हिन्दी दिवस - 2026 के अवसर पर चर्चा - परिचर्चा

        हिन्दी' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से हुई है, जो आगे चलकर फारसी (ईरानी) संपर्क के माध्यम से इस भाषा का नाम बन गया। वर्ष 1918 में गांधी जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राजभाषा बनाने को कहा था। गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। वर्ष 1949 में स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की अनुच्छेद 343(1) में इस प्रकार वर्णित है.  राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।  इस निर्णय के बाद मूल हिंदोस्तानी बोली उर्दू के शकल से प्रतिस्थापित हो जाते हैँ। यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया, इसी दिन हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50वाँ जन्मदिन था, इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। हालाँकि जब राष्ट्रभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो अहिंदी (जहाँ हिंदी कम या बिलकुल भी बोली नहीं जाती) भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और इसी कारणवश हिंदी में भी अंग्रेजी का प्रभाव पड़ने लगा। देश में हर साल हिन्दी दिवस पर अनेकों कार्यक्रम होते हैं। इसी क्रम में जैमिनी अकादमी ने चर्चा परिचर्चा का आयोजन किया है। जिस का विषय " ‌भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा की भूमिका क्या होनी चाहिए ? " रखा गया है। शामिल विद्वानों को " हिन्दी सेवी सम्मान - 2026" सम्मानित किया गया है :-
हिंदी की बोलियों का विकास हिंदी के ही विकास का एक रूप में हिंदी की अनेक बोलियाँ हैं क्योंकि भक्ति काल में कलमकारों ने अपनी -अपनी बोलियों में मानवजाति में  अलौकिक ईश चेतना को जगाया था।  वर्गभेद , जाति -पाँति , अन्धविश्वास आदि की दीवारों को तोड़ा यह बोलियाँ थी ब्रजभाषा में सूरदास जी ने सूर सागर आदि रचा । अवधी ने संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस रच के   जन -मन -घर में पूजनीय बना दिया । बुंदेली, बघेली , भोजपुरी , मालवी , राजस्थानी मगही आदि मुख्य बोली हैं, यह हिंदी की शक्ति का बुस्टर के साथ अनेकता  में एकता की मिसाल है। ये भारतीय संस्कृति , इतिहास , रीति रिवाज , परंपराओं को बाँधे हुए हैं । भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली हिंदी भाषा है। मुम्बई का फ़िल्म उद्योग अवधी , भोजपुरी,आदि और हिंदी फिल्मों  की भव्य महानगर है। हिंदी ने आजादी के आंदोलन में राष्ट्रजागरण की भूमिका निभायी।देशभर में इसने हर दिल में जगह बनायी। आजादी के बाद  संविधान में राजभाषा का दर्जा मिला है। राजभाषा के रूप में अहिन्दी भाषी राज्यों में उड़ान भर   रही है। भारत , विश्व में हिंदी  द्रुतगामी गति से आगे बढ़ के विश्व पटल पर स्थापित हुयी है । विश्व के बाजारवाद , व्यापार की भाषा हिंदीं बनी है। दुनिया के एक सौ पचास  देशों में हिंदी पढ़ाई जाती है और यहॉं शोध कार्य  कर रहे हैं। कई देश जैसे इटली , श्रीलंका , रूस , मॉरिशिस आदि में स्नातक , स्नातकोत्तर , पीएचडी आदि का पाठ्यक्रम की व्यवस्था है। अमेरिका के तीस से ज्यादा विश्वविद्यलयों में हिंदी शिक्षा को स्थान मिला है। लगभग सौ देशों में हिंदी पढ़ी , बोली , लिखी जाती है।  एशिया की प्रतिनिधि भाषा है ।भारतीय महाकाव्य को प्रो ची.श्येन. ने रामचरितमानस, रामायण का चीनी भाषा में अनुवाद किया।  आ महामहिम प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जी ने 27 सितंबर ,2014 में 'संयुक्त राष्ट्र संघ में' हिंदी में अपना भाषण देकर विश्व को संबोधित किया था। फ्लोरेंस विश्वविद्यालय , इटली में हिंदी शोध करता डॉ जुइजिपियो तैसितौरी ' रामचरित मानस ' और ' बाल्मिकी रामायण ' पर तुलनात्मक शोध आरंभ किया है।इन आधारों पर हिंदी की गति अपनी सक्रिय भूमिका में दिखायी दे रही है। भारत की आजादी के आंदोलन के समय हिंदी नेताओं , जन -जन की संपर्क भाषा थी ।  गांधी जी, स्वामी दयानन्द सरसवती आदि गुजराती होते हुए हिंदी में काम करते थे ।भारत की आजादी के बाद से हिंदी  को संविधान ने राजभाषा के रूप में मान्यता दी । मेरे मतानुसार हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में बेहतर है जिस प्रकार राष्ट्र की एकता, अखंडता , संप्रभुता, देशप्रेम  को सिद्ध करने के लिये हम एक राष्ट्र ध्वज , एक राष्ट्रगीत और एक राष्ट्रचिह्न अपनाते हैं ,उसी प्रकार भाषाओं के क्षेत्र में हमेशा एक भाषा की जरूरत  है वह राष्ट्रभाषा हिन्दी है, क्योंकि हिंदी के शब्दकोष व्यापक भंडार है , इसकी देवनागरी लिपि वैज्ञानिक है । हिंदी भाषा सरल , सहज, लचीली , उच्चारण सुगम है । हर कोई आसानी से से हिंदी को सीख , बोल लेता है। डॉ मनोज पांडे ने कहा -"भाषा के बिना संस्कृति पंगु है , संस्कृति के अभाव में भाषा अंधी है। "भारतेन्दु जी ने भी कहा -

