भक्ति किसी की भी करें। कर्म तो करना पड़ता है। बिना कर्म के भक्ति कभी नहीं होती है। इसे भी ज्ञान कहते हैं। कभी - कभी ज्ञान के रास्ते पर कर्म नज़र नहीं आता है। ये अक्सर होता है। कर्म ही भक्ति को सही दिशा प्रदान करता है। तभी ज्ञान काम करता है। वर्तमान व भविष्य ज्ञान से प्राप्त होता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- अगर भक्ति की बात करें तो केवल ईश्वर के नाम को जपने से भक्ति सफल नहीं होती, भक्ति के लिए अपना कर्तव्य व अपने कर्म ईमानदारी से निभाने चाहिए क्योंकि कर्म ही भक्ति को सार्थकता और पूर्णता प्रदान करता है इसलिए निष्काम कर्म करने चाहिए, जब हम अपने आपको भगवान के समर्पित करके कर्तव्यों का पालन करते हैं तो उसी को सच्ची भक्ति कहा जाता है, अगर हम आज की चर्चा को विस्तार से आगे बढाने का प्रयास करें क्या कर्म बिना भक्ति नहीं और भक्ति बिना ज्ञान नहीं तो इसमें कोई शक नहीं कि अपने कर्त्वयों को पूरी ईमानदारी, निष्ठा और समपर्ण के साथ निभाना ही सच्ची पूजा है क्योंकि कर्मयोग के लिए कर्म स्वयं भक्ति बन जाता है कहने का भाव निस्वार्थ भाव से की गई सेवा मोक्ष का मार्ग बन जाता है, दुसरी तरफ भक्ति के बिना पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है क्योंकि भक्ति ही ज्ञान को परिपूर्ण करती है, बैसे भी शास्त्रों के अध्ययन करने से ज्ञान में बृद्धि होती है, यह दार्शनिक मान्यता है कि ईश्वर या आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए समर्पण प्रेम और भक्ति अनिवार्य है, भक्ति के माध्यम से ही हृदय की शुद्धता और अंहकार का नाश होता है कहने का भाव भक्ति ही ज्ञान का मार्ग है, बिना भक्ति के ज्ञान नीरस और अधूरा है वास्तव में ईश्वर की प्रेमपूर्ण सेवा से ही सर्वोच्च ज्ञान का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, अन्त में यही कहुंगा कि कर्म ही पूजा है बशर्ते की कर्म शुद्ध व पारदर्शी व बिना लोभ, लालच के हो इसी तरह भक्ति भी अगर तन, मन व भाव से की जाए तो वो भक्ति भी ज्ञान का सागर बन जाती है , यही नहीं भक्ति और ज्ञान ईश्वर प्राप्ति के दो प्रमुख मार्ग हैं, जबकि भक्ति प्रेम, समर्पण और श्रद्धा पर आधारित मन का मार्ग है जबकि ज्ञान विवेक, समझ और सत्य की खोज पर आधारित मार्ग है, यही नहीं कर्म और भक्ति जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं यहाँ कर्म का अर्थ कर्तव्यों का निस्वार्थ पालन करना है जो भक्ति ही कहलाता है और भक्ति का अर्थ ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण जबकि कर्म जीवन को सही दिशा देते हैं और भक्ति मन को शांति प्रदान करके ज्ञान में परिवर्तित करती है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
हमारा जीवन हो या संसार, कर्म प्रधान है. कर्म प्रधान विस्व करि राखा. कर्म के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है, भक्ति भी कर्म के बिना नहीं होती है. भक्ति में आस्था प्रधान होती है. आस्था होगी, प्रभु में विश्वास होगा, तभी भक्ति करने का विचार आता है और भक्ति का कर्म किया जा सकता है. विश्वास से ही ज्ञान होता है. इसलिए यह सच है कि कर्म बिना भक्ति नहीं होती है और भक्ति बिना ज्ञान नहीं होता है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
हम बहुत कुछ सोचते है, अच्छे से अच्छा कर्म करते हुए भक्तिभाव से रहते हुए जीवन यापन करें और ज्ञान की गंगा प्रभावित करते रहे। परन्तु ऐसा होता नहीं अनायास ही हृदय परिवर्तित हो ही जाता है, जिसके परिप्रेक्ष्य में कर्म,भक्ति और ज्ञान अधुरा ही रहता है। यह सत्य है, कि कर्म बिना भक्ति नहीं होती है, भक्ति बिना ज्ञान नहीं होता है। वास्तविक रूप हम वस्तुस्थिति समझते है, उसी प्रकार से हम अपना जीवन समर्पित करते हुए, प्रगति के सोपानों की ओर अग्रसरित होते जाते है......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
