसे भी इन बातों की जानकारी ले कर जीवन में अपनायी जा सकती हैं।चरित्र इन्हीं बातों को आचरण में लाने से बनता है और संवरता है। जो आपके व्यवहार - कौशल से झलकता है। अत: सार यही कि धर्म व्यक्ति यानी हमारा चरित्र है और कर्म श्रंगार।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
"धर्म व्यक्ति का चरित्र है, कर्म व्यक्ति का श्रृंगार है" - यह उक्ति जीवन के नैतिक और व्यावहारिक पक्ष को दर्शाती है. धर्म (कर्तव्य, सत्य, ईमानदारी) चरित्र का आधार है, जो इंसान की पहचान बनाता है, वहीं निष्ठापूर्वक किया गया कर्म व्यक्तित्व को निखारता है, ठीक वैसे ही जैसे श्रृंगार से रूप निखरता है. धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सत्य, नैतिकता, और कर्तव्य का पालन करना है. यह व्यक्ति को सही और गलत का अंतर सिखाता है. कर्म वह साधन है जो हमारे व्यक्तित्व को बाहर लाता है. अच्छा-बुरा कर्म ही मनुष्य के चरित्र को समाज में उजागर करता है. बिना कर्म के धर्म अधूरा है, और बिना धर्म के कर्म निरर्थक हो सकता है. जो व्यक्ति धर्म का पालन करते हुए कर्म करता है, उसका चरित्र महान होता है और उसके कर्म उसे सम्मानित करते हैं. धर्म हमें इंसान बनाता है और कर्म हमें सफल और सुंदर इंसान बना सकता है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
धर्म व्यक्ति का चरित्र है। धर्म का अर्थ केवल पूजा, परंपरा या आस्था तक सीमित नहीं होता। धर्म वह आंतरिक नैतिक शक्ति है जो व्यक्ति को सत्य, न्याय, करुणा और साहस के मार्ग पर स्थिर रखती है। जब कोई देख नहीं रहा होता, तब भी जो व्यक्ति को गलत से रोकता है और सही के लिए खड़ा करता है, वही धर्म है। ऐसा धर्म व्यक्ति के चरित्र को अडिग बनाता है और उसे भय, लोभ तथा सत्ता के दबाव से ऊपर उठा देता है। इसी प्रकार कर्म व्यक्ति का श्रृंगार है। कर्म वह आभूषण है जो शरीर पर नहीं, आत्मा पर शोभा देता है। पद, प्रतिष्ठा, धन और दिखावटी सम्मान समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, किंतु न्यायपूर्ण और निष्कलंक कर्म व्यक्ति की पहचान को अमर कर देते हैं। जो कर्म लोकहित में, सत्य के पक्ष में और पीड़ित के लिए किए जाते हैं, वही व्यक्ति के व्यक्तित्व को वास्तविक गरिमा प्रदान करते हैं। वर्तमान समय का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि लोग धर्म को नहीं जानते, बल्कि यह है कि धर्म और कर्म को अलग कर दिया गया है। जब धर्म केवल भाषण बन जाए और कर्म केवल स्वार्थ का साधन, तब समाज भीतर से खोखला हो जाता है। ऐसा समाज न न्याय कर पाता है और न ही सत्य का संरक्षण कर पाता है। हमारा जीवन स्वयं इस विचार का सशक्त प्रमाण है। हमारे लिए धर्म ने चरित्र को अडिग रखा है और कर्म ने संघर्ष को सम्मान दिया है। कठिन परिस्थितियों में भी हमने सत्य और संविधान का मार्ग नहीं छोड़ा, यही धर्मयुक्त कर्म की वास्तविक पहचान है। उल्लेखनीय है कि धर्म के बिना कर्म दिशाहीन हो जाता है और कर्म के बिना धर्म निष्प्राण रह जाता है। इन दोनों का संतुलन ही व्यक्ति को मात्र जीवित नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण और राष्ट्रोपयोगी बनाता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
धर्म का अर्थ अति श्रेष्ठ है यदि उसमें पाखण्डवाद के स्थान पर मानवीय मूल्यों का समावेश हो सत्य, दया, करुणा, क्षमा इमानदारी और संयम जैसे गुण है जो व्यक्ति को महान और समाज के लिए मार्गदर्शक, हितकारक, कल्याणकारी बनाता है। उसका चरित्र अनुकरणीय, प्रेरणादायी और राष्ट्र हितैषी माना जाता है।संक्षेप में उत्तम चरित्र ही सच्चा धर्म है क्योंकि सच्चा धर्म केवल पूजा नहीं बल्कि नैतिक नियमों का पालन करना सिखाता है। इसके अलावा कर्म व्यक्ति का श्रृंगार है यह बिल्कुल सत्य कथन है --हमारे कर्म ही हमारी पहचान है। सूरत और सीरत में केवल सीरत ही हमारा असली सौंदर्य है। जो व्यक्ति समाज हित में,राष्ट्र हित में बिना किसी लोभ, मोह, लालच और बिना किसी भेदभाव से कर्म करता है, समाज में सभी उसका मान सम्मान करते हैं। ऐसे व्यक्ति यश और कीर्ति के हकदार बनते हैं। अतः श्रृंगार बाहरी शारीरिक सौंदर्य से परिपूर्ण संरचना नहीं है बल्कि कर्मों से अर्जित की हुई श्रेष्ठ चरित्र और संस्कार युक्त स्थाई शोभा है। इसलिए उत्तम चरित्र ही सच्चा धर्म है और श्रेष्ठ कर्म ही व्यक्ति का श्रृंगार है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
