तेलंगा खड़िया स्मृति सम्मान - 2026

      उपेक्षा से कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है। यह परम सत्य है। यह सब को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। उपेक्षा से नुकसान अवश्य होता है। कई बार तो अपराध का जन्म हो जाता है। इस से किसी को भी लाभ नहीं होता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है।‌ अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
    . अगर उपेक्षा की बात करें तो इसके अर्थ किसी व्यक्ति, वस्तु या कार्य पर ध्यान न देना उसे नजर अंदाज करना या उसकी देखभाल में लापरवाही बरतना जिससे  उसे अनदेखा समझा जाए बात कुछ भी हो किन्तु उपेक्षा करना एक गंभीर समाजिक ही नहीं भावनात्मक अपराध ही समझा जाता है जिससे मानसिक स्वास्थ्य, शारिरिक स्वास्थ्य यहाँ तक की रिश्तों तक नुकसान पहुंचता है इसका मुख्य कारण चिंता, कम आत्मसम्मान और शारीरिक जोखिमों का कारण बन सकता है इससे व्यक्ति के विकास में रूकावट आने से मानसिक रोग तक पहुँचा देती है, तो आईये आज इसी चर्चा को आगे ले चलते हैं कि उपेक्षा कभी अच्छी नहीं होती है और यह अपराध को जन्म देती है, मेरे ख्याल में उपेक्षा और समाजिक दबाव किसी भी व्यक्ति, महिला या बच्चे  को असुरक्षा की भावना पैदा करके अपराध की और धकेल  सकता है,  क्योंकि समाज की उपेक्षा, भेदभाव और जिम्मेदारियों में लापरवाही, अपराधी प्रवृतियों को जन्म देती है जो एक गंभीर समाजिक समस्या है इसलिए इस बात का उचित ध्यान रखने की जरूरत है की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए इसके नतीजे अच्छे नहीं होते,  इससे गंभीर मानसिक और शारिरिक प्रभाव पडते हैं, रिश्तों और समाज पर बुरा असर पडता है इसके साथ साथ बच्चों के विकास  में बाधा आ सकती है जिससे वो पढाई व समाजिक गतिविधियों में पीछे रह जाते हैं और उनमें हिंसक व्यवहार बढ़ सकता है, अन्त में यही कहुँगा कि उपेक्षा एक प्रकार का दुव्यर्वेहार है जिसमें उचित देखभाल की कमी से व्यक्ति को नुकसान होता है इसलिए इसे किसी भी स्थिति से बढावा नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि उपेक्षा अक्सर अपराध को जन्म देती है 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

       उपेक्षा अपने-आप में एक मानसिक तत्व होता है जो इंसान को भीतर तक तोड़ता है। उपेक्षित इंसान भीतर से टूट जाता है। अपने आप को कमतर मानने लगता है। बुद्धि से कितना भी तीक्ष्ण हो इंसान लेकिन उपेक्षा उसकी बुद्धि को कुंद कर देती है  - - - और हर कदम पर मिलने वाली उपेक्षा उसे येन-केन प्रकारेण सफलता की चाहत की ओर ढकेलती है। ऐसी स्थिति में उचित अनुचित का भान नहीं रहता और यह प्रक्रिया उसे जाने अनजाने अपराध की ओर प्रवृत्त कर देती है। अतः सदैव सिद्ध है कि उपेक्षा मानसिक अपराध है। सामाजिकता के लिये अभिशाप है। मानस रोग तज्ञ चिकित्सक आज के नवीनतम दौर में विशिष्ट थेरेपी से सामाजिक क्रांति ला रहे हैं। चिकित्सा की दिशा में तो ठीक है लेकिन ए आई के दौर में आज यह अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। तात्पर्य यही कि समाज में रहना है तो कभी भी किसी की उपेक्षा न करें। जियो और जीने दो के सिद्धांत के साथ बढ़कर एक दूसरे के साथ सार्थक कदम बढायें।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

      उपेक्षा कभी अच्छी नहीं होती। बात तो सही है,उपेक्षा होने पर उपेक्षित व्यक्ति के मन में, उपेक्षित करने वाले के प्रति दुर्भावना आती है।इधर इसके मन में तो दुर्भावना है ही इसलिए उसको उपेक्षित किया जा रहा है।यानि दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति दुर्भावना हो जाती है। इससे नफरत और फिर अपराध तक हो जाते हैं। इसीलिए उपेक्षा को अपराध की जन्मदात्री भी कहा जाता है। उपेक्षा के मूल में अपेक्षाएं पूरी न होता है। उपेक्षा से बचने एकमात्र उपाय किसी से कोई अपेक्षा न रखना होगा।न अपेक्षा न उपेक्षा,सीधा सी बात। फिर भी ऐसी स्थिति हो तो वार्ता कर स्थिति में सुधार का प्रयास तो किया ही जा सकता है।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर -  उत्तर प्रदेश

