1.सरकारी अर्थचक्र अपनी पुस्तक से ध्यान हटाकर नौवीं कक्षा के विमल ने बिस्तर पर बैठे दादा जी से प्रश्न किया, "दादाजी, सरकार कैंसर की रोकथाम के लिए जागरूकता अभियान चलाती है। बीड़ी-सिगरेट पर चेतावनी छपवाती है। धूम्रपान निषेध अभियान के प्रचार में धन खर्च करती है। कैंसर रोकने और धूम्रपान बंद करने के लिए कितने ही गैर-सरकारी संगठनों को धन बाँटती है, फिर भी लोग इस बुराई को नहीं छोड़ते?" "बेटा, हमारे देश में लोग कम पढ़े-लिखे हैं।" "परंतु दादाजी, मैं अनेक पढ़े-लिखे अफ़सर लोगों को सिगरेट पीते हुए देखता हूँ।" "बात तो तेरी ठीक है," दादाजी पोते की तर्कशक्ति पर आश्चर्यचकित थे। "दादाजी, मैं क्या सोचता हूँ? यदि सरकार तंबाकू और उससे बनने वाले पदार्थों पर ही प्रतिबंध लगा दे, तो न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी।" "बेटे, तम्बाकू उत्पादों से सरकार को बहुत कर (Tax) मिलता है। यदि कर नहीं मिलेगा, तो सरकार कैंसर रोकने का अभियान कैसे चलाएगी?" दादाजी ने सरकारी अर्थचक्र को समझा तो दिया। पोते को न जाने कुछ समझ में आया या नहीं, पर...