विश्वास अर्थात भरोसा एक मानसिक अवस्था है जहाँ हम किसी विशेष प्रमाण के बिना भी किसी बात को सत्य मान लेते हैं ।विश्वास हर किसी पर होता भी नहीं है। विश्वास चाहे स्वयं पर हो या किसी अन्य पर, विश्वास करना वास्तव में सबसे बड़ी कला है क्योंकि यह मनुष्य को मानसिक मजबूती और सकारात्मकता बनाए रखने की क्षमता देता है।यदि हम आत्मविवश्वासी हैं तो मुश्किलों से निकलने का हुनर भी हमारे पास होता है। समस्या का समाधान खोजने की हिम्मत हमारे भीतर अवश्य होती है। विश्वास एक गुण भी है जो मनुष्य को तनाव की स्थिति से बाहर निकालता है। जीवन के अनुभवों से सीख लेने का भाव मन में पैदा करता है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विश्वास चाहे कितना भी पक्का हो लेकिन उसका आधार अति कोमल होता है। जरा सी असावधानी, उपेक्षा, झूठ और वेवफाई से टूट भी जाता है। अतः हर किसी पर विश्वास तो नहीं होता है जिस पर होता है वह अटूट भरोसे के आधार पर ही होता है। उस विश्वास को निभाना अथवा बनाए रखना एक सुन्दर कला है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
सामाजिक जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हमें विश्वास करने की आवश्यकता पड़ती है। देखा जावे तो यह स्थिति दोनों पक्ष के लिए होती है। यह बात भी सच है कि सामान्यत: विश्वास अपनों या परिचितों पर ही करने की आवश्यकता पड़ती है। निश्चित ही इसमें विश्वास टूटने का जोखिम तो होता है। अत: हमें इस संभावना के लिए सजग तो रहना ही चाहिए। विश्वास करना असल में हमारे लिए कला के रूप में परीक्षा भी है, मजबूरी भी है,रिश्ता भी है और प्रेम भी। ऐसे में यदि विश्वास पवित्रता से निभाया जाता है तो यह रिश्ता,प्रेम और आचरण की जीत होती है और नहीं निभाया जाता तो यह चारित्रिक दोष ही प्रमुख माना जाएगा। कहा भी गया है, धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया, किंतु जब चरित्र गया तो सब कुछ गया। सार यही कि जीवन में विश्वास की आवश्यकता तो पड़ती ही है, इसके लिए अविश्वास का विकल्प तो रखना सजगता होगी। साथ ही उसके प्रभाव के परिणाम की तैयारी हमारी समझदारी होगी। इस परिप्रेक्ष्य में जब हम विश्वास को लेकर इतनी विवेचना कर रहे हैं तब हमारा भी दायित्व बनता है कि हम पर कोई विश्वास कर रहा है तो हम उसे पूरी पवित्रता से निभाएं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
वर्तमान समय में जब दुनिया में विश्वास जैसी कोई चीज भी नहीं रही है । बाड़ ही खेत को खा रही है, हाथ को हाथ खा रहा है, ऐसी स्थिति में किसी पर विश्वास करना, जैसे बाजी लगाना हो । लेकिन विश्वास किए बगैर एक पल भी काम नहीं चलता । विश्वास के दो पहलू हैं - खुद पर तथा दूसरों पर । खुद पर विश्वास के लिए लक्ष्य पर अटूट विश्वास, सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करना, खुद पर भरोसा करना, धैर्य रखना आदि । दूसरों पर विश्वास करने का मापदंड है - विज्ञान अर्थात बार-बार करके देखना, परखना फिर अगर विश्वास योग्य लगे तो करना ।
- बसन्ती पंवार
जोधपुर - राजस्थान
विश्वास कोई भोली भावना नहीं, बल्कि विवेक से उपजी चेतना है। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक व्यक्ति विश्वास के योग्य नहीं होता, पर यही जीवन का यथार्थ है। उक्त यथार्थ की कसौटी पर सही व्यक्ति, सही समय और सही उद्देश्य पर विश्वास कर पाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी कला है। यह कला डर से नहीं, अनुभव से निखरती है, यह आँख मूँदकर नहीं, बल्कि आँख खोलकर लिया गया निर्णय होती है। विश्वास कायरता नहीं, साहस है, क्योंकि इसमें टूटने का जोखिम निहित होता है। विश्वास अशक्ति नहीं, बल्कि वह आन्तरिक शक्ति है जो आत्मसम्मान, धैर्य और सत्यनिष्ठा से जन्म लेती है। जो व्यक्ति विश्वास करना और सम्बन्धों को जोड़ना जानता है, वही समाज को गति देता है और राष्ट्र को नैतिक आधार प्रदान करता है। वर्तमान अविश्वास के युग में विश्वास करना स्वयं में एक क्रांतिकारी कर्म है। यह उद्घोष करता है कि हम सन्देह से ऊपर उठकर न्याय, करुणा और कर्तव्य के साथ खड़े हैं। विवेकपूर्ण विश्वास ही लोकतन्त्र की धड़कन, न्याय की आत्मा और मानवता की पहचान है। अतः विश्वास सब पर नहीं, पर जहाँ किया जाए, वहाँ पूर्ण उत्तरदायित्व, सत्य और साहस के साथ किया जाए। यही विश्वास की कला है, यही मनुष्य होने का गौरव और यही सत्साह है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
विश्वास एक ऐसा शब्द है, जिसमें ग़ज़ब की मिठास है और ग़ज़ब की खटास भी! एक विश्व की आस (विश्व + आस) यानी मिठास है. दूसरे विष का वास (विष + वास) यानी खटास है.एक समय था जब किसी पर भी, किसी भी समय विश्वास किया जा सकता था. उस समय दिलों में ईमानदारी थी, मुखौटों का चलन नहीं था. अब ईमानदारी किसी कोने में छिपी हुई है और मुखौटों का बोलबाला है. इसलिए विश्वास तो हर किसी पर नहीं होता है. विश्वास सही इंसान पर करना और सही समय पर करना वास्तव में एक बड़ी कला है. हर किसी पर आँख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि विश्वास एक नाजुक धागा है, जो टूट जाए तो वापस नहीं जुड़ता. यह कला धैर्य, सही निर्णय लेने की क्षमता और सामने वाले को परखने के हुनर से विकसित होती है, जो जीवन को सरल और संबंध को गहरा बना सकती है. ध्यान से देखा जाए तो उसके हाव-भाव, आंखों की हलचल से पता लग सकता है. लेकिन इसमें भी धोखा देने वाले अभिनय में माहिर होते हैं. यही कारण है कि विश्वास करना सबसे बड़ी कला होता है और हर किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
विश्वास तो हर किसी पर नहीं होता है, पर कभी-कभी करना पड़ता है. बिना विश्वास के कोई काम नहीं होता है. हर चीज़ में विश्वास की जरूरत होती है. किस पर विश्वास करना है, किस पर नहीं करना है यह भी एक बहुत बड़ी कला है. अगर हम किसी गलत व्यक्ति पर विश्वास कर लेते हैं और वह हमें धोखा देता है तो हमें बहुत गहरा आघात लगता है. इसलिए बहुत सोच समझकर किसी पर विश्वास करना चाहिए. पर मुश्किल यह है कि वैसे व्यक्ति की पहचान हम कैसे करेंगें. फिर भी मजबूरी में किसी काम को करवाने के लिए विश्वास करना ही पड़ता है. प्रेम में, व्यापार में, शादी विवाह में यानी जीवन के हर क्षेत्र में आदमी को किसी न किसी पर विश्वास करना ही पड़ता है. विश्वास पर ही तो ये दुनिया चलती है और चलती रहेगी.
- दिनेश चन्द्र प्रसाद " दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
विश्वास हर किसी पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि विश्वास भावुकता नहीं बल्कि विवेक से उपजी अनुभूति है। विश्वास करना एक ऐसी कला है जिसमें सामने वाले के आचरण, नीयत और निरंतरता को परखना पड़ता है। जो व्यक्ति बिना समझे विश्वास करता है, वह अक्सर धोखा खा जाता है, जबकि सच्चा विश्वास सोच-समझकर किया गया वह निर्णय होता है जो रिश्तों को मजबूती देता है। विश्वास केवल संबंधों की नींव नहीं है, बल्कि समाज और जीवन को जोड़ने वाला सूत्र भी है। साथ ही, विश्वास का संबंध आत्मविश्वास से भी गहराई से जुड़ा है, क्योंकि जो स्वयं पर विश्वास करता है, वही दूसरों पर संतुलित और सही विश्वास कर पाता है। इसीलिए कहा गया है कि विश्वास करना सरल नहीं, बल्कि अनुभव, संयम और समझ से विकसित होने वाली मनुष्य की सबसे बड़ी कला है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