      जब किसी व्यक्ति, बच्चे या साथी की भावनाओं, जरूरतों या अस्तित्व की लगातार अनदेखी यानि उपेक्षा की जाती है, तो उसमें हीन भावना, क्रोध और कुंठा पैदा होती है. ये नकारात्मक भावनाएं अंततः विद्रोह, अनैतिक आचरण या अपराध का रूप ले सकती हैं. उपेक्षा कभी-कभी अपने अहंकार के कारण भी की जाती है, वह तो और भी खतरनाक है. इसलिए ही कहा जाता है कि उपेक्षा कभी अच्छी नहीं होती, चाहे वह किसी कारण से हो या अकारण हो. उपेक्षा तो हीन भावना, क्रोध और कुंठा पैदा करने वाली उपेक्षा ही है, जो अपराध को जन्म दे सकती है.

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

     ये सत्य वचन है कि उपेक्षा कभी अच्छी नहीं होती है और उपेक्षा अपराध को जन्म देती है. उपेक्षा किसी की भी हो, कहीं भी हो, घर में हो, समाज में हो वह अपराध को ही जन्म देती है. उपेक्षित कोई व्यक्ति हो या समाज हो जब उसके बर्दास्त करने की सीमा रहती है तबतक बर्दास्त करता है. जब उपेक्षा बर्दास्त से बाहर हो जाती है तो वह व्यक्ति या समाज अपराधी बन जाता है. इसलिए किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - प. बंगाल 

       उपेक्षा ,लापरवाही, अवहेलना, तिरस्कार, उदासीनता या विरक्ति। वास्तव में यह शब्द किसी कार्य,व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति उदासीन रवैये को दर्शाता है। स्वास्थ्य, रिश्तों और व्यक्तिगत विकास को लेकर उपेक्षा अच्छी नहीं मानी गई है। यह हानिकारक सिद्ध होती है। यदि हम अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही करते हैं तो हम गम्भीर बिमारी का शिकार हो सकते है ।बच्चों के प्रति लापरवाही का सीधा सा अर्थ है, रिश्तों की अनदेखी जिसके परिणाम बुरे हो सकते हैं और भविष्य में अवसाद, चिंता तथा आत्मसम्मान में कमी आती है। अपनी संतानों को समय रहते ध्यान नहीं देना ,उनको अच्छे संस्कार नहीं देना, अच्छी शिक्षा और देखभाल नहीं करना जैसे कृत्य माता पिता का सबसे बड़ा दोष कहलाता है। जिसका नतीजा यह होता है कि संतानें बुरी संगत में पड़ जाती हैं, बुरी आदतों की शिकार हो जाती हैं। ऐसी संतानें एक दिन अपने माँ बाप के प्रति भी असंवेदनशील होकर पाप कर्म करने से नहीं चूकती। यही उपेक्षा अपराध को जन्म देती है।

- शीला सिंह

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

     जीवन के परिदृश्य में किसी भी तरह की उपेक्षा करना अत्यधिक कठिन हो जाता है, एक बार उपेक्षित किया तो भटकाव स्वाभाविक हो जाता है। उपेक्षा कभी अच्छी नहीं होती है, उपेक्षा अपराध को जन्म देती है। यह अत्यन्त सत्यता की झलक दिखाई देती है। जब हम प्रारम्भिक कार्यों को उपेक्षा करते रहते है, तो अन्तत: अपराधिक प्रवृत्ति में पहुंच जाता है और वहाँ से निकलना मुश्किल रहता है....

