चाहत से कर्म होता है। हर कर्म के पीछे कोई ना कोई वजह यानि चाहत अवश्य होती है। जो कर्म की व्याख्या करतीं हैं। जिससे कर्म की उपयोगिता स्पष्ट होती है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है।अब आयें विचारों में से कुछ विशेष विचार पेश करते हैं :- हमारे मन में जब तक चाहत न हो हमारा कर्म सार्थक नहीं होता है। चाहत बिना कर्म नहीं होता, कर्म बिना ज्ञान नहीं होता। यथार्थवाद की झलकियाँ दिखाई देती है। जरुरी नहीं मानव ही कर्म करें और ज्ञान प्राप्त करें। भूखण्ड में जितने भी जन हो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कर्मण्ता हो जाती है, उसी के आधार पर ज्ञान की प्राप्ति होती है। खाली बैठकर कर्म और ज्ञान नहीं बनता है। कर्म, तपस्या करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, तब मिलता है.....।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
यह सूक्ति जीवन के मूलभूत सत्य को अत्यंत सरल किन्तु गहन रूप में अभिव्यक्त करती है। इसमें मनुष्य के संपूर्ण विकास की त्रिवेणी — चाहत (इच्छा), कर्म (कार्य) और ज्ञान (बोध) — का सुंदर समन्वय निहित है। ये तीनों तत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक के बिना दूसरा अधूरा है।चाहत मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाली वह आंतरिक ज्वाला है, जो उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। बिना चाहत के कोई भी व्यक्ति किसी कार्य को प्रारंभ करने की इच्छा नहीं करता। चाहत ही लक्ष्य निर्धारित करती है और मन को सक्रिय बनाती है। जैसे — यदि किसी छात्र के मन में डॉक्टर बनने की चाहत नहीं होगी, तो वह कठिन परिश्रम करने के लिए प्रेरित नहीं होगा। चाहत ही कर्म की दिशा तय करती है।
भारतीय दर्शन में भी कहा गया है —
“कामना ही सृष्टि का मूल कारण है।”
अर्थात सृजन का प्रारंभ इच्छा से ही होता है।केवल चाहत होना पर्याप्त नहीं है, जब तक वह कर्म में परिणत न हो। कर्म ही वह माध्यम है, जिससे चाहत वास्तविकता बनती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म को जीवन का आधार बताते हुए कहा है —
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। यदि व्यक्ति केवल इच्छा करता रहे और कर्म न करे, तो वह इच्छा केवल कल्पना बनकर रह जाती है। कर्म ही चाहत को सार्थक करता है।कर्म तभी सफल और सार्थक होता है, जब वह ज्ञान के प्रकाश में किया जाए। बिना ज्ञान के किया गया कर्म दिशाहीन हो सकता है। ज्ञान व्यक्ति को सही और गलत का विवेक प्रदान करता है।इस प्रकार स्पष्ट है कि चाहत, कर्म और ज्ञान जीवन के तीन आधार स्तंभ हैं। चाहत बिना कर्म संभव नहीं, और कर्म बिना ज्ञान सार्थक नहीं। इन तीनों का संतुलित समन्वय ही मनुष्य को सफलता, संतोष और आत्मविकास की ओर ले जाता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह श्रेष्ठ चाहत रखे, निरंतर कर्म करे और ज्ञान को अपना मार्गदर्शक बनाए। तभी जीवन पूर्ण, सार्थक और सफल बन सकता है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
चाहत बिना कर्म नहीं होता य़ह बात बिल्कुल सत्य है क्योंकि जब मन में चाहत होती है कि हमें यह काम करना है तो मनुष्य कर्म करने की तरफ बढ़ता है. यदि मन में विचार ही नहीं पैदा होंगे, चाहत ही नहीं पैदा होगी तो हम कैसे कर्म कर सकते हैं. अंदर की प्रेरणा से ही लोग कर्म करने को प्रस्तुत होते हैं. और बिना कर्म किए ज्ञान नहीं होता है. जैसे हम रास्ता चलते हैं तो रास्ते के बारे में जानकारी हासिल होती है. यानी हमने चलने का कर्म किया तो रास्ते का ज्ञान हुआ. जैसे हम परिचर्चा में भाग लेते हैं तो पहले मन में चाहत उत्पन्न होती है और हम लिखना शुरू कर देते हैं. और जब लिखना शुरू करते हैं तो ज्ञान आता जाता है कि ऐसे लिखना है वैसे लिखना है. इसीलिए यह सिद्ध हो जाता है कि चाहत बिना कर्म नहीं होता और कर्म बिना ज्ञान नहीं होता.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
