परमानन्द श्रीवास्तव स्मृति सम्मान - 2026
मानव जीवन में कर्म प्रधान है अच्छे कर्मों से सुख और बुरे कर्मों से दुख मिलता है। जैसे कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलेगा। कर्म ही भाग्य का आधार है क्योंकि व्यक्ति वर्तमान में जो मेहनत लगन से अच्छे कर्म करता है उसी से वह भविष्य अर्थात भाग्य का निर्माण करता है। मेहनती व्यक्ति का आने वाला कल सुखमय और मंगलकारी होता है। इसके विपरीत परिणाम दुखद ही होते हैं।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
आईये आज कर्म के विषय में बात करते हैं वास्तव में कर्म एक ऐसा नियम है जो हमारे भविष्य को अच्छा या बुरा बनाने के लिए कारागार सिद्ध होता है क्योंकि हम अपने जीवन के रचयिता स्वयं हैं जबकि सत्कार्य ही बेहतर भविष्य की कुंजी है और बुरे कर्म हमें अन्धकार में ले डूबते हैं तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि कर्म से कर्म बनता है और कर्म से भाग्य बनता है, मेरा मानना है कि हमारे वर्तमान कार्य, विचार और भावनाएं ही हमारे भविष्य की परिस्थितियों, भाग्य और अगले कर्मों का आधार निधार्रित करते हैं, हमारे कर्म ही आगे चलकर परिणाम सिद्ध करते हैं विस्तार में कर्म का चक्कर ही निम्न प्रकार के कार्य करता है, देखा जाए हमारे द्वारा किए गए सभी अच्छे और बुरे कर्म नष्ट नहीं होते बल्कि एकत्र होते रहते हैं जिनसे संचित कर्म बनता है यही संचित कर्म हमें हमारे जीवन में फल के रूप में मिलते हैं जिनसे हमारी शारीरिक, मानसिक व अन्य परिस्थितियां आगे का रास्ता तय करती हैं जिनसे हमारे भाग्य का निर्माण होता है हमारे कर्म ही हमारा भाग्य तय करते हैं और भाग्य से हम फल ग्रहण करते हैं लेकिन हम स्वतंत्र कर्म करते हुए अपने भाग्य को बदल सकते हैं इंसान अपने विवेक से अच्छे कर्म करके सुखद जीवन का मार्ग चुन सकता है कहने का भाव जैसे हम कर्म करते हैं बैसा ही हमारा भविष्य निश्चित है, जिसका सही मतलब यही निकलता है कि कर्म से ही कर्म बनता है, अन्त में यही कहुंग कि कर्म एक ऐसा शब्द है जो हमारी ज़िंदगी के हर पहलु को गहराई से छूता है जीवन जो कुछ भी होता है वो कहीं न कहीं हमारे कर्मों का ही परिणाम होता है क्योंकि कर्म का सिद्धांत सिखाता है कि हमारी सोच और हर क्रिया का प्रभाव हमारे जीवन पर पडता है, सरल शब्दों में हम यह भी कह सकते है कि हमारा भाग्य कर्मों से ही निधार्रित होता है और प्रत्येक मनुष्य अपने कर्मों को बदल कर अपना भाग्य बदल सकता है और भाग्य हमें अवसर प्रदान करता है लेकिन अगर हम उस अवसर का सद्पयोग नहीं करते तो वो अवसर हाथ से निकल जाता है इसलिए सही मौके पर सही कार्य करना ही हमारा भाग्य तय करता है इसलिए कर्म से ही कर्म महान बनता है और वोही कर्म हमारा भाग्य तय करता है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
दोनों ही बात सही हैं। कर्म से कर्म बनता है।जैसे-जैसे कर्म करते जाते हैं वैसे-वैसे कर्म जुड़ते जाते हैं। कार्य करेंगे तभी तो कोई कार्य संपन्न होगा, बिना करे तो कार्य होना असंभव है। यदि नियति साथ दे तो जितना सुंदर प्रयास उतना ही सुंदर भाग्य भी बनेगा। प्रत्येक स्थिति में कर्म जरूरी है। इसलिए निष्क्रिय नहीं रहे वरन कार्य संपादित करते रहें। कार्य संपन्न होगा और सौभाग्य की राह खुलेगी।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
जीवन की धाराऐं प्रातःकाल से प्रारंभ होकर रात्रि विश्राम तक चलता है। जिसमें कर्म और भाग्य छिपा हुआ रहता है। कर्म से कर्म बनता है, कर्म से भाग्य बनता है। वास्तविक रूप में सत्यता प्रतीत होता है। हम प्रतिदिन कर्म ही नहीं करेगें, चुपचाप बैठे रहकर भाग्य पर भरोसा करते हुए, जीवन यापन करते रहेगें तो कभी भी सफलता अर्जित ही नहीं कर सकते। सबके अलग-अलग कर्म रहते है। सबका भाग्य एक जैसा नहीं रहता। चोरी करके जीवन यापन करना उसका कर्म है, तभी तो पेट की आग बुझायेगा। न्यायिक बनना उसके कर्म और भाग्य पर निर्भर करता है.....।
-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
