मनुष्य का जीवन दो आधारों पर टिका होता है—कर्म और भाग्य। भाग्य हमें इस संसार में जन्म देता है, परिस्थितियाँ देता है, और एक दिशा प्रदान करता है। लेकिन केवल भाग्य ही सब कुछ नहीं होता। यदि मनुष्य कर्म न करे, तो उसका भाग्य भी निष्क्रिय रह जाता है।कर्म ही वह साधन है, जिससे मनुष्य अपनी पहचान बनाता है। एक साधारण व्यक्ति भी अपने परिश्रम, ईमानदारी और समर्पण से महान बन सकता है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ लोगों ने अपने कर्मों से अपनी अलग पहचान बनाई है।भाग्य हमें अवसर देता है, लेकिन उन अवसरों को सफलता में बदलना हमारे कर्म पर निर्भर करता है। यदि हम अपने कर्तव्यों को निष्ठा से निभाएँ, तो भाग्य भी हमारा साथ देने लगता है। यह सत्य है कि भाग्य हमें इंसान बनाता है, परंतु कर्म हमें विशेष और सम्माननीय बनाता है। इसलिए जीवन में कर्म को सर्वोपरि मानकर आगे बढ़ना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।
- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'
मुंबई - महाराष्ट्र
इस बात में कोई संदेह नहीं की भाग्य जन्म के साथ ही पिछली परिस्थितियों के अधार पर मिलता है लेकिन कर्म हमारे वर्तमान और भविष्य की पहचान बनाते हैं वास्तव में यह दोनों जीवन के दो पहलू हैं लेकिन भाग्य उसे कह सकते हैं जो हमें मिला है और कर्म वह हैं जो हम करते हैं लेकिन हम इस बात को ठुकरा नहीं सकते कि भाग्य लेकर ही हम इंसान की योनि में आये हैं मगर हम क्या कर रहे है वो हमारे कर्म हैं जिनसे हमारी पहचान बनना संभव है तो आईये आज की चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि, कर्म से पहचान बनती है और भाग्य से इंसान बनता है, मेरे ख्याल में पूर्व जन्मों या अतीत के कर्मों का फल माना जाता है और भाग्य ही केवल हमें शरीर, परिवार और शुरूआती परिस्थितियां प्रदान करता है और कर्म व्यक्ति की पहचान बनाते हैं जब हम मेहनत, ईमानदारी और अच्छे कर्म अच्छे चालचलन रखते हैं तो हमारी बैसी ही पहचान बनती है इसमें भाग्य कोई रोल अदा नहीं करता क्योंकि व्यावहारिक और आध्यात्मिक की दृष्टिकोण से कर्म में इतनी सामर्थ्य है कि वो बुरे भाग्य को भी अच्छे भाग्य में बदल सकता है,यह सत्य है कि जीवन में संघर्ष और परिस्थितियां भाग्य से आ सकती हैं लेकिन उन परिस्थितियों में आप क्या करते हैं वही आपकी असली पहचान निधार्रित करता है, देखा जाए भाग्य वह स्थिति है जो हमें बिना प्रत्यक्ष प्रयास से मिलती है जबकि कर्म वह प्रक्रिया है जिससे हम अपना भविष्य लिखते हैं इसलिए भाग्य के भरोसे न बैठकर अपने कर्मों को पूरी निष्ठा के साथ करना चाहिए क्योंकि कर्म ही जीवन की दशा और दिशा को तय करते हैं, अन्त में यही कहुंगा कि कर्म और भाग्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जबकि कर्म हमारे द्वारा किए गए कार्य हैं और भाग्य उन कार्यों कापरिणाम जबकि पूर्व जन्मों के कर्म भाग्य बनाते हैं लेकिन वर्तमान के अच्छे कर्मों से भाग्य को बदला जा सकता है जबकि कर्म अधिक प्रबल हैं, सत्य तो यह है बिना मेहनत यानि कर्म के भाग्य नहीं बनता इसलिए कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है जिससे हमारी पहचान बनती है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
खुदा के बंदे हैं हजारों फिरते हैं मारे मारे
मैं वो बंदा बनूगा जिसपे खुदा का प्यार वारे।।
इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि भाग्य से ही इंसान को बहुत कुछ हासिल होता है। निःसंदेह कर्म का अपना महत्व है लेकिन करम अर्थात भाग्य भी कम मायने नहीं रखता। करम अर्थात भाग्य ही इंसान को ऊंचा उठाता है या नीचे गिराता है। कर्म कितना भी अच्छा हो भाग्य मे न हो तो फल नहीं मिलता। इंसान अपने भाग्य से नहीं लड सकता। जिसके भाग्य में ऊंचाईयां हैं उसे जन्म से गरीबी मिले या अमीरी भाग्य उसे खुशनसीबी दे ही देता है। सच है कि कर्म ही पूजा है लेकिन सिर्फ पूजा से कुछ नहीं होता। हम जानते हैं प्रत्येक प्राणी प्रयासरत रहता है लेकिन कर्म के प्रयोजन सच्चे पथ दर्शक होते है - - हमारा मार्ग निर्धारित करते हैं और तद्नुसार हमारा भाग्य हमें गढता है। तात्पर्य यही कि इंसान चाहे तो भाग्य के हाथों सामान्य इंसान बने या कर्म से कर्म वीर - - दोनों ही स्थितियों में इंसान को समर्पित समाज रत्न बनना चाहिये - - यही मानवमात्र की सच्ची पहचान है
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
ये सत्य है कि कर्म से पहचान बनती है और भाग्य से इंसान बनता है. जो जैसा कर्म करता है लोग उसे उसी रूप में पहचानते लगते हैं. जैसे कोई कविता लिखता है तो उसे कवि के रूप में, कोई गाता है तो उसे गायक के रूप में, कोई बिगड़ा हुआ समान बनाता है तो उसे मिस्त्री के रूप में, कोई अच्छा व्यवहार करता है तो उसे भले आदमी के रूप में, चोरी करने वाले को चोर के रूप में. यानी जो जैसा किया उसकी पहचान वैसी ही बन जाती है. लेकिन कहा जाता है कि कर्म से ही भाग्य बनता है और भाग्य से ही मनुष्य इंसान बनता है. अगर देखा जाए तो सब एक साथ जुड़े हुए हैं और सबका मुल कर्म ही है. अगर कोई कर्म नहीं करता है तो कुछ नहीं होने वाला.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - पश्चिम बंगाल
दुनिया में हमे पहचान हमारे कर्म से मिलते है ! जातीयता कर्म ही इंसान की पहचान बताती है ! जो अमुख प्राणी से मिलती है ! जिसके कर्म आदत स्वभाव ख़ान पान रंग रूप पहरावा बताता है ! यह उस राज्य गाँव का है !उसके स्वभाव में सौम्यता श्रेष्ठता उदंडता उस व्यक्ति गाँव से मिलती है जहाँ पर लोग बुद्धि के ज्ञाता है अपनी हस्ती अपने कर्म से बना शिखर को प्राप्त करते है दिनकर ,निराला,लाल की तरह अटल आत्म विश्वास बच्चन ,प्रेमचंद सम्मान मिलता है, जो हमारे आत्म-विश्वास को शिक्षा कर्म से बढ़ाते है !कर्म से पहचान बनती है और भाग्य से मानवता को जगाते इंसान बनता है! जो हमें कर्म और भाग्य के महत्व को समझाता गीता, रामायण, महाभारत भारतीयों की अपनी सांस्कृतिक विरासत का एक महान गौरवपूर्ण अनुसरण है। कर्म करने से हमें आंतरिक संतुष्टि मिलती है और हमारा आत्म-विश्वास बढ़ता है।भाग्य जीवन की दिशा को निर्धारित करता है, और इसके बिना हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकते।अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करता है, जो हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करती हैं।भाग्य हमें आंतरिक शक्ति देता है, जो हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है।कर्म और भाग्य संयोजन सफलता का मार्ग है, और इसके बिना हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकते।कर्म और भाग्य का संयोजन हमें आंतरिक संतुष्टि देता है और हमारा जीवन सुखी और समृद्ध बनाता है।
- अनिता शरद झा
रायपुर -छत्तीसगढ़
दुख में जो जीता रहे,नहीं किया संघर्ष।
अस्त हुआ रवि भाग्य का, नहीं मिला फिर हर्ष।।
कर्म सदा सुंदर करो,तभी उदय हो भाग्य।
प्रिय मत रख आलस्यता, रखना मन वैराग्य।।
