पाठकों के बीच में रेनू चौहान की लघुकथाएं

             परिचय 

​जन्मतिथि : 28 मार्च 1955

जन्म स्थान : अम्बाला - हरियाणा

शिक्षा: पत्रकारिता एवं जनसंचार तथा गृहविज्ञान में स्नातक, आहार विज्ञान एवं जनस्वास्थ्य पोषण में ​स्नातकोत्तर डिप्लोमा, समाजशास्त्र में एम.ए., विस्तार शिक्षा में एम.एस.सी.|
सम्पृति: स्वतंत्र लेखन

प्रकाशित कृतियाँ : -

​बाल एकांकी: रंग-बिरंगे बादल
​बाल कहानियाँ: नन्हा सिपाही, गड़बड़झाला, पिटारा, पर्यावरण सरंक्षण व महिलाएँ(चिल्ड्रेन बुक ​ट्रस्ट द्वारा पुरस्कृत रचनाएँ), रामू हाथी(हिंदी अकादमी,दिल्ली द्वारा पुरस्कृत पुस्तक), अदला-​बदली, रात की बारात, राजा के दो सींग, चाँद और चिंटू, छुटकी आदि|
​ काव्य संग्रह: नीली नदी, रचो प्रिये रचो, भोर का तारा, नदियाँ हैं मेरी करघा, आवाज़ निकलती ​है टहलने, रोशनियाँ, रंग और ध्वनियाँ, रंग, चुटकी भर,
रेनू चौहान की श्रेष्ठ प्रेम कविताएँ

पुरुस्कार/ सम्मान: -

बाल एवं किशोर साहित्य सम्मान(हिंदी अकादमी, नई दिल्ली),
बाल साहित्य मार्तण्ड ​शिरोमणि सम्मान(बाल कल्याण संसथान, खटीमा),
हिंदी साहित्यकार सम्मान(हिंदी साहित्य सेवा ​समिति, मुरैना),
वरिष्ठ प्रतिभा सम्मान(हम सब साथ-साथ, नई दिल्ली)
सम्पृति: स्वतंत्र लेखन

विशेष : -

बाल गीत: चंदा मामा का पजामा, अगड़म-बगडम ढम्मक ढू, ​बारहसिंगा की कहानी, साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक
- ‘प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन’ ​में कविताएँ शामिल|
- अधिकांश कविताएँ नेपाली, बांग्ला, मणिपुरी तथा मलयालम में अनुदित
- नवसाक्षरों हेतु: विश्वास की तलाश(प्रोढ़ शिक्षा निदेशालय द्वारा पुरस्कृत) भोजन और हमारा ​शरीर, बीमारी में भोजन कैसा हो?, अच्छा भोजन, कम खर्च-अच्छा आहार, भोजन की पौष्टिकता ​नष्ट न होने दें, गर्भवती की देखभाल, सलोनी हुई सयानी, श्यामा का गाँव, बंधेज की अनूठी ​कला, काश, छोटी या बड़ी, पूनम, विदाई आदि|

पता : 

रेनू चौहान 

बी-बी/ 6 बी, जनकपुरी, 

नई दिल्ली-110058

             1. चैन

    उसने एक दिन पत्नी को बुलाया| उसके हाथ में पांच लाख रूपए थमाते हुए कहा, “ देखो यह मेरे पूरे जीवन की जमापूँजी है| बड़ी  मेहनत से एक-एक पैसा करके यह धन बचाया है|”

    वह अवाक बैठी उन पांच लाख के नोटों को फड़फड़ाते हुए देखती रही| सोचने लगी, “ठीक कहते हो, इसमें कोई शक नहीं कि यह धन बहुत मेहनत से जमा किया गया है| सारी ज़िन्दगी रूखा-सूखा खाकर, फटा-पुराना पहन कर, टूटे-फूटे घर में रहकर, बिना इलाज अथवा आधे-अधूरे इलाज के साथ घिसट-घिसट के जीकर पैसा बचाना वास्तव में बहुत ही कठिन कार्य है|”

    उसने आगे कहा,“यह मैं ही हूँ जो इतना पैसा बचा सका| तुम्हारे बस का यह नहीं है| अगर तुम्हें इस धन की खबर होती तो तुमने ना जाने कब का इसे खर्च कर दिया होता| पैसा जमा करना तुम्हारे बस की बात नहीं है|”