आप हम जो भी काम करें वो हमारा कर्म होता है। हर एक को दुनिया में जीने के लिये कुछ न कुछ कर्म अर्थात काम करना ही पड़ता है। कर्म करने की आदत और इच्छा हो तो उसकी तैयारी हमारे प्रारब्ध में सदैव लिखी होती है। कर्म को मन से अपनाना होता है। तभी कर्म सार्थक होता है। कर्म की सार्थकता ज्ञान के साथ चलती है। अज्ञानता को कर्म में विश्वास नहीं होता। अज्ञानी व्यक्ति सोचता है कि बिना कुछ करे भी रोटी मिल जायेगी तो यह नितान्त मूर्खता है। घर में खाना बनाने का सामान मौजूद है लेकिन बनाया न जाये तो खाना बनाने का ज्ञान कैसे मिलेगा। जब तक मन में समर्पित चाहत नही होगी - - - स्वेच्छा से काम करने का माद्दा न हीं होगा - - - न ज्ञानवर्धन होगा ना ही कर्म होगा। सिर्फ करम के भरोसे रोटी का निवाला मुंह में नहीं आयेगा - - - कर्म करना होगा। सच्चे मन से सीखें तो हर कर्म आसान है। बस कर्म करते चलें शेष सब विचार पीछे रखें आप पायेंगे कि कर्म की सच्ची चाहत आपको वह सब कुछ देगी जिसके आप हकदार हैं। ज्ञान के साथ साथ भौतिक लालसाओं की भी पूर्ति होगी। "अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम । दास मलूका कह गये सबके दाता राम" ऐसी मनोवृति वाले लोग कर्म में विश्वास नहीं रखते लेकिन वक्त सब सिखा देता है कि कर्म तो संसार का नियम है। जंगल के राजा शेर को भी शिकार करना पड़ता है तभी उसे भक्ष्य मिलता है। स्पष्ट है कि कर्म करेंगे तो ज्ञान मिलेगा और ज्ञान है तो कर्म। दोनों परस्परपूरक हैं।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
बिना चाहत कुछ नहीं होता, और जो होता है उसका होना कोई चाहता नहीं। कर्म और चाहत का साथ मणि कांचन संयोग होता है। मन से किया गया कार्य हमेशा सफल होता है।अब रही बात कर्म बिना ज्ञान की तो यह बात शत प्रतिशत सही है। केवल थ्योरी से सूचना मिलती है। ज्ञान प्रेक्टिकल से ही, यानी कर्म से ही होता है।अनुभव और कर्म से प्राप्त ज्ञान हमेशा स्थायी होता है। इस तरह से प्राप्त ज्ञान जीवन में सफलता दिलाता है।चाहत, कर्म और ज्ञान की इस त्रिवेणी में अवगाहन कर जीवन लक्ष्य को सहजता से प्राप्त किया जा सकता है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
कहते हैं जहां चाह वहां राह,जब भी मन में चाहत होती,कुछ पाने की, हासिल करने की,तो कर्म सर्वोपरि होता है। हमें कर्म करना पड़ता है। बिना कर्म के कुछ भी संभव नहीं चाहते अधूरी रह रहे जाती है।हम असफल हो जाते हैं।चाहत है तो कठिन से कठिन कार्य भी हम पूरी मनसा, वाचा, कर्मणा से सकारात्मक सोच रखकर पूर्ण करते हैं।दृढ़ संकल्पित होकर किया गया काम जरुर सफलता का कीर्तिमान हासिल करता है। कर्म बिना ज्ञान नहीं होता। कर्म करते रहिए ज्ञान बढ़ेगा ही।सिर पे हाथ धरे बैठे रहने से कुछ भी हासिल नहीं होता। कर्महीन मानव कभी किस्मत को कोसता है,कभी आत्मग्लानि है पीड़ित रहता है। कर्म करते रहने से ज्ञात में वृद्धि होती है कुछ सीखने, जानने की जिज्ञासा बढ़ती है।मनोबल बढ़ता है।श्रेषट विचारों का सृजन होता है।मानव को इच्छित सफलता मिलती है। कर्म बिना ज्ञान हासिल नहीं होता। शारीरिक हो या मानसिक कर्म करना ही पड़ेगा।ज्ञान ज्योति आलोकित तभी होगी इसके लिए मानव को कर्म करके तपना पड़ता है। जिस प्रकार सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है। गोताखोर सरोवर में गोता लगाता है तो उसकी गहराई पता चलती है। कर्म ही पूजा है इसे मूलमंत्र मानकर ही हमें जीवन में सक्रिय रहना चाहिए, कर्म बिना मानव ज्ञानशून्य है।