विश्वास तो हर किसी पर नहीं होता, विश्वास करना सबसे बड़ी कला है ।यह दोनों बातें बिल्कुल ही सही है क्योंकि विश्वास हम उन्ही पर करते हैं जिन पर हमें पूरा भरोसा होता है। हम जिससे पूर्ण संतुष्ट होते हैं उन्ही पर भरोसा करते हैं और उन्ही पर विश्वास करते हैं।किसी से अपना काम निकलवाना हो तो सबसे पहले जो आवश्यकता होती है वह विश्वास की होती है। हम तभी कामयाब होते हैं जब सामने वाले को अपने विश्वास में ले ले। इसलिए कहा गया है की विश्वास करना सबसे बड़ी कला है।अब बात करता हूं सामने वाला व्यक्ति हमारे ऊपर विश्वास करके हमसे कोई उम्मीद रखता है तो हमारी जवाबदारी है कि हम उसकी बात पर खरे उतरे ।
- रविंद्र जैन रूपम
धार - मध्य प्रदेश
विश्वास हर किसी पर नहीं किया जा सकता ! विश्वास उसपर ही हम करते हैं , जिसकी बातें हमें ठीक लगती हैं , जो अपने कृत्यों से उसकी बात समझाने और समझने मैं कामयाब होता है ! आजकल की दुनियां में सबसे खतरनाक वो लोग होते हैं , जो बगल मैं छुरी और मुंह से रामराम बोलते हैं ! ऐसे व्यक्ति मीठी छुरी की तरह होते हैं , आत्मीयता का ढोंग करते हैं , व मतलब निकल जाने पर विश्वासघात करते हैं , व बाद मैं पहचानते भी नहीं !! विश्वास करना भी एक कला है क्योंकि जो विश्वसनीय और अविश्वसनीय में भेद करना सीख जाए , वही इस कला मैं निपुण है , व उसे यह कला आती है ! गलत जगह विश्वास के , धोखे तो अधिकांश लोग खाते ही हैं ! विश्वास पर दुनियां कायम है , पर यह विश्वास यदि हम सही व्यक्ति पर कर पाएं , तो हम कामयाब होते हैं , अन्यथा धोखा मिलना निश्चित है !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
हम हर किसी पर विश्वास कर पायें यह संभव नहीं और हर कोई हम पर विश्वास करे यह कोई जरूरी नहीं। हमारे विश्वास पर कौन कितना खरा उतरेगा इसका पता लगाना हमारे हाथ में कतई नही है लेकिन किसी के विश्वास पर खरा उतरने की हर कोशिश सिर्फ और सिर्फ हमारे हाथ में ही है। जब हम किसी पर विश्वास कर रहे होते हैं तो महज उसपर विश्वास नहीं कर रहे होते बल्कि उसे यह यकीन दिला रहे होते हैं कि तुम अपने हो और तुम्हारे बारे मे कही गई किसी भी बात को तुमसे बात किए बिना हम सही नहीं मानेंगे।किसी से यह कहना मामूली काम नहीं है, बड़ी कला है।
- दर्शना जैन
खंडवा - मध्यप्रदेश
आज का समय ऐसा है एक हाथ को दूसरे हाथ पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए, फिर भी हम विश्वास करते हैं, करना भी चाहिए क्यों कि यकीन पर ही दुनिया कायम है । विश्वास पर ही रिश्ते कायम है जहां विश्वास नहीं वहां रिश्ते की डोर कमजोर पड़ कर टूट जाती है । विश्वास करना वास्तव में एक कला है, जो हमें दूसरों के साथ जुड़ने और जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है। एक विश्वास ही हमें अपने डर और संदेहों को पार करने की शक्ति देता है।विश्वास करने से हम अपने रिश्तों में गहराई और मजबूती ला सकते हैं, और दूसरों के साथ मिलकर कुछ नया और बड़ा बना सकते हैं। लेकिन साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि हम अपने विश्वास को सही जगह और सही लोगों पर रखें, ताकि हम निराश न हों। विश्वास करना एक ऐसी कला है जो हमें जीवन में आगे बढ़ने और सफल होने में मदद कर सकती है।
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
