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क्षितिज संस्था द्वारा वरिष्ठ लघुकथाकार स्व. मधुदीप जी को ऑनलाइन श्रद्धांजलि

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उमेश जैमिनी का जन्मदिन

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आज उमेश जैमिनी ( Sunny ) का जन्मदिन है । वह अब मोहाली ( चण्डीगढ़ ) में अपनी पत्नी भावना के साथ रहता है । जो एक कम्पनी में नौकरी करता है । जन्मदिन के अवसर पर उमेश जैमिनी ( Sunny ) का हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं  पानीपत में उमेश जैमिनी (Sunny ) के  जन्मदिन का  Cake मां संगीता रानी Cake काटते हुए 12 जनवरी 2022 पिता बीजेन्द्र जैमिनी Cake काटते हुए 12 जनवरी 2022 मोहाली कार्यालय में जन्मदिन मनाते हुए उमेश जैमिनी   मोहाली कार्यालय में जन्मदिन मनाते हुए उमेश जैमिनी मोहाली कार्यालय में जन्मदिन मनाते हुए उमेश जैमिनी मोहाली कार्यालय में जन्मदिन मनाते हुए उमेश जैमिनी                    

2022 का प्रथम सम्मान से सम्मानित बीजेन्द्र जैमिनी

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2022 का प्रथम सम्मान                           बीजेन्द्र जैमिनी जन्म : 03 जून 1965 शिक्षा : एम ए हिन्दी , पत्रकारिता व जंनसंचार विशारद्              फिल्म पत्रकारिता कोर्स              कार्यक्षेत्र : प्रधान सम्पादक / निदेशक                जैमिनी अकादमी , पानीपत                ( फरवरी 1995 से निरन्तर प्रसारण ) मौलिक :- मुस्करान ( काव्य संग्रह ) -1989 प्रातःकाल ( लघुकथा संग्रह ) -1990 त्रिशूल ( हाईकू संग्रह ) -1991 नई सुबह की तलाश ( लघुकथा संग्रह ) - 1998 इधर उधर से ( लघुकथा संग्रह ) - 2001 धर्म की परिभाषा (कविता का विभिन्न भाषाओं का अनुवाद) - 2001 सम्पादन :- चांद की चांदनी ( लघुकथा संकलन ) - 1990 पानीपत के हीरे ( काव्य संक...

विश्व हिन्दी दिवस पर फेसबुक कवि सम्मेलन

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जैमिनी अकादमी द्वारा ब्लॉग पर  विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर फेसबुक कवि सम्मेलन का आयोजन रखा है । जिस का विषय " मन की आँखें " रखा गया है ।  विधिवत रूप से फेसबुक कवि सम्मेलन शुरू हुआ । जिसमें आई कविताओं में से विषय अनुकूल कविताओं को सम्मानित किया जा रहा है । जो इस प्रकार हैं : -                मन की आँखें                ********** बोल जुबान से निकलें जब भी, मन की आँखें मंजर देख लिया करती हैं, इशारा इनका समझो तो, कई विपदाओं से हम बच सकते हैं, तन पर लगी आँखों का अपना दायरा है, पर मन की आँखें सीमित कहां रहती हैं, यहां से वहां इस पार से उस पार का, सब तुरंत देखकर भांप लेती हैं, इनसे भला कौन बच पाया है, जो भी उलझा है इन्हीं में फंसा है, शेष तो सारा ही छलावा लगता है, इनकी सीमा निर्धारित कहां होती है, ये सारा भार खुमार है सांसारिकता का, मन की आँखें खुली तो जैसे, सब भ्रम है यहां पर यहीं का।                         ...