    खोई-खोई नज़रों से कभी पति तो कभी पैसे को देखते हुए उसने मन ही मन सोचा,”ठीक कह रहे हो| इस प्रकार से पैसे जमा करना मेरे बस की बात नही थी|”

    वो फिर बोला,”तुम्हें यह पैसे थमा दिये हैं अब मैं चैन से मर सकूँगा|”

    नोटों की ओर देखते हुए भी वो नहीं देख पा रही थी| पूरी ज़िन्दगी चलचित्र की तरह उसकी नज़रों के आगे से घूम रही थी| उसके मुँह से केवल यह निकला, “पता नहीं चैन से मरना था या चैन से जीना था?”  ०००

    2. गोमेध का कमाल

    “व्यय बहुत होता है पंडित जी, क्या करना चाहिये?” पंडित जी के आगे अपनी हथेली फैलाते हुए उसने पूछा| अपनी धोती और चोटी सँभालते हुए पंडित जी ने तुरंत उत्तर दिया, “सवा चार रत्ती की गोमेध पत्थर की अंगूठी बनवा कर सीधे हाथ की बीच की ऊंगुली में पहनो, खर्चा कम हो जाएगा|

    कहे अनुसार उसने पैसा खर्चकर  गोमेध खरीदकर झट अंगूठी बनने दे दी|

    कुछ दिनों पश्चात् ही मालूम हुआ कार्यालय में कर्मचारी अधिकता के कारण छंटनी होने वाली है| जबतक अंगूठी बनकर आई, नौकरी छूट चुकी थी| आमदनी न होने पर खर्चा कम होना स्वाभाविक था|

गोमेध ने क्या किया?

अंगूठी प्रवाह दी गई| ०००

           3. जाला

    आज दो तारिख है| पता नहीं उसे सुबह से ही रह-रह कर क्रोध क्यों आ रहा है? पहले बच्चों पर झलाई फिर पति पर| उनके ऑफिस जाने पर वो सिर पकड़ कर बैठ गई| सोचने लगी इतनी चिडचिडाहट क्यों हो रही है? आज दो तारिख है का घंटा झनझनाता हुआ दिमाग में बार-बार क्यों बज रहा है|

    आज उसकी सबसे प्रिय सखी शोभा का जन्मदिन है| दो साल पहले किसी बात पर उसका और शोभा का मनमुटाव हो गया था| उसके बाद शोभा शहर छोड़ कर कही बाहर चली गई थी|  परन्तु अभी पिछले सप्ताह ही उसे पता चला कि वह वापिस इस शहर में लोट आई है| उसे आश्चर्य हुआ कि उसने लौट कर उससे संपर्क क्यों नहीं किया? इसका मतलब है वह उससे अभी नाराज़ है| सारी घटना चलचित्र की तरह उसकी नज़रों के सामने से घूम गई| सारी बात में गलती शोभा की ही थी फिर भी वो ऐंठ रही है| क्रोध का एक और उफान उसके सिर चढ़ गया|

    क्रोध में पाँव पटकते, दांत पीसते हुए उसने झाड़ू हाथ में ले लिया और तेज़ी से सारे घर के जाले उतरने लगी| कहीं स्टूल, मोढ़े, तो कही कुर्सी, सोफे पर चढ़ते-उतरते हुए उसने एक-एक कर सारे कमरों के जाले झाड़ू मार-मार कर साफ़ कर दिये| एकदम पस्त होकर वो सोफे पर लुढ़क गई| उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी, 12 बज रहे थे| उसने सोचा उसने अपने मस्तिष्क को हरा दिया है| परन्तु नहीं वो गलत सोच रही थी| बैठते ही फिर वही तारीख, वही बात उसके सिर में झनझनाने लगी| लेकिन इस बार उसे गुस्सा नहीं आया। वो ठठा कर हँस पड़ी| सोचने लगी, सारे घर के इतने सारे जाले साफ़ कर सकती हूँ जो मुझे परेशां भी नहीं कर रहे थे, तो फिर यह दिमाग का नन्हा सा जाला क्यों नहीं साफ़ कर सकती जो मुझे दिन-रात परेशान किये जा रहा है?

