मौन हर कोई नहीं रह सकता है। क्योंकि शब्द गायब हो जाता है। जो साधना का एक पड़ाव कहलाता है। ऐसी स्थिति पर सभी नहीं पहुंचाते हैं। यह काफी अभ्यास के बाद सम्भव होता है। दिल से बड़ा कुछ भी नहीं है। यह सिर्फ ब्रह्म है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- मौन से बड़ा नहीं है शब्द, दिल से बड़ा नहीं है हाथ..... विषय मन के भावों की गहराइयों को छू जाता है.... यह एक भावनात्मक कथन है जो अर्थपूर्ण है... कभी कभी ऐसी विकट स्थिति आ जाती है जब हम अपनी बात को बोलकर अथवा शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते चूंकि उस समय मुख से निकले शब्दों से गलत फहमी भी हो सकती है। शब्दों की अपनी एक सीमा रेखा होती है और हम मौन हो जाते हैं। मौन रहकर हम अपने धैर्य, समझ और अपनी भावनाओं को समेट लेते हैं किंतु यही 'मौन' हमारे अंदर के भावों को बिना किसी शब्द के व्यक्त कर देता है... अर्थात बिना कुछ कहे उन्मुक्त हो शांति और सत्य को परिलक्षित करता है । रही बात दिल से बड़ा नहीं है हाथ...यह उक्त...