यह वाक्य भारतीय जीवन-दर्शन का सार है। इसमें कर्म की निरंतरता और उसकी सृजनात्मक शक्ति का गूढ़ संकेत निहित है। यहाँ “कर्म से कर्म बनता है” का अर्थ है कि प्रत्येक कर्म केवल एक परिणाम नहीं देता, बल्कि वह आगे आने वाले कर्मों की दिशा और प्रकृति को भी निर्धारित करता है। मनुष्य का एक सत्कर्म उसे और अधिक सत्कर्मों की ओर प्रेरित करता है, जबकि एक दुष्कर्म उसके भीतर नकारात्मक प्रवृत्तियों को जन्म देता है। इस प्रकार कर्म एक बीज की तरह है, जो अंकुरित होकर वृक्ष बनता है और फिर अनेक बीज उत्पन्न करता है। भारतीय दर्शन, विशेषतः भगवद्गीता में, कर्म को जीवन का आधार माना गया है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि कर्म ही वह साधन है जिससे मनुष्य अपने जीवन को आकार देता है। भाग्य कोई पूर्वनिर्धारित स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि कर्मों की निरंतर श्रृंखला का परिणाम है। “कर्म से भाग्य बनता है” इस तथ्य को और स्पष्ट करता है। भाग्य को अक्सर लोग संयोग या ईश्वर की इच्छा मान लेते हैं, परंतु वास्तव में भाग्य हमारे पूर्व और वर्तमान कर्मों का संचय है। जैसे किसान जो बीज बोता है, वैसी ही फसल काटता है। यदि वह परिश्रम, धैर्य और लगन से कार्य करता है, तो उसका भविष्य समृद्ध होता है। इसके विपरीत आलस्य और अकर्मण्यता व्यक्ति के भाग्य को दुर्बल बना देती है। महापुरुषों का जीवन भी इसका प्रमाण है। महात्मा गांधी, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, स्वामी विवेकानंद—इन सभी ने अपने कर्मों के बल पर अपना भाग्य स्वयं लिखा। उनका जन्म सामान्य परिस्थितियों में हुआ, परंतु उनके असाधारण कर्मों ने उन्हें असाधारण बना दिया। कर्म का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह केवल बाहरी कार्य नहीं, बल्कि विचार और भावना भी कर्म हैं। सकारात्मक विचार सकारात्मक कर्मों को जन्म देते हैं और अंततः एक उज्ज्वल भाग्य का निर्माण करते हैं। इसीलिए भारतीय परंपरा में “मनसा, वाचा, कर्मणा”—तीनों की शुद्धता पर बल दिया गया है। अंततः यह कहा जा सकता है कि कर्म ही जीवन का निर्माता है। भाग्य कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं, बल्कि हमारे कर्मों का ही प्रतिबिंब है। यदि मनुष्य जागरूक होकर, सत्य और परिश्रम के मार्ग पर चलकर कर्म करता है, तो वह अपने भाग्य को स्वयं उज्ज्वल बना सकता है। इसलिए जीवन का मूल मंत्र यही होना चाहिए—सत्कर्म करते रहो, क्योंकि कर्म ही भविष्य का भाग्य लिखता है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
यह हर कर्म का परिणाम निकलता है जो आगे चलकर भाग्य नियत करता है और अगला कर्म भी। यह पूरा चक्र होता है जिसे आध्यात्म की दृष्टि से देखने पर सहजता से समझा जा सकता है। अत: किसी भी कर्म करने से पहले चिन्तन-मनन करना महत्वपूर्ण होता है ताकि उसके परिणाम सुखद ही हों। ऐसा माना जाता है कि संसार में हमें जो भी स्वयं के हों या दूसरों के सुख-दुख देखने मिलते हैं, वे पूर्व में किये गए कर्मों के परिणाम यानी प्रतिफल ही होते हैं।ये बात अलग है कि कोई इन तर्क को मानता है, कोई नहीं। कोई परवाह करता है, कोई नहीं। इसीलिए हमें विविधता और विभिन्नता नजर आती है। यह सामाजिक स्वीकार्य भी है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
"कर्मण्येवाधिकारस्ते" - "करम की गति न्यारी" - - - - दो बिल्कुल विपरीत संकल्पनाये। कर्म और करम। एक का सकारात्मक संदेश और दूजे का भाग्य वादिता पर जोर। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि कर्म करना हमारे हाथ में है - - - कर्म से करम अर्थात भाग्य बनता है। ये बात और है कि सभी को कर्म का फल सकारात्मक नहीं मिलता है। प्रारब्ध की दीवार पिछले जन्म के कर्मों का भुगतान
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
कर्म से कर्म बनता है. हम जो करते हैं वही हमारा कर्म बन जाता है. जैसे पढ़ाई करते हैं, खाना खाते हैं, गाड़ी चलाते हैं, हल चलाते हैं यानी जो कुछ काम करते हैं वही हमारा कर्म बन जाता है या कर्म कहलाता है. इसलिए कहा गया है कि कर्म से कर्म बनता है. दूसरी बात कर्म से ही भाग्य बनता है. जैसे अच्छी तरह से पढ़ाई करेंगे तो अच्छे इंसान बनेंगे. अच्छे पद पर कार्यरत रहेंगे. खेत की अच्छी तरह से जुताई करेंगे, अच्छे बीज डालेंगे तो फसल भी अच्छी होगी. मतलब अच्छा कर्म करेंगे तो अच्छा भाग्य बनेगा. गलत कार्य करेंगे तो भाग्य भी वैसा ही बनेगा. इसलिए कहा जाता है कि कर्म से ही भाग्य बनता है या मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है.