    वह एक झटके से उठ खड़ी हुई| उसने एक अच्छा सा गिफ्ट निकाला, उसे सुंदर से पेपर में पैक कर वो शोभा के यहाँ जाने के लिये तैयार होने लगी| वह गुनगुना रही थी और उसके होंठों पर मुस्कान थी| उसने शोभा की पसंद की साड़ी पहनी थी| तैयार होकर जाने के लिए जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने शोभा खड़ी मुस्कुरा रही थी और उसके हाथ में बड़ा सा पैकेट था| खिलखिला कर दोनों गले मिलीं| हाथ का पैकेट पकडाते हुए शोभा ने कहा, “खाना है, जल्दी से लगा दे, बहुत जोर से भूख लगी है, सुबह से कुछ नहीं खाया, सोचा था तेरे साथ ही खाऊँगी|”  

सारे जाले झड चुके थे| ०००

         4. निकम्मा

 वो ना ढंग से पढाई कर सका, न खेल-कूद में ही अव्वल आ सका| उसे ना कोई ढंग की नौकरी मिली, न अपना पुश्तैनी धंधा, खेती-बाड़ी ही उसके बस की थी| पिता उस पर बात-बेबात झल्ला उठते और जब-तब उसे निकम्मा कहने से बाज न आते|

    एक दिन वो मुँह लटकाये और हाथ जोड़े पिता के सामने खड़ा था| समस्या थी चालीस हज़ार रूपए जो उसे सरकारी नौकरी पाने के लिए रिश्वत के रूप में देने थे| चालीस हज़ार रूपए कहाँ से आयें? यदि मकान, खेत आदि गिरवी रख कर उधार ले भी लिया जाए तो कल को चुकाया कैसे जाएगा? परन्तु उसने पक्का वादा किया कि धीरे-धीरे करके वो सारे पैसे चुका  देगा, एक बार किसी तरह से नौकरी मिल जाए बस|

    दुनिया भर की अटकलें लगाने के बाद किसी तरह से रो-पीट कर आखिरकार पैसों का बंदोबस्त कर दिया गया| नौकरी मिलने पर उस किस्मत के धनी को पहली पोस्टिंग ट्रैफिक पुलिस में मिली| न केवल शीघ्र ही उधार लिए पैसे चुका दिए गए बल्कि घर की काया पलट भी हो गयी| अब उसके दूसरे पढ़े-लिखे भाई खुद को निकम्मा समझने लगे थे| ०००

           5. कड़ी

  पेट्रोल पंप के मेनेजर रमेश बाबू ने हरिप्रसाद को अपने कमरे में बुलवाया| हरीप्रसाद कमरे में आया तो काम पर से बिना सिर उठाये उन्होंने कहा, “हरी प्रसाद तुम नौकरी से बर्खास्त किये जाते हो, शाम को अपना हिसाब करते हुए जाना|”

“पर क्यों?” बेसाख्ता हरी के मुँह से निकला|

    “क्योंकि तुम जानते ही नहीं हो कि इस पेट्रोल पंप की कार्य प्रणाली की तुम एक महत्वपूर्ण कड़ी हो,” मेनेजर ने हरी को जवाब दिया|

    रमेश बाबू काफी कठोर व अनुशासन प्रिय व्यक्ति हैं| उन्हें जवाब देना तो दूर कोई उनके सामने आने का भी प्रयत्न नहीं करता| यूँ व्यक्तिगत तौर पर वो सबकी मदद करने को भी तैयार रहते हैं, परन्तु अनुशासनहीनता सहन करना उनके बस की बात नहीं है|

     हरिप्रसाद इस प्रकार की स्थिति के लिए कदापि तैयार नहीं था| वह तपाक से बोला, “मैं हर रोज़ सुबह समय से आता हूँ, शाम को पूरे समय के बाद ही निकलता हूँ, दिनभर जीतोड़ मेहनत करता हूँ|”

“हा, पर यह काफी नहीं है,” रमेश बाबू ने अपनी नज़रें फिर से मेज़ पर बिखरे कागजों पर जमा ली थी|

    “क्या मतलब,” लगभग चिल्लाते हुए हरिप्रसाद के मुँह से निकला|

    कुर्सी पीछे खिसका कर आराम से बैठते हुए रमेश बाबू बोले, “तुम सोचते हो कि इस पेट्रोल पंप के इतने सारे कर्मचारियों में तुम नगण्य से व्यक्ति हो| तुम गाड़ी में हवा भरवाने आये लोगों से न केवल तमीज से बात नहीं करते अपितु एक-दो रुपये के लालच में टायर के वाल्व के ख़राब होने की झूठी बात भी बनाते हो| इससे हतोत्साहित हो कर लोग दूसरे पेट्रोल पंप पर हवा भरवाने जाते हैं तो साथ ही पेट्रोल भी वहीँ से भरवा लेते हैं| इससे इस पेट्रोल पंप की आमदनी के साथ-साथ उसकी छवि पर भी बुरा असर पड़ रहा है| मैं सोचता हूँ कि तुम्हारा ईमानदार, शालीन और सभ्य होना मुझसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि तुम ग्राहकों के सीधे संपर्क में आते हो|” ०००

