गौरी लंकेश स्मृति सम्मान -2026

          अंहकार हर किसी में होता है। फिर भी अंहकार पर ज्ञान देता है।‌यही वास्तविकता है। इंसान मर जाता है परन्तु अंहकार नहीं मरता है। अहंकार एक प्रकार ना इलाज बीमारी है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं: - 
     यह परम सत्य है कि अहंकार किसी का नहीं रहा "जब आशा तृष्णा ना रहीं, मर मर गए शरीर।" इससे स्पष्ट है सांसारिक जीव, मनुष्य सब कुछ विनष्ट होना है, फिर मैं कर्ता हूं' किसी की भौतिक उपलब्धि, पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति का।   तो बस यहीं से अहंकार का बीज अंकुरित होने लगता है जो एक दिन उसके नष्ट होने का कारण बनता है । अहंकार व्यक्ति को तोड़ता है, बाँटता है क्योंकि मैं की सीमा इतनी संकीर्ण होती है कि वह सह अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता । इस कारण उसके द्वारा किए गए कर्म से सफलता और सिद्धि नहीं मिलती। फिर वह चाहें कितना प्रेम और ईश्वर भक्ति कर ले पर फल विपरीत और अहंकार की प्रवृत्ति के रूप में ही मिलेगा । यथा रावण वीर होकर भी मैं रूपी अहंकार के साथ अकेला पड़ गया जहां वह पराजय और विनाश को प्राप्त हुआ । कबीर दास जी ने इसे बहुत बड़ा संकट माना है वह कहते हैं ---

"मैं मैं बड़ी बलाइ है , सके तो निकलो भाजि ।

कब तक राखाँ है सखी ,रुई लपेटी आग।।" 

अतः एक दिन यह अहंकार रूपी आग मनुष्य को नष्ट ही कर देती है ।

 - डॉ.रेखा सक्सेना

 मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

           अहंकार ही एक ऐसा चीज़ है जो किसी का नहीं रहता है.वैसे दुनिया में बहुत सारे अहंकारी हैं जिनका अहंकार कभी नहीं रहा. बलवान  से बलवान व्यक्ति का अहंकार पल भर में काफूर होते देखा गया है. रामायण काल में रावण सबसे बड़ा अहंकारी था उसे आज भी सभी अहंकारी मानते हैं और किसी अहंकारी व्यक्ति की तुलना उससे करते हैं और कहते हैं कि इतना बुद्धिमान रावण का जब अहंकार खत्म हो गया तो तुम किस खेत की मूली हो. दुनिया में सबसे ज्यादा बलवान, बुद्धिमान,धनवान रावण जब अपना अहंकार नहीं रख सका तो साधारण या असाधारण आदमी की क्या बिसात. महाभारत काल में दुर्योधन भी बहुत अहंकारी था उसका भी अहंकार नहीं रहा तो कलयुगी आदमी का अहंकार तो जाना ही है. किसी का भी अहंकार सदा के लिए नहीं रहता उसे जाना ही है. इसलिए अहंकार किसी को भी नहीं करना चाहिए. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पं. बंगाल 

       अहंकार मनुष्य की मानसिक स्थिति है जो ज्ञान और विवेक को नष्ट कर विनाश की ओर धकेल देती है। अहंकार के कारण सही गलत की समझ खत्म हो जाती है। अहंकारी व्यक्ति न तो स्वयं सुखी रह सकता है और न ही दूसरों को सुखी देख सकता है। द्वापर युग में दुर्योधन अपने अहंकार के कारण महाभारत युद्ध में पूरे कौरव वंश का विनाश करवा दिया। असीम ज्ञान और शक्ति के अहंकार में रावण विनाश को प्राप्त हुआ। हिरण्यकशयप इतना अहंकारी था कि वह स्वयं को ही भगवान मानता है। अहंकारी व्यक्ति अपनी गलतियों को कभी स्वीकार नहीं करता। अतः अहंकार कभी किसी का सगा नहीं होता आज नहीं तो कल अवश्य मरता है। 