- डॉ. माधुरी त्रिपाठी
रायगढ़ - छत्तीसगढ़
जहाँ चाह वहाँ राह एक अच्छी और सच्ची कहावत है जिसका मतलब है कि अगर किसी को काम करने की सच्ची इच्छाशक्ति और दृढ निश्चय हो तो उसे पूरा करने का रास्ता अपने आप निकल आता है और मन में ऐसी चाहत बनती है कि मैं जो कार्य करने जा रहा हुँ उसे पूरा करके ही छोडूंगा तो आईये आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं कि चाहत बिना कर्म नहीं होता और कर्म बिना ज्ञान नहीं होता, मेरा मानना है कि जब कोई भी व्यक्ति किसी कर्म को सच्ची इच्छाशक्ति से करने का इच्छुक होता है तो असंभव कार्य भी संभव लगता है क्योंकि व्यक्ति उसे चुनौती के रूप में हासिल करता है और उसी ढंग से मेहनत करके सफलता हासिल करके रहता है क्योंकि परिस्थितियां चाहे कुछ भी हों जब मनुष्य मन में ठान लेता है कि मैं इसे हासिल करके रहुंगा तो वो अपना प्रयास जारी रखता है जब तक सफल नहीं हो पाता तभी को कहा है मन के हारे हार है मन के जीते जीत कहने का भाव जब हम मन में चाहत रख कर पूरी लगन से किसी भी कार्य को हाथ में लेते हैं तो सफलता हमारे कदम चुमने लगती है और ज्यों ज्यों हम कार्य को करते जाते हैं तो हमें उस कार्य को करना आसान लगने लगता है क्योंकि हमारा उस कार्य की तरफ ज्ञान और ध्यान बढने लगता है जिस से कार्य असान लगने लगता है सत्य कहा है करत, करत अभ्यास के जड मत होत सुजान, करत विद्या एक ऐसी विद्या है जो साधारण व्यक्ति को भी होनहार बना देती है बशर्ते व्यक्ति की चाहत और लगन अच्छी हो तो अनजान भी जानकर हो जाता है जिसका यही अर्थ निकलता है कि कर्म से ही ज्ञान हासिल हो सकता है,आखिरकार यही कहुंगा कि जीवन में कोई भी कार्य एक चाहत या इच्छा से शुरू होता है और जब हम कर्म करना शुरू करते हैं तो हमें उससे अनुभव और ज्ञान प्राप्त होता है कहने का भाव इच्छा कार्य को प्रेरित करती है और कार्य ज्ञान को लेकिन किसी भी कार्य को करने के लिए इच्छाशक्ति और उदेश्य जरूरी है जिससे जाहिर होता है कि चाहत बिना कर्म अधूरा है और कर्म बिना ज्ञान इसलिए व्यक्ति को चाहत और कर्म को साथ लेकर चलना चाहिए ताकि उसे कहीं भी हार का सामना न करना पड़े
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
यह सच है कि चाहत बिना कर्म नहीं होता. चाहत हो तभी कर्म करने की प्रेरणा मिलती है, उद्यम भी होता है और उद्यम के लिए साहस पैदा होता है और समय भी निकल आता है. चाहत के बिना कर्म हो हीए नहीं सकता! चाहत सी कर्म करने पर अनेक नए आविष्कार भी होते हैं और हुए हैं. तभी तो कहा जाता है आवश्यकता आविष्कार की जननी है.यह भी सच है कि कर्म बिना ज्ञान नहीं होता. कर्म न करके केवल सोचते रहने से ज्ञान नहीं होता. कर्म करने पर या तो सफलता मिलती है, जिससे खुशी भी मिलती है और ज्ञान भी. कर्म करने पर असफलता भी मिल सकती है, जिससे कोई-न-कोई सबक भी मिल जाता है और असफलता का कारण ढूंढने या जानने से ज्ञान मिलता है. कर्म ही जीवन है, चाहत पूरी करने वाला है और ज्ञान का स्त्रोत है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति -ऑस्ट्रेलिया
