जगदीश कश्यप की लघुकथाएं
परिचय
जगदीश कश्यप हिंदी साहित्य के प्रमुख लघुकथाकार थे, जिन्होंने लघुकथा विधा को स्वतंत्र पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 1 दिसंबर 1949 को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ और निधन 17 अगस्त 2004 को हो गया। उन्होंने लघुकथा को मात्र रचना नहीं, बल्कि एक सशक्त साहित्यिक विधा बनाने के लिए जीवन समर्पित कर दिया।
वे 'मिनीयुग' नामक लघुकथा पत्रिका के संस्थापक और सम्पादक भी थे, जिसके माध्यम से उन्होंने कई नए लेखकों को प्रोत्साहित किया।
प्रमुख रचनाएँ :-
उनकी प्रमुख लघुकथा संग्रहों में नागरिक, कुहरे से गुजरते हुए और कदम-कदम पर हादसे शामिल हैं। पंकज चतुर्वेदी द्वारा संपादित उनके लघुकथा संग्रह में कई दुर्लभ रचनाएँ भी संकलित हैं।
साहित्यिक योगदान :-
लघुकथा की अवधारणा को स्पष्ट करने और उसके गुणात्मक मानदंड स्थापित करने में उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने मात्रा के बजाय गुण पर जोर दिया, अच्छी रचनाओं को सराहा तथा कमजोर को आलोचना की। मंचों पर लघुकथा पाठन शुरू कर उन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया।
विशेष :-
ये 'मिनीयुग' नामक लघुकथा पत्रिका के संस्थापक सम्पादक
जगदीश कश्यप की लघुकथाएं
1.भूख
वह पूरी शक्ति से भाग रहा था. जब वह रुका तो उसने अपने को किसी बड़े नगर में पाया. कई बार रो पड़ने के बावजूद किसी ने भी उसे अपने पवित्र नगर में घुसने नहीं दिया था. अब वह गांव की ओर दौड़ रहा था.
उसे अच्छी तरह से मालूम था कि पीछा करने वाली डायन उसके मां-बाप को भी निगल गई थी. पूरी की पूरी जिंदगी उसने इस डायन की कैद से छुटकारा पाने में बरबाद कर दी थी. किसी तरह वह एक रात को चुपचाप भाग निकला था.
उसने एक झोंपड़ी का द्वार खटखटाया. खस्ता हालत में खड़ा टट्टर उसके जरा-सा ढकेलते ही खुल गया. लेकिन सामने पड़ते ही वह भय से चीख पड़ा. एक बूढ़े की लाश के पास खड़ी वह क्रूरता से मुस्करा रही थी.
‘ये बुड्ढा भी वर्षों पहले मेरे चंगुल से निकल भागा था. एक हफ्ते तक मैंने इसको खाट से नहीं उठने दिया.’
उसके यह सोचते ही कि वह तीन दिन से भूखा है, उसके पेट में ऐंठन-सी हुई. वह मुड़ भागा. वह मुस्कराती रही.
जैसे ही वह एक मोड़ पर आकर रुका, वह सामने थी. तुरंत ही उसने ढेर-सा खून उगला और उसके कदमों में गिर पड़ा.
2. दूसरा सुदामा
वह स्वागत कक्ष में अन्य उम्मीदवारों की तरह बैठ गया, जो मंत्रीजी को अपनी तकलीफें सुनाने आए थे. लोग उसके मैले कुर्ते-धोती की तरफ घूर रहे थे और वह निगाह चुराते हुए सामने दीवार पर टंगी अधनंगे गांधीजी की आयल पेंटिंग को लगातार देख रहा था. पत्नी ने कहा था— ‘तुम भूखे मरो, पर बच्चों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है. इस मरे अखबार ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा. जवान लड़की की शादी कब करोगे? कुछ तो अपने सफेद बालों का लिहाज करो.’ इस पर वह कुछ न बोला तो पत्नी बिफर पड़ी-‘मैंने दो बजे रात को तुम्हारे दोस्त के लिए चाय बनाई है. ताजा खाना बनाकर खिलाया है. तुम अगर उसके पास नहीं गए तो मैं बाल-बच्चों को जहर खिला दूंगी.’ ‘पर भागवान! इतनी दूर जाना है, कम से कम सौ रुपये तो होने चाहिए!’ पत्नी यह सोचकर कि उसके पति को भगवान ने अकल दे दी है, दुगने उत्साह से पड़ोसन के यहां गई और न जाने किस जुगत से एक सौ रुपये ले आई. अचानक कक्ष में बेचैनी फैल गई. नेता, पत्रकार, व्यापारी से लगने वाले चेहरे हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए. जवाब में मंत्रीजी मुस्कराते हुए सबका अभिवादन करने लगे. अचानक उनकी नजर फटेहाल दाढ़ी वाले व्यक्ति पर पड़ी. ‘अरे, शशांक तुम?’ मंत्रीजी ने अपने लंगोटिया यार को तुरंत पहचान लिया और उसका हाथ पकड़कर अपने कक्ष में चले गए. लोगों को अचंभा हुआ कि मंत्री महोदय कैसे-कैसे सड़ियल लोगों से दोस्ती रखते हैं. शशांक तो जैसे गदगद हो गया. ‘भाभी-बच्चे कैसे हैं?’ मंत्रीजी ने उत्साहवश पूछा तो शशांक ने दुगने उत्साह से कहा—‘तुम्हारी भाभी ने इतना जोर डाला कि मुझे मजबूरन आना पड़ा.’ मंत्रीजी ने घंटी बजाकर काफी लाने का आर्डर दे दिया. ‘आने में तो कोई दिक्कत नहीं हुई? मुझे लिख देते, सीट रिजर्व हो जाती.’ अचानक शशांक को अपनी सारी देह दुखती मालूम पड़ी. गाड़ी में इतनी भीड़, उफ्! बामुश्किल टट्टी के पास बैठने लायक जगह मिली थी. ‘सर! सेठ रामदास जाने को कह रहे हैं.’ सेक्रेटरी ने चिक उठाते हुए अंदर झांका और आंखों ही आंखों में दोनों के बीच कुछ कहा गया. ‘शशांक मैं इन लोगों को भेजकर अभी आया, तुम आराम से बैठो.’ शशांक लंबी यात्रा के कारण थका हुआ था. काफी पीते ही उसे ऐसी झपकी आई की गहरी नींद सो गया. जब उसकी आंख खुली तो शाम हो चुकी थी. नौकर उसे जगाकर चाय देकर जाने लगा तो उसने पूछा— ‘आपके मंत्रीजी कहां हैं?’ ‘हुजूर, बड़े मिनिस्टर का फोन आया था, दिल्ली से. वो हवाई जहाज से गए हैं, चार दिन के लिए.’ ‘चार दिन के लिए?’ ‘हां, हुजूर, वो कह गए हैं कि आपको कोई तकलीफ न हो—भोजन कैसा लेंगे?’ शशांक कुछ बोल न सका. उसको बिस्कुट का स्वाद मिट्टी जैसा लगने लगा. अर्दली ने फोन मिलाया और अपने अधिकारी को अवगत करा दिया. अधिकारी ने मंत्रीजी से कहा—‘सर, शशांक नाम का आदमी चला गया है.’ ‘मंत्रीजी उस समय स्थानीय डाक बंगले पर लजीज भोजन कर रहे थे. अधिकारी की बात पर वे तनिक मुस्कराए और इत्मीनान से पानी का गिलास उठाकर पीने लगे.
3. ममत्व
जब स्थिति ज्यादा बिगड़ गई तो पुलिस और प्रशासन की मदद के लिए सेना बुला ली गई. फैशनेबल बाज़ारों में मुर्दापन और गली-मुहल्लों में टोपधारी सशस्त्र वर्दियाँ नज़र आ रही थीं .
किशना की माँ बच्चे के दूध के लिए तड़प रही थी . उसे पता नहीं था कि उसका मिस्त्री पति इन दंगों में मारा गया है या कहीं मुसीबत में फँस गया है .
जवान लड़की किशना को माँ ने सख़्त हिदायत दे रखी थी कि वह खिड़की न खोले . कहीं ऐसा न हो कि वह किसी वहशी की नज़र में आ जाए और उसकी इज़्ज़त पर डाका पड़ जाए .
माँ दस्त से परेशान थी . बच्चे गर्म मानी, कभी उबली खा-खाकर परेशान हो गए थे . दोनों समय का आटा ज़रूरत से कम मांडा जाता, पता नहीं कर्फ़्यू कब खुले .
किशना की माँ के पेट में फिर मरोड़ उठा .
‘ले किशना, जरा बबलू को पकड़ . मरे, ये लोग दंगा क्यों करते हैं . इनका सत्यानाश हो . और वह धोती सँभालती हुई पाखाने की ओर भागी . बच्चा बुरी तरह डकरा रहा था .
जब वह लौटी तो उसने एक अविश्वसनीय दृश्य देखा . उसकी जवान अविवाहिता लड़की किशना बच्चे को शायद स्तनपान कराने का प्रयास कर रही थी .
4. ताड़ वृक्ष की छाया
हर काम समय से करने के पाबंद दोनों कान्वेंटी बच्चे अभी जाग रहे थे. मिकी ने वाल–क्लाॅक में पौने ग्यारह बजते हुए देखे तो कह उठा-‘बेबी, मम्मी…ना॓ट कम…सो फार!’
‘मिकी लैट मी स्लीप.’
‘बेबी ये का॓ट रेड हैंडिड क्या है? वे सामने वाली कोठी में मेरा क्लास मेट अनु कह रहा था, हमारे पापा किसी से दस हजार रुपया ले रहे थे, आई मीन टेन थाउजेंड रूपीस.’