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।"

भारतीय संस्कृति , एकता , राष्ट्रीय चेतना की

 हिंदी आत्मा है

हिंदी की भाषागत शुद्धता के प्रति 

असावधानी एक स्वीकार्य क्रीड़ा है। मैं तो ऐसा ही मानती हूँ।

आज तो प्रतिष्ठित अखबारों , पत्रिकाओं में अक्षरों में 

वर्तनी की गलती ,अनुस्वार , अनुनासिक

 लिंग आदि की व्याकरण की गलतियों से भरा रहता है।

। भाषा की अशुद्धता को दर्शाता है। ऐसी गलतियाँ 

भाषा को लगड़ी बना के लुप्त होने के 

कगार पर खड़ी हो जाती हैं।

समय के परिवर्तन के साथ अब एक विधिक और प्रशासनिक भाषा के रूप में हिंदी की स्थिति थोड़ी सुधरी , थोड़ी परिपक्व , जटिल भी हुई है । न्यायालय के फैसलों को  हिंदी की गुणवत्ता की वजह से अहिंदीभाषी   कुछ राज्य अपनी भाषा के साथ हिंदी में दे रहे हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है।  विधि की  हिंदी में किताबें हैं लेकिन भाषा किलिष्ट होने से  कानून की पढ़ाई छात्र अंग्रेजी में करना पसंद करते हैं। प्रशासनिक सेवाओं के ऑन लाइन फॉर्म हो या राष्ट्रीय पुरस्कार हेतु फॉर्म भी अंग्रेजी में होते हैं। जिसे हिंदी भाषी , जो अंग्रेजी नहीं जानता है उसे पेचीदा ही लगती है। विश्व व्यापार के आयात -निर्यात के ऑन लाइन फॉर्म दिखावा ही है। इन का हिंदी में प्रयोग होना अभी चुनौती है। हिंदी को एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में लोकप्रिय बनाने के लिए शिक्षण और प्रशिक्षण   में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की इंटरनेट के द्वारा ई -प्रशिक्षण की  पहल करने की जरूरत है।  सरकार इस तरह की व्यवस्था उपलब्ध कराए कि केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान  द्वारा , केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो  या अन्य माध्यम से ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करे। विदेशों में  स्थापित सभी भारतीय दूतावास हिंदी भाषा का बेसिक पाठ्यक्रम के आधार बनाके  , वर्कशॉप द्वारा विदेशी छात्रों को शिक्षण दें ।  सरकारी संस्थानों से हिंदी पत्रिका प्रकाशित हों।भारत की अब 7 वीं शक्ति सॉफ्ट पॉवर का भाषा अनुवाद  भारतीय सभी भाषाओं को आगे बढ़ा रहा है।   हम सब भारतीय प्रण करें कि  घर बाहर हम हिंदी में संवाद करें ।  स्वभाषा मजबूत होगी तो राष्ट्र मजबूत उन्नत बनेगा। जो राष्ट्र स्वयं का अन्न नहीं उगा सकता तो वह भूखा रहेगा । जिस राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं होगी उसका इतिहास , संस्कृति , समूल नष्ट हो जाएगी। जिस राष्ट्र में स्वतः के बुनकर नहीं होंगे उस राष्ट्र में तन ढकने के लिए वस्त्र नहीं होंगे। हिंदी भाषा आसान होने से विश्व को स्वतः जोड़ रही। है। इसलिए राजनैतिक स्वार्थ को छोड़ो हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाएँ। मातृभाषा  हिंदी माँ , माटी  इतिहास  और संस्कृति से जोड़ती है।  भाषा हिंदी ।।