सभी लघुकथाएँ कोई न कोई सीख देती हैं

     रेनू चौहान की लघुकथाएँ मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से बुनी गई हैं। संतुलित काया, संवादयुक्त, उद्देश्य सहित, प्रभावशाली अंत, इन सभी तत्वों से सुसज्जित लघुकथाएँ पाठक को अवाक छोड़ जाती हैं :-

'चैन' 

लघुकथा में कृपण पति से त्रस्त पत्नी पति द्वारा बचाई 5 लाख की जमापूंजी देख प्रसन्न नहीं होती क्योंकि पति ने सारी जिंदगी शौक मारकर उसे इकट्ठा किया था। शिक्षा यह कि धन को समय रहते खर्च करना चाहिए, वरना बाद में किसी काम का नहीं रहता।

'गोमेध का कमाल '

लघुकथा का शीर्षक 'गोमेद' होना चाहिए। यह वह कीमती रत्न होता है जिसे पहनने से भाग्य उदय होता है। अंधविश्वास पर प्रहार करती लघुकथा सीख देती है।

'जाला'

 सीख देती है कि रिश्तों पर उग आए जालों को समय रहते साफ कर लेना चाहिए।

'निकम्मा'  

लघुकथा का पात्र  रिश्वत देकर सरकारी नौकरी पा लेता है और निकम्मे से कमेरा बनकर इज़्ज़त पाता है।आजकल लोग पैसे वाले को सम्मान देते हैं, भले वह बेईमान हो।

'कड़ी' 

लघुकथा मालिकों की मनोदशा बताती है कि कर्मचारी की निष्ठा का कोई मोल नहीं यदि वह मालिक के स्थान पर ग्राहक के प्रति निष्ठा दिखलाए।

         सभी लघुकथाएँ कोई न कोई सीख देती हैं।

- डॉ अंजु दुआ जैमिनी 

फरीदाबाद - हरियाणा 

सामाजिक यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति

1. चैन

पंच लाइन: "पता नहीं चैन से मरना था या चैन से जीना था?" — यही पूरी लघुकथा का मार्मिक और विचारोत्तेजक केंद्र है।

सीख: धन जीवन के लिए है, जीवन धन के लिए नहीं।

कथ्य: मध्यमवर्गीय जीवन की विडंबना और धन-संचय बनाम जीवन-सुख का प्रभावी चित्रण।

लघुकथा के मापदंड: कथानक, कसाव, संवाद और अंत—चारों दृष्टियों से यह एक सफल एवं प्रभावशाली लघुकथा है।

2. गोमेध का कमाल

पंच लाइन: "गोमेध ने क्या किया? अंगूठी प्रवाह दी गई।" — व्यंग्य की तीखी धार इसी में निहित है।

सीख: अंधविश्वास की अपेक्षा विवेक और कर्म पर विश्वास करना चाहिए।

कथ्य: अंधविश्वास और भाग्यवाद पर सटीक व्यंग्य।

लघुकथा के मापदंड: संक्षिप्तता, व्यंग्य और अप्रत्याशित अंत इसे प्रभावी लघुकथा बनाते हैं।

3. जाला

पंच लाइन: "सारे जाले झड़ चुके थे।" — बाहरी और भीतरी दोनों जालों के हटने का सुंदर प्रतीक।

सीख: मन के मैल को साफ कर देने से रिश्ते फिर से जीवंत हो उठते हैं।

कथ्य: अहं, मनमुटाव और आत्मबोध के माध्यम से रिश्तों की पुनर्स्थापना का भावपूर्ण चित्रण।

लघुकथा के मापदंड: प्रतीकात्मकता, संवेदना और सकारात्मक अंत इसे सफल लघुकथा सिद्ध करते हैं।

4. निकम्मा

पंच लाइन: अंत में "अब उसके दूसरे पढ़े-लिखे भाई खुद को निकम्मा समझने लगे थे।" — व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करती है।