-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

       बालाघाट - मध्यप्रदेश

      उपेक्षा का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को अनदेखा करना नहीं है, बल्कि उसके अस्तित्व, उसकी पीड़ा, उसकी भावनाओं और उसके अधिकारों को महत्व न देना है। यह एक ऐसा मौन व्यवहार है, जो बाहर से शांत दिखता है, पर भीतर से विनाशकारी होता है। उपेक्षा में शब्दों का शोर नहीं होता, पर इसके परिणाम अत्यंत गहरे और दूरगामी होते हैं। सबसे पहले, उपेक्षा व्यक्ति के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती है। जब किसी व्यक्ति को बार-बार अनदेखा किया जाता है, उसकी बातों को महत्व नहीं दिया जाता, या उसकी भावनाओं को तुच्छ समझा जाता है, तो उसके भीतर हीनता, पीड़ा और असंतोष जन्म लेने लगते हैं। यह पीड़ा धीरे-धीरे आक्रोश का रूप ले सकती है। जब व्यक्ति को यह महसूस होता है कि उसकी उपस्थिति या उसकी समस्याओं का कोई मूल्य नहीं है, तो उसके भीतर समाज और व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। यही वह अवस्था है, जहाँ उपेक्षा अपराध की भूमिका तैयार करती है। एक उपेक्षित बालक, जिसे प्रेम और मार्गदर्शन नहीं मिलता, वह गलत संगति की ओर आकर्षित हो सकता है। एक उपेक्षित युवा, जिसकी प्रतिभा को सम्मान नहीं मिलता, वह विद्रोही बन सकता है। एक उपेक्षित नागरिक, जिसकी समस्याओं को शासन अनसुना करता है, वह व्यवस्था के प्रति असंतोष और विरोध का मार्ग चुन सकता है। इस प्रकार, उपेक्षा केवल एक भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन और अपराध का एक प्रमुख कारण बन सकती है। भारतीय चिंतन में सदैव समावेश और संवेदनशीलता पर बल दिया गया है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना हमें सिखाती है कि हर व्यक्ति हमारे परिवार का हिस्सा है। जब हम किसी की उपेक्षा करते हैं, तो हम इस मूल भावना से दूर हो जाते हैं। इसके विपरीत, यदि हम सहानुभूति, संवाद और सम्मान का व्यवहार अपनाएँ, तो न केवल व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। अतः यह स्पष्ट है कि उपेक्षा कभी समाधान नहीं होती, बल्कि समस्याओं की जननी होती है। यदि हम अपराधमुक्त, संतुलित और संवेदनशील समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें उपेक्षा के स्थान पर अपनत्व, संवाद और सम्मान की संस्कृति को अपनाना होगा। निष्कर्षतः, जहाँ उपेक्षा समाप्त होती है, वहीं विश्वास जन्म लेता है और जहाँ विश्वास जन्म लेता है, वहीं अपराध का अंत प्रारंभ हो जाता है।

- डाॅ.छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

     उम्र या पद में कोई भी बड़ा हो या छोटा,मान-सम्मान सभी चाहते हैं। स्वाभिमान सभी रखते हैं और रखना भी चाहिए। यह हमारा गौरव होता है। ऐसे में किसी की उपेक्षा होती है, वह भले ही अनजाने में यानी भूलवश ही क्यों न हो, अच्छी नहीं होती और जानकर करना तो किंचित भी नहीं। क्योंकि भूल के लिए तो क्षमा की गुंजाइश बनती है, किंतु जानबूझ कर की जाने वाली उपेक्षा के लिए कोई गुंजाइश नहीं बचती। मजबूरी या परिस्थितिजन्य अवस्था में भले ही पीड़ित व्यक्ति तत्समय मौन रहकर कोई प्रतिक्रिया न दे लेकिन वह इस उपेक्षा का भविष्य में अवसर आने पर इस उपेक्षा का बदला अवश्य लेना चाहेगा या लेता है। भले ही वह किसी भी रूप में हो, किसी भी सीमा को तोड़ना पड़े। इसीलिए ही कहा गया है कि उपेक्षा अपराध को जन्म देती है। इसी परिप्रेक्ष्य में एक बात और गंभीरतापूर्वक मनन करना चाहिए वह ये कि किसी की उपेक्षा करने पर उसका जो अपमान होता है तो उसके मन में जो पीड़ा या कसक उठती है, वह बद्दुआ बनकर उपेक्षा करने वाले के लिए भविष्य में नुकसान पहुंचाने वाली होती है। अत: उपेक्षा से सदैव बचना चाहिए। इसके परिणाम बहुत ही कष्टप्रद हो सकते हैं।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति सम्मान पाना चाहता है। अपने किए कार्य के प्रति दो शब्द प्रेम के भी सुनना चाहता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी समस्या या बात सामने रखता है और अगला उसे पर ध्यान नहीं दे अर्थात उसकी उपेक्षा करे तो निश्चित रूप से उसे खराब लगेगा। इस स्थिति में कई बार गलत कदम उठ जाते हैं। कई चलचित्रों में भी इस तरह के भावों तथा फल स्वरुप घटित हुई आपराधिक घटना को दर्शाया गया है। बदला, विद्रोह, गलत संगत में पड़ना, नशे का व्यसन आदि भी उसमें शामिल हो जाते हैं। इसलिए किसी की भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए।जहां तक बने सद्भाव रखते हुए सहायक बनें और दुखित मन को सांत्वना प्रदान करें।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