- डॉ मंजु गुप्ता

मुंबई - महाराष्ट्र 

डोगरी भाषा के विकास में हिंदी की भूमिका      

प्रस्तावना

भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, संवेदना और सामूहिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति होती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषाओं का विकास एक-दूसरे से अलग-थलग रहकर नहीं, बल्कि निरंतर संपर्क, संवाद और आदान-प्रदान के माध्यम से हुआ है। डोगरी और हिंदी भी ऐसी ही दो भाषाएँ हैं, जिनके बीच लंबे समय से गहरा सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक संबंध रहा है। हिंदी ने डोगरी के विकास में अनेक स्तरों पर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं डोगरी ने भी हिंदी के साहित्य और भारतीय भाषायी संस्कृति को समृद्ध किया है।डोगरी जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र की प्रमुख भाषा है और अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता, शब्द-संपदा, लोक परंपरा तथा साहित्यिक अभिव्यक्ति के कारण भारतीय भाषाओं में विशिष्ट स्थान रखती है। आज डोगरी भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा है। इस स्थिति तक पहुँचने की उसकी यात्रा में साहित्यकारों, संस्थाओं, पत्र-पत्रिकाओं, शिक्षण संस्थानों और विभिन्न भारतीय भाषाओं के साथ उसके संवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी इस संवाद की सबसे प्रभावशाली कड़ियों में से एक रही है।

ऐतिहासिक संपर्क और भाषायी निकटता

डोगरी और हिंदी दोनों भारतीय आर्य भाषा-परिवार से संबंधित हैं। दोनों के बीच शब्द-संपदा, वाक्य-विन्यास और सांस्कृतिक संदर्भों के स्तर पर अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। जम्मू क्षेत्र का उत्तर भारत के अन्य भागों से निरंतर सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क रहा है। व्यापार, शिक्षा, प्रशासन, धार्मिक यात्राओं और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से हिंदी का प्रभाव जम्मू क्षेत्र तक पहुँचा और इसके साथ ही डोगरी भाषी समाज ने हिंदी के व्यापक साहित्यिक संसार से संवाद स्थापित किया।इस संपर्क का अर्थ डोगरी की स्वतंत्र पहचान का क्षरण नहीं रहा। इसके विपरीत, हिंदी के माध्यम से डोगरी को व्यापक भारतीय भाषायी परिदृश्य से जुड़ने का अवसर मिला। डोगरी लेखकों को अपनी रचनाओं को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का मंच मिला और हिंदी जगत को डोगरी की समृद्ध लोक-संस्कृति तथा साहित्य से परिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ।

डोगरी साहित्य के प्रचार-प्रसार में हिंदी की भूमिका

डोगरी साहित्य की एक बड़ी चुनौती लंबे समय तक उसके सीमित पाठक-वर्ग तक पहुँचना रही। हिंदी ने इस सीमा को काफी हद तक तोड़ने में सहायता की। जब डोगरी की कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, लोककथाओं और नाटकों का हिंदी में अनुवाद हुआ, तो वे जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर व्यापक हिंदी समाज तक पहुँचे। अनुवाद ने केवल रचनाओं को दूसरी भाषा में पहुँचाने का काम नहीं किया, बल्कि डोगरी साहित्य की संवेदनाओं को राष्ट्रीय साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बनाया। डोगरी के प्रमुख साहित्यकारों की रचनाओं के हिंदी अनुवादों ने पाठकों, आलोचकों और शोधार्थियों को डोगरी साहित्य को समझने का अवसर दिया। इससे डोगरी साहित्य पर हिंदी में आलोचनात्मक लेखन और शोध की संभावनाएँ भी बढ़ीं।

