हिन्दी दिवस - 2026 के अवसर पर चर्चा - परिचर्चा

        हिन्दी' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से हुई है, जो आगे चलकर फारसी (ईरानी) संपर्क के माध्यम से इस भाषा का नाम बन गया। वर्ष 1918 में गांधी जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राजभाषा बनाने को कहा था। गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। वर्ष 1949 में स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की अनुच्छेद 343(1) में इस प्रकार वर्णित है.  राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।  इस निर्णय के बाद मूल हिंदोस्तानी बोली उर्दू के शकल से प्रतिस्थापित हो जाते हैँ। यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया, इसी दिन हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50वाँ जन्मदिन था, इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। हालाँकि जब राष्ट्रभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो अहिंदी (जहाँ हिंदी कम या बिलकुल भी बोली नहीं जाती) भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और इसी कारणवश हिंदी में भी अंग्रेजी का प्रभाव पड़ने लगा। देश में हर साल हिन्दी दिवस पर अनेकों कार्यक्रम होते हैं। इसी क्रम में जैमिनी अकादमी ने चर्चा परिचर्चा का आयोजन किया है। जिस का विषय " ‌भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा की भूमिका क्या होनी चाहिए ? " रखा गया है। शामिल विद्वानों को " हिन्दी सेवी सम्मान - 2026" सम्मानित किया गया है :-
हिंदी की बोलियों का विकास हिंदी के ही विकास का एक रूप में हिंदी की अनेक बोलियाँ हैं क्योंकि भक्ति काल में कलमकारों ने अपनी -अपनी बोलियों में मानवजाति में  अलौकिक ईश चेतना को जगाया था।  वर्गभेद , जाति -पाँति , अन्धविश्वास आदि की दीवारों को तोड़ा यह बोलियाँ थी ब्रजभाषा में सूरदास जी ने सूर सागर आदि रचा । अवधी ने संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस रच के   जन -मन -घर में पूजनीय बना दिया । बुंदेली, बघेली , भोजपुरी , मालवी , राजस्थानी मगही आदि मुख्य बोली हैं, यह हिंदी की शक्ति का बुस्टर के साथ अनेकता  में एकता की मिसाल है। ये भारतीय संस्कृति , इतिहास , रीति रिवाज , परंपराओं को बाँधे हुए हैं । भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली हिंदी भाषा है। मुम्बई का फ़िल्म उद्योग अवधी , भोजपुरी,आदि और हिंदी फिल्मों  की भव्य महानगर है। हिंदी ने आजादी के आंदोलन में राष्ट्रजागरण की भूमिका निभायी।देशभर में इसने हर दिल में जगह बनायी। आजादी के बाद  संविधान में राजभाषा का दर्जा मिला है। राजभाषा के रूप में अहिन्दी भाषी राज्यों में उड़ान भर   रही है। भारत , विश्व में हिंदी  द्रुतगामी गति से आगे बढ़ के विश्व पटल पर स्थापित हुयी है । विश्व के बाजारवाद , व्यापार की भाषा हिंदीं बनी है। दुनिया के एक सौ पचास  देशों में हिंदी पढ़ाई जाती है और यहॉं शोध कार्य  कर रहे हैं। कई देश जैसे इटली , श्रीलंका , रूस , मॉरिशिस आदि में स्नातक , स्नातकोत्तर , पीएचडी आदि का पाठ्यक्रम की व्यवस्था है। अमेरिका के तीस से ज्यादा विश्वविद्यलयों में हिंदी शिक्षा को स्थान मिला है। लगभग सौ देशों में हिंदी पढ़ी , बोली , लिखी जाती है।  एशिया की प्रतिनिधि भाषा है ।भारतीय महाकाव्य को प्रो ची.श्येन. ने रामचरितमानस, रामायण का चीनी भाषा में अनुवाद किया।  आ महामहिम प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जी ने 27 सितंबर ,2014 में 'संयुक्त राष्ट्र संघ में' हिंदी में अपना भाषण देकर विश्व को संबोधित किया था। फ्लोरेंस विश्वविद्यालय , इटली में हिंदी शोध करता डॉ जुइजिपियो तैसितौरी ' रामचरित मानस ' और ' बाल्मिकी रामायण ' पर तुलनात्मक शोध आरंभ किया है।इन आधारों पर हिंदी की गति अपनी सक्रिय भूमिका में दिखायी दे रही है। भारत की आजादी के आंदोलन के समय हिंदी नेताओं , जन -जन की संपर्क भाषा थी ।  गांधी जी, स्वामी दयानन्द सरसवती आदि गुजराती होते हुए हिंदी में काम करते थे ।भारत की आजादी के बाद से हिंदी  को संविधान ने राजभाषा के रूप में मान्यता दी । मेरे मतानुसार हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में बेहतर है जिस प्रकार राष्ट्र की एकता, अखंडता , संप्रभुता, देशप्रेम  को सिद्ध करने के लिये हम एक राष्ट्र ध्वज , एक राष्ट्रगीत और एक राष्ट्रचिह्न अपनाते हैं ,उसी प्रकार भाषाओं के क्षेत्र में हमेशा एक भाषा की जरूरत  है वह राष्ट्रभाषा हिन्दी है, क्योंकि हिंदी के शब्दकोष व्यापक भंडार है , इसकी देवनागरी लिपि वैज्ञानिक है । हिंदी भाषा सरल , सहज, लचीली , उच्चारण सुगम है । हर कोई आसानी से से हिंदी को सीख , बोल लेता है। डॉ मनोज पांडे ने कहा -"भाषा के बिना संस्कृति पंगु है , संस्कृति के अभाव में भाषा अंधी है। "भारतेन्दु जी ने भी कहा -

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।"

भारतीय संस्कृति , एकता , राष्ट्रीय चेतना की

 हिंदी आत्मा है

हिंदी की भाषागत शुद्धता के प्रति 

असावधानी एक स्वीकार्य क्रीड़ा है। मैं तो ऐसा ही मानती हूँ।

आज तो प्रतिष्ठित अखबारों , पत्रिकाओं में अक्षरों में 

वर्तनी की गलती ,अनुस्वार , अनुनासिक

 लिंग आदि की व्याकरण की गलतियों से भरा रहता है।

। भाषा की अशुद्धता को दर्शाता है। ऐसी गलतियाँ 

भाषा को लगड़ी बना के लुप्त होने के 

कगार पर खड़ी हो जाती हैं।

समय के परिवर्तन के साथ अब एक विधिक और प्रशासनिक भाषा के रूप में हिंदी की स्थिति थोड़ी सुधरी , थोड़ी परिपक्व , जटिल भी हुई है । न्यायालय के फैसलों को  हिंदी की गुणवत्ता की वजह से अहिंदीभाषी   कुछ राज्य अपनी भाषा के साथ हिंदी में दे रहे हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है।  विधि की  हिंदी में किताबें हैं लेकिन भाषा किलिष्ट होने से  कानून की पढ़ाई छात्र अंग्रेजी में करना पसंद करते हैं। प्रशासनिक सेवाओं के ऑन लाइन फॉर्म हो या राष्ट्रीय पुरस्कार हेतु फॉर्म भी अंग्रेजी में होते हैं। जिसे हिंदी भाषी , जो अंग्रेजी नहीं जानता है उसे पेचीदा ही लगती है। विश्व व्यापार के आयात -निर्यात के ऑन लाइन फॉर्म दिखावा ही है। इन का हिंदी में प्रयोग होना अभी चुनौती है। हिंदी को एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में लोकप्रिय बनाने के लिए शिक्षण और प्रशिक्षण   में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की इंटरनेट के द्वारा ई -प्रशिक्षण की  पहल करने की जरूरत है।  सरकार इस तरह की व्यवस्था उपलब्ध कराए कि केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान  द्वारा , केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो  या अन्य माध्यम से ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करे। विदेशों में  स्थापित सभी भारतीय दूतावास हिंदी भाषा का बेसिक पाठ्यक्रम के आधार बनाके  , वर्कशॉप द्वारा विदेशी छात्रों को शिक्षण दें ।  सरकारी संस्थानों से हिंदी पत्रिका प्रकाशित हों।भारत की अब 7 वीं शक्ति सॉफ्ट पॉवर का भाषा अनुवाद  भारतीय सभी भाषाओं को आगे बढ़ा रहा है।   हम सब भारतीय प्रण करें कि  घर बाहर हम हिंदी में संवाद करें ।  स्वभाषा मजबूत होगी तो राष्ट्र मजबूत उन्नत बनेगा। जो राष्ट्र स्वयं का अन्न नहीं उगा सकता तो वह भूखा रहेगा । जिस राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं होगी उसका इतिहास , संस्कृति , समूल नष्ट हो जाएगी। जिस राष्ट्र में स्वतः के बुनकर नहीं होंगे उस राष्ट्र में तन ढकने के लिए वस्त्र नहीं होंगे। हिंदी भाषा आसान होने से विश्व को स्वतः जोड़ रही। है। इसलिए राजनैतिक स्वार्थ को छोड़ो हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाएँ। मातृभाषा  हिंदी माँ , माटी  इतिहास  और संस्कृति से जोड़ती है।  भाषा हिंदी ।।