सीख: भ्रष्ट व्यवस्था में योग्यता नहीं, अवसर और अनैतिकता का बोलबाला हो सकता है।

कथ्य: रिश्वतखोरी और सामाजिक मूल्यों के पतन पर प्रभावशाली व्यंग्य।

लघुकथा के मापदंड: कथ्य सशक्त है, अंत प्रभावशाली है और लघुकथा की व्यंग्यात्मक परंपरा का सफल निर्वाह करती है।

5. कड़ी

पंच लाइन: "तुम्हारा ईमानदार, शालीन और सभ्य होना मुझसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।" — यही कथा का सार है।

सीख: किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा उसके प्रत्येक कर्मचारी के व्यवहार पर निर्भर करती है।

कथ्य: कार्यस्थल पर नैतिकता, ग्राहक-व्यवहार और जिम्मेदारी का सशक्त संदेश।

लघुकथा के मापदंड: यथार्थपरक कथ्य, स्पष्ट संदेश और प्रभावी संवाद इसे सफल लघुकथा बनाते हैं।

समग्र समीक्षा

         रेनू चौहान की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन विसंगतियों को सहज भाषा एवं प्रभावशाली शिल्प में प्रस्तुत करती हैं। इनकी पंच लाइनें कथ्य को सार्थक बनाती हैं, कथानक में कसाव है और अंत पाठक को सोचने के लिए विवश करता है। समग्र रूप से ये लघुकथाएँ लघुकथा-विधा के प्रमुख मापदंडों—संक्षिप्तता, एकाग्र कथ्य, प्रभावी अंत और सामाजिक सरोकार—पर खरी उतरती हैं।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश

        पांचों लघुकथा समकालीन

       रेनु जी की पांचों लघुकथा समकालीन हिंदी लघुकथा की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसमें कथ्य की सामाजिक सार्थकता, व्यंग्य की धार और अंत की मारकता को विशेष महत्व दिया जाता है। विशेष रूप से "जाला" और "गोमेध का कमाल" :-

1. चैन

यह लघुकथा जीवनभर धन-संचय के मोह में वर्तमान सुखों की उपेक्षा पर तीखा प्रश्नचिह्न लगाती है। पति-पत्नी के संवादों के माध्यम से कथा जीवन और धन के वास्तविक मूल्य पर विचार करने को बाध्य करती है। अंतिम पंक्ति अत्यंत मारक और स्मरणीय है।

2. गोमेध का कमाल

अंधविश्वास और ज्योतिषीय उपायों पर करारा व्यंग्य करती यह लघुकथा अपनी संक्षिप्तता और प्रभावी अंत के कारण सफल बन पड़ी है। कथ्य सीधा, व्यंग्य तीखा और निष्कर्ष सार्थक है।

3. जाला

यह मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक लघुकथा मन के भीतर जमे अहंकार और कटुता के "जालों" को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। बाहरी और भीतरी जालों का प्रतीकात्मक संयोजन इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

4. निकम्मा

भ्रष्ट व्यवस्था और सामाजिक मूल्यांकन की विडंबना पर आधारित यह लघुकथा तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। "निकम्मा" शब्द का बदलता अर्थ कथा को गहरी सामाजिक अर्थवत्ता प्रदान करता है।

5. कड़ी

यह लघुकथा बताती है कि किसी भी संस्थान की सफलता में हर कर्मचारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ग्राहक व्यवहार, ईमानदारी और कार्य-संस्कृति पर आधारित इसका संदेश प्रभावशाली और विचारोत्तेजक है।

- चंद्रिका व्यास 

मुंबई - महाराष्ट्र 

 पांचों लघुकथाएं सोद्देश्य लिखी गई है 

चैन 

को आम भारतीयजन की प्रवृत्ति कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि क्योंकि व्यक्ति पूर्वार्ध में आर्थिक परेशानियों के बावजूद अपने बुढ़ापे के लिए कुछ धन अवश्य बचत करता है और यह धन कहीं न कहीं पत्नी को सुकून देने के साथ व्यथित भी करता है। बचत के दोनों पहलुओं सुंदर ढंग से उद्धृत किया गया है।

 गोमेध का कमाल 

अंधविश्वास पर कुठाराघात कर यथार्थ को प्रस्तुत करती उम्दा लघुकथा है। कम शब्दों में पाठ को तक अपनी बात पहुंचाने में सफल रही है।