अनुवाद : दो भाषाओं के बीच सेतु

डोगरी के विकास में हिंदी की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका अनुवाद के क्षेत्र में दिखाई देती है। अनुवाद ने दोनों भाषाओं के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया है। डोगरी की मौलिक रचनाएँ हिंदी में अनूदित हुईं और हिंदी की श्रेष्ठ रचनाएँ डोगरी में पहुँचीं।डोगरी लोककथाओं, लोकगीतों, लोकगाथाओं और आधुनिक साहित्य के हिंदी अनुवाद ने डोगरी संस्कृति को व्यापक भारतीय समाज तक पहुँचाया। दूसरी ओर, हिंदी के प्रसिद्ध कवियों, कहानीकारों और उपन्यासकारों की रचनाओं के डोगरी अनुवाद ने डोगरी पाठकों के सामने भारतीय साहित्य की विशाल परंपरा को खोला। इस द्विमुखी अनुवाद-परंपरा ने दोनों भाषाओं को समृद्ध किया। अनुवाद के कारण डोगरी लेखकों को नए कथ्य, नई शिल्प-प्रविधियों और व्यापक साहित्यिक दृष्टियों से परिचित होने का अवसर मिला। साथ ही हिंदी साहित्य ने डोगरी की लोक-संवेदना, पहाड़ी जीवन, जम्मू की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय अनुभवों को आत्मसात किया।

शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी का योगदान

शिक्षा के क्षेत्र में भी हिंदी का डोगरी के विकास से गहरा संबंध रहा है। लंबे समय तक जम्मू क्षेत्र में हिंदी शिक्षा और उच्च शिक्षा के प्रमुख माध्यमों में रही। अनेक डोगरी भाषी विद्यार्थियों ने हिंदी के माध्यम से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, इतिहास और सामाजिक विज्ञान का अध्ययन किया। इसका सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि डोगरी भाषी शिक्षित वर्ग ने अपनी मातृभाषा में लेखन की आवश्यकता को अधिक गंभीरता से अनुभव किया। हिंदी के माध्यम से प्राप्त आधुनिक ज्ञान और साहित्यिक संस्कारों को अनेक लेखकों ने डोगरी में रचनात्मक रूप प्रदान किया। बाद के समय में डोगरी के अध्ययन-अध्यापन और विश्वविद्यालयीय शोध के विस्तार ने इस प्रक्रिया को और मजबूत किया। हिंदी और डोगरी के तुलनात्मक अध्ययन ने दोनों भाषाओं की समानताओं और विशिष्टताओं को समझने की नई दृष्टि प्रदान की।

पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक संस्थाओं की भूमिका

डोगरी साहित्य के विकास में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं ने समय-समय पर डोगरी साहित्य और साहित्यकारों को स्थान दिया। इससे डोगरी की रचनात्मक उपलब्धियाँ हिंदी भाषी पाठकों तक पहुँचीं। इसी प्रकार विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं ने हिंदी और डोगरी के बीच संवाद को मजबूत किया। साहित्यिक सम्मेलन, संगोष्ठियाँ, पुस्तक-प्रकाशन, अनुवाद परियोजनाएँ और पुरस्कारों ने दोनों भाषाओं के लेखकों को एक-दूसरे के निकट लाने का कार्य किया। जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी जैसी संस्थाओं ने भी भारतीय भाषाओं के पारस्परिक साहित्यिक संबंधों को मजबूत करने में योगदान दिया। डोगरी और हिंदी के बीच निरंतर संवाद ने साहित्यिक गतिविधियों को व्यापक आधार प्रदान किया।

डोगरी के आधुनिक साहित्य के निर्माण में हिंदी का प्रभाव

आधुनिक डोगरी साहित्य के विकास में हिंदी साहित्यिक आंदोलनों और आधुनिक साहित्यिक प्रवृत्तियों का प्रभाव भी देखा जा सकता है। आधुनिक कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना और बाल साहित्य जैसी विधाओं के विकास में व्यापक भारतीय साहित्यिक वातावरण का प्रभाव रहा।हिंदी के माध्यम से डोगरी साहित्यकार आधुनिकता, यथार्थवाद, प्रगतिशील चेतना, नई कविता, नई कहानी, स्त्री-विमर्श, दलित विमर्श, पर्यावरण चेतना और सामाजिक सरोकारों से परिचित हुए। इन प्रवृत्तियों को डोगरी लेखकों ने अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक जमीन के अनुरूप रचनात्मक रूप दिया।इस प्रकार हिंदी का प्रभाव केवल अनुकरण तक सीमित नहीं रहा। डोगरी साहित्य ने बाहरी प्रभावों को अपनी स्थानीय संवेदना में रूपांतरित करके मौलिक साहित्य का निर्माण किया।