- डॉ मंजु गुप्ता

मुंबई - महाराष्ट्र 

डोगरी भाषा के विकास में हिंदी की भूमिका      

प्रस्तावना

भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, संवेदना और सामूहिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति होती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषाओं का विकास एक-दूसरे से अलग-थलग रहकर नहीं, बल्कि निरंतर संपर्क, संवाद और आदान-प्रदान के माध्यम से हुआ है। डोगरी और हिंदी भी ऐसी ही दो भाषाएँ हैं, जिनके बीच लंबे समय से गहरा सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक संबंध रहा है। हिंदी ने डोगरी के विकास में अनेक स्तरों पर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं डोगरी ने भी हिंदी के साहित्य और भारतीय भाषायी संस्कृति को समृद्ध किया है।डोगरी जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र की प्रमुख भाषा है और अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता, शब्द-संपदा, लोक परंपरा तथा साहित्यिक अभिव्यक्ति के कारण भारतीय भाषाओं में विशिष्ट स्थान रखती है। आज डोगरी भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा है। इस स्थिति तक पहुँचने की उसकी यात्रा में साहित्यकारों, संस्थाओं, पत्र-पत्रिकाओं, शिक्षण संस्थानों और विभिन्न भारतीय भाषाओं के साथ उसके संवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी इस संवाद की सबसे प्रभावशाली कड़ियों में से एक रही है।

ऐतिहासिक संपर्क और भाषायी निकटता

डोगरी और हिंदी दोनों भारतीय आर्य भाषा-परिवार से संबंधित हैं। दोनों के बीच शब्द-संपदा, वाक्य-विन्यास और सांस्कृतिक संदर्भों के स्तर पर अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। जम्मू क्षेत्र का उत्तर भारत के अन्य भागों से निरंतर सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क रहा है। व्यापार, शिक्षा, प्रशासन, धार्मिक यात्राओं और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से हिंदी का प्रभाव जम्मू क्षेत्र तक पहुँचा और इसके साथ ही डोगरी भाषी समाज ने हिंदी के व्यापक साहित्यिक संसार से संवाद स्थापित किया।इस संपर्क का अर्थ डोगरी की स्वतंत्र पहचान का क्षरण नहीं रहा। इसके विपरीत, हिंदी के माध्यम से डोगरी को व्यापक भारतीय भाषायी परिदृश्य से जुड़ने का अवसर मिला। डोगरी लेखकों को अपनी रचनाओं को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का मंच मिला और हिंदी जगत को डोगरी की समृद्ध लोक-संस्कृति तथा साहित्य से परिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ।

डोगरी साहित्य के प्रचार-प्रसार में हिंदी की भूमिका

डोगरी साहित्य की एक बड़ी चुनौती लंबे समय तक उसके सीमित पाठक-वर्ग तक पहुँचना रही। हिंदी ने इस सीमा को काफी हद तक तोड़ने में सहायता की। जब डोगरी की कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, लोककथाओं और नाटकों का हिंदी में अनुवाद हुआ, तो वे जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक हिंदी समाज तक पहुँचे। अनुवाद ने केवल रचनाओं को दूसरी भाषा में पहुँचाने का काम नहीं किया, बल्कि डोगरी साहित्य की संवेदनाओं को राष्ट्रीय साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बनाया। डोगरी के प्रमुख साहित्यकारों की रचनाओं के हिंदी अनुवादों ने पाठकों, आलोचकों और शोधार्थियों को डोगरी साहित्य को समझने का अवसर दिया। इससे डोगरी साहित्य पर हिंदी में आलोचनात्मक लेखन और शोध की संभावनाएँ भी बढ़ीं।

अनुवाद : दो भाषाओं के बीच सेतु

डोगरी के विकास में हिंदी की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका अनुवाद के क्षेत्र में दिखाई देती है। अनुवाद ने दोनों भाषाओं के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया है। डोगरी की मौलिक रचनाएँ हिंदी में अनूदित हुईं और हिंदी की श्रेष्ठ रचनाएँ डोगरी में पहुँचीं।डोगरी लोककथाओं, लोकगीतों, लोकगाथाओं और आधुनिक साहित्य के हिंदी अनुवाद ने डोगरी संस्कृति को व्यापक भारतीय समाज तक पहुँचाया। दूसरी ओर, हिंदी के प्रसिद्ध कवियों, कहानीकारों और उपन्यासकारों की रचनाओं के डोगरी अनुवाद ने डोगरी पाठकों के सामने भारतीय साहित्य की विशाल परंपरा को खोला। इस द्विमुखी अनुवाद-परंपरा ने दोनों भाषाओं को समृद्ध किया। अनुवाद के कारण डोगरी लेखकों को नए कथ्य, नई शिल्प-प्रविधियों और व्यापक साहित्यिक दृष्टियों से परिचित होने का अवसर मिला। साथ ही हिंदी साहित्य ने डोगरी की लोक-संवेदना, पहाड़ी जीवन, जम्मू की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय अनुभवों को आत्मसात किया।

शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी का योगदान

शिक्षा के क्षेत्र में भी हिंदी का डोगरी के विकास से गहरा संबंध रहा है। लंबे समय तक जम्मू क्षेत्र में हिंदी शिक्षा और उच्च शिक्षा के प्रमुख माध्यमों में रही। अनेक डोगरी भाषी विद्यार्थियों ने हिंदी के माध्यम से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, इतिहास और सामाजिक विज्ञान का अध्ययन किया। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि डोगरी भाषी शिक्षित वर्ग ने अपनी मातृभाषा में लेखन की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से अनुभव किया। हिंदी के माध्यम से प्राप्त आधुनिक ज्ञान और साहित्यिक संस्कारों को अनेक लेखकों ने डोगरी में रचनात्मक रूप प्रदान किया। बाद के समय में डोगरी के अध्ययन-अध्यापन और विश्वविद्यालयीय शोध के विस्तार ने इस प्रक्रिया को और मजबूत किया। हिंदी और डोगरी के तुलनात्मक अध्ययन ने दोनों भाषाओं की समानताओं और विशिष्टताओं को समझने की नई दृष्टि प्रदान की।

पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक संस्थाओं की भूमिका

डोगरी साहित्य के विकास में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं ने समय-समय पर डोगरी साहित्य और साहित्यकारों को स्थान दिया। इससे डोगरी की रचनात्मक उपलब्धियाँ हिंदी भाषी पाठकों तक पहुँचीं। इसी प्रकार विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं ने हिंदी और डोगरी के बीच संवाद को मजबूत किया। साहित्यिक सम्मेलन, संगोष्ठियाँ, पुस्तक-प्रकाशन, अनुवाद परियोजनाएँ और पुरस्कारों ने दोनों भाषाओं के लेखकों को एक-दूसरे के निकट लाने का कार्य किया। जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी जैसी संस्थाओं ने भी भारतीय भाषाओं के पारस्परिक साहित्यिक संबंधों को मजबूत करने में योगदान दिया। डोगरी और हिंदी के बीच निरंतर संवाद ने साहित्यिक गतिविधियों को व्यापक आधार प्रदान किया।

डोगरी के आधुनिक साहित्य के निर्माण में हिंदी का प्रभाव

आधुनिक डोगरी साहित्य के विकास में हिंदी साहित्यिक आंदोलनों और आधुनिक साहित्यिक प्रवृत्तियों का प्रभाव भी देखा जा सकता है। आधुनिक कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना और बाल साहित्य जैसी विधाओं के विकास में व्यापक भारतीय साहित्यिक वातावरण का प्रभाव रहा।हिंदी के माध्यम से डोगरी साहित्यकार आधुनिकता, यथार्थवाद, प्रगतिशील चेतना, नई कविता, नई कहानी, स्त्री-विमर्श, दलित विमर्श, पर्यावरण चेतना और सामाजिक सरोकारों से परिचित हुए। इन प्रवृत्तियों को डोगरी लेखकों ने अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक जमीन के अनुरूप रचनात्मक रूप दिया।इस प्रकार हिंदी का प्रभाव केवल अनुकरण तक सीमित नहीं रहा। डोगरी साहित्य ने बाहरी प्रभावों को अपनी स्थानीय संवेदना में रूपांतरित करके मौलिक साहित्य का निर्माण किया।