यह सच है की चाहत बिना कर्म नहीं होता यदि कुछ करने की लगन नहीं तो कुछ भी करना संभव नहीं है। और कर्म बिना ज्ञान भी नहीं होता यदि हम कोई कार्य नहीं करेंगे तो हमें कैसे पता होगा काम करने से ही ज्ञान होता है सफलता सफलता कर्म के आधार पर होती है लेकिन उसके लिए प्रयास करना । बहुत जरूरी है। कर्म प्रधान विश्व कर राखा। जो जस करे सो तस फल चाखा। अर्थात कर्म बिन ज्ञान नहीं होता , चाहत बिना कर्म नहीं होता।।
- पदमा तिवारी
दमोह - मध्यप्रदेश
"चाहत बिना कर्म नहीं होता, कर्म बिना ज्ञान नहीं होता" यह कथन जीवन के सबसे गहन और सारगर्भित सत्य को उद्घाटित करता है। किसी भी कार्य की शुरुआत मानव मन में उत्पन्न हुई चाहत से होती है। बिना इच्छा, बिना लक्ष्य और बिना आंतरिक प्रेरणा कोई भी कर्म स्वाभाविक रूप से जन्म नहीं ले सकता। चाहत ही वह प्रारंभिक ऊर्जा है जो व्यक्ति को प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करती है और उसे कठिनाइयों के बावजूद निरंतर आगे बढ़ने की शक्ति देती है। किंतु केवल चाहत पर्याप्त नहीं है, कर्म को सही दिशा और परिणाम प्राप्त करने के लिए ज्ञान अनिवार्य है। ज्ञान कर्म को विवेकपूर्ण, प्रभावशाली और फलदायी बनाता है। बिना ज्ञान के किया गया प्रयास अकस्मात, दिशाहीन और कभी-कभी व्यर्थ साबित होता है। इस प्रकार जीवन में स्थायी सफलता और संतोष तभी संभव है जब चाहत, ज्ञान और कर्म का सामंजस्य बना रहे। यह सूत्र प्रत्येक क्षेत्र शिक्षा, व्यवसाय, समाज सेवा और व्यक्तिगत विकास में लागू होता है। यह हमें यह भी स्मरण कराता है कि निष्क्रियता और अज्ञानता से कोई परिणाम नहीं निकलता। केवल प्रेरणा, विवेक और संकल्प के साथ किया गया कर्म ही समाज, परिवार और स्वयं के लिए मूल्यपूर्ण सिद्ध होता है। भारतीय जीवन-दर्शन के अनुरूप इस कथन में कर्मयोग, ज्ञानयोग और इच्छाशक्ति की त्रिगुणात्मकता का सटीक प्रतिबिंब दिखाई देता है। अंततः यह विचार हमें मार्गदर्शन देता है कि जीवन में उद्देश्यपूर्ण कर्म तभी सार्थक होते हैं जब वे स्पष्ट चाहत और ज्ञान के साथ जुड़े हों।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
जब हमारे हृदय में कुछ पाने की तीव्र इच्छा, आकांक्षा या ललक होती है। चाहें वह वस्तु, व्यक्ति या किसी मुकाम तक पहुंचने की हो। तब हमारी भावनाएं आमतौर पर तीव्र गति से उसे पाने के लिए कर्मोंन्मुखी हो जाती हैं। हर पल अपनी इसी चाहत की पूर्ति के लिए रात में स्वप्न और दिन में उस सपने को पूरा करने के लिए पूरी तत्परता से व्यक्ति कर्म करता है। परिणाम सफलता मिलती भी है। क्योंकि वह व्यक्ति की पसंद का सवाल होता है। गाड़ी खरीदना, किसी से रिश्ता बनाना, ऊंची नौकरी पाना, बहुत बड़ा अमीर बनना या ऊंचा राजनीतिक पद पाना यह ऐसी चाहत है कि इन सबके लिए उसे इस स्थिति तक पहुंचने के लिए कर्म तो करना ही पड़ेगा। फिर कभी सफल इन सब स्थितियों की प्राप्ति में जो उसे अनुभव होते हैं, वह ज्ञानदायी होते हैं और यही ज्ञान उसे आगे भी वर्तमान और भविष्य में चाहत की पूर्ति में भरपूर सहायक होता है। अतः चाहत से कर्म और फिर कर्म से ज्ञान होता है।
- डॉ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
" मेरी दृष्टि में " ज्ञान उसे कहते हैं जिससे तरक्की के रास्ते खुलते हैं। यही ज्ञान तो कर्म का बढ़ावा देता है। जिससे जीवन आगे बढ़ता है। मान - सम्मान ही ज्ञान और कर्म की कुंजी कहलातीं है। फिर ज्ञान और कर्म एक ही नदी के दो किनारे है । जो भविष्य का भाग्य तय करते है।
- बीजेन्द्र जैमिनी
(संचालन व संपादन)
Comments
Post a Comment