         उपेक्षा कभी कोई समाधान नहीं ला सकती। यह केवल समाज और व्यक्तियों के भीतर असन्तोष, कटुता और अविश्वास का बीज बोती है। यह ध्यान देने योग्य है कि जब किसी अपराध, अन्याय या अनुचित व्यवहार को अनदेखा किया जाता है, तो केवल पीड़ित की वाणी दबती ही नहीं, बल्कि अपराधी को भी हौसला मिलता है। उपेक्षा से सामाजिक उत्तरदायित्व दुर्बल होता है और मानवीय मूल्यों का क्षरण होता है। अतः उपेक्षा के स्थान पर जागरूकता, संवाद और सक्रिय हस्तक्षेप ही एक सशक्त और न्यायपूर्ण समाज की नींव रख सकते हैं। हमें न केवल अन्याय को पहचानना चाहिए, बल्कि उसकी रोकथाम के लिए साहसपूर्वक कदम उठाने चाहिए। संवेदनशीलता, निरन्तर प्रयास और सक्रिय भागीदारी ही अपराध और अन्याय को अंकुरित होने से रोक सकती है।जब हम समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करते हैं, अन्याय के विरुद्ध ठोस पग उठाते हैं और अशक्तों तथा दिव्यांगों की वाणी बनते हैं, तभी हम वास्तविक न्याय और मानवता की दिशा में अग्रसर होते हैं। इसलिए उपेक्षा त्यागकर जिम्मेदारी अपनाना और प्रत्येक अन्याय के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े होना ही सच्ची वीरता और समाज के प्रति सच्ची निष्ठा है। जागरूकता और सक्रियता का मार्ग ही हमें एक न्यायपूर्ण, प्रगतिशील और सम्मानजनक समाज की ओर ले जाता है। इस प्रकार, उपेक्षा अपराध को जन्म देती है, पर सक्रियता, साहस और दृढ़ संकल्प उसे नष्ट कर सकते हैं। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

      एक सच है कि उपेक्षा अच्छी नहीं होती है।  जब हम किसी व्यक्ति की किसी बात पर कम ध्यान देते हैं । उसकी महत्वपूर्ण बातों को भी तुच्छ मानकर उसका तिरस्कार ,निरादर या अवहेलना करते हैं तो यह उपेक्षा की स्थिति कभी-कभी इतनी विस्फोटक हो जाती है कि उपेक्षित व्यक्ति अपराध को जन्म देने लगता है वह अपने को हीन अक्षम होने का कारण सोचते- सोचते आक्रामक, हिंसक हो जाता है ।यह स्थिति बाल्यावस्था हो किशोरावस्था हो या जीवन के किसी भी पारिवारिक,सामाजिक राजनैतिक क्षेत्र से जुडे व्यक्ति की हो सकती है । फिर होता क्या है? उपेक्षित होने पर व्यक्ति के शारीरिक ,बौद्धिक, भावनात्मक स्तर पर आक्रामक  संवेगों का उदय होना शुरू हो जाता है।परिणामतः अपशब्द,  लडाई - झगड़ा, अनशन,  कानूनी कार्यवाही तक इस उपेक्षा के परिणाम  देखे जा रहे हैं  अतः जीवन में हर व्यक्ति को हर वर्ग और वर्णाश्रम व्यवस्था  के इन्सान के साथ प्रेमपूर्ण मान सम्मानजनक समरसता का व्यवहार रखना चाहिए जिससे अपराध जन्म न ले सकें।

- डाॅ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

      " मेरी दृष्टि में " उपेक्षा से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। बल्कि अपना विश्वास अवश्य खो देते हैं। आज के समय में विश्वास पात्र कहा मिलाते हैं। इससे विश्वासघात का जन्म होता है। कई बार तो अपराध का जन्म हो जाता है। अतः उपेक्षा करना कोई समझदारी नहीं कहा जा सकता है। उपेक्षा से स्वयं का नुक्सान होता है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)

Comments

  1. कभी किसी की उपेक्षा नहीं करना चाहिए। उससे दुर्भावना पैदा होती है। मन विद्रोही हो जाता है और इंसान गलत कदम उठा लेता है। जो न तो उसके हित में और न ही समाज के हित में कल्याणकारी होते हैं। उपेक्षा एक नकारात्मक भाव है जिसका त्याग जरूरी है।

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