पाठकों के बीच में डॉ. मधुकांत की लघुकथाएं


     1.सरकारी अर्थचक्र

अपनी पुस्तक से ध्यान हटाकर नौवीं कक्षा के विमल ने बिस्तर पर बैठे दादा जी से प्रश्न किया, "दादाजी, सरकार कैंसर की रोकथाम के लिए जागरूकता अभियान चलाती है। बीड़ी-सिगरेट पर चेतावनी छपवाती है। धूम्रपान निषेध अभियान के प्रचार में धन खर्च करती है। कैंसर रोकने और धूम्रपान बंद करने के लिए कितने ही गैर-सरकारी संगठनों को धन बाँटती है, फिर भी लोग इस बुराई को नहीं छोड़ते?"

"बेटा, हमारे देश में लोग कम पढ़े-लिखे हैं।"

"परंतु दादाजी, मैं अनेक पढ़े-लिखे अफ़सर लोगों को सिगरेट पीते हुए देखता हूँ।"

"बात तो तेरी ठीक है," दादाजी पोते की तर्कशक्ति पर आश्चर्यचकित थे।

"दादाजी, मैं क्या सोचता हूँ? यदि सरकार तंबाकू और उससे बनने वाले पदार्थों पर ही प्रतिबंध लगा दे, तो न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी।"

"बेटे, तम्बाकू उत्पादों से सरकार को बहुत कर (Tax) मिलता है। यदि कर नहीं मिलेगा, तो सरकार कैंसर रोकने का अभियान कैसे चलाएगी?" दादाजी ने सरकारी अर्थचक्र को समझा तो दिया। पोते को न जाने कुछ समझ में आया या नहीं, परंतु दादाजी अपने अप्रभावी उत्तर से स्वयं में आत्मग्लानि अनुभव कर रहे थे। ०००

           2. चांदी

"चांदी की मां, कई वर्षों से दिल में हसरत थी कि अपनी बेटी चांदी जवान हो गई है। उसके ब्याह के लिए कम से कम एक चांदी का मंगलसूत्र तो बनवाकर रख दूँ," गहरी सांस लेकर रमुवा ने कहा।

"कल लेने तो गए थे, फिर क्या हुआ?" चांदी की मां ने पूछा।

"चांदी की मां, लगता है मंगलसूत्र उसके भाग्य में ही नहीं है। हर साल अधिक से अधिक पैसे जोड़कर सुनार के पास जाता हूँ, परंतु चांदी के भाव उससे अधिक उछाल जाते हैं। आज गया तो था, परंतु चांदी का भाव तीन गुना बढ़ गया। बोल, क्या करें?"

"चिंता न कर चांदी के बापू! चांदी का नहीं बना तो गिल्ट (नक़ली) का खरीद देंगे। चांदी के मंगलसूत्र के बिना कोई ब्याह तो नहीं रुक जाएगा, चलकर रोटी खा..." चांदी की मां ने उत्साह से कहा। ०००

         3. अपना राज

​नेता ख्याली राम ने अपने परिवार की एक बैठक बुलाई। चार पुत्र, तीन पुत्रवधू, दो बेटियाँ, दो दामाद, पाँच पोते-पोतियाँ, और पाँच धेवते-धेवतियाँ - कुल इक्कीस (21) सदस्य बैठक में एकत्रित हुए।

​बड़े बेटे ने मीटिंग में कहा, "यदि हम सब मिलकर चुनाव में एक ही पार्टी पर पूरी ताकत लगाएँ, तो हमारे परिवार का एक व्यक्ति तो चुनाव जीत ही सकता है।" इसी प्रकार सबने अपने-अपने सुझाव दिए।

​अंत में, नेता ख्यालीराम ने सबको समझाया, "सबको अलग-अलग चार प्रमुख पार्टियों को ज्वाइन (या शामिल) कर लेना चाहिए। आजकल, पार्टी कितना भी अच्छा काम करे, जनता का मन ऊब जाता है। हर बार लोग नया चेहरा देखना चाहते हैं। जब दूसरी पार्टी की सरकार बनती है, तो वह विपक्षी पार्टी से प्रतिशोध लेना चाहती है। यदि हम अपने-आप को पूर्ण सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो प्रत्येक पार्टी में हमारा प्रभावशाली प्रतिनिधित्व होना चाहिए।"

​"दिखावे के लिए अलग-अलग पार्टी में रहते हुए हमें जनता में एक-दूसरे की घोर आलोचना करनी पड़े, गालियाँ निकालनी पड़ें, एक-दूसरे से लड़ते भी रहना पड़े, परंतु अंदर से हमको संगठित रहना पड़ेगा, ताकि किसी भी पार्टी का शासन आए, हमारा परिवार सत्ता में बना रहे।"०००

  4. रक्तदान - जीवनदान

​अपूर्व धन-संपत्ति अर्जित करने के बाद सेठ किरोड़ीमल अधिक चिंतित रहने लगे। उन्हें एक ही चिंता थी कि लंबे समय तक वह इस धन का सुख कैसे भोग पाएं।

​अपने पारिवारिक पंडित जी पर उनकी अटूट श्रद्धा थी क्योंकि आज तक कभी भी उनकी भविष्यवाणी गलत नहीं निकली थी। इसलिए, प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर वे पंडित जी के पास जा बैठे, "पंडित जी, मुझे यह बताओ मेरी मृत्यु कब और कैसे होगी?"