जाला 

रिश्तो में दो सखियों के रिश्तों में आई  दरार से मन में चल रहे उधेड़बुन और  स्वभाव  पनपते क्रोध  को जाले के माध्यम से संयत करने का प्रयास किया गया है जिसमें लेखिका सफल भी हुई है । किंतु मेरी नजर में इस विषय को इतना विस्तार देने की आवश्यकता नहीं थी।

निकम्मा 

व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार है प्रथम तो नौकरी प्राप्त करने के के लिए रिश्वत दो एवं प्राप्त करने के पश्चात मनमानी रिश्वत को लघुकथा तो अपने उद्देश्य में सफल हुई है किंतु  नवीनता का अभाव महसूस हुआ। 

 कड़ी 

स्पष्ट संदेश है कि जो भी कार्यकर्ता  या कर्मचारी प्रत्यक्ष रूप से यदि जनता से जुड़ा हुआ है तो उसके प्रत्येक क्रियाकलापों में उसके व्यवहार में विनम्रता एवं ईमानदारी बहुत जरूरी है इस विषय को लेखिका ने बखूबी क्रमबद्ध विस्तार दे पंच युक्त बनाया है जिससे लघुकथा की प्रभावोत्पादकता सशक्त हुई  है।

            पांचों लघुकथाएं सोद्देश्य लिखी गई है 

- मीरा जैन

उज्जैन - मघ्यप्रदेश 

 छोटी-छोटी दरारों में छिपे बड़े सत्य

रेनू चौहान जी की ये पाँचों लघुकथाएँ समकालीन जीवन की छोटी-छोटी विडंबनाओं, मानसिक द्वंद्व और सामाजिक यथार्थ को सरल भाषा में गहराई से पकड़ने का प्रयास करती हैं।इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि ये “साधारण घटनाओं” के भीतर छिपे “असाधारण सत्य” को उजागर करती हैं :-

1. “चैन”

यह कहानी धन-संग्रह और मानसिक शांति के बीच के विरोधाभास को उजागर करती है। पति द्वारा जीवनभर की जमा पूँजी पत्नी को देकर “चैन से मरने” की बात एक गहरी विडंबना पैदा करती है। पति का ‘चैन से मरने’ का कथन और पत्नी की मौन प्रतिक्रिया इस बात को उजागर करती है कि कभी-कभी उपलब्धियाँ भी रिश्तों के भीतर एक अजीब-सी रिक्तता छोड़ जाती हैं।

2. “गोमेध का कमाल”

यह कथा अंधविश्वास पर तीखा व्यंग्य है।ज्योतिषीय उपाय (गोमेध रत्न) के सहारे आर्थिक समस्या हल करने की उम्मीद अंततः नौकरी छूटने के यथार्थ से टकराती है।नौकरी का छूटना और आर्थिक स्थिति का बदल जाना यह दिखाता है कि समस्याओं का समाधान बाहरी तावीज़ों में नहीं बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को समझने और स्वीकार करने में है।

3. “जाला”

यह लघुकथा मानसिक जाले (गुस्सा/अहंकार) को भौतिक जाले साफ करने के माध्यम से अत्यंत सुंदर प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।जिसमें घर के जाले मन के भीतर जमे हुए क्रोध, शिकायत और दूरी के प्रतीक बन जाते हैं। पात्र का शारीरिक रूप से घर की सफाई करना और अंततः मन के भीतर जमे पुराने संबंधों को स्वीकार करना इस बात को दर्शाता है कि असली सफाई बाहर नहीं, भीतर की होती है।

4. “निकम्मा”

यह कथा सामाजिक दृष्टिकोण की विडंबना दिखाती है कि “निकम्मा” कहा जाने वाला व्यक्ति परिस्थितियों में सबसे उपयोगी साबित हो सकता है।यह कहानी यह प्रश्न छोड़ती है कि “योग्यता” का मूल्यांकन समाज कितनी जल्दी और कितनी सतही दृष्टि से कर देता है, और परिस्थितियाँ किस तरह धारणा बदल देती हैं।

5. “कड़ी”

यह लघुकथा संगठन में “छोटी कड़ी” के महत्व को उजागर करती है, विशेषकर ग्राहक सेवा और नैतिकता के संदर्भ में।यहाँ अनुशासन और ईमानदारी के साथ-साथ ग्राहक से व्यवहार की गुणवत्ता को संस्था की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया है। कहानी यह स्पष्ट करती है कि किसी भी व्यवस्था में सबसे छोटी कड़ी भी पूरी संरचना की दिशा और छवि बदल सकती है।