- शीला सिंह 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

        यह कथन जीवन की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है। “अहंकार किसी का नहीं रहा है” — इतिहास, समाज और हमारा दैनिक जीवन इसके अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। अहंकार मनुष्य को यह भ्रम देता है कि वह सबसे बड़ा, सबसे शक्तिशाली और सबसे स्थायी है, जबकि सत्य यह है कि जीवन क्षणभंगुर है। आज जो सत्ता, धन या पद पर है, कल वही समय के आगे असहाय हो सकता है। मृत्यु सभी के लिए समान है—वह न उम्र देखती है, न पद, न प्रतिष्ठा। अहंकार मनुष्य को दूसरों से दूर करता है, उसके विवेक को ढक देता है और अंततः पतन का कारण बनता है। इसके विपरीत विनम्रता, करुणा और संयम व्यक्ति को महान बनाते हैं और समाज में सम्मान दिलाते हैं। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वही वास्तव में सफल और शांत जीवन जीता है।

- रंजना वर्मा उन्मुक्त

रांची - झारखंड 

     हम इतिहास उठाकर देखे तो सत्य का पता चल ही जाता है। अहंकार किसी का नहीं रहा है, आज नहीं तो कल मरता है। अहंकार से ज्ञानता का पता चलता है, अच्छता का आईना देखकर ही मानव को चलना चाहिए, हकीकत महत्वपूर्ण अंग प्रदर्शित करता जाता है, प्रेम भाव और अहंकार में कब बदलाव आ जाए, कह ही नहीं जा सकता है। अगर देखा जाए तो किसी भी क्षेत्र में जब प्रगति के सौपानों में अगर होता जाता है,तो स्वाभाविक तौर पर स्वाभिमान हो ही जाता है, जो आज नहीं कल जिसका अंत होने उपरान्त ही मुक्तिबोध होता है.....

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

       बालाघाट - मध्यप्रदेश

    ये सत्य है कि अहंकारआज नही तो कल मरता है उदाहरणार्थ रावण को अहंकार का पर्याय   कहना गलत नही होगा ।जब रावण जैसे ज्ञानी की बुद्धि अहंकार ने नष्ट कर दी  तो आगे क्या कहे । आत्म प्रेम, आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा, आत्मश्लाघा,यानि कि  अपनी ही समस्‍याओं या परेशानियों में डूबा तथा खुद के लिए दुखी और आत्म श्रेष्ठता जैसे आत्मकेन्द्रित और घोर स्वार्थी मनोविकारों के कारण व्यक्ति की बुद्धि सीमित एवँ संकुचित हो जाने के कारण वह सदैव कुण्ठित, क्लेशयुक्त और विषादग्रस्त रहता है ।इसके विपरीत मनुष्य की विनम्रता ही उसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती होती है ।अतः अहंकार तज विनम्रता को अपनाना चाहिए क्योंकि अहंकार किसी का नही रह पाया ।

