अधूरा ज्ञान व अधूरा कर्म कभी भी खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसे में अधूरेपन से बचना चाहिए। तभी सार्थक जीवन की कामना कर सकते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- सुमित्रानंदन पंत की स्मृति में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मनुष्य के जीवन में अधूरा ज्ञान सबसे अधिक घातक सिद्ध होता है, क्योंकि आधी-अधूरी जानकारी व्यक्ति को सत्य से दूर ले जाकर भ्रम, अहंकार और गलत निर्णयों की ओर धकेल सकती है। इतिहास और समाज इस बात के साक्षी हैं कि जब ज्ञान विवेक, अनुभव और पूर्ण अध्ययन से रहित हो जाता है, तब वह निर्माण के स्थान पर विनाश का कारण बनता है। इसी प्रकार अधूरा कार्य भी कभी वास्तविक सफलता तक नहीं पहुंचता, क्योंकि बिना पूर्ण समर्पण, धैर्य और निरंतरता के किया गया प्रयास बीच मार्ग में ही अपनी सार्थकता खो देता है। प्रकृति का प्रत्येक नियम पूर्णता, संतुलन और निरंतर कर्म का संदेश देता है, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह ज्ञान प्राप्ति में गहराई, सत्य और समझ को महत्व ...