- दिनेश चन्द्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
कर्म करने से कर्म बनता है अर्थात काम करने से ही तो काम होता है, खाली कल्पना करने, सोचने- विचारने, हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने से तो कुछ भी काम होना संभव नहीं है । कहा भी गया है-
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै: ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे...।।
कर्म ही हमारे भाग्य का निर्धारण करते हैं । कठोर परिश्रम, लगन, दृढ़ इच्छा शक्ति ही हमें मंजिल तक पहुंचाती है । अतः कर्म करने से ही भाग्य बनता है । कर्म और भाग्य एक-दूसरे के पूरक है । गीता में भी श्री कृष्ण ने कहा है - *कर्म करो फल की इच्छा मुझ पर छोड़ दो । इसलिए कर्म करें तथा सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें ।
- बसन्ती पंवार
जोधपुर - राजस्थान
कर्म से ही कर्म जन्म लेता है, यह जीवन का मूल सिद्धांत है। प्रत्येक विचार, प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक कार्य अगली दिशा को निर्धारित करता है। जब मनुष्य निष्क्रिय नहीं रहता, बल्कि चेतन होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करता है, तब उसका कर्म केवल व्यक्तिगत नहीं रहता, वह सामाजिक प्रभाव भी उत्पन्न करता है। यही सतत कर्मशीलता मनुष्य को आत्मबल प्रदान करती है और उसे परिस्थितियों का दास नहीं, बल्कि उनका नियंत्रक बनाती है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है, यह कोई दार्शनिक कल्पना नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य है। भाग्य कोई पूर्व निर्धारित रेखा नहीं है, जिसे बदला न जा सके, बल्कि वह निरंतर किए गए कर्मों का परिणाम है। जो व्यक्ति अन्याय, असमानता और शोषण के विरुद्ध खड़ा होता है, उसका प्रत्येक संघर्ष भविष्य की नींव रखता है। ऐसे कर्म तत्काल फल न दें, फिर भी वे समय के साथ इतिहास में अपना स्थान अवश्य बनाते हैं। सकारात्मक, ज्वलंत और उत्कृष्ट कर्म वही होता है जो सत्य, साहस और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हो। जब कोई व्यक्ति अकेले खड़े होकर भी न्याय की बात करता है, तब वह केवल अपना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र का भाग्य गढ़ रहा होता है। इस दृष्टि से कर्म ही साधना है, कर्म ही संघर्ष है और अंततः कर्म ही वह शक्ति है जो मनुष्य को उसकी नियति तक पहुँचाती है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
कितनी सही बात है... जो हम कार्य करते हैं , प्रयास करते हैं , उसी से कर्म बनता है ! कर्म हमारा श्रम है , संघर्ष है , और ये ही हमारे कर्म बनाते हैं ! जैसे हम कर्म करते हैं , उनके फलस्वरूप ही हमारा भाग्य बनता है ! कर्म यदि सकारात्मक होंगे , सार्थक होंगे तो भाग्य अच्छा होगा , और यदि कर्म नकारात्मक होंगे , तो भाग्य अच्छा नहीं होगा !! अर्थात हमारे कर्म ही हमारे भाग्य को निर्धारित करते हैं !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
" मेरी दृष्टि में " कर्म की कोई परिभाषा नहीं होती है। कर्म तो कर्म होता है। फिर भी कर्म से ही जीवन शुरू होता है। जीवन भर कर्म पर कर्म चलता रहता है। सफल कितने इंसान होते है। यह सब भाग्य पर निर्भर करता है। भाग्य भी कर्म पर आधारित होता है। यह जीवन चक्र है। सारी उम्र कर्म से बंध कर रहना होता है।
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