विचार तो विचार हैं। जो कर्म से बड़ा होता है। यानि आदर्श हो सकता है। जो जीवन की रूपरेखा तय करता है। फिर भी कर्म के बिना विचार का कोई मतलब नहीं होता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- विचारों से बड़ा हमेशा कर्म होता है, कर्म के बिना विचार अधूरा होता है.... इसमें कोई दो राय नहीं है...भारतीय संस्कृति और गीता के अनुसार कर्म को ही गीता का सार माना गया है, चूंकि कर्म पर ही हमारी पहचान , हमारा जीवन, हमारा भविष्य निर्धारित होता है किंतु कहीं ना कहीं हम जानते हैं कि विचारों से ही कर्म की उत्पत्ति होती है बशर्ते कर्म को क्रियान्वित होना जरूरी है। यदि अच्छे विचार होंगे तो कर्म भी अच्छे होंगे। जीवन में सफलता के लिए अच्छे एवं उच्च विचारों का आना तो जरूरी है साथ ही उसे कर्म- रूप में क्रियान्वित करना भी आवश्यक है। केवल विचार करने से ही कुछ नहीं होता, अपने कर्म से उसे मूर्त रूप में भी लाना होता है। हमारे जीवन में कर्म का काफी महत्व है,...