बाल साहित्य के विकास में योगदान

डोगरी बाल साहित्य के विकास में भी हिंदी का योगदान उल्लेखनीय है। हिंदी में विकसित बाल साहित्य की विविध विधाओं—बाल कविता, बाल कहानी, बाल उपन्यास, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य आदि—से डोगरी बाल साहित्यकारों को प्रेरणा और नए प्रयोगों की दिशा मिली।डोगरी की लोककथाओं, लोकगीतों और स्थानीय जीवनानुभवों को बाल साहित्य के आधुनिक रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को हिंदी के व्यापक बाल साहित्यिक वातावरण से बल मिला। परिणामस्वरूप डोगरी में बच्चों के लिए मौलिक साहित्य के साथ-साथ अनुवादित साहित्य का भी विस्तार हुआ।

शब्द-संपदा और अभिव्यक्ति पर प्रभाव

भाषाएँ जब एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं तो उनके शब्द-भंडार में स्वाभाविक रूप से आदान-प्रदान होता है। डोगरी और हिंदी के बीच भी यह प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है। शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक शब्द हिंदी के माध्यम से डोगरी के व्यवहार में आए हैं।हालाँकि भाषा-विकास का अर्थ यह नहीं कि किसी भाषा की मौलिक शब्द-संपदा समाप्त हो जाए। डोगरी की शक्ति उसकी अपनी लोक-भाषिक जड़ों में है। इसलिए हिंदी से प्राप्त शब्दों को स्वीकार करते हुए डोगरी ने अपनी विशिष्ट शब्द-संपदा और मुहावरेदार अभिव्यक्ति को भी सुरक्षित रखा है।

राष्ट्रीय स्तर पर डोगरी की पहचान

डोगरी को राष्ट्रीय साहित्यिक पहचान दिलाने में हिंदी माध्यम की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिंदी के विशाल पाठक-वर्ग के कारण डोगरी साहित्य और उसके रचनाकारों को व्यापक भारतीय साहित्यिक समाज में पहचान मिली।डोगरी साहित्य पर हिंदी में लिखी गई आलोचनात्मक सामग्री, परिचयात्मक पुस्तकें, शोध-कार्य और अनुवाद राष्ट्रीय स्तर पर डोगरी की उपस्थिति को मजबूत करने वाले माध्यम बने। डोगरी के साहित्यकारों की उपलब्धियाँ जब हिंदी के माध्यम से देश के अन्य भागों तक पहुँचीं तो डोगरी को भारतीय साहित्य की एक स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में समझने का अवसर बढ़ा।

हिंदी और डोगरी : प्रतिस्पर्धा नहीं, सहअस्तित्व

किसी भी भाषा के विकास को दूसरी भाषा के प्रभाव से जोड़ते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भाषायी संपर्क को प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हिंदी और डोगरी का संबंध प्रभुत्व और अधीनता का संबंध नहीं, बल्कि सहअस्तित्व और सहयोग का संबंध होना चाहिए।डोगरी की अपनी स्वतंत्र अस्मिता, साहित्यिक परंपरा और सांस्कृतिक आधार हैं। हिंदी उस अस्मिता को समाप्त करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि उसे व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का माध्यम बन सकती है। इसी प्रकार डोगरी की विशिष्टता हिंदी को भारतीय भाषायी विविधता की गहराई से परिचित कराती है।आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों भाषाओं के बीच अनुवाद और साहित्यिक संवाद को और बढ़ाया जाए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाए। डिजिटल माध्यमों, ई-पुस्तकों, ऑडियोबुक, ऑनलाइन पत्रिकाओं और सामाजिक मीडिया के माध्यम से डोगरी साहित्य को हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों तक पहुँचाया जाए।

भविष्य की संभावनाएँ

21वीं सदी में भाषाओं के विकास की नई संभावनाएँ डिजिटल तकनीक से जुड़ी हैं। हिंदी का विशाल डिजिटल संसार डोगरी के लिए एक प्रभावशाली मंच बन सकता है। डोगरी साहित्य का हिंदी में अनुवाद और हिंदी साहित्य का डोगरी में अनुवाद डिजिटल पुस्तकालयों, वेबसाइटों और ऑनलाइन प्रकाशन मंचों पर उपलब्ध कराया जा सकता है।डोगरी के दुर्लभ साहित्य, लोक-साहित्य और पुराने दस्तावेजों का डिजिटलीकरण भी आवश्यक है। हिंदी के माध्यम से इनके परिचय और प्रसार की व्यापक संभावनाएँ हैं। इसी प्रकार डोगरी सीखने के लिए हिंदी माध्यम से ऑनलाइन पाठ्यक्रम, शब्दकोश और अध्ययन सामग्री तैयार की जा सकती है।

