दुनियां में कोई ऐसा इंसान नहीं हुआ है। जिसने कभी कोई पाप ना किया हो। ऐसा मैं सोचता हूं। परन्तु सभी को सत्कर्म अवश्य करनें चाहिए। जो इंसान सत्कर्म से दूर रहता है। वह अवश्य नरक का भागीदार होता है। यह सिर्फ धार्मिक हीं नहीं है। बल्कि प्राकृतिक नियम भी है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:- मनुष्य का जीवन उसके कर्मों की सबसे बड़ी पहचान है। वाणी क्या कहती है, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, जितना यह कि हमारे कर्म क्या कहते हैं। क्योंकि समय शब्दों को नहीं, कर्मों को याद रखता है। पाप का मार्ग आरंभ में भले ही आसान और आकर्षक लगे, पर उसका अंत हमेशा अंधकार में होता है। झूठ, छल, अहंकार, ईर्ष्या, अन्याय और किसी का दिल दुखाना—ये सब ऐसे पाप हैं जो धीरे-धीरे मनुष्य की आत्मा को खोखला कर देते हैं। पाप केवल मृत्यु के बाद मिलने वाला नर्क नहीं है, बल्कि वह अशांति भी है जो जीवित रहते हुए मनुष्य को भीतर से जलाती रहती है। जिस व्यक्ति के मन में अपराध, स्वार्थ और दूसरों के लिए कटु...