भक्ति होती है भगवान के प्रति अपनी आस्था को अपने तरीके से व्यक्त करना !! कोई मंदिर जाकर अपनी भक्ति को साकार करता है , कोई घर मैं माथा टेक कर , कोई भजन गाता है , कोई उपवास करता है , कोई यात्रा करता है अपने इष्ट के दर्शन को !! इन सारी क्रियाओं में, व्यक्ति को कर्म करना पड़ता है !! इसलिए ये कथन सही व सार्थक है कि भक्ति कर्म के बिनानहीं होती !! जब हम भक्ति में लीन हो जाते हैं , तो हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है !! यदि भक्ति के बगैर भी ज्ञान होता है कई लोगों को , पर ये भी सत्य है कि भक्ति में डूबने के पश्चात , ज्ञान की वृद्धि होती है !! अतः ये सब बातें एक दूसरे से जुड़ी हैं कि कर्म भक्ति के लिए आवश्यक है , और भक्ति से ज्ञान बढ़ता है !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
दुनिया के हर क्षेत्र में कर्म जरूरी होता है. बिना कर्म किए कुछ नहीं होता है. तो भक्ति तो एक कठिन मार्ग है. इसमें तो होना ही चाहिए या कहें बिना कर्म भक्ति होती ही नहीं है. कहा गया है-----
" कर्म प्रधान विश्व करी राखा,
को करी तर्क बढाव ही साखा."
यानी कर्म की ही प्रधानता हर जगह पर होती है. और भक्ति करने के लिए कई तरह के कर्म करने पड़ते हैं. इसलिए हम कह सकते हैं कि कर्म के बिना भक्ति नहीं हो सकती है. यह भी सत्य है कि बिना भक्ति के ज्ञान नहीं हो सकता. हम कौन हैं कहाँ से आए हैं, कहां जाना है. हमारे कर्म क्या हैं. ये सब जानकारी के लिए भक्ति का होना बहुत जरूरी होता है. गुरु और भगवान के प्रति जब हमारी भक्ति दृढ़ होगी तब ही हमें ग्यान की प्राप्ति होगी. किसी भी चीज़ के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसमें भक्ति भाव से लिन हो जाना पड़ता है तब ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है. इसलिए ज्ञानी होने के लिए भक्ति में डूब जाना पड़ेगा. तभी सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होगी.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
जीवन में कर्म का अत्यंत महत्व है। केवल भावनाओं या विचारों से जीवन सफल नहीं होता। भारतीय दर्शन हमें यही सिखाता है कि कर्म बिना भक्ति नहीं होती और कर्म बिना ज्ञान नहीं होता। इसका अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति अगर केवल ईश्वर या गुरु के प्रति भक्ति का भाव रखता है, लेकिन अपने जीवन में नैतिक और धर्मयुक्त कार्य नहीं करता, तो उसकी भक्ति अधूरी रहती है। भक्ति केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रह सकती; उसे कर्म के माध्यम से जीवन में प्रकट होना आवश्यक है।इसी प्रकार, ज्ञान केवल पुस्तकों या विचारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक ज्ञान तब ही संभव है जब व्यक्ति अपने ज्ञान को कर्म में उतारे, अपने जीवन में अनुभव करे और समाज में उपयोग करे। कर्म ही वह माध्यम है जो ज्ञान और भक्ति को वास्तविकता में बदलता है। उदाहरण के लिए, भगवद गीता में कहा गया है: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”, अर्थात केवल कर्म करो, फल की चिंता मत करो। इस प्रकार, जीवन में कर्म, भक्ति और ज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना कर्म के भक्ति केवल भावनाओं का खेल बन जाती है और ज्ञान केवल विचारों तक सीमित रह जाता है। इसलिए हमें अपने जीवन में हमेशा सही कर्म करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि हमारी भक्ति और ज्ञान दोनों पूर्ण और सार्थक बन सकें।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