सत्य है कि सुंदर कर्म से ही हमारी पहचान बनती है। यदि बिना प्रयास किये ही हम विचार करते रहें कि हमारी पहचान बन जाए तो यह कभी संभव नहीं है वह व्यक्ति तो कर्महीन ही कहलाएगा और चमकता भाग्य भी पहली बार व्यक्ति के दरवाजे पर दस्तक देता ही है यदि हम आलस्य ही करते रह जाएंगे तो सुंदर भाग्य तो दरवाजे से ही लौट जाएगा और हम मनुष्य- जीवन पाकर भी इसको अर्थपूर्ण नहीं कर पाएंगे। इंसान तभी इंसान कहलाता है जब वह अपने सुंदर व्यक्तित्व के होने का आभास करवा देता है।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
कर्म से पहचान बनती है। कर्म का बहुधा तीन तरह से आकलन किया जाता है। एक अच्छा कर्म करने वाला,दूसरा बुरा कर्म करने वाला और तीसरा कुछ न करने वाला यानी निकम्मा, आलसी। इसी आधार पर पहचान भी बन जाती है। फिर यही कर्म भाग्य के रूप में प्रतिफल देते हैं। जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित भी करते हैं। अच्छे कर्म से सुख-समृद्धि मिलती हैऔर मान-सम्मान मिलता है।वहीं बुरे कर्म से दुख और संघर्ष में वृद्धि होती है। अपयश मिलता है मान-सम्मान को ठेस पहुंचतीन है। इसी प्रकार आलसी व्यक्ति का जीवन भी हताशा और निराशा से भरा होता है। अनादर झेलना पड़ता है। सार यही कि जब जीवन मिला है तब कर्म तो करना ही पड़ेगा और जब कर्म करना है तो बुरे कर्म करने से बचना चाहिए। आलस्य को त्यागकर जितनी सामर्थ्य हो उसके अनुसार कर्म करते रहना चाहिए। ऐसे में अच्छा भले न हो, बुरा तो नहीं होगा। सामान्य जीवन भी औसतन ठीक जीवन माना जाता है। बात समझने की और अपनाने की है। जैसा कर्म वैसी पहचान, वैसा प्रतिफल।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
कर्म ही पूजा है,इसे जो आत्मसात करता है,उसकी पहचान बनती है।अच्छे कर्म करने से फल अच्छा मिलता है। संस्कार, शिष्टाचार परिलक्षित होती है। सभ्य आचरण मानव को कर्मवीर बनाता है।नेक कर्म करके मान-सम्मान,पद- प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।नये आयाम कर्म के बल पर मानव सृजित करता है। नवलकीर्तिमान जीवन में स्थापित करता है।समाज उस कर्मवीर के कर्मों का बखूबी बखान करता है।लोग उसके पदचिन्हों में चलने का प्रयास करते हैं।साथ ही प्रेरणास्रोत मानते हैं।उनके कार्यों से प्रेरित होकर यश की प्राप्ति होती है।श्रेषठ गुणों की सराहना मुक्त कंठों से की जाती है। कर्म मानव निश्छल भाव से पूरी निष्ठा,लगनता से करता है। अच्छा से अच्छा प्रदर्शन कर वाहवाही बटोरता है।समाज उसे सुर्खियों में लाकर पहचान देता है।यह उसकी अनमोल धरोहर होती है। कर्म करने वाले को ही भाग्य साथ देता है।जो सिर पे हाथ धरे बैठे रहते हैं वे निकम्मा घोषित किये जाते हैं।हेम भावना से लोग उन्हें देखा करते हैं। भाग्य तब खुलता है जब मानव कर्म करता है।यह कर्म सकारात्मक ऊर्जा के साथ, एकाग्रचित्त होकर करने से कामयाब होने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है। भाग्य भरोसे बैठे रहने से कुछ भी हासिल नहीं होता।भाग्य रेखाएं दिन-प्रतिदिन बदलती रहती हैं। इन्हें सजाने-संवारने का कार्य कर्म करने से होता है।तब जाकर भाग्य द्वार खुलते हैं मानव प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।हर जगह कार्यों की प्रशंसा होती है।मनोबल, कार्य करने का जज्बा बढ़ता है। अपने आप में इंसान को गर्व की अनुभूति होती है।सदैव तरक्की करता है। अपार खुशियां मिलती है। जीवन सुखमय व्यतीत करता है।
- डॉ. माधुरी त्रिपाठी
रायगढ़ - छत्तीसगढ़