बाल साहित्य के विकास में योगदान

डोगरी बाल साहित्य के विकास में भी हिंदी का योगदान उल्लेखनीय है। हिंदी में विकसित बाल साहित्य की विविध विधाओं—बाल कविता, बाल कहानी, बाल उपन्यास, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य आदि—से डोगरी बाल साहित्यकारों को प्रेरणा और नए प्रयोगों की दिशा मिली।डोगरी की लोककथाओं, लोकगीतों और स्थानीय जीवनानुभवों को बाल साहित्य के आधुनिक रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को हिंदी के व्यापक बाल साहित्यिक वातावरण से बल मिला। परिणामस्वरूप डोगरी में बच्चों के लिए मौलिक साहित्य के साथ-साथ अनुवादित साहित्य का भी विस्तार हुआ।

शब्द-संपदा और अभिव्यक्ति पर प्रभाव

भाषाएँ जब एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं तो उनके शब्द-भंडार में स्वाभाविक रूप से आदान-प्रदान होता है। डोगरी और हिंदी के बीच भी यह प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है। शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक शब्द हिंदी के माध्यम से डोगरी के व्यवहार में आए हैं।हालाँकि भाषा-विकास का अर्थ यह नहीं कि किसी भाषा की मौलिक शब्द-संपदा समाप्त हो जाए। डोगरी की शक्ति उसकी अपनी लोक-भाषिक जड़ों में है। इसलिए हिंदी से प्राप्त शब्दों को स्वीकार करते हुए डोगरी ने अपनी विशिष्ट शब्द-संपदा और मुहावरेदार अभिव्यक्ति को भी सुरक्षित रखा है।

राष्ट्रीय स्तर पर डोगरी की पहचान

डोगरी को राष्ट्रीय साहित्यिक पहचान दिलाने में हिंदी माध्यम की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिंदी के विशाल पाठक-वर्ग के कारण डोगरी साहित्य और उसके रचनाकारों को व्यापक भारतीय साहित्यिक समाज में पहचान मिली।डोगरी साहित्य पर हिंदी में लिखी गई आलोचनात्मक सामग्री, परिचयात्मक पुस्तकें, शोध-कार्य और अनुवाद राष्ट्रीय स्तर पर डोगरी की उपस्थिति को मजबूत करने वाले माध्यम बने। डोगरी के साहित्यकारों की उपलब्धियाँ जब हिंदी के माध्यम से देश के अन्य भागों तक पहुँचीं तो डोगरी को भारतीय साहित्य की एक स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में समझने का अवसर बढ़ा।

हिंदी और डोगरी : प्रतिस्पर्धा नहीं, सहअस्तित्व

किसी भी भाषा के विकास को दूसरी भाषा के प्रभाव से जोड़ते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भाषायी संपर्क को प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हिंदी और डोगरी का संबंध प्रभुत्व और अधीनता का संबंध नहीं, बल्कि सहअस्तित्व और सहयोग का संबंध होना चाहिए।डोगरी की अपनी स्वतंत्र अस्मिता, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक आधार हैं। हिंदी उस अस्मिता को समाप्त करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि उसे व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का माध्यम बन सकती है। इसी प्रकार डोगरी की विशिष्टता हिंदी को भारतीय भाषायी विविधता की गहराई से परिचित कराती है।आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों भाषाओं के बीच अनुवाद और साहित्यिक संवाद को और बढ़ाया जाए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाए। डिजिटल माध्यमों, ई-पुस्तकों, ऑडियोबुक, ऑनलाइन पत्रिकाओं और सामाजिक मीडिया के माध्यम से डोगरी साहित्य को हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों तक पहुँचाया जाए।

भविष्य की संभावनाएँ

21वीं सदी में भाषाओं के विकास की नई संभावनाएँ डिजिटल तकनीक से जुड़ी हैं। हिंदी का विशाल डिजिटल संसार डोगरी के लिए एक प्रभावशाली मंच बन सकता है। डोगरी साहित्य का हिंदी में अनुवाद और हिंदी साहित्य का डोगरी में अनुवाद डिजिटल पुस्तकालयों, वेबसाइटों और ऑनलाइन प्रकाशन मंचों पर उपलब्ध कराया जा सकता है।डोगरी के दुर्लभ साहित्य, लोक-साहित्य और पुराने दस्तावेजों का डिजिटलीकरण भी आवश्यक है। हिंदी के माध्यम से इनके परिचय और प्रसार की व्यापक संभावनाएँ हैं। इसी प्रकार डोगरी सीखने के लिए हिंदी माध्यम से ऑनलाइन पाठ्यक्रम, शब्दकोश और अध्ययन सामग्री तैयार की जा सकती है।

उपसंहार

डोगरी भाषा के विकास की यात्रा भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सहयोग की सुंदर मिसाल है। हिंदी ने डोगरी को व्यापक पाठक-वर्ग से जोड़ने, अनुवाद को बढ़ावा देने, आधुनिक साहित्यिक प्रवृत्तियों से परिचित कराने, शिक्षा और शोध को गति देने तथा राष्ट्रीय साहित्यिक मंच पर उसकी पहचान मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।लेकिन इस भूमिका को डोगरी की स्वतंत्र अस्मिता के संदर्भ में समझना आवश्यक है। हिंदी डोगरी का विकल्प नहीं है और न डोगरी हिंदी की प्रतिस्पर्धी मात्र है। दोनों भारतीय भाषायी संस्कृति की दो विशिष्ट धाराएँ हैं, जो एक-दूसरे से संवाद करते हुए अधिक समृद्ध होती हैं।वास्तव में हिंदी और डोगरी का संबंध भारतीय बहुभाषिकता की उस सुंदर परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें भाषाएँ एक-दूसरे को मिटाती नहीं, बल्कि एक-दूसरे की आवाज को दूर तक पहुँचाती हैं। हिंदी ने डोगरी की आवाज को व्यापक राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और भविष्य में भी दोनों भाषाओं का यह संवाद भारतीय साहित्य को अधिक समृद्ध, बहुरंगी और मानवीय बनाने में योगदान देता रहेगा।

- यशपाल निर्मल

जम्मू - जम्मू कश्मीर 

    यह भारत के सबसे संवेदनशील और सबसे जरूरी सवालों में से एक है। इसे नारे से नहीं, समझ से देखना होगा।संविधान में कहीं भी हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' नहीं कहा गया है। अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी भारत की *राजभाषा* है, और अनुच्छेद 351 कहता है कि सरकार का कर्तव्य हिंदी के प्रचार-प्रसार का है ताकि वह सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर सके। संविधान ने 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया है। यानी भारत की परिकल्पना एक-भाषी राष्ट्र की नहीं, बहुभाषी संघ की थी। जनगणना के अनुसार लगभग 43% लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। अगर उसकी बोलियों - भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि को जोड़ें तो संख्या और बड़ी है। सिनेमा, प्रवासन, रोजगार और डिजिटल कंटेंट ने हिंदी को एक स्वाभाविक संपर्क भाषा (Link Language) बना दिया है। दिल्ली में मजदूरी करने वाला तमिल युवा और बेंगलुरु में काम करने वाला असमिया इंजीनियर आपस में अक्सर हिंदी में ही बात कर पाते हैं। यह भूमिका हिंदी ने किसी कानून से नहीं, बाजार और व्यवहार से हासिल की है।

पक्ष में तर्क : -

- भारत जैसे विशाल देश को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए एक सहज संपर्क भाषा चाहिए। अंग्रेजी आम भारतीय की भाषा नहीं बन पाई।

- हिंदी का ढांचा संस्कृत से निकला है, इसलिए मराठी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी भाषी के लिए इसे समझना तुलनात्मक रूप से आसान है।

- वैश्विक मंच पर भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता हिंदी में सबसे अधिक है।

चिंता का पक्ष - जो दक्षिण और पूर्वोत्तर में है :

- भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, अस्मिता और रोजगार से जुड़ी है। जब केंद्र सरकार की परीक्षाएं, नौकरियां सिर्फ हिंदी-अंग्रेजी में होती हैं, तो गैर-हिंदी भाषी को लगता है कि उस पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।

