अंहकार हर किसी में होता है। फिर भी अंहकार पर ज्ञान देता है।यही वास्तविकता है। इंसान मर जाता है परन्तु अंहकार नहीं मरता है। अहंकार एक प्रकार ना इलाज बीमारी है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं: - यह परम सत्य है कि अहंकार किसी का नहीं रहा "जब आशा तृष्णा ना रहीं, मर मर गए शरीर।" इससे स्पष्ट है सांसारिक जीव, मनुष्य सब कुछ विनष्ट होना है, फिर मैं कर्ता हूं' किसी की भौतिक उपलब्धि, पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति का। तो बस यहीं से अहंकार का बीज अंकुरित होने लगता है जो एक दिन उसके नष्ट होने का कारण बनता है । अहंकार व्यक्ति को तोड़ता है, बाँटता है क्योंकि मैं की सीमा इतनी संकीर्ण होती है कि वह सह अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता । इस कारण उसके द्वारा किए गए कर्म से सफलता और सिद्धि नहीं मिलती। फिर वह चाहें कितना प्रेम और ईश्वर भक्ति कर ले पर फल विपरीत और अहंकार की प्रवृत्ति के रूप में ही मिलेगा । यथा रावण वीर होकर भी मैं रूपी अहंकार के साथ अकेला पड...