- सुषमा दीक्षित शुक्ला

लखनऊ - उत्तर प्रदेश 

      हमारे चरित्र और स्वभाव में जो भी अवगुण होते हैं उनका खामियाज़ा हमें देर-सबेर किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ता है। अहंकार ऐसे अवगुणों में से एक है,बल्कि प्रमुख है। कहा भी गया है " अहंकार का घर खाली होता है।" इतिहास भी ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। अहंकार  की प्रतिक्रिया अहं से शुरु होती है। अहंकारी यही मानकर और ठानकर चलता है कि जो कुछ भी या सब कुछ वही है, बाकी सब तुच्छ और यही मानसिकता उसे पतन की ओर ले जाती है। क्योंकि अहंकारी लोगों को एक तो दूसरे का मान-सम्मान करना नहीं आता, दूसरे अनादर भी करते हैं।  उनके इसी आचरण और व्यवहार से लोग दुखी और आक्रोशित हो, धीरे-धीरे दूर होने जाते हैं। ऐसे लोगों को  आवश्यकता पड़ने पर सहयोग भी नहीं मिलता।सामाजिक कार्य में उन्हें तवज्जो नहीं  मिलती। धीरे- धीरे फिर यही एकाकीपन उन्हें मानसिक संताप देने लगता है और एक दिन चरमोत्कर्ष पर पहुंचा देता है। अत: सार यही कि कभी भी स्वयं को अहंकारी होने से बचना है। हमेशा सभी से मिलजुलकर रहने  और सौहार्द्रतापूर्ण व्यवहार रखना चाहिए।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     क्या साधारण मनुष्य के लिए यह सम्भव है कि वह किसी पर क्रोध नहीं करे, दूसरों की बढ़ती को देखकर कभी ना ईष्या भाव रखे, सभी के साथ सरल-सहज व्यवहार करे, अहंकार का भाव ना रखे- नहीं न! देने का भान होना अहम् है : अहंकार तो ज्ञान देने से भी आता है, पूजा-पाठ करने का भी अहंकार हो जाता है, कोरोना काल में सभी मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर में ताला लटका रहा- तब भी हमें ईश्वर वहीं दिखते हैं- दूसरो को अपने से छोटा समझना, दूसरों अज्ञानी कहना भी अहंकार है वैसे अहंकारी को भान कहाँ होता है कि उसमें अहम् भर रहा है या भरा पड़ा है- प्रत्येक व्यक्ति को पता है कि उसका जीवन कठपुतली है जिसका डोर अदृश्य हाथों में है -और उसके इच्छा शक्ति पर जीवन्त समय है इतिहास गवाह था अहंकार किसी का नहीं रहा है और कोरोना काल भी सभी के घमंड को चूर-चूर करता रहा लेकिन वह मनुष्य ही क्या जो कि सुधर जाए -चेत जाए -पारी आने पर मरेगा लेकिन जबतक जिएगा अहंकारी ही रहेगा।

-विभा रानी श्रीवास्तव

 पटना - बिहार 

अहंकार के संबंध में एक श्लोक आता है -

यदा किंचिज्ज्ञोहं द्विप इव मदान्ध समभवम्।तदा सर्वज्ञोऽमित्यभवदवलिप्तं मम मन:॥

यदा किंचित् किंचित् बुधजन सकासादवगतम्।

तदा मूर्खोऽमिति ज्वरऽइव मदो मे व्यपगत:॥

अर्थात जब मैं थोड़ा सा ज्ञान पाकर मदांध हाथी की तरह घमंड में चूर हो गया कि मैं सब कुछ जानता हूँ, तब मेरा मन अहंकारी हो गया। लेकिन, जैसे-जैसे बुद्धिमान लोगों के संपर्क में आया, वैसे-वैसे मुझे समझ में आया कि मैं तो मूर्ख था और मेरा वह सारा घमंड बुखार की तरह उतर गया। अहंकार,अहम यानि मैं का भाव। किसी संत कवि ने कहा था - जब मैं था तब हरि नहीं,अब हरि हैं मैं नाहिं। यह सत्य है कि यह मैं का भाव अहंकार किसी का नहीं रहा है,आज नहीं तो कल मरता ही है। इसके अनेकानेक प्रत्यक्ष उदाहरण मिलते हैं।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर -  उत्तर प्रदेश

      अहंकार एक ऐसा नकारात्मक विकार है मनुष्य में, जो उसकी बुद्धि , विवेक हर लेता है व भविष्य में होनेवाली प्रगति के मार्ग में बाधक बनता है ! अहंकार चाहे संपत्ति का हो , या ज्ञान का , या बल का , मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देता क्योंकि अहंकारी मनुष्य की सफलता की दिशा मैं पूर्ण विराम लग जाता है ! इतिहास गवाह है कि अहंकारी मनुष्य का सदा पतन होता है ! महाज्ञानी होते हुए भी रावण को उसका अहंकार ले डूबा क्योंकि वह अपने आपको सर्वश्रेष्ठ , सही , समझता था ! अहंकारी के अहंकार का नाश निश्चित है , चाहे वह शीघ्र हो या देर से !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