‘अरे पापा का कुछ नहीं होगा. मम्मी इसलिए स्टेनो अंकल के साथ अपने ब्रदर के यहां गई है. अंकल स्पेशल सैक्रेटरी हैं. मम्मी कहती है कि मिनिस्टर उनकी हर बात मानते हैं.’
‘पर तुमने नहीं सुना, स्टेनो अंकल कह रहे थे, मेमसाहब केस सीरियस है. खुद जाल बिछाकर पकड़वाया है.’
तभी कार के हार्न की आवाज सुनाई दी. दोनों बच्चे फुदककर उठ खडे़ हुए और कारीडोर में आकर नीचे झांकने लगे. मम्मी के पास स्टेनो अंकल खड़े थे. मम्मी जोर–जोर से कह रही थी, ‘तुम्हें उस मिनिस्टर से उलझने की क्या जरूरत थी? यू डांट नो, वो कांट्रेक्टर का आदमी है. एट लास्ट टेंडर तो उसी को मिला. उसके थ्रू काम हो रहा था तो क्या तुम्हें नहीं मिलता कुछ? अगर माई ब्रदर बीच में नहीं पड़ते तो वह मिनिस्टर का बच्चा कब मानने वाला था. तुम्हारा ये एज–पर–ला॓ हम सबको ले डूबेगा.’
‘मैम साहब!’ स्टेनो ने संकेत किया तो मम्मी–पापा ने ऊपर की ओर देखा. पापा अपमानित ढंग से मुस्करा उठे और बच्चों को टा–टा किया. मम्मी लगभग चीखती हुई बोली—‘मिकी बेटी, तुम लोग अभी जाग रहे हो–डेमफूल! गो–टू–बेड!’
दोनों बच्चे चुपचाप बिस्तर की ओर बढ़े. मायूस कदम लिए. उन्होंने पापा के चेहरे पर ऐसी अपमानित मुस्कराहट पहली बार देखी थी. तिस पर उनका बेवजह टा–टा करने का आखिर क्या मतलब था?
5. धुएं के ताजमहल
आशीर्वाद देते वक्त एक बारगी उसका हाथ कांप गया था. सफेद पोशाक मे सजी लड़की घुटी हुई रुलाई में सिर्फ ‘पापा–पापा’ ही बुदबुदा पाई थी कि वह तेजी से लौट पड़ा-‘कहीं पास बैठे दुल्हा को शक न हो जाए. उसने आधी बची हुई अंग्रेजी की बोतल खोली और नीट पैग चढ़ा गया और इत्मीनान से सिगरेट होठों पर लगाकर बेपरवाह अंदाज में पेंट की जेबों पर हाथ मारने लगा.
‘मिस्टर डेनियल, आप अंधेरे मे बैठे हैं!’
रोशनी होने पर डेनियल ने पलटकर देखा कि उसकी बेटी का धर्मपिता बिखरे हुए अंदाज में खड़ा था.
‘मैं आपके दुख को जानता हूं डेनियल साहब कि बेबी के असली पिता होते हुए भी एक अजनबी की माफिक आपने गिफ्ट दिया. आपने मेरी इज्जत रख ली.’
‘इज्जत रख ली के बच्चे! तूने मेरी दोस्ती की पीठ में छुरी भोंक दी. जिस थाली में खाया उसी में छेद…’
अंत तक उसकी नर्स पत्नी उससे छिपाती रही कि अस्पताल के एकाउंटेंट से उसका कोई ऐसा–वैसा संबंध नहीं है.
‘उसे आज के बाद इस घर में नहीं आना चाहिए.’
‘तुम ही क्यों नहीं कहते, वह तो तुम्हारा दोस्त है. इस पर वह खून का घूंट पीकर रह गया था. नतीजा निकला डाइवोर्स! फलतः बेबी को मां ले गई और लड़का डेनियल के पास रह गया.
‘क्या सोच रहे हैं मिस्टर डेनियल?’
‘मिस्टर मैथ्यूज, अब आपकी बेटी है. मैं आपके बुलावे पर यहां नहीं आया. बेबी ने धमकी दी थी कि अगर मैं उसकी शादी में शरीक नहीं हुआ तो वह शादी नहीं करेगी. वैसे भी बच्चे ताजमहल देखने की जिद कर रहे थे.’
तभी डेनियल की भूतपूर्व पत्नी आ गई और हड़बड़ाती हुई बोली-‘आप यहां क्या कर रहे हैं? वहां सब लोग आपको पूछ रहे हैं.’ और अपने तलाकशुदा पति को सहमे हुए अंदाज में देखने लगी.
‘अच्छा डेनियल साहब, आयम सारी. आप ताजमहल जरूर देखना. कुछ दिन रुकिए ना!’
जवाब में डेनियल ने सिगरेट का लंबा–सा कस लिया और मिसेज मैथ्यूज की ओर उछाल दिया. मिसेज मैथ्यूज घबराकर पीछे हट गईं. मानो किसी ने उसपर थूक दिया हो. और डेनियल उस धुएं में अपने ताजमहल को बनते–बिगड़ते देख रहा था.
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