विश्वास दुनिया का ऐसा शब्द है जो भावनाओं का विराट विश्व अपने भीतर समाये हुये है। विश्वास करवाया नहीं जा सकता। विश्वास भीतर से उपजता है जो हर किसी पर नहीं होता। यह बात दोनों पक्ष पर लागू होती है। विश्वास जजिस पर करना है वह कर्ता और विश्वास जिस पर किया जाये वह कर्मवाहक।हो सकता है कि विश्वास करना सबसे बड़ी कला हो - - प्रायः यही माना जाता है लेकिन मैं मानती हूँ कि विश्वास कला से ज्यादा आपकी बुद्धि का प्रयोग है। बुद्धि के सकारात्मक और नकारात्मक प्रवाह आपकी दिशा निर्धारित करते हैं जिसके अनुसार आपको सामनेवाले पर भरोसा होता है और यही भरोसा विश्वास उत्पन्न करता है। ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास और मानवीय सांसारिकता पर विश्वास दोनों एक साथ चल सकते हैं बशर्ते कि आपके भीतर एक सच्चा दिल हो। कलुषित दिल के साथ आप न किसी पर विश्वास कर सकते हैं न किसी का विश्वास हासिल कर सकते हैं। अतः सबसे बड़ी बात यही है कि अपने आप कोय विश्वसनीय बनायें। विश्वास ही इंसान को अपने-परायों के बीच बैठाता है - - या उठाता है। विश्वास कमाइये और जीवन की सच्ची कला के अनुसार आगे बढिये।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
आज के युग में हर किसी पर विश्वास करना ख़तरे से ख़ाली नहीं और अपने पैरों पर ख़ुद कुल्हाड़ी मारने जैसा काम है। दोस्त, रिश्ते, पड़ोसी सभी पीठ पीछे छुरा घोंपने पर तैयार रहते हैं।बढ़ते साइबर क्राइम ने तो विश्वास की जड़ें ही खोद दी हैं। ग़रीब, धार्मिक बाबा आदि कोई भी विश्वास के लायक नहीं हैं । पर फिर क्या करें? क्या सभी हमें मारने, हमारा कुछ बिगाड़ने के लिए ही चले आ रहे हैं?क्या उनके चाहने भर से वो हमारा वो सब कुछ बिगाड़ सकते हैं जो वो चाहते हैं ?क़तई नहीं! हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता चाहे वो लाख कोशिश करें। हमारे बारे में हमारी पीठ पीछे कोई कितना ही उल्टा पुल्टा क्यों न बोलता रहे, कितनी ही राजनीति क्यों न कर ले। हमें जो पाना है, खोना है यश -अपयश सभी निश्चित है। यदि उसे कोई बदल सकता हैं तो हम स्वयं बदल सकते हैं अपनी संकल्पशक्ति अपने मस्तिष्क की उपज से। यदि हम हर समय श़क और अविश्वास की स्थिति में रहेंगे तो हमारा मस्तिष्क नकारात्मक ऊर्जा से भरा रहेगा। हमारे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। अविश्वास की नहीं थोड़ा सतर्क रहने की आवश्यकता है। होशियार व विवेकपूर्ण रहें। स्वयं विश्वास के पात्र बनें। किसी ने आपका विश्वास तोड़ा भी है तो उसे माफ़ कर दें वह आगे बढें। यदि आपने कुछ खोया है तो शायद वह उसी का था अथवा उसे उसकी आप से अधिक आवश्यकता थी। यदि वह आपका है तो कभी ना कभी, किसी न किसी रूप में आपके पास लौट कर अवश्य आएगा। चिंता न करें। अभी भी इस संसार में बहुत कुछ विश्वास के आधार पर हो रहा है।
- रेनू चौहान
नई दिल्ली
यह सच है हर व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति उसके सिद्धांत, उसकी अच्छाइयों पर भरोसा नहीं होता। पक्का विश्वास पाने और जमाने के लिए व्यक्ति व्यावहारिक स्तर पर परखने पर ही उसपर दृढ विश्वास कर पाता है ।क्योंकि यदि आंख मूंदकर किसी पर विश्वास कर भी लिया तो भय फिर भी बना ही रहता है, जब तक अपना उद्देश्य पूरा नहीं हो जाए । फिरभी हमें अपने कार्य से दूसरों को भरोसेमंद तरीकों से सच्चाई और ईमानदारी के साथ जानकारी लेनी और देनी चाहिए। तभी विश्वसनीयता बन सकती है। सामाजिक जीवन में रिश्तों को कायम रखना ,बैंक के वित्तीय कार्य, रोजगार में कर्मचारियों के प्रति पारदर्शिता, ईमानदारी का ज्ञान रखकर सजग रहना आवश्यक है । यह भी मानना होगा बहुत अच्छा प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी अपना पूर्ण ध्यान विश्वास पर रखते हैं यही उनकी कलाकारी है। इतना ध्यान जरूरी है कहीं भी अंधविश्वास ना हो। बल्कि सकारात्मक विचार के साथ जीने की कला ही विश्वास की सफलतम ऊर्जा है।
- डॉ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