- तमिल, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, मराठी जैसी भाषाओं का अपना हजारों साल का समृद्ध साहित्य और इतिहास है। उन पर हिंदी थोपने का प्रयास उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बनाने जैसा लगता है।

        मेरे विचार में हिंदी की आदर्श भूमिका इन तीन सिद्धांतों पर होनी चाहिए -

*क. सेतु की, शासक की नहीं:* हिंदी की भूमिका एक बड़े भाई जैसी होनी चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, न कि एक शासक जैसे जो सब पर राज करे। 'हिंदी को बढ़ाओ' के साथ 'भारतीय भाषाओं को भी बढ़ाओ' - यही अनुच्छेद 351 की मूल भावना थी।

*ख. विकल्प की, अनिवार्यता की नहीं:* हिंदी संपर्क भाषा के रूप में *विकल्प* बने, अनिवार्यता नहीं। अगर दो लोग तमिल और हिंदी में सहज हैं, तो वे तमिल में बात करें। अगर एक हिंदीभाषी और एक तेलुगुभाषी मिलें, तो वे अपनी सुविधा से हिंदी या अंग्रेजी चुनें। थोपने से भाषा के प्रति सम्मान घटता है, बढ़ता नहीं।

*ग. लेने वाली, सिर्फ देने वाली नहीं:* हिंदी को खुद को समृद्ध करना होगा। तमिल से 'अण्णा', बांग्ला से 'अड्डा', मराठी से 'चाल', कन्नड़ से कई शब्द लेकर हिंदी और समावेशी बन सकती है। जिस हिंदी में केवल संस्कृत के कठिन शब्द भर दिए जाएंगे, वह आम लोगों से दूर हो जाएगी

  अंत में मेरे विचार से हिंदी को भारतीय भाषाओं की *प्रतिद्वंद्वी* नहीं, *सहयोगी* होना चाहिए। भारत की आत्मा अंग्रेजी में नहीं बस सकती, यह सच है। पर भारत की आत्मा केवल हिंदी में भी नहीं बसती। वह तमिल के संगम साहित्य में, बांग्ला के बाउल गीत में, मराठी के अभंग में, और असमिया के बिहू में भी बसती है। आदर्श स्थिति यह होगी कि हर भारतीय कम से कम 3 भाषा जाने ।अपनी मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेजी। मातृभाषा से वह अपनी जड़ से जुड़े, हिंदी से वह अपने देश से जुड़े, और अंग्रेजी से वह दुनिया से जुड़े। प्रत्येक व्यक्ति उसी भाषा में सहज होता है जिसमें वह सोचता है, ख्वाब देखता है और किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं होता। अत: हिंदी भाषा वह सेतु बन सकती है जो एक दूसरे के मन को जोड़े। भाषा जोड़ने का काम करती है, तोड़ने का नहीं। हिंदी की सबसे बड़ी भूमिका यही होनी चाहिए - भारत को जोड़ना, तोड़ना नहीं।

- डॉ. रेखा मित्तल

    चंडीगढ़

      हमें गर्व है कि हमारा भारत, विश्व का भौगोलिक एवं जनसँख्या के आधार पर विशालतम देश है। हमारे देश की संस्कृति और संस्कार विश्व पटल पर एक अनुपम पहचान लिए है। हमारी संस्कृति और संस्कार में विविधता में एकता तो है ही, शुचिता भी है और मर्यादा भी। यही विशेषता संपूर्ण विश्व के लिए आकर्षित करती है और हमें गौरवान्वित। हमारे रीति-रिवाज, हमारी बोली हर 50-100 किलोमीटर भी बदली-बदली सी नजर आती है , ऐसी विविधता के बावजूद भी, हम इंसान और नागरिक के रूप में अपने राष्ट्र के लिए एकता और अखंडता के लिए समर्पित भाव से जुड़े हुए हैं, जो आश्चर्यजनक तो है ही , मिसाल भी है। हमारे इस  विशालतम देश को पारस्परिक रूप  से जुड़ने और समझने के लिए संवाद स्वरूप जो सशक्त,सरस और सहज माध्यम है वह हिंदी भाषा ही है। इसका क्षेत्र व्यापक है। पूरे देश में जहाँ विविध बोली और भाषाएं हैं उनमें हिंदी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक भी है और प्रमुख भी। हिंदी भाषा को राजकीय भाषा का स्थान मिला है। यह मानने में कोई संकोच नहीं कि अभी भी हमारे देश में ऐसे क्षेत्रवासी हैं जो हिंदी भाषा नहीं समझ पाते। अत:  हिंदी को देश के हरेक क्षेत्र में    सशक्त माध्यम बनाने हेतु हिंदी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना आवश्यक और महत्वपूर्ण है। जिसके लिए स्थानीय और केंद्र के अलावा हिंदी प्रेमियों, साहित्य, संगीत, चलचित्र के माध्यम से सतत प्रयास भी किये जा रहे हैं। सार यही कि भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा जितनी व्यापक होगी, जितनी समृद्ध होगी देश को उन्नतऔर समृद्ध करने में उतनी ही सहजता होगी।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     यह सत्य है कि भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी भाषा की भूमिका देश को एक सूत्र में पिरोने बाली ही भाषा नहीं है अपितु यह देश की एकता और अखंडता को बनाये  रखने में भी प्रमुख कार्य करती है इसके साथ साथ संपर्क  और संवाद को आसान  बनाने में सहायक है तभी तो इसका व्यापक स्तर पर प्रयोग होता है जिससे लेन देन, व्यापार इत्यादि के स्रोतों में बढौतरी मिलती है, यही नहीं हिंदी भाषा सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती है जिससे  राष्ट्रीय एकता को मजबूती व बढ़ावा मिलता है, देखा जाए यह आर्यों की प्राचीन भाषा है जिसे वैदिक और लैकिक संस्कृत में बांटा गया है इस भाषा को 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को  देश की राजभाषा घोषित किया था जिसका पैमाना बढ़त की और ही दिख रहा है, अन्त में यही कहुँगा हिंदी भाषा विश्व की सबसे  समृद्ध और सरल भाषाओं  में से एक है और यह केवल संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की आत्मा  है,  इसमें अनोखा आकर्षण और मिठास मिलती है जिससे रिश्तों की मर्यादा और अपनेपन का एहसास महसूस होता है, आज का दिन यानि 14 सितंबर हिंदी दिवस  के रूप में मनाया जाता है जो हिंदी के ऐताहासिक महत्व को दर्शाता है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हिंदी दूनिया भर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में एक है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

     भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा का स्थान सर्वोपरि होना चाहिए , क्योंकि ..... 

हिंदी भाषा होमी राष्ट्रभाषा है ! 

हिंदी भाषा अति सरल भाषा है ! 

हिंदी भाषा मैं जो बोलते हैं , वो ही लिखते हैं ! 

हिंदी भाषा मैं कोई शब्द मूक नहीं होता ! 

भारतीय भाषाओं मैं से हिन्दीभारत के सबसे अधिक क्षेत्र मैं बोली जानेवाली भाषा है ! हिंदी को उसका उचित स्थान महीना प रहा क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर , अधिकांश विद्यालयों मैं अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दिया जाता है ! हिंदी में उच्च शिक्षा का अभाव है क्योंकि हिंदी का वांछित विकास नहीं हो पाया इस दिशा में! हिंदी का सम्मान जब नागरिकों के साथ , दिल से सरकार भी करने लग जाएगी , तो हिंदी के उचित विकास को कोई रोक नहीं पाएगा ! हिंदी को उसके उचित स्थान पर तभी देखा जा सकता है जब अंग्रेजी का मिथ्या मोह त्यागकर , लोग इसको इसके वांछित , शीर्ष स्थान पर पहुंचने का प्रयास करें ! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