​पंडित जी ने उनकी हस्त रेखाएं देखीं, पतरा (पंचांग) निकाला, ग्रहों की चाल देखी तथा जन्मपत्री का अध्ययन किया, "जजमान, चिंता की बात तो है, क्या कहूँ..."।

​"फिर भी बताओ पंडित जी, जानकारी होने पर समुचित व्यवस्था तो की जा सकती है," सेठ किरोड़ीमल ने अपना मन कड़ा कर लिया।

​"सेठ जी, पहली बात तो यह है कि आपकी मृत्यु सड़क दुर्घटना में, खून बहने से होगी और दो-तीन वर्ष का सुखी जीवन आपका शेष है।"

​"कोई उपाय?" सेठ की आवाज़ बैठ गई।

​"सुबह चिंतन करके बताता हूँ।"

​सेठ जी घर लौट आए। रात भर चिंता में जागते रहे और प्रातः फिर पंडित जी के पास जा पहुँचे।

​"एक उपाय है... आप अपने शरीर से खून का दान कर दें तो दुर्घटना टल सकती है।"

​"खून का दान?" सेठ हिचकिचाया, "कुछ और दान करने से काम नहीं चलेगा?"

​"नहीं सेठ जी।"

​"तो अपने नौकर या बच्चों से खून दान करवा दूँ?"

​"सेठ जी, दुर्घटना में खून आपका निकलना है, तो रक्तदान भी आपका ही होना चाहिए।"

​"बहुत दर्द होता होगा?"

​"काँटा चुभने जितना..."

​"फिर तो आसान है। मैं रक्तदान कैंप लगवाने की योजना बनाता हूँ," खुशी-खुशी सेठ घर लौट आया।

​सेठ किरोड़ीमल के पास धन की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने अपनी धर्मशाला में विशाल रक्तदान कैंप लगवाया। सेठ जी द्वारा रक्तदान करने की बात सुनकर परिवार के सदस्य तथा गाँव के अनेक लोग खुशी-खुशी रक्तदान करने के लिए आए।

​खून दान करने के बाद सेठ किरोड़ीमल जी भी संतुष्ट हो गए। ०००

         5. काम-धंधा

​खाना खाने के बाद जमींदार के साथ हल्का गुड़गुड़ाते हुए रिश्तेदार ने अपने मन की बात पूछी, "आजकल कौन सा काम-धंधा अच्छा है? बेटा जवान हो गया, किसी न किसी काम में तो डालना ही पड़ेगा।"

​हुक्के का धुंआ उगलकर जमींदार ने समझाया, "देख भाई, अपने बेटे के बारे में तू ही ठीक से जानता है। यदि वह झगड़ालू, झूठा, बेईमान, गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला, बेशर्म है तो राजनीति का धंधा नंबर वन है। और यदि ज्ञानवान, अच्छा वक्ता, धार्मिक स्वभाव का है तो उसको कथावाचक बना दे। न हींग लगेगी न फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा।"

​रिश्तेदार बोला, "बेटा 12वीं फेल है। चालाक भी है... पर बातों में किसी को आगे नहीं जाने देता..."।

​जमींदार (मुस्कुराते हुए), "फिर तो तू उसको दलाल बना दे। लेन-देन में दोनों ओर से कमीशन बनेगा।"

​सुनकर रिश्तेदार संतुष्ट हो गया। ०००

   कथ्य, शिल्प और संदेश

1. सरकारी अर्थचक्र

यह लघुकथा सरकारी नीतियों के अंतर्विरोध पर तीखा व्यंग्य करती है। बाल-मन की सहज जिज्ञासा के माध्यम से व्यवस्था की विडंबना उजागर हुई है। संवाद स्वाभाविक हैं और अंत पाठक को गहरे आत्ममंथन के लिए विवश करता है। कथ्य, शिल्प और प्रभाव—तीनों स्तरों पर यह एक सफल लघुकथा है।पंचलाइन: "जब व्यवस्था स्वयं विरोधाभास पर टिकी हो, तब सबसे सरल प्रश्न भी सबसे कठिन उत्तर मांगते हैं।"

2. चांदी

'चांदी' नाम और चांदी के बढ़ते मूल्य का प्रतीकात्मक प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली है। एक सामान्य परिवार की आर्थिक विवशता और जीवन की यथार्थपरक पीड़ा सहज भाषा में उभरती है। संक्षिप्त कथानक मार्मिकता के साथ सामाजिक यथार्थ को पाठक के सामने रखता है। पंचलाइन:"महँगाई सबसे पहले सपनों का मूल्य बढ़ाती है, फिर उन्हें समझौते में बदल देती है।"