     इतिहास, समाज और व्यक्तिगत जीवन—तीनों साक्षी हैं कि अहंकार कभी टिकता नहीं।सत्ता, धन, सौंदर्य, ज्ञान या बल—जिस भी आधार पर अहंकार खड़ा होता है, समय उसे धीरे-धीरे खोखला कर देता है। जो आज स्वयं को अजेय समझता है, वही कल परिस्थितियों के सामने विवश दिखाई देता है। भारतीय दर्शन में अहंकार को बंधन का मूल माना गया है—यह मनुष्य को विनम्रता, करुणा और विवेक से दूर कर देता है। यह सत्य इतिहास से लेकर वर्तमान तक बार-बार प्रमाणित हुआ है कि अहंकार का अंत अवश्यंभावी है। रावण अपनी अपार शक्ति, विद्या और वैभव के कारण स्वयं को अजेय मान बैठा, पर उसका अहंकार ही उसके पतन का कारण बना। कौरवों में दुर्योधन का दंभ—“मैं ही राजा बनूँगा”—महाभारत के विनाश में बदल गया। राजा हर्षवर्धन जैसे उदाहरण इसके विपरीत हैं, जहाँ शक्ति के साथ विनय ने उन्हें महान बनाया। आधुनिक जीवन में भी यह सत्य उतना ही प्रासंगिक है—कई बड़े पदों पर बैठे लोग अपने अधिकार और अहंकार में मानवीय संबंधों को तुच्छ समझते हैं, पर पद हटते ही वही लोग उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं। समाज में अक्सर देखा जाता है कि धन या सफलता के शिखर पर पहुँचा व्यक्ति दूसरों को कमतर समझने लगता है, लेकिन परिस्थितियाँ बदलते ही उसका अहंकार चुपचाप ढह जाता है। मृत्यु यहाँ केवल शारीरिक नहीं, बल्कि अहं की मृत्यु भी है—प्रतिष्ठा, प्रभाव और दंभ का अंत। इसलिए यह कथन एक सीख देता है कि जो आज स्वयं को सबसे ऊपर समझ रहा है, वही कल जीवन सत्य के सामने नतमस्तक होगा। अहंकार क्षणिक है, पर विनम्रता शाश्वत—और अंततः वही मनुष्य को सच्ची ऊँचाई देती है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

     दुनिया में जन्म लेने वाला हर इंसान अपने भीतर "काम क्रोध मद मोह लोभ "इन पांच मनोभावों के साथ जन्म लेता है। इनमें सबसे खतरनाक भाव बनता है अहंकार का।मन के भीतर बसे रावण कंस जैसे तत्व इनके प्रणेता होते हैं। लेकिन प्रागैतिहासिक काल से लेकर  सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग कलयुग  - - तक गवाह हैं कि अहंकार किसी का भी नहीं रहा है। सद्प्रवृत्तियाँ जीवित रहती हैं  - - उन्हे प्रकृत्ति साथ देती है लेकिन कुप्रवृत्तियाँ इंसान को जीते जी मारती हैं। समाज का तिरस्कार - - अपनों से दूरी - - - पग-पग पर अपमान अहंकार का विनाशक कारक बनता है परंतु सबसे बड़ा सत्य यह भी है कि अहंकार अपने ही व्यवहार से मरता है। अहंकारी व्यक्ति व्यवस्था के विरोध में चलता है - - अपना ही मत उसे सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होता है। अहंकार बुद्धि का विकास नहीं होने देता। सीखने की प्रवृत्ति का नाशक होता है अहंकार। शासकों का अहंकार देश के लिए सर्वाधिक घातक होता है। तात्पर्य यही कि कभी भी अहंकार के थोथे घमंड को अपने पास न फटकने दें - - स्वयं को जाँचे परखें, अपने परीक्षक स्वयं बने और सामान्य सामाजिक जीवन जियें तभी जीवन की सार्थकता है।