उपसंहार

डोगरी भाषा के विकास की यात्रा भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सहयोग की सुंदर मिसाल है। हिंदी ने डोगरी को व्यापक पाठक-वर्ग से जोड़ने, अनुवाद को बढ़ावा देने, आधुनिक साहित्यिक प्रवृत्तियों से परिचित कराने, शिक्षा और शोध को गति देने तथा राष्ट्रीय साहित्यिक मंच पर उसकी पहचान मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।लेकिन इस भूमिका को डोगरी की स्वतंत्र अस्मिता के संदर्भ में समझना आवश्यक है। हिंदी डोगरी का विकल्प नहीं है और न डोगरी हिंदी की प्रतिस्पर्धी मात्र है। दोनों भारतीय भाषायी संस्कृति की दो विशिष्ट धाराएँ हैं, जो एक-दूसरे से संवाद करते हुए अधिक समृद्ध होती हैं।वास्तव में हिंदी और डोगरी का संबंध भारतीय बहुभाषिकता की उस सुंदर परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें भाषाएँ एक-दूसरे को मिटाती नहीं, बल्कि एक-दूसरे की आवाज को दूर तक पहुँचाती हैं। हिंदी ने डोगरी की आवाज को व्यापक राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और भविष्य में भी दोनों भाषाओं का यह संवाद भारतीय साहित्य को अधिक समृद्ध, बहुरंगी और मानवीय बनाने में योगदान देता रहेगा।

- यशपाल निर्मल

जम्मू - जम्मू कश्मीर 

    यह भारत के सबसे संवेदनशील और सबसे जरूरी सवालों में से एक है। इसे नारे से नहीं, समझ से देखना होगा।संविधान में कहीं भी हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' नहीं कहा गया है। अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी भारत की *राजभाषा* है, और अनुच्छेद 351 कहता है कि सरकार का कर्तव्य हिंदी के प्रचार-प्रसार का है ताकि वह सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर सके। संविधान ने 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया है। यानी भारत की परिकल्पना एक-भाषी राष्ट्र की नहीं, बहुभाषी संघ की थी। जनगणना के अनुसार लगभग 43% लोग हिंदी को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। अगर उसकी बोलियों - भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि को जोड़ें तो संख्या और बड़ी है। सिनेमा, प्रवासन, रोजगार और डिजिटल कंटेंट ने हिंदी को एक स्वाभाविक संपर्क भाषा (Link Language) बना दिया है। दिल्ली में मजदूरी करने वाला तमिल युवा और बेंगलुरु में काम करने वाला असमिया इंजीनियर आपस में अक्सर हिंदी में ही बात कर पाते हैं। यह भूमिका हिंदी ने किसी कानून से नहीं, बाजार और व्यवहार से हासिल की है।

पक्ष में तर्क : -

- भारत जैसे विशाल देश को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए एक सहज संपर्क भाषा चाहिए। अंग्रेजी आम भारतीय की भाषा नहीं बन पाई।

- हिंदी का ढांचा संस्कृत से निकला है, इसलिए मराठी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी भाषी के लिए इसे समझना तुलनात्मक रूप से आसान है।

- वैश्विक मंच पर भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता हिंदी में सबसे अधिक है।

चिंता का पक्ष - जो दक्षिण और पूर्वोत्तर में है :

- भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, अस्मिता और रोजगार से जुड़ी है। जब केंद्र सरकार की परीक्षाएं, नौकरियां सिर्फ हिंदी-अंग्रेजी में होती हैं, तो गैर-हिंदी भाषी को लगता है कि उस पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।

- तमिल, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, मराठी जैसी भाषाओं का अपना हजारों साल का समृद्ध साहित्य और इतिहास है। उन पर हिंदी थोपने का प्रयास उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बनाने जैसा लगता है।

        मेरे विचार में हिंदी की आदर्श भूमिका इन तीन सिद्धांतों पर होनी चाहिए -

*क. सेतु की, शासक की नहीं:* हिंदी की भूमिका एक बड़े भाई जैसी होनी चाहिए जो सबको साथ लेकर चले, न कि एक शासक जैसे जो सब पर राज करे। 'हिंदी को बढ़ाओ' के साथ 'भारतीय भाषाओं को भी बढ़ाओ' - यही अनुच्छेद 351 की मूल भावना थी।