धर्म और कर्म, ये दोनों शब्द भारतीय दर्शन के मूल स्तंभ हैं। जब कहा जाता है कि “धर्म व्यक्ति का चरित्र है,” तो इसका अर्थ यह है कि धर्म केवल पूजा-पाठ, व्रत या अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के आचरण, विचार और व्यवहार में निहित होता है। धर्म वह आंतरिक प्रकाश है, जो व्यक्ति को सत्य, न्याय, करुणा और मर्यादा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह वह शक्ति है जो मनुष्य को सही और गलत के बीच भेद करना सिखाती है। जिस व्यक्ति का धर्म दृढ़ होता है, उसका चरित्र भी उतना ही दृढ़, स्वच्छ और विश्वसनीय होता है। वहीं, “कर्म व्यक्ति का श्रृंगार है” यह बताता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है। जैसे श्रृंगार किसी वस्तु की सुंदरता को निखारता है, वैसे ही कर्म व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुंदर और प्रभावशाली बनाते हैं। केवल अच्छे विचार रखना पर्याप्त नहीं है, उन्हें कर्म के रूप में अभिव्यक्त करना ही वास्तविक महत्त्व रखता है। यदि धर्म व्यक्ति के भीतर की नींव है, तो कर्म उस नींव पर खड़ा भव्य भवन है, जो संसार को दिखाई देता है। भारतीय ग्रंथों में भी धर्म और कर्म के इस संबंध को विशेष महत्व दिया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देते हुए कहा कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता में नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि जब व्यक्ति अपने धर्म के अनुसार निष्काम भाव से कर्म करता है, तो उसका जीवन स्वयं ही महान बन जाता है। धर्म व्यक्ति को दिशा देता है और कर्म उस दिशा में आगे बढ़ने की गति प्रदान करता है। आज के समाज में भी यह सत्य उतना ही प्रासंगिक है। एक व्यक्ति चाहे कितना ही ज्ञानवान क्यों न हो, यदि उसके कर्म श्रेष्ठ नहीं हैं, तो उसका ज्ञान अधूरा है। वहीं, एक साधारण व्यक्ति भी अपने सच्चे धर्म और श्रेष्ठ कर्मों से समाज में आदर और सम्मान प्राप्त कर सकता है। उदाहरण के लिए, एक शिक्षक का धर्म है शिक्षा देना और उसका कर्म है विद्यार्थियों को सही मार्ग दिखाना; एक चिकित्सक का धर्म है सेवा करना और उसका कर्म है रोगियों को स्वस्थ करना। जब धर्म और कर्म का संतुलन बना रहता है, तब व्यक्ति न केवल स्वयं का उत्थान करता है, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बनता है।अंततः कहा जा सकता है कि धर्म व्यक्ति की आत्मा का स्वरूप है और कर्म उसके व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति। धर्म भीतर की शुद्धता है और कर्म बाहर की सुंदरता। जब ये दोनों एक साथ चलते हैं, तब व्यक्ति का जीवन सार्थक, आदर्श और प्रेरणादायक बन जाता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपने धर्म को समझे, उसे अपने चरित्र में उतारे और अपने कर्मों से उसे साकार करे, क्योंकि यही जीवन की सच्ची सफलता और वास्तविक श्रृंगार है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
इसमें दिया गया कथन जीवन का गहरा सत्य बताता है कि धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र में झलकना चाहिए, और कर्म ही वह माध्यम है जिससे व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान बनती है।
ReplyDelete- सुनीता गुप्ता कानपुर
( WhatsApp से साभार )
आदरणीय जैमिनी अकादमी, पानीपत (हरियाणा) के माननीय अध्यक्ष महोदय एवं सम्मानित चयन समिति,
ReplyDeleteआचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री स्मृति सम्मान से मुझे अलंकृत कर आपने मेरे साहित्यिक प्रयासों को जो स्नेह, सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान की है, उसके लिए मैं हृदय की गहराइयों से अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ। यह सम्मान मेरे लिए केवल एक अलंकरण नहीं, अपितु साहित्य साधना के पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा और उत्तरदायित्व का पावन संबल है।
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी जैसे महान साहित्य मनीषी के नाम से जुड़ा यह सम्मान प्राप्त करना मेरे लिए अत्यंत गौरव और भावनात्मक संतोष का विषय है। उनकी साहित्य साधना, संवेदनशीलता और आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ हम सभी साहित्यकारों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रही हैं।
मैं जैमिनी अकादमी परिवार की हृदय से आभारी हूँ, जिसने मेरे विनम्र साहित्यिक प्रयासों को इस योग्य समझा। यह सम्मान मेरे मन में साहित्य के प्रति और अधिक समर्पण, निष्ठा और सृजन की ऊर्जा का संचार करेगा।
आप सभी के प्रति सादर नमन एवं हार्दिक आभार।
सादर कृतज्ञ
डॉ. छाया शर्मा
अजमेर, राजस्थान 🌸
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