         हिन्दी जहां सभी भाषाओं की बड़ी बहन है,सभी साथ लेकर चलने वालों में से है।आजादी के आन्दोलन से अब तक हिन्दी भाषा हो या उसका साहित्य अपनी सहयोगी भाषाओं,हिन्दी अहिन्दी भाषी विद्वानों के साथ आगे बढ़कर आज विश्व पटल पर अपने प्रसिद्ध गान को गुंजायमान किए है।हां जिस तरह की इच्छा शक्ति क्रियान्वयन की अपेक्षा राजनीतिक क्षेत्र से थी नहीं हुई। पर विश्व पटल पर खुला व्यापार फिल्म जगत की मजबूरियों ने चाहें अनचाहें हिन्दी का प्रचार-प्रसार संवर्द्धन किया।प्रकाशन की दुनियां में परिवर्तन तकनीक ने सोने पर सुहागा का काम किया।आज हिन्दी भाषा व साहित्य अधुनातन तकनीक स्वरूपों के साथ निरन्तर आगे बढ रही है,पर हिन्दी के नाम पर केवल पखवाड़ा मनाने वालों,हिंगेजी के बुखार वालों व हिन्दी के नाम पर बोलियों की दुकान आरम्भ कर देने वालों से सावधान रहने की आवश्यकता है,हानि चाहें देश की हो,धर्म की,समाज, परिवार या भाषा साहित्य की आस्तीन के सांपों से ही आगत से अनागत तक अधिक हुई है।जय हिन्द, जय हिन्दी भाषा।

- शशांक मिश्र भारती

शाहजहांपुर - उत्तर प्रदेश

       भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक चेतना से निर्मित होती है। यहाँ भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि लोक-स्मृति, संस्कृति, परंपरा और संवेदना की वाहक है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगला, असमिया, उड़िया, पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी, मैथिली, संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा मिलकर भारत की भाषायी अस्मिता को आकार देती है। इस विराट भाषायी परिवार में हिन्दी की भूमिका एक सेतु की है। हिन्दी का महत्व इस कारण नहीं है कि वह अन्य भारतीय भाषाओं से बड़ी है, बल्कि इसलिए है कि वह अलग-अलग भाषायी क्षेत्रों के बीच संवाद का एक व्यापक माध्यम बनी है। हिन्दी ने भारतीय भाषाओं के शब्दों, लोकानुभवों और सांस्कृतिक बिंबों को आत्मसात किया है। उसकी प्रकृति ही ऐसी रही है कि वह लेने के साथ देने वाली भाषा बनी। हिन्दी साहित्य को देखें तो उसमें भारतीय भाषाओं और बोलियों की सुगंध स्पष्ट दिखाई देती है। लोकभाषाओं ने हिन्दी को जीवन दिया और हिन्दी ने उन लोकस्वरों को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने का कार्य किया। कबीर की सधुक्कड़ी, तुलसी की अवधी, सूर की ब्रजभाषा और आधुनिक हिन्दी का विकास—यह यात्रा बताती है कि हिन्दी किसी एक भूभाग में बंद भाषा नहीं रही; उसने भारतीय भाषायी संसार से निरंतर संवाद किया है।आज हिन्दी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका भाषाओं को जोड़ने की है। दक्षिण भारत का कोई व्यक्ति उत्तर भारत से संवाद करे, पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति देश के दूसरे हिस्से तक पहुँचे या किसी भारतीय साहित्य का व्यापक स्तर पर आदान-प्रदान हो—ऐसे अनेक अवसरों पर हिन्दी संपर्क-भाषा के रूप में उपयोगी सिद्ध होती है।लेकिन हिन्दी की भूमिका तभी सार्थक होगी जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं को प्रतिस्पर्धी नहीं, सहयात्री माने। किसी भाषा का विकास दूसरी भाषा को कमजोर करके नहीं हो सकता। भारत की भाषायी शक्ति उसकी विविधता में है। हिन्दी को तमिल से सीखना है, बंगला से संवेदना ग्रहण करनी है, मराठी से सामाजिक चेतना, पंजाबी से जीवटता, असमिया से प्रकृति-बोध और संस्कृत से अपनी ज्ञान-परंपरा का विस्तार करना है।आज अनुवाद के माध्यम से हिन्दी भारतीय भाषाओं के बीच एक महत्वपूर्ण पुल बन सकती है। एक भाषा का श्रेष्ठ साहित्य दूसरी भाषा के पाठक तक पहुँचे—यही भाषायी लोकतंत्र है। यदि किसी कन्नड़ लेखक की रचना हिन्दी में आती है और फिर हिन्दी के माध्यम से देश के दूसरे हिस्सों तक पहुँचती है, तो यह केवल अनुवाद नहीं, भारतीय आत्मा का परस्पर परिचय है।डिजिटल युग में हिन्दी के सामने नई संभावनाएँ भी हैं और चुनौतियाँ भी। इंटरनेट, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया ने भाषाओं की सीमाएँ कम की हैं। ऐसे समय में हिन्दी को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा के रूप में भी सक्षम बनना होगा। साथ ही भारतीय भाषाओं के बीच डिजिटल अनुवाद और ज्ञान-विनिमय को बढ़ाना होगा।हिन्दी का भविष्य दूसरी भारतीय भाषाओं के भविष्य से अलग नहीं है। एक भारत की कल्पना अनेक भाषाओं के सम्मान के बिना अधूरी है।इसलिए हिन्दी को केवल ‘राष्ट्रभाषा’ कहकर गौरवान्वित होने के बजाय उसे भारतीय भाषाओं की सहचरी, संवाद की सेतु और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की वाहिका बनाना अधिक सार्थक होगा।अंततः भाषा कोई दीवार नहीं, खिड़की होनी चाहिए।हिन्दी ऐसी खिड़की बने, जिससे भारत अपनी हर भाषा में स्वयं को देख सके और हर भारतीय भाषा से हिन्दी का आकाश और विस्तृत होता जाए।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

      भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा की भूमिका ठीक वैसी ही होनी चाहिए जैसी किसी घर में एक बड़ी बहन की होती है जो सबका ध्यान रखते हुए, उचित देखभाल करते हुए अन्य भाई-बहनों को साथ लेकर चलती है। हिंदी भाषा और संस्कृति की एक प्रकृति या विशेषता कह लीजिए कि वह अच्छाई को ग्रहण करते हुए उसे अपने में एकाकार कर लेती है। इसी कारण हिंदी में नए-नए शब्द समाहित होते चले जाते हैं। तो हिंदी अपनी इस विशेषता को ना छोड़े साथ ही दूसरी भाषाओं के अच्छे साहित्य  का हिंदी में अनुवाद होता रहे। विज्ञान से संबंधित पुस्तकों का हिंदी में अच्छा अनुवाद उपलब्ध कराने की ओर अधिक से अधिक ध्यान रख कर उसे कार्यान्वित किया जाए।हर हिंदी भाषी हिंदी बोलने-लिखने में गर्व अनुभव करे। अंग्रेजी का गुणगान करते रहने से हिंदी अपनी भूमिका का निर्वाह कैसे कर पाएगी? हिंदी दिवस पर इस पर विचार करते हुए हर हिंदी भाषी को अपने लिए कुछ लक्ष्य निश्चित करके उन्हें कार्यान्वित करने का संकल्प करें ताकि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके। जो हो रहा है उससे संतोष करके बैठ न जाएँ बल्कि जो नहीं हो पा रहा है उस पर विचार करके, कार्य योजना बना कर कार्य करना आरंभ करें।हिंदी में लिख कर केवल अपने विकास और अपने महिमामंडन, वाहवाही तक ही सीमित न रह जाएँ..यह सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

        राष्ट्रीय गौरव हिन्दी भाषा को संवैधानिक दर्जा होने के उपरांत भी हम लोगों की उपेक्षा का शिकार हो रही है हिंदी।  हमारी सरकारों के ढुलमुल रवैया के कारण भी हिन्दी भारत देश में मात्र सौतन बन कर रह गई है ।जो लोग कहते हैं कि अंग्रेजी अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क भाषा है उन्हें मैं बता देना चाहता हूं कि 2 सौ देशों  में से मात्र 14 देशों में अंग्रेजी बोली जाती हैं। बाकी देशों में उनकी अपनी भाषा है जिसे बोलने पर वे गर्व करते हैं । लेकिन हमारे देश में राष्ट्र गौरव हिन्दी बोलने पर शर्म और अंग्रेजी बोलने पर गर्व किया जाता है।ऐसे में हिंदी दिवस मनाना मात्र औपचारिकता है।हिन्दी पत्रकारिता ने हिन्दी के भाषाई वर्चस्व को कायम रखने का प्रयास किया है अन्यथा हम भारत वासियों ने हिन्दी भाषा को हाशिए पर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।आज हिंदी दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हिंदी को हम राज-काज एवं राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करें जिसकी वह अधिकारिणी है। 