मानव जीवन में कर्म और भाग्य दोनों का विशेष महत्व है, किंतु इनकी भूमिका अलग-अलग होती है। भाग्य हमें जन्म, परिस्थितियाँ और अवसर देता है, जबकि कर्म उन अवसरों को सार्थक बनाने की क्षमता प्रदान करता है। वास्तव में, भाग्य हमें इंसान बनाता है, पर हमारी असली पहचान हमारे कर्मों से ही बनती है। यदि किसी व्यक्ति को उत्तम परिस्थितियाँ मिलें, पर वह कर्महीन हो, तो उसका जीवन व्यर्थ हो सकता है। वहीं, कठिन परिस्थितियों में जन्मा व्यक्ति भी अपने सत्कर्मों के बल पर समाज में सम्मान और पहचान प्राप्त कर सकता है। इतिहास गवाह है कि महान व्यक्तित्वों ने अपने कर्मों से ही अपना स्थान बनाया, न कि केवल भाग्य के भरोसे। कर्म हमारे चरित्र, व्यक्तित्व और मूल्यों को दर्शाता है। यह हमें न केवल सफलता दिलाता है, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी बनाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम भाग्य पर निर्भर रहने के बजाय कर्म को अपना मार्गदर्शक बनाएं। अंततः कहा जा सकता है कि भाग्य हमें जीवन देता है, लेकिन कर्म उसे अर्थ और पहचान प्रदान करता है।
- अर्चना झा
पानीपत - हरियाणा
मनुष्य का जन्म भाग्य का परिणाम हो सकता है, परन्तु उसका उत्थान, उसका गौरव और उसकी अमर पहचान केवल उसके कर्मों की देन होती है। भाग्य हमें जीवन देता है, किन्तु कर्म हमें उद्देश्य देता है; भाग्य हमें अस्तित्व देता है, किन्तु कर्म हमें व्यक्तित्व देता है। वास्तव में, भाग्य एक अवसर है अर्थात एक प्रारम्भिक बिन्दु। किन्तु कर्म वह अग्नि है, जो उस अवसर को उपलब्धि में, संघर्ष को सफलता में, और साधारण जीवन को प्रेरणास्रोत में परिवर्तित करती है। जो व्यक्ति अपने कर्मों में उत्कृष्टता, सत्य, साहस और समर्पण का समावेश करता है, वही अपने भाग्य का निर्माता बन जाता है। आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम अपने भाग्य को कोसें, बल्कि इस बात की है कि हम अपने कर्मों को इतना ऊँचा उठाएं कि भाग्य स्वयं हमारे द्वार पर आकर खड़ा हो जाए। इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने कर्म को पूजा माना, वही युगपुरुष बने, वही राष्ट्र के पथप्रदर्शक बने। यह विचार केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला भी है। जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्म को ईमानदारी, निष्ठा और राष्ट्रहित से जोड़ देता है, तब एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण होता है। कर्म ही वह शक्ति है, जो व्यक्ति को नागरिक बनाती है और नागरिक को राष्ट्रनायक। अतः आइए, हम यह संकल्प लें कि हम अपने कर्मों को इतना उत्कृष्ट, इतना सकारात्मक और इतना प्रभावशाली बनाएँ कि हमारी पहचान केवल हमारे नाम से नहीं, बल्कि हमारे कार्यों से हो और वही कार्य राष्ट्र की प्रगति का आधार बनें।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू एवं कश्मीर
कर्म ही इंसान को पहचान दिन आता है और अच्छे कर्म ही इंसान का भाग्य बदल देता है इसी बात को आगे बढ़ाते हुए में इस बात को पूरी तरह विस्तार से लिख रही हूं मनुष्य का जीवन अनेक आयामों से मिलकर बना है, जिसमें कर्म और भाग्य दो ऐसे स्तंभ हैं, जो उसके अस्तित्व और व्यक्तित्व को आकार देते हैं। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि जीवन में अधिक महत्वपूर्ण क्या है—कर्म या भाग्य? वस्तुतः दोनों का अपना-अपना स्थान है, परंतु इनकी भूमिका अलग-अलग है। कर्म से पहचान बनती है मनुष्य अपने कर्मों से ही जाना जाता है। उसका व्यवहार, उसके कार्य, उसकी निष्ठा और परिश्रम ही उसकी पहचान गढ़ते हैं। इतिहास साक्षी है कि जिन लोगों ने अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाया, वे समय के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ गए। कर्म वह शक्ति है, जो व्यक्ति को साधारण से असाधारण बना देती है। यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी, परिश्रम और समर्पण के साथ कार्य करता है, तो उसकी पहचान समाज में स्वतः बन जाती है। कर्म ही वह दर्पण है, जिसमें व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप झलकता है। भाग्य से इंसान बनते हैं भाग्य वह अदृश्य शक्ति है, जो हमें जीवन का आधार देती है—हमारा जन्म, परिवार, परिस्थितियाँ और अवसर। यह सत्य है कि हम किस घर में जन्म लेंगे, यह हमारे वश में नहीं होता। यही भाग्य का क्षेत्र है।भाग्य हमें एक प्रारंभिक मंच देता है, लेकिन उस मंच पर हम क्या प्रदर्शन करते हैं, यह हमारे कर्म पर निर्भर करता है। भाग्य हमें इंसान बनाता है, परंतु महान इंसान बनने के लिए कर्म आवश्यक है।
कर्म और भाग्य का संतुलन :-
जीवन में केवल भाग्य पर निर्भर रहना निष्क्रियता को जन्म देता है, जबकि केवल कर्म पर अहंकार उत्पन्न हो सकता है। इसलिए दोनों का संतुलन आवश्यक है। भाग्य अवसर देता है, कर्म उसे उपलब्धि में बदलता है।जैसे बीज हमें मिलता है, परंतु उसे बनाने के लिए सिंचाई और देखभाल करनी पड़ती है। अतः यह स्पष्ट है कि भाग्य हमें जन्म देता है, लेकिन कर्म हमें पहचान देता है। यदि मनुष्य अपने कर्मों को श्रेष्ठ बना ले, तो वह अपने भाग्य को भी बदलने की क्षमता रखता है। इसलिए हमें भाग्य को स्वीकार करते हुए कर्म को अपना धर्म बनाना चाहिए, क्योंकि अंततः पहचान उसी की बनती है, जो कर्म करता है।
- अलका पाण्डेय
मुम्बई - महाराष्ट्र
यही सत्य है कि कर्म से इंसान की पहचान बनती है जब हमारे कर्म स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए हितकारी, लाभकारी हों ; सबको संतुष्ट करने वाले हों तो इससे प्रथम तो हम स्वयं ही मानसिक रूप से संतोष अनुभव करते हैं साथ ही हमें समाज में सम्मान भी प्राप्त होता है। हमारी अनुपस्थिति में लोग हमारे कार्य से हमें याद करें ऐसे कर्म ही सुकर्म होते हैं। ना कि नाम से पहचान हो। ऐसे कर्म में विश्वास रखने वाले सदैव आगे बढ़ने वाले आशावादी दृष्टिकोण से बुरे समय को भी मात देने वाले, मेहनती, अनुशासित, आत्मसंयमी , उदार प्रकृति के होते हैं। यही भाग्यशाली और कर्म प्रधान लोगों के लक्षण हैं जो उन्हें अपने जीवन में धन-धान्य ,सुख- संपदा पाने वाले भाग्यशाली इंसान माना जाता है। समाज भी इन्हें मान- सम्मान देने वाला, कर्मठ भाग्यशाली मानता है। अतः सुंदर सार्थक कर्म ही भाग्यशाली इंसान की पहचान हैं।
- डॉ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
दैनिक जीवन में हम सभी कुछ न कुछ कर्म करते हैं।किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती है। कर्म कोई भी हो सकता है। जब कोई लीक से हटकर कुछ अलग कार्य करता है तब उस कार्य विशेष के लिए उसकी पहचान बन जाती है। भाग्य किसी किसी का साथ देता है, प्रत्येक व्यक्ति का नहीं। जिसको भाग्य का साथ मिल गया वह भाग्यवान बन जाता है। मगर कार्य करने वाला व्यक्ति अपनी साख स्वयं बनाता है।
ReplyDelete- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
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