*ख. विकल्प की, अनिवार्यता की नहीं:* हिंदी संपर्क भाषा के रूप में *विकल्प* बने, अनिवार्यता नहीं। अगर दो लोग तमिल और हिंदी में सहज हैं, तो वे तमिल में बात करें। अगर एक हिंदीभाषी और एक तेलुगुभाषी मिलें, तो वे अपनी सुविधा से हिंदी या अंग्रेजी चुनें। थोपने से भाषा के प्रति सम्मान घटता है, बढ़ता नहीं।

*ग. लेने वाली, सिर्फ देने वाली नहीं:* हिंदी को खुद को समृद्ध करना होगा। तमिल से 'अण्णा', बांग्ला से 'अड्डा', मराठी से 'चाल', कन्नड़ से कई शब्द लेकर हिंदी और समावेशी बन सकती है। जिस हिंदी में केवल संस्कृत के कठिन शब्द भर दिए जाएंगे, वह आम लोगों से दूर हो जाएगी

  अंत में मेरे विचार से हिंदी को भारतीय भाषाओं की *प्रतिद्वंद्वी* नहीं, *सहयोगी* होना चाहिए। भारत की आत्मा अंग्रेजी में नहीं बस सकती, यह सच है। पर भारत की आत्मा केवल हिंदी में भी नहीं बसती। वह तमिल के संगम साहित्य में, बांग्ला के बाउल गीत में, मराठी के अभंग में, और असमिया के बिहू में भी बसती है। आदर्श स्थिति यह होगी कि हर भारतीय कम से कम 3 भाषा जाने ।अपनी मातृभाषा, हिंदी और अंग्रेजी। मातृभाषा से वह अपनी जड़ से जुड़े, हिंदी से वह अपने देश से जुड़े, और अंग्रेजी से वह दुनिया से जुड़े। प्रत्येक व्यक्ति उसी भाषा में सहज होता है जिसमें वह सोचता है, ख्वाब देखता है और किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं होता। अत: हिंदी भाषा वह सेतु बन सकती है जो एक दूसरे के मन को जोड़े। भाषा जोड़ने का काम करती है, तोड़ने का नहीं। हिंदी की सबसे बड़ी भूमिका यही होनी चाहिए - भारत को जोड़ना, तोड़ना नहीं।

- डॉ. रेखा मित्तल

    चंडीगढ़

      हमें गर्व है कि हमारा भारत, विश्व का भौगोलिक एवं जनसँख्या के आधार पर विशालतम देश है। हमारे देश की संस्कृति और संस्कार विश्व पटल पर एक अनुपम पहचान लिए है। हमारी संस्कृति और संस्कार में विविधता में एकता तो है ही, शुचिता भी है और मर्यादा भी। यही विशेषता संपूर्ण विश्व के लिए आकर्षित करती है और हमें गौरवान्वित। हमारे रीति-रिवाज, हमारी बोली हर 50-100 किलोमीटर भी बदली-बदली सी नजर आती है , ऐसी विविधता के बावजूद भी, हम इंसान और नागरिक के रूप में अपने राष्ट्र के लिए एकता और अखंडता के लिए समर्पित भाव से जुड़े हुए हैं, जो आश्चर्यजनक तो है ही , मिसाल भी है। हमारे इस  विशालतम देश को पारस्परिक रूप  से जुड़ने और समझने के लिए संवाद स्वरूप जो सशक्त,सरस और सहज माध्यम है वह हिंदी भाषा ही है। इसका क्षेत्र व्यापक है। पूरे देश में जहाँ विविध बोली और भाषाएं हैं उनमें हिंदी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक भी है और प्रमुख भी। हिंदी भाषा को राजकीय भाषा का स्थान मिला है। यह मानने में कोई संकोच नहीं कि अभी भी हमारे देश में ऐसे क्षेत्रवासी हैं जो हिंदी भाषा नहीं समझ पाते। अत:  हिंदी को देश के हरेक क्षेत्र में    सशक्त माध्यम बनाने हेतु हिंदी प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करना आवश्यक और महत्वपूर्ण है। जिसके लिए स्थानीय और केंद्र के अलावा हिंदी प्रेमियों, साहित्य, संगीत, चलचित्र के माध्यम से सतत प्रयास भी किये जा रहे हैं। सार यही कि भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा जितनी व्यापक होगी, जितनी समृद्ध होगी देश को उन्नतऔर समृद्ध करने में उतनी ही सहजता होगी।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     यह सत्य है कि भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी भाषा की भूमिका देश को एक सूत्र में पिरोने बाली ही भाषा नहीं है अपितु यह देश की एकता और अखंडता को बनाये  रखने में भी प्रमुख कार्य करती है इसके साथ साथ संपर्क  और संवाद को आसान  बनाने में सहायक है तभी तो इसका व्यापक स्तर पर प्रयोग होता है जिससे लेन देन, व्यापार इत्यादि के स्रोतों में बढौतरी मिलती है, यही नहीं हिंदी भाषा सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती है जिससे  राष्ट्रीय एकता को मजबूती व बढ़ावा मिलता है, देखा जाए यह आर्यों की प्राचीन भाषा है जिसे वैदिक और लैकिक संस्कृत में बांटा गया है इस भाषा को 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को  देश की राजभाषा घोषित किया था जिसका पैमाना बढ़त की और ही दिख रहा है, अन्त में यही कहुँगा हिंदी भाषा विश्व की सबसे  समृद्ध और सरल भाषाओं  में से एक है और यह केवल संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की आत्मा  है,  इसमें अनोखा आकर्षण और मिठास मिलती है जिससे रिश्तों की मर्यादा और अपनेपन का एहसास महसूस होता है, आज का दिन यानि 14 सितंबर हिंदी दिवस  के रूप में मनाया जाता है जो हिंदी के ऐताहासिक महत्व को दर्शाता है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हिंदी दूनिया भर में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में एक है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