- हेमलता मिश्र मानवी

 नागपुर -महाराष्ट्र 

      अहंकार वह भ्रम है जो मनुष्य को क्षणिक शक्ति, पद, धन या अधिकार के नशे में यह विश्वास करा देता है कि वह अजेय है। किंतु प्रकृति, समय और सत्य इन तीनों के सामने अहंकार सदैव नतमस्तक हुआ है। इतिहास साक्षी है कि साम्राज्य, तानाशाह, अन्यायी व्यवस्थाएँ और स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने वाले लोग, अंततः उसी अहंकार के बोझ तले दबकर नष्ट हुए हैं। सकारात्मक दृष्टि से देखें तो यह पंक्ति मनुष्य को भय नहीं, बल्कि विवेक का प्रकाश देती है। यह हमें स्मरण कराती है कि विनम्रता ही वास्तविक शक्ति है। जो झुकना जानता है, वही उठना भी जानता है। अहंकार मनुष्य को समाज से काटता है, जबकि नम्रता उसे मानवता से जोड़ती है। जहाँ अहंकार संवाद तोड़ता है, वहीं विनय न्याय, करुणा और समता का मार्ग प्रशस्त करती है। वर्तमान के समय में, जब सत्ता, व्यवस्था और व्यक्ति स्वयं को कानून, संविधान और नैतिकता से ऊपर समझने लगते हैं, तब यह पंक्ति और भी ज्वलंत हो उठती है। यह स्पष्ट संकेत देती है कि कोई भी पद, कोई भी कुर्सी, कोई भी अधिकार स्थायी नहीं है जबकि स्थायी केवल सत्य, न्याय और मानवीय मूल्य है। अतः श्रेष्ठ वही है जो शक्ति में रहते हुए भी संयम रखे, अधिकार में रहते हुए भी उत्तरदायित्व निभाए, और सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी स्वयं को क्षणभंगुर माने। अहंकार का अंत निश्चित है, किंतु विनम्रता अमर होती है। यही जीवन का सार है, यही राष्ट्र और समाज को आगे बढ़ाने वाली चेतना है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

         यह बिल्कुल सत्य है कि अहंकार (घमंड) किसी का नहीं रहा है; आज नहीं तो कल उसे मिटना ही है। अहंकार मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है। जब थोड़ा बल, धन, पद या बुद्धि आती है, तो अहंकारी व्यक्ति दूसरों को छोटा मानकर स्वयं को सर्वोपरि समझता है, जो अंततः उसके आत्म-विनाश का कारण बनता है। रावण जैसी महान शक्ति का भी अहंकार नहीं रहा, जो सिद्ध करता है कि घमंड अस्थायी है। अहंकार रिश्तों में तनाव पैदा करता है, समाज में अशांति फैलाता है और व्यक्ति को सत्य से दूर कर देता है। अहंकारपूर्ण व्यक्ति अपनी गलतियों से नहीं सीखता और अंततः ईश्वर से भी दूर हो जाता है। सत्य के ज्ञान और आत्मचिंतन से ही अहंकार का नाश होता है। अहंकार से दूर रहकर, विनम्रता और निःस्वार्थ भाव से जीना ही जीवन की सार्थकता है।

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

         अहंकार किसी का नहीं रहता है।आज नहीं तो कल मरता है। यह बात कल भी सत्य थी ,आज भी सत्य है और कल भी सत्य रहेगी। इतिहास व अमर गाथाएं हमें इसके अनेक  उदाहरण देते हैं। अहंकारी कंस,दंभी रावण,घमंडी हिरण्यकश्यप ,राजा बलि, दुर्योधन इसके अनगिनत उदाहरण हमारे सामने है ‌। अहंकार मात्र एक काँच का शीशा है, जिसके टूटते ही आँखों से अज्ञानता की पट्टी खुल जाती है और सब स्पष्ट दिखने लगता है।

किस बात का अहंकार

तुम भी दो रोटी खाते हो 

और मैं भी।

तुम भी हवा में साँसें लेते हो 

और मैं भी।

तुम भी प्यास बुझाने के लिए 

पानी ही पीते हो और मैं भी।

फर्क है तो बस इतना

कि तुमने हाड़-माँस से बने 

इस देह रूपी महल को

किराये पर ले रखा है,

शायद नहीं जाना है।

और महल एक दिन

खंडहर में बदल जाता है,

ये निश्चित है।

- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा' 

वाराणसी - उत्तर प्रदेश 

      अहंकार,,, यानी सर्वनाश। रावण और दुर्योधन जैसे अहंकारी का परिणाम हम सब जानते हैं।फलत: अहंकार को जितनी दूर खुद से रखा जाए उतना बेहतर होगा।अहंकारी का सदैव बुरा परिणाम होता है इसीलिए हम सभी को अहंकार को सदैव अपने से बहुत दूर रखनी चाहिए। जब हम सभी जानते हैं कि अहंकार से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता सिवाय विध्वंस के फिर क्यों इसको अपने करीब फटकने दिया जाए।