भक्ति के अनेक तरीके या यूँ माने शैलियां हैं। किसकी किस शैली में रुचि है, यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। कुछ लोग भक्ति के रूप में पूजा-पाठ करने में प्रतिदिन खूब समय बिताते हैं। कुछ लोगों का प्रतिदिन मंदिर जाने का नियम है। कोई सेवा-भाव में रुचि रखते हैं। इस तरह भक्ति में विविधता देखने मिलती है। इस परिप्रेक्ष्य में यह माना जा सकता है कि शैली कोई भी हो,यह कर्म के अंतर्गत तो रहेगा ही। अत: कर्म बिना भक्ति नहीं होती है, यह कहना बिल्कुल भी अनुचित नहीं है।दूसरा यह कि भक्ति बिना ज्ञान नहीं होता है, इसे लेकर भी अलग-अलग पक्ष हो सकते हैं। भक्ति के लिए यदि कोई गुरु की भूमिका में है तब तो ज्ञान की भूमिका विशेष रूप में रहेगी। भक्ति के लिए भी ज्ञान का सहारा लिया जा सकता है। लेकिन एक पक्ष यह भी है कि बिना ज्ञान के भी भक्ति हो सकती है। ऐसा भी कहा जाता है कि भोले का भगवान होता है। यहाँ भोले से आशय अज्ञानता से है। सार यही की जीवन और जीवनयापन में विविधताएं बहुत हैं और जीवन का यही आकर्षण है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
यह सच है कि कर्म (कर्तव्य पालन ) ही जीवन के लिए मुख्य है और भक्ति भगवान के प्रति पूरी तरह समर्पित होना। जब हम इस संसार में आए हैं तो हमारे प्रत्येक कार्य के मूल में ईश्वर ही होता है, भले ही अहंकार की अज्ञानतावश हम यह कह दें कि अमुक कार्य मैंने किया है तो यह गलत है। हमारे भारतीय दर्शन में गीता का ज्ञान भी यही शिक्षा देता है कि-- कर्म करो पर फल की इच्छा नहीं करो। अतः इस भाव को समर्पित होकर प्रत्येक कार्य में ईश्वर को कर्ता मानकर कर्म करना है तब यह भावपूरित कर्म भक्ति बन जाता है। जन-जन के कल्याण के लिए दया ,करुणा के भाव से परिपूरित अंतःकरण जब परोपकारी कार्य करता है तब यह मनुष्य की कर्म भक्ति है यही सर्वस्व का समर्पण आत्म निरीक्षण करने के बाद विकसित होता है। जहां यह निष्काम कर्म भक्ति से ज्ञान वृद्धि को प्राप्त होता अध्यात्म एवं विश्व बन्धुत्व की ओर ले जाता है। सुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय में समभाव रखकर कर्म करना ही भक्ति है जहां जीवन के सार तत्व का ज्ञान होता है। कर्म, भक्ति, ज्ञान की त्रिवेणी में अवगाहन ही जीवन का ध्येय होना चाहिए।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
“कर्म बिना भक्ति नहीं होती है, भक्ति बिना ज्ञान नहीं होता है” यह कथन मानव जीवन की आध्यात्मिक प्रगति का क्रम स्पष्ट करता है। मनुष्य का अस्तित्व कर्मप्रधान है, वह जैसा करता है, वैसा बनता है। यदि जीवन में कर्म नहीं है तो भक्ति केवल कल्पना या भावनात्मक प्रदर्शन बनकर रह जाती है। सच्ची भक्ति वही है जो व्यक्ति के व्यवहार, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व में दिखाई दे। जब कोई व्यक्ति अपने कार्य को ईश्वरार्पण भाव से, निष्काम भावना से और सत्यनिष्ठा के साथ करता है, तब वही कर्म भक्ति का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार कर्म भक्ति की भूमि तैयार करता है और उसे जीवन्त बनाता है। भक्ति मन को विनम्र और शुद्ध बनाती है। जहाँ अहंकार, स्वार्थ और द्वेष होता है, वहाँ ज्ञान का प्रकाश स्थिर नहीं रह सकता। भक्ति मनुष्य को समर्पण, श्रद्धा और आंतरिक अनुशासन सिखाती है। इसी निर्मल भावभूमि पर ज्ञान का उदय होता है। ज्ञान केवल पुस्तकीय जानकारी नहीं, बल्कि सत्य का आत्मबोध है, जो सही और गलत में भेद करना सिखाता है। जब ज्ञान जागृत होता है, तब वह कर्म को दिशा देता है और भक्ति को गहराई प्रदान करता है। अतः कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कर्म से भक्ति सशक्त होती है, भक्ति से ज्ञान प्रकाशित होता है और ज्ञान से जीवन उद्देश्यपूर्ण बनता है। यही त्रिवेणी मानव जीवन को ऊँचाई, संतुलन और पूर्णता प्रदान करती है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) – जम्मू और कश्मीर