 - मदन हिमाचली 

 सोलन - हिमाचल प्रदेश 

       हिन्दी में बोलचाल, उर्दू, अंग्रेज़ी और तकनीकी शब्दों का मिश्रण बढ़ा है। इसे लेकर बहस भी है—एक पक्ष इसे भाषा की स्वाभाविक गतिशीलता मानता है, दूसरा साहित्यिक भाषा की शुद्धता और सौंदर्य को लेकर चिन्तित है। (हिन्दी राष्ट्र की भाषा अवश्य बने, लेकिन बड़ी बहन की तरह—छोटी बहनों को दबाने वाली नहीं, उन्हें साथ लेकर चलने वाली भाषा रहे- यानी राष्ट्र की भाषायी विविधता को जोड़ने वाली भाषा के रूप में अधिक सार्थक बननी चाहिए-) भूमिका हिन्दी की “राष्ट्र की एक भाषा” भर नहीं, बल्कि “राष्ट्र की भाषायी विविधता को जोड़ने वाली भाषा” के रूप में अधिक सार्थक बननी चाहिए। भारतीय भाषाओं के साहित्य का सेतु बनना — तमिल, तेलुगु, बांग्ला, मराठी, असमिया, भोजपुरी, मैथिली, उड़िया, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का हिन्दी में अनुवाद और हिन्दी साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं में प्रसार होना चाहिए-यानी -    हिन्दी का विस्तार दूसरी भाषाओं की कीमत पर नहीं होना चाहिए। भारत की भाषायी विविधता उसकी कमजोरी नहीं, सांस्कृतिक शक्ति है।

- विभा रानी श्रीवास्तव

 पटना - बिहार 

       हिंदी भारत की आत्मा है ,हिंदी हमारी पहचान है ,हिंदी हम भारतीयों की चेतना है ।जी हाँ हिन्दी को उपेक्षित कर शिक्षा का सर्वांगीण विकास अधूरा है ।हिन्दी को मातृ भाषा का दर्जा मिलना चाहिए ।  किसी भी व्यक्ति की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है, और मां को पहली गुरु कहा गया है ,क्योंकि हिंदी हमारी मात्र जुबान है । हिंदी भाषा का स्थान, हम भारतीयों के जीवन में मां और संतान के संबंध जैसा ही होता है। इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है,,, बहुत कुछ कहा जा सकता है ।भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति की प्राणद चेतना का नाम है ,,,।हम भारतीयों की वह चेतना हिंदी है,,। अर्थात मन के भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जो माध्यम है वह मुख्य तौर पर हिंदी भाषा है । भाषा मौखिक और लिखित दो रूपों में विद्यमान रहती है। भाषा वह माध्यम है जिससे हम देश की संस्कृति ,इतिहास ,परंपराएं, संचित ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीक तथा अपने महान विरासत को जान पाते हैं । हिंदी हमारी जुबान है अतः हमें अपने बच्चों को हिंदी की ओर उन्मुख करना चाहिए और सरकार को इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा अवश्य देना चाहिए ।

सारा जहां यह जानता है कि हिंदी हमारी पहचान है ।

संस्कृत से संस्कृति हमारी हिंदी से हिंदुस्तान है,,,,।

 स्वतंत्रता के सूर्योदय के साथ हिंदी को भारत की बिंदी बनना चाहिए था ,,,लेकिन उस हिंदी के हालात आजादी के 73 वर्ष बाद भी गुलामी के 200 वर्षों से बदतर सिद्ध हो रही है। जिस हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए हिंदी भाषी बंगाली राजा राममोहन राय ,ब्रह्म समाज के नेता केशव चंद्र सेन ,सुभाष चंद्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आशा के दीप जलाए ,वह हिंदी अपने ही घर में  बिलख रही है उपेक्षित है । विश्व  में इसकी लोकप्रियता बढ़ी है परंतु परंतु हिंदी भाषा अपने ही घर में भटक रही है,,,, अपनी पहचान होती नजर आ रही है,,,। जबकि शिक्षा में हिंदी को विशेष स्थान देना चाहिए । शिक्षा शब्द संस्कृत के, शिक्ष,धातु से लिया गया है इसका अर्थ है सीखना सिखाना ,अर्थात जिस प्रक्रिया द्वारा अध्ययन और अध्यापन होता है उसे शिक्षा कहते हैं । शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए हिंदी भाषा में सिखाया जाना व शैक्षिक जागरूकता फैलाना जरूरी है ।तभी वास्तविक स्वतन्त्रता भी सिद्ध होगी जब शिक्षा मे हिन्दी को यथोचित सम्मान मिलेगा ।

- सुषमा दीक्षित शुक्ला 

लखनऊ - उत्तर प्रदेश 

       हिन्दी दुनिया में सबसे अधिक लोगों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा है l इसमें उर्दू भी शामिल है, क्योंकि बोलचाल में हिन्दी और उर्दू एक जैसी ही है, भले ही उसकी लिपि अलग - अलग है l भाषा में तत्सम, तत्भव, देशज और विदेशज शब्दों का प्रयोग करने का प्रावधान है l हिन्दी उदार भाषा है, जो अपने अंदर अन्य भाषाओं को भी सम्मान जनक स्थान देती है l यह जैसी लिखी जाती है, वैसी ही पढ़ी और बोली जाती है l कुछ अपवाद हो सकते हैँ l इसलिए विश्व में इसकी महानता स्वीकार की जाती हैl

- अनिल पंतग 

बेगूसराय - बिहार 

       जो सत्य को भास जाए वही भाषा है। भाषा के माध्यम से ही हम भावनाओं को व्यक्त करते हैं जो भाषा  ,स्पष्ट भाव का अर्थ बताता है वही भाषा सरल और सहज होता है जिसे सभी व्यक्ति सरलता से समझ सकता है बोल सकता है भाषा मनुष्य को आगे बढ़ता है अर्थात सरल और सहज भाषा से ही व्यक्त होकर समझकर विकास की ओर गति करता है। हमारे राष्ट्र का नाम हिंदुस्तान है यहां रहने वाले निवासी हिंदुस्तानी है और यहां अधिकतर हिंदी बोलने वाले व्यक्ति है ,यहां के अधिकतर लोग हिंदी भाषा बोलते हैं राष्ट्र को समृद्ध बनाने के लिए हिंदी भाषा का विस्तार होना चाहिए और अन्य भाषाओं का भी अपमान ना सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए  सरल भाषा को अपनाना चाहिए। सरल और सहज भाषा हिंदुस्तान के लिए हिंदी भाषा उपयुक्त है। भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा का स्थान उसकी सहज सरल और भावात्मकता को देखते हुए उसकी बहुल्यता होनी चाहिए। हर व्यक्ति मातृभाषा से ही वस्तु को पहचानता है इस तरह राष्ट्रभाषा हिंदी से ही देश के विकास को पहचानेगा क्योंकि हिंदी भाषा सहज और सरल है। 

- उर्मिला सिदार 'उर्मी' 

 रायगढ़ - छत्तीसगढ़

      हिन्दी भाषा सरल है और भाषा में मिठास है । स्वर व्यंजन और ककहरा जो हिन्दी में समझ गया।भाषा अशुद्ध नहीं होगी।ग़लतियाँ नहीं होंगी। भारतीय भाषाओं में हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा मिलना चाहिए। लेकिन हिन्दी का मूल संस्कृत है इसे भी भूलना नहीं चाहिए। हिंदी के साथ ही अन्य भाषाओं का भी सम्मान करना चाहिए । आज विदेशों में भी हिन्दी भाषा पढ़ाई जाती है संस्कृत श्लोक पढ़ाया जाता है।पचहत्तर प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हैं। आने वाले समय में हिन्दी भाषा की भूमिका को विस्तार मिलेगा और मूल भाषा में गिनी जाएगी।

- सुधा पांडेय 

पटना - बिहार 

       सभी  देशों  में  अनेक  भाषायें  बोली  जातीं  हैं  । लेकिन  हर  देश  की  एक  ऐसी  भाषा  होती  है  जो  उसकी  राष्ट्र  भाषा  होती  है  ।हमारे  देश  में  भी  अनेक  भाषायें  हैं  ।हिंदी  एक  पुष्प  है  जिसमें  अनेक  प्रांतीय  भाषायें  उसकी  पंखुड़ियों  के  रूप  में  शोभित  हो  रहीं  हैं  । हिंदी  और  अनेक  भाषाओं  की  लिपि  भी  एक  ही  है  । हिंदी  में  अनेक  भाषाओं  के  शब्द  हैं  और  अन्य  भाषाओं  में  हिंदी  के  अनेक  शब्द  हैं  । इससे  सभी  भाषाओं  में  एकता  स्थापित  होती  है  हिंदी  अब  देश  में  ही  नहीं  सम्पूर्ण  विश्व  की  सम्पर्क  भाषा  बन  चुकी  है  ।इस  तरह  यह  सम्पूर्ण  विश्व  को  जोड़ने  का  कार्य  कर  रही  है  ।