 ‌     यह पाँचों कथाएँ आधुनिक जीवन की “छोटी-छोटी दरारों में छिपे बड़े सत्य” को उजागर करने में सफल हैं।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

सामाजिक लघुकथाओं का गुलदस्ता 

    आदरणीया रेनू चौहान जी की प्रस्तुत लघुकथाएं समाज के विभिन्न पहलुओं के वास्तविक सारगर्भित चित्र हैं। जिन्हें बहुत ही कुशलता और सरसता से  लघुकथा के रूप में  उकेरा गया है। सभी लघुकथा सार्थक कथ्य लिए हैं :-

1. चैन

      पूरी कहानी का सार ही अंतिम पंक्ति में है, " चैन से मरना था या चैन से जीना था?"निम्न और मध्यम वर्ग के लिए  वास्तव में धनोपार्जन करना बहुत संघर्ष भरा होता है। भविष्य के लिए रुपये जोड़ना है तो वर्तमान में मुश्किलें और वर्तमान की जरूरतें और शौक पूरे कर लिए तो भविष्य में कोई संकट आ जाये तो उसके लिए कोई जमा पूंजी नहीं। कुलमिलाकर अच्छा कथ्य लिए अच्छी लघुकथा।

2.  गोमेध का कमाल

    कथ्य यद्यपि अच्छा है किंतु लघुकथा के प्रारंभ के अनुसार पाठक को थोड़े विस्तार की अभिलाषा थी। बहुत संक्षेप में  लघुकथा समाप्त कर दी गई। हालांकि घटनाक्रम पूरा समझ में आ गया ।

3. जाला

     बहुत सुंदर लघुकथा। मर्मस्पर्शी। शीर्षक बहुत ही बढ़िया।अनुरूप।

4.निकम्मा

    अच्छी लघुकथा। भाग्य और कर्म दोनों का अच्छा प्रस्तुतिकरण।

5. कड़ी

      कथ्य अच्छा है। परंतु शिल्प में अपेक्षित कसावट नहीं प्रतीत हुई। अंत भी मेरी दृष्टि में अस्पष्ट सा लगा।

       कुल मिला कर भिन्न-भिन्न कथ्यों को लिए आदरणीया  रेनू जी की पांचो  सामाजिक लघुकथाओं का गुलदस्ता सुंदर है और आकर्षक है। पठनीय है।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      जीवन-दर्शन का सुंदर संतुलन

रेनू चौहान (दिल्ली) की पाँच लघुकथाओं पर संक्षिप्त समीक्षा :-

1. चैन – 

यह लघुकथा जीवनभर धन जोड़ने और जीवन का सुख खो देने की विडंबना को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। अंतिम पंक्ति— "चैन से मरना था या चैन से जीना था?" पूरी कथा का सार बन जाती है।

2. गोमेध का कमाल – 

अंधविश्वास और कर्मकांड पर तीखा व्यंग्य करती यह लघुकथा अपने अप्रत्याशित अंत के माध्यम से अंधश्रद्धा पर प्रभावी प्रहार करती है।

3. जाला – 

मन के भीतर जमे अहंकार और कटुता के 'जाले' हटाकर संबंधों को पुनः जीवंत करने का सुंदर संदेश देती संवेदनशील और सकारात्मक लघुकथा।

4. निकम्मा –

 भ्रष्ट व्यवस्था पर करारा व्यंग्य। समाज में ईमानदारी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार से मिली सफलता को प्रतिष्ठा मिलने की विडंबना को सशक्त ढंग से उजागर करती है।

5. कड़ी – 

किसी भी संस्थान में सबसे छोटे कर्मचारी के व्यवहार का संगठन की प्रतिष्ठा पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है, इसे यह लघुकथा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रेखांकित करती है।

समग्रतः

रेनू चौहान की ये पाँचों लघुकथाएँ संक्षिप्त कथानक, सहज भाषा, तीक्ष्ण व्यंग्य, मानवीय संवेदना और प्रभावशाली अंत के कारण पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं। इनके कथ्य में सामाजिक यथार्थ और जीवन-दर्शन का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।

- अलका पाण्डेय 

मुम्बई - महाराष्ट्र 

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