- डॉ पूनम देवा

पटना -  बिहार 

        अगर अहंकार की बात करें तो अहंकार किसी व्यक्ति के आत्म सम्मान या आत्म महत्व की भावना है लेकिन यह तब समस्या बन जाता है जब वह सर पर चड़ कर बोलने लगता है, तो आईये आज का रूख इसी बात पर करते हैं कि अहंकार किसी का नहीं रहा है आज नहीं तो कल मरता है,मेरे सोच के मुताबिक अहंकार का जन्म पद, प्रतिष्ठा, कुर्सी, दौलत, अधिक सुविधाओं के कारण होता है और फिर यही अंहकार इंसान को इंसान से दूर करने लगता है यहां तक कि इंसान ईश्वर तक को भुलाने  लगता है और अपने आप को ही महान समझ कर गलत कार्यों में  लुप्त होकर खुद का विनाश कर लेता है, जैसे अंहकार रावण को ले डूबा, कंस  जैसे भी इसी के कारण खत्म हो गए कहने का मतलब अंहकार महाविनाश करके ही छोड़ता है, यही नहीं जीवन की प्रगति में अहंकार बहुत बडा़ बाधक है, इसके वशीभूत होकर मनुष्य हमेशा  पतन की और जाता है क्योंकि अंहकार की जड़ अज्ञान है, जिस प्रकार अंधकार सूर्य के प्रकाश में विलीन हो जाता है उसी प्रकार अंहकार भी सत्य के ज्ञान से नष्ट हो जाता है और मनुष्य की बुद्धि मलीन कर देता है जिससे मनुष्य अपने आप को ही महान समझने लगता है और  सच्चाई को समझ नहीं पाता आखिरकार अपना विनाश कर बैठता है, कहने का मतलब अहंकार किसी का नहीं टिक पाता इससे मनुष्य मानव से दानव की तरफ चला जाता है और राक्षस बुद्धि वाले कार्य करने लगता है तथा खुद ही भगवान मानने लगता है यही उसका घमंड उसे चकनाचूर कर देता है, अगर हम रामायण, महाभारत या गीता जैसे पवित्र व धार्मिक ग्रन्थों को पड़ें तो यही सिद्ध होता है कि घमंड या अंहकार ने महान से महान यौदाओं को कहीं का नहीं छोड़ा चाहे, रावण हो या दुर्योधन, कंस हो या वाली सभी को घमंड ने  नीचा दिखाते हुए कुल नाश तक का रास्ता दिखाने पर मजबूर कर दिया  जिस से साबित होता है कि अहंकार किसी का नहीं रहा और अंहकारी का अन्त आखिर होकर ही रहा। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

        बिल्कुल सटीक पंक्तियां। अहंकारी का सदा विनाश होता है। कोई कितना भी बड़ा और समर्थ क्यों न हो उसका पतन निश्चित रूप से होता है और गर्व टूट जाता है।अहंकार किसी का नहीं रहता। कभी तुरंत तो कभी बाद में मगर उसका विनाश निश्चित है। इसलिए कभी किसी बात पर अहंकार न करें। आत्म संतुष्टि के लिए कुछ पल खुशी के साथ जिए जा सकते हैं। लेकिन उनको अहम के रूप में परिणित नहीं होना चाहिए।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर -  मध्य प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " अहंकार से बचने के उपाय सफल नहीं होते हैं। हर इंसान कुछ ना कुछ ऐसे कार्य करता है जो अपने आस - पास की शान्ति भंग कर के रखता है यहीं अंहकार की निशानी है। फिर भी अहंकार के रास्ते पर चलता है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)


Comments

  1. अहंकारी का हमेशा पतन होता है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली हो। इसलिए अहंकार से हमेशा बचें। कंस, रावण ,दुर्योधन,जरासंध जैसी हस्तियां अहंकार की वजह से नष्ट हुईं ,साधारण इंसान की तो बात ही क्या।

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