कर्म के बिना कुछ भी संभव नहीं है । भक्ति का मार्ग भी कर्म के रास्ते से होकर ही गुजरता है । भक्ति का अर्थ है-ईश्वर या किसी के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव जो मन, कर्म, वचन से प्रकट होता है । यह *भज्* धातु से बना है जिसका अर्थ होता है भजना, सेवा करना, ध्यान में निमग्न हो जाना अर्थात अनन्य निष्ठा के साथ कर्म में डूब जाना । भक्ति के बिना ज्ञान नहीं होता क्योंकि जो कर्म हमने किया ही नहीं, उसका अगर अनुभव नहीं हुआ है तो उसके विषय में ज्ञान कैसे हो सकता है ? इसलिए कर्म के बिना भक्ति नहीं होती, भक्ति के बिना ज्ञान नहीं होता । कहा भी है-
जाकै पैर न फटी बिवाई
वह क्या जाने पीर पराई ।
- बसंती पंवार
जोधपुर - राजस्थान
देखिए! भक्ति और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। जहां भक्ति है वहां ज्ञान है, जहां ज्ञान है वहां भक्ति है। जो भक्त है वही भक्ति करेगा। समर्पण के बिना भक्ति नहीं होती। जहां समर्पण है वहां काम भी करना होगा। गीता जी में कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग और क्रिया योग की बातें कही गई है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि पुरुषार्थ तो करना ही पड़ेगा। यदि कोई व्यक्ति सोचे, बिना काम किए मंजिल को हासिल कर लूंगा तो यह सोचना गलत है। जब तक व्यक्ति काम नहीं करेगा, तब तक कुछ नहीं मिलेगा। थोथे शब्दों से किसी का भक्त नहीं बन जा सकता। कर्म का नाम भक्ति है। भक्त वह है जो अपने श्रद्धेय के लिए समर्पण भाव में जीता है और वह जैसा कहे वैसा कर्म करता है। जब तक भक्ति नहीं होगी तब तक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
- डॉ संतोष गर्ग 'तोष'
पंचकूला - हरियाणा
कर्म बिना भक्ति नहीं होती क्योंकि निस्वार्थ कर्म से ही भक्ति भावना सबल होती है। हमारा कर्म परहितकारी, कल्याणकारी होगा तभी उसमें भक्ति का भाव पैदा होगा। कर्म में यदि भक्ति है तो कर्म भी सार्थक माना जाता है। इसके अलावा भक्ति बिना ज्ञान निरर्थक है और ज्ञान के बिना कर्म भी अंधा है। मनुष्य कर्म के माध्यम से लौकिक कर्तव्यों को आध्यात्मिकता में परिवर्तित कर देता है। भक्ति भावना हमारी आत्मा को शुद्ध करती है तथा मानव द्वारा किये गये उपयोगी, सार्थक और श्रेष्ठ कर्म जगत में विकास लाकर जीवन को नई दिशा देते है। 'गीता का उपदेश भी यही है -----बिना फल की इच्छा से कर्म करते रहो। अच्छे कर्म का फल भी अच्छा ही मिलेगा। अतः निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही सच्ची भक्ति है और श्रेष्ठ कर्म और भक्ति का समन्वय ही सच्चा ज्ञान है। ज्ञान है तभी मानव कर्म का महत्व समझता है। अच्छे कर्म करना ही सही ज्ञान है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
" मेरी दृष्टि में " ज्ञान वह शक्ति है। जो जीवन को दिशा प्रदान करती है। जो लोगों में विभिन्नता पैदा करतीं है । वास्तव में भाक्ति व ज्ञान मार्ग अलग-अलग परिभाषा तैयार करते हैं। बाकि तो कर्म ही तय करता है। भक्ति सिर्फ परिणाम है। कर्म पुरुषार्थ को परिभाषित करता है।ज्ञान दोनों में कार्य करता है।
- बीजेन्द्र जैमिनी
(संचालन व संपादन)
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