3. अपना राज

यह लघुकथा परिवारवाद और अवसरवादी राजनीति पर सटीक व्यंग्य करती है। कथानक समकालीन राजनीति की वास्तविकता को उजागर करता है। संवाद पात्रानुकूल हैं तथा अंत लोकतंत्र की विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करता है। विषय की प्रासंगिकता इसे विशेष प्रभावशाली बनाती है पंचलाइन:"सत्ता बदलती रहती है, पर स्वार्थ की राजनीति अपना राज बनाए रखती है।"

4. रक्तदान—जीवनदान

अंधविश्वास से प्रारंभ होकर यह लघुकथा सामाजिक जागरूकता और मानवीय संवेदना तक पहुँचती है। कथानक रोचक है तथा रक्तदान जैसे महत्त्वपूर्ण संदेश को सहजता से स्थापित करता है। सकारात्मक अंत पाठक को प्रेरित करता है और कथा की सार्थकता बढ़ाता है। पंचलाइन: "भय से किया गया रक्तदान भी अंततः किसी के जीवन की आशा बन जाता है।"

5. काम-धंधा

यह लघुकथा सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर चुटीले व्यंग्य के माध्यम से तीखा प्रहार करती है। संवाद प्रभावी हैं तथा अंत में व्यंग्य अपनी पूरी धार के साथ सामने आता है। संक्षिप्तता और व्यंजना इसे पठनीय एवं विचारोत्तेजक बनाती है। पंचलाइन:"जब मूल्य पीछे छूट जाते हैं, तब पेशे नहीं, प्रवृत्तियाँ पहचान बन जाती हैं।"

समग्र समीक्षा

           डॉ. मधुकांत की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ, व्यवस्था की विसंगतियों, आर्थिक विषमता, राजनीतिक अवसरवाद और मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखकर रची गई हैं। इनकी सबसे बड़ी शक्ति इनकी संवादप्रधान शैली, सहज भाषा, तीक्ष्ण व्यंग्य, संक्षिप्त कथानक और प्रभावी अंत है। लेखक बिना उपदेश दिए पाठक के भीतर प्रश्न और चिंतन जगाते हैं, जो एक सफल लघुकथा की सबसे बड़ी कसौटी है। कहीं-कहीं कथ्य थोड़ा संक्षिप्त किया जा सकता है, किंतु समग्र रूप से ये लघुकथाएँ लघुकथा-विधा के प्रमुख मानदंडों पर खरी उतरती हैं और समकालीन सामाजिक चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती हैं।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

   समाज के यथार्थ बिंब 

आदरणीय डॉ.मधुकांत जी की प्रस्तुत लघुकथाएं समाज के यथार्थ बिंब हैं। जिनको शालीनता से उकेरा गया है :-

1.सरकारी अर्थचक्र

    बहुत अच्छी लघुकथा। सटीक शीर्षक।

2.चांदी

  गरीब की अभिलाषाओं को बढ़ती महंगाई किस तरह से रौंदकर छिन्न-भिन्न करती है। इस लघुकथा में बहुत ही मार्मिक तरीके से दिखाया गया है। बढ़िया कथ्य औरी सधे हुए शिल्प के साथ अच्छी लघुकथा।

3.अपना राज

  व्यंग्य के रूप में आज की सच्चाई का यथार्थ रूप इस लघुकथा में शालीनता से प्रस्तुत किया गया है। 

4. रक्तदान - जीवनदान

        इस विषय और कथ्य को लेकर ऐसी लघुकथाएं अक्सर पढ़ने को मिलती हैं। नयापन नहीं। फिर भी यह लघुकथा बुरी नहीं। औसतन ठीक है। प्रस्तुति भी ठीक। 

5. काम-धंधा

      अच्छी लघुकथा। कथ्य और शिल्प बढ़िया। यथार्थ और मौलिक।व्यंग्य के रूप में भी अच्छी प्रस्तुति।

        कुल मिलाकर आदरणीय डॉ.मधुकांत जी की लघुकथाओं में सामाजिक चिंतन के साथ-साथ छटपटाहट भी है और पीड़ा भी। जिसे व्यंग्य के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास   भी किया गया है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

    व्यवस्था और नैतिक

        डॉ. मधुकांत की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ—“सरकारी अर्थचक्र”, “चांदी”, “अपना राज”, “रक्तदान-जीवनदान” और “काम-धंधा”—समकालीन समाज की विडंबनाओं को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर करती हैं। इन कथाओं की सबसे बड़ी शक्ति है—सरल संवादों के माध्यम से गहरे सामाजिक सत्य को सामने लाना :-

1. सरकारी अर्थचक्र

यह लघुकथा सरकारी नीतियों और कर-व्यवस्था की विडंबना को बहुत तीखे ढंग से प्रस्तुत करती है।पोते और दादा के संवाद के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि समाज में जागरूकता अभियानों और वास्तविक नीतिगत निर्णयों के बीच एक बड़ा विरोधाभास है। व्यंग्य की चरम स्थिति तब आती है जब दादा स्वयं स्वीकार करते हैं कि “टैक्स के बिना अभियान कैसे चलेगा?”यह कथ्