     भारतीय भाषाओं में हिंदी भाषा का स्थान सर्वोपरि होना चाहिए , क्योंकि ..... 

हिंदी भाषा होमी राष्ट्रभाषा है ! 

हिंदी भाषा अति सरल भाषा है ! 

हिंदी भाषा मैं जो बोलते हैं , वो ही लिखते हैं ! 

हिंदी भाषा मैं कोई शब्द मूक नहीं होता ! 

भारतीय भाषाओं मैं से हिन्दीभारत के सबसे अधिक क्षेत्र मैं बोली जानेवाली भाषा है ! हिंदी को उसका उचित स्थान महीना प रहा क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर , अधिकांश विद्यालयों मैं अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दिया जाता है ! हिंदी में उच्च शिक्षा का अभाव है क्योंकि हिंदी का वांछित विकास नहीं हो पाया इस दिशा में! हिंदी का सम्मान जब नागरिकों के साथ , दिल से सरकार भी करने लग जाएगी , तो हिंदी के उचित विकास को कोई रोक नहीं पाएगा ! हिंदी को उसके उचित स्थान पर तभी देखा जा सकता है जब अंग्रेजी का मिथ्या मोह त्यागकर , लोग इसको इसके वांछित , शीर्ष स्थान पर पहुंचने का प्रयास करें ! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

         हिन्दी जहां सभी भाषाओं की बड़ी बहन है,सभी साथ लेकर चलने वालों में से है।आजादी के आन्दोलन से अब तक हिन्दी भाषा हो या उसका साहित्य अपनी सहयोगी भाषाओं,हिन्दी अहिन्दी भाषी विद्वानों के साथ आगे बढ़कर आज विश्व पटल पर अपने प्रसिद्ध गान को गुंजायमान किए है।हां जिस तरह की इच्छा शक्ति क्रियान्वयन की अपेक्षा राजनीतिक क्षेत्र से थी नहीं हुई। पर विश्व पटल पर खुला व्यापार फिल्म जगत की मजबूरियों ने चाहें अनचाहें हिन्दी का प्रचार-प्रसार संवर्द्धन किया।प्रकाशन की दुनियां में परिवर्तन तकनीक ने सोने पर सुहागा का काम किया।आज हिन्दी भाषा व साहित्य अधुनातन तकनीक स्वरूपों के साथ निरन्तर आगे बढ रही है,पर हिन्दी के नाम पर केवल पखवाड़ा मनाने वालों,हिंगेजी के बुखार वालों व हिन्दी के नाम पर बोलियों की दुकान आरम्भ कर देने वालों से सावधान रहने की आवश्यकता है,हानि चाहें देश की हो,धर्म की,समाज, परिवार या भाषा साहित्य की आस्तीन के सांपों से ही आगत से अनागत तक अधिक हुई है।जय हिन्द, जय हिन्दी भाषा।

- शशांक मिश्र भारती

शाहजहांपुर - उत्तर प्रदेश

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