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परम्परा
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लघुकथा कसौटी -02 परम्परा सुबह-सुबह अदिति और अपूर्व जैसे ही अपने कमरे से निकल कर बाहर आए, पापा ने चाय की ट्रे मेज़ पर धरते हुए मीठे स्वर में कहा," आ जाओ बच्चों ! गर्मागर्म चाय तैयार है । " उनके पाँव छूते हए अदिति ने नर्म स्वर में कहा , " आप क्यों रोज शर्मिंदा करते हैं मुझे पापा जी ! यह काम तो मेरा है न !" " हर काम घर की माँ - बहन या बहू-बेटी का ही नहीं होता बेटा जी ! हम पुरुषों का भी कुछ फर्ज़ बनता है । " " पर पापा जी!..... " केई पर- वर नहीं बेटा जी ! इधर बैठो और मेरी बात सुनो ," प्याले में चाय ढालते हुए वे बोले ," मैंने बचपन से देखा था कि मेरे दादू जी ही सुबह की पहली चाय दादी माँ और हम सबको पिलाते थे। वे बीमार हो गए ,फिर न रहे तो यह दायित्व मेरे बाबू जी ने ले लिया और उनके बाद मैंने । पता है बेटा ! तुम्हारी सास श्री कहती थीं,' जी ! प्रेम से पिलाई आपकी पहली चाय मेरे भीतर ' हॉर्स-पॉवर ' भर देती है ।' फिर वह भी चली गई । बस बच्चों ! मैं उसी परम्परा को निभा भर रहा हूँ...
पाठकों के बीच में प्रबोध कुमार गोविल की लघुकथाएं
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प्रबोध कुमार गोविल जन्म : 1953, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) जन्म के तुरंत बाद से ही राजस्थान में स्थाई निवास शिक्षा व अनुभव : प्रबोध कुमार गोविल पत्रकारिता एवं जनसंचार के प्रोफ़ेसर तथा ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर में निदेशक के पद पर कार्यरत रहे। वे लंबे समय तक वनस्थली विद्यापीठ में प्रशासन और जनसंपर्क अधिकारी भी रहे। वे एक बहुमुखी और सृजनशील लेखक हैं जिन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन किया है। उनकी अनेक पुस्तकें अंग्रेज़ी, उर्दू, सिंधी,राजस्थानी,मराठी, अरबी ,पंजाबी, संस्कृत, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमिया आदि भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। उनकी कई रचनाएं आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित हुई हैं। प्रकाशित कृतियाँ : - कविता संग्रह : रक्कासा-सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया, उगती प्यास दिवंगत पानी उपन्यास : देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, रेत होते रिश्ते, वंश, आखेट महल, जल तू जलाल तू, अक़ाब, हडसन तट का जोड़ा, हसद, रायसाहब की चौथी बेटी, ...
भाजपा ने आपातकाल में जेल गए लोकतंत्र सेनानियों का किया अभिनंदन
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