देखिए! विश्वास के बिना दुनिया नहीं चलती। न परिवार चलता है, न ही कोई संस्था और दोस्ती भी विश्वास पर ही कायम रहती है। भले ही विश्वास सभी पर नहीं किया जा सकता परन्तु प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी पर तो विश्वास करना ही होता है। जैसे हम परिवार में माता-पिता पर विश्वास रखते हैं, भाई-बहन अथवा जीवन साथी पर। उन्हीं के कारण से हम जिंदगी भर निर्भय होकर जी भी पाते हैं। इसके अतिरिक्त स्कूल, दफ्तर अथवा दुकानदारी के किसी भी काम में जब हम अकेले कार्य नहीं कर पाते तो हमें किसी दूसरे की आवश्यकता अवश्य पड़ती है। ऐसे में दूसरों पर विश्वास तो करना ही पड़ता है। यदि विश्वास नहीं करेंगे तो हम अपने जीवन में पीछे रह जाएंगे, औरों के संग कदम से कदम मिलाकर चल नहीं पाएंगे। जिंदगी में ठहराव आ जाएगा और तनाव में जीने लगेंगे। दूसरों पर विश्वास करने के लिए भगवान शिव की भांति आधी आंखें खुली रखनी पड़ती हैं और आधी बंद। तभी हम दूसरों से सहायता ले पाते हैं दूसरों के संग काम कर पाते हैं। दूसरों की बात छोड़ो, शत्- प्रतिशत हम अपनी ही नज़रों में भी सही नहीं होते तो दूसरे की नज़रों में कैसे होंगे और दूसरा हमारी नज़रों में कैसे होगा। यह भी एक कला है कि हम दूसरों पर विश्वास कर सकें। किसी एक व्यक्ति को सभी लोग अच्छा कहते हैं वह क्यों कहते हैं? क्योंकि उसको सभी के साथ रहने की कला आती है, और तो और उस व्यक्ति के साथ मिलकर कार्य करने को हर कोई तत्पर रहता है क्योंकि वह विश्वास की कला को जानता है। किसी भी व्यक्ति से वह अपना काम करवा सकता है। वह सभी पर भरोसा करता है और सभी उस पर करते हैं। किस पर कितना विश्वास होता है, कितना नहीं यह एक अलग विषय है। जैसे हर काम की एक कला होती है, ठीक वैसे ही विश्वास की भी एक कला होती है तभी कोई व्यक्ति धरा से आसमां तक पहुंचकर सभी का प्रिय बन पाता है।
- डॉ.संतोष गर्ग 'तोष'
पंचकूला - हरियाणा
रखना इस विश्वास को, नहीं कभी आसान। सदा चुनौती यह हुई,देना सँग सम्मान।।
देना सँग सम्मान,अडिग बातों पर रहना।
भड़काते हैं लोग,नहीं फिर भी है बहना।।
एक शब्द विश्वास,इसे जीवन में चखना।
जो हो हृदय समीप,भरोसा उस पर रखना।।
जी हाँ,यह सत्य है कि किसी पर विश्वास कर पाना बहुत कठिन है। किंतु यदि विश्वास बन गया है तो फिर डिगना भी नहीं चाहिए।जीवन में बहुत सारे ऐसे लोग मिलते हैं जो हमें अपने विश्वसनीय पात्र के लिए भड़काते हैं, किंतु इसी समय हमारे विश्वास की वास्तविक परीक्षा होती है, जिसमें सही उतरना भी बहुत बड़ी चुनौती है।जिस तरह से सोना को तपाकर खरा किया जाता है उसी तरह से ये विश्वास है जो जितनी परीक्षा दे ,उतना ही मजबूत होता जाता है।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
विश्वास सब पर नहीं होता, क्योंकि विश्वास केवल शब्दों या संबंधों से नहीं, बल्कि अनुभव और आचरण से जन्म लेता है। हर व्यक्ति, हर परिस्थिति विश्वास के योग्य नहीं होती—यही समझ विकसित होना ही परिपक्वता है। अंधा विश्वास हमें बार-बार ठेस पहुँचा सकता है, जबकि विवेकपूर्ण विश्वास संबंधों को मजबूती देता है। विश्वास करना वास्तव में एक कला है, जिसमें संतुलन आवश्यक है—न अत्यधिक संदेह, न पूर्ण भोलापन। यह कला हमें सिखाती है कि कब दिल से भरोसा करें और कब बुद्धि से सावधान रहें। सही समय, सही व्यक्ति और सही सीमा तक किया गया विश्वास ही सार्थक होता है। विश्वास समय के साथ बनता है, व्यवहार से परखा जाता है और जिम्मेदारी से निभाया जाता है। जो व्यक्ति विश्वास की इस कला को समझ लेता है, वह जीवन में ठगा नहीं जाता, बल्कि मजबूत, सुरक्षित और सुसंयत संबंधों का निर्माण करता है।
- रंजना वर्मा उन्मुक्त
रांची - झारखंड
Comments
Post a Comment