जीत का अर्थ कुछ भी हो सकता है। परन्तु जीत तो जीत है। हार भी कर्म से होती है। यह जीत से वंचित रहता है। कर्म का भविष्य ही हार जीत का फैसला करता है। फिर भी जीत का महत्व मीठा होता है। जीत और हार में सिर्फ परिणाम का अंतर होता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:- यह सच है मनुष्य के जीवन क्षेत्र से जुड़े सभी क्रियाकलापों में उसके कर्म की प्रधानता रहती है। वह प्रत्येक कर्म में तल्लीनता से कार्य करता है तो सफलता रूपी जीत उसके कर्म का आधार होती है। यदि कर्म करने में आलस्य या आराम को प्रमुखता दी जाती है और वांछना वह यह करें कि काम हो जाएगा, लोग कर देंगे। तो यह सोच उसके लिए छलावा है। जीत तो बहुत दूर की बात है। हार का सामना ही उसे करना पड़ेगा वह कभी किसी क्षेत्र में कामयाब नहीं हो सकता। बड़े-बड़े ज्ञानी महात्मा, साधु- संत, ईश्वरीय सत्तात्मक ग्रन्थों के ज्ञाता है। उन्होंने भोगा है और इसीलिए उपदेशों से जन-जन को यही संदेश देते हैं-" सकल पदारथ है जग म...