- डॉ.अवधेश  कुमार  चंसौलिया  

ग्वालियर - मध्यप्रदेश 

      भारत केवल अनेक धर्मों और संस्कृतियों का देश नहीं, बल्कि विविध भाषाओं और बोलियों की भी समृद्ध भूमि है। यहाँ हर भाषा अपने साथ एक विशेष संस्कृति, इतिहास, साहित्य और जीवन-दर्शन लेकर चलती है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगला, मराठी, पंजाबी, गुजराती, असमिया, उड़िया, संस्कृत, उर्दू सहित अनेक भारतीय भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं। ऐसी भाषायी विविधता के बीच हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंदी भारत की उन प्रमुख भाषाओं में है, जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग बोलते, समझते और पढ़ते हैं। हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि इसे बहुत से लोग बोलते हैं, बल्कि इसलिए भी है कि यह विभिन्न क्षेत्रों और भाषायी समुदायों के बीच संवाद का एक सशक्त माध्यम बन सकती है। हिंदी ने समय-समय पर अनेक भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण किए हैं और स्वयं भी दूसरी भाषाओं को समृद्ध किया है। यही भारतीय भाषाओं की खूबसूरती है कि वे एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की सहयोगी हैं। हिंदी को आगे बढ़ाने का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं को पीछे करना बिल्कुल नहीं होना चाहिए। भारत की भाषायी शक्ति उसकी विविधता में ही निहित है। यदि हिंदी राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क भाषा के रूप में अपनी भूमिका निभाती है, तो साथ ही तमिल, बंगला, मराठी, पंजाबी, गुजराती, तेलुगु और अन्य भाषाओं को भी समान सम्मान और संरक्षण मिलना चाहिए। प्रत्येक भाषा भारत की आत्मा का एक अलग स्वर है।आज तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में हिंदी के सामने नए अवसर भी हैं। इंटरनेट, डिजिटल शिक्षा, फिल्मों, समाचार माध्यमों और सामाजिक मंचों ने हिंदी को देश-विदेश तक पहुँचाया है। आवश्यकता है कि हिंदी में उच्च स्तरीय विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, कानून, शिक्षा और शोध की सामग्री अधिक से अधिक उपलब्ध हो, ताकि हिंदी केवल भावनाओं और साहित्य की भाषा न रहकर ज्ञान-विज्ञान की भाषा भी बने। इसके साथ हिंदी को सरल, सहज और आधुनिक बनाने की आवश्यकता है। भाषा तभी जीवित और लोकप्रिय रहती है, जब वह समय के साथ बदलती है। दूसरी भारतीय भाषाओं तथा विश्व की भाषाओं से उपयोगी शब्दों को अपनाने में संकोच नहीं होना चाहिए। भाषा की शुद्धता के साथ उसकी सहजता और जनसुलभता भी महत्वपूर्ण है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान का वातावरण बनाया जाना चाहिए। बच्चों को हिंदी सीखने के साथ अपनी मातृभाषा तथा अन्य भारतीय भाषाओं को जानने का अवसर भी मिलना चाहिए। इससे उनमें भाषायी सम्मान और राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित होगी। मेरे विचार से हिंदी की सबसे बड़ी भूमिका “जोड़ने वाली भाषा” की होनी चाहिए, “थोपने वाली भाषा” की नहीं। हिंदी यदि प्रेम, संवाद और सहयोग के माध्यम से आगे बढ़ेगी, तो उसका सम्मान स्वतः बढ़ेगा। हमें ऐसी भाषा-नीति की आवश्यकता है जिसमें हिंदी का विकास हो, लेकिन किसी अन्य भारतीय भाषा को कमतर न समझा जाए। अंततः कहा जा सकता है कि हिंदी भारत की एक महत्वपूर्ण संपर्क भाषा है, जबकि भारत की सभी भाषाएँ मिलकर भारतीय संस्कृति की विराट पहचान बनाती हैं। हिंदी का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब वह अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलेगी।

“भाषाएँ अनेक हैं, भाव एक है;

बोलियाँ अनेक हैं, भारत एक है।

हिंदी बने संवाद का सेतु,

और हर भारतीय भाषा बने भारत के गौरव की धरोहर।”

 - सुनीता गुप्ता

 कानपुर - उत्तर प्रदेश 

      भारतीय भाषाओं में हिंदी की भूमिका सर्वोच्च है , क्योंकि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। हिन्दी भाषा को संवैधानिक दर्जा भी प्राप्त है , केवल केंद्रीय सरकार द्वारा इच्छा-शक्ति के अभाव में अधिकारिक रूप से  घोषित नहीं किया गया है।... जिस कारण हिंदी को राजरानी के रूप  में भारत सरकार द्वारा  ढुलमुल  नीति एवं दृढ़तापूर्वक कानून नहीं  बना कर   , मात्र अहिन्दीभाषी राज्यों को खुश रखने के लिए ,संभवत: वोट बैंक की दृष्टि से प्रतिष्ठित नहीं की जा रही है जो हमारे देश का दुर्भाग्य  है।.. हर देश की अपनी निजी राष्ट्रभाषा है। किसी दूसरी विदेशी भाषा की वैशाखी लेकर नहीं चल रही है। ...हिंदी को लेकर भारत की आम जनता में विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों तथा हिंदी क्षेत्रीय भाषाओं से कोई टकरार नहीं है और न ही विरोध है किंतु सरकार की हिंदी के प्रति उदासीनता एवं उपेक्षापूर्ण नीति के कारण हिंदी को जो स्थान मिलना चाहिए था , जो अधिकार मिलना चाहिए था,  वह अभी तक नहीं मिल सकी है और सिर्फ राजकीय समारोह आयोजित कर अपने कार्य को, अपनी भूमिका को सिर्फ दिखावे के लिए निर्वाह , खानापूर्ति कर रही है ।... भारतीय भाषाओं में हिन्दी की भूमिका आरंभ से ही , आजादी के पहले से ही काफी महत्वपूर्ण रही है । सभी भारतीय भाषाओं ने वंदेमातरम और जन गण मन को निर्विरोध रूप से स्वीकार किया था , अपनाया था , चाहे पश्चिम बंगाल का प्रांत  हो या दक्षिण के प्रांतों का ।हिन्दी ने ही सभी प्रांतों  की जनता को एक सूत्र में बांधकर हमारे देश को आजादी दिलायी थी। इससे भारतीय भाषाओं में हिन्दी की भूमिका स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है।आज हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय भाषा  का केंद्र सरकार द्वारा अधिकारिक भाषा घोषित नहीं किए जाने के कारण हिन्दी दिवस समारोह मनाए जाने का जो प्रचलन चल पड़ा है , लगता है ,वह रुकने वाला नहीं है।... जब तक हिंदी राष्ट्रीय भाषा घोषित नहीं की जाती है तब तक ऐसा ही चलता रहेगा। किन्तु हमें यह जानना होगा कि हिन्दी की सभी भारतीय भाषाओं में भूमिका सर्वोच्च ,लब्धप्रतिष्ठित ,  सहगामिनी, सहयोगी की रही है , इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता ।

- डा. बिन्देश्वर प्रसाद गुप्ता

पटना - बिहार

        भारत में अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं व क्षेत्रीय लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा बोलते भी हैं। अलग-अलग राज्य के निवासी अपनी क्षेत्रीय भाषा में ही सामान्यतः अभिव्यक्ति करते हैं, जिसमें प्रेम, सामंजस्यता व एकता का विराट दर्शन होता ही है। किंतु हिंदी सबको ही आनी चाहिए क्योंकि एक राज्य के लोग व्यवसाय हेतु, पर्यटन हेतु, अध्ययन हेतु भिन्न भिन्न कारणों से एक राज्य से दूसरे राज्य जाते ही हैं।भावों का आदान-प्रदान दूरसंचार के द्वारा भी होता ही रहता है। ऐसे में यदि कोई हिंदी ना जाने तो वार्तालाप भी असंभव है।तो हिंदी देश के उत्थान के लिए अत्यावश्यक है। हिंदी नहीं तो देश का विकास भी द्रुत गति से न होकर धीरे हो जाएगा।

- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

वाराणसी - उत्तर प्रदेश 

       वही जो परिवार में बहनों की होती है । कोई भी किसी बहन के साथ कोई भेदभाव नहीं रखती । सबको समान आदर देती है । सबको साथ लेकर चलती है । आपस के लड़ाई-झगड़े वे घर में ही मिल - जुलकर आपसी संवाद से निपटा लेती हैं । उनके स्वरूप की विविधता में ही एकता की सुंदरता होती है । उनमें प्रादेशिक भी कोई मतभेद नहीं होते । राजनीति को वे कभी अपने पास फटकने ही नहीं देती हैं । वे अच्छी तरह जानती हैं कि राजनीतिकों ने अपने स्वार्थ की खातिर उनका  कितना बड़ा नुक़सान किया है । समझदार है कि उन्होंने उनकी नीयत को भांप कभी अपना नुकसान नहीं होने दिया । आज ये भाषाएं जहां खड़ी हैं , वे अपनी विशिष्टताओं के कारण खड़ी हैं । भाषाओं ने कभी कोई अलगाव की बात नहीं की । सद्भाव में ही वे अपना भला समझती हैं । उनके बीच कभी अपनी अस्मिता का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं हुआ । वे अपनी - अपनी जगह खुश हैं । संतुष्ट हैं । हिंदीजीवियों को भी आज अपनी भूमिका निष्पक्षता से उनके व्यापक हित में निभाना चाहिए । हम हिंदी हैं । हिंदी हमारी है । उसके बारे में सोचना सभी हिंदियों का परम कर्तव्य है । हमें उस दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए कि हमें हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता ही न पड़े । जय हिंद ! जय हिंदी ! हिंदी मेव जयते ! 

-  अशोक आनन 

    मक्सी - मध्यप्रदेश 

      हिन्दी हमारी मातृभाषा है। भारतीय भाषाओं में हिन्दी भाषा की अपनी खास विशेषता है। भाषाएं हमारे देश में भिन्न -भिन्न बोली जातीं हैं।  अनेकता में एकता परिभाषित है। हर राज्य में अपनी बोली ,बोली जाती तो हैं हीं। लेकिन सभी भाषाओं से सर्वोच्च स्थान पर हमारी हिन्दी का बर्चस्व कायम है। मीठी और सुन्दर ग्राह्य स्वरूप हिन्दी भाषा हीं है। हिन्दी राजभाषा में तो अपना स्थान बना चुकी है। उम्मीद है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा भी शीघ्र घोषित कर दिया जाएगा। हम सभी का दायित्व भी है कि हिन्दी में हीं अधिकतर सारी बातें करें। अधिकत्म प्रयोग हिन्दी का लिखने में भी करें हम सब। जब तक हम सभी मिलकर दृढ़ संकल्प ना लेंगे हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए तब तक हिन्दी को वह स्थान प्राप्त नहीं होगा जो होना चाहिए।  नवजात शिशु भी स्वत: पहली बार "माॕ " शब्द को हीं उच्चारित करता है। अतः निसंदेह हम बड़े गर्व से अपनी भाषा हिन्दी का सम्मान करें।

- डॉ पूनम देवा 

पटना - बिहार

         भारत की भाषायी विरासत किसी इंद्रधनुष से कम नहीं, जहाँ प्रत्येक भाषा अपनी विशिष्ट संस्कृति, संवेदना, लोकचेतना और सभ्यतागत स्मृतियों का मनोहारी रंग समेटे हुए है। ऐसी विविधता के मध्य हिंदी की भूमिका किसी भाषा पर आधिपत्य स्थापित करने की नहीं, बल्कि समन्वय, संवाद और सौहार्द की सेतु-भाषा बनने की होनी चाहिए। हिंदी का वास्तविक वैभव तभी सार्थक है, जब वह भारतीय भाषाओं की अस्मिता का सम्मान करते हुए उनसे आत्मीयता स्थापित करे। तमिल की प्राचीनता, बंगला की भावप्रवणता, मराठी की ओजस्विता, पंजाबी की जीवंतता, मैथिली की माधुर्यता, अंगिका की लोकगंध—इन सभी की समृद्धि मिलकर भारत की बहुरंगी भाषायी चेतना को पूर्णता प्रदान करती है। हिंदी को चाहिए कि वह अन्य भारतीय भाषाओं को प्रतिस्पर्धी नहीं, सहयात्री माने; उनके शब्दों को आत्मसात करे, उनके साहित्य से समृद्ध हो और अपनी सरलता एवं व्यापकता से जन-जन के बीच संवाद का माध्यम बने। हिंदी जितनी उदार होगी, उतनी ही समृद्ध और सम्मानित होगी। किसी भाषा का उत्कर्ष दूसरी भाषा के क्षरण में नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और सह-अस्तित्व में निहित है। हिंदी वह सूत्र बने, जिसमें भारत की विविध भाषाएँ मोतियों की भाँति गुँथकर राष्ट्रीय एकात्मता का सुंदर हार बन जाएँ। भाषाएँ भले अनेक हों, किंतु भाव एक हों; बोलियाँ भले अलग हों, किंतु आत्मीयता एक हो—इसी समन्वित चेतना में हिंदी की वास्तविक सार्थकता और भारतीयता का सौंदर्य निहित है।

- अर्चना झा 

पानीपत - हरियाणा 

      भारतीय भाषा में हिंदी भाषा की क्या भूमिका होनी चाहिए, आज हिंदी दिवस पर चर्चा का विषय है। हमारे भारतवर्ष में लगभग 22 भाषाएं बोली जाती हैं यथा- असमिया, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कत ,संथाली , सिंधी, तमिल, तेलुगू और उर्दू।  प्रदेश स्तर पर भी बहुत सी बोलियां है जो बोली जाती हैं जैसे पश्चिमी हिंदी की बोलियां- खड़ी, ब्रज, हरियाणवी, बुंदेली और कन्नौजी। इसी प्रकार पूर्वी हिंदी की कुछ बोलियां है जिसमें अबधी ,बघेली, छत्तीसगढ़ी है। फिर राजस्थानी हिंदी बोलियां भी है - मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती मालवी । इसके साथ-साथ बिहार की भी बोलियां भी हैं - भोजपुरी, मगही, मैथिली और यह भी देखा जाता है की पहाड़ी क्षेत्र में बोलने वाली कुमाऊनी, गढ़वाली यानी हिमाचली बोलियां भी प्रमुखता से अपने-अपने क्षेत्र में बोली जाती हैं। सभी भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा सबसे अधिक बोली जाती है। अत्यधिक सरल, सहज, सुगम देवनागरी लिपि में स्वर व्यंजन से सजी हिंदी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका भी बहुआयामी है यथा- सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक।भारतीय संविधान में हिन्दी को  राजभाषा का दर्जा प्राप्त  है और संघीय सरकार के समस्त कार्य भी हिंदी में ही किए जाते हैं फिर भी सामाजिक श्रेष्ठता के प्रदर्शन में अंग्रेजी को प्रमुखता दी जाती है। विदेशी प्रभाव  से सभी परिचित हैं।आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बहुत तेजी के साथ हिंदी को बढ़ावा दिया जा सकता है जहां हिंदी का प्रयोग तेजी से हो सकता है। हमारी हिंदी विभिन्न भाषा भाषी सामुदायिक प्रियजनों के बीच संपर्क भाषा के रूप में सेतु का कार्य कर सकती है। सभी भाषावासी एक दूसरे से आपस में बातचीत कर सकते हैं।हम देख रहे हैं आज वैश्वीकरण के दौर में अपने देश की भाषाओं के अलावा हिंदी का प्रयोग प्रत्येक देश की मूल भाषाओं पर भी पड़ने लगा है क्योंकि भारतीय मूल के लाखों करोड़ो भारतीय विदेश में रह रहे हैं। वह अपनी मातृभाषा से प्रेम करते हैं और इसके संवर्धन प्रचार  प्रयास के लिए प्रयासरत भी हैं। हिंदी की सम्मानजनक और प्रगतिवान स्थिति के महत्व को आंकते हुए भारतीय साहित्य के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने समझा और लिखा था----

 "निज भाषा उन्नत अहै 

 सब उन्नति का मूल।

बिन निज भाषा ज्ञान के

 मिटत न हिय का शूल"।।

 यह सच भी है । अतः समस्त भारतीय भाषाओं  के साथ संवाद अनुवाद  हिन्दी के साथ करें। हमें अपनी मातृभाषा की जड़ों को मजबूत बनाए रखने के लिए उससे निरंतर जुड़े  रहना होगा ।

-  डाॅ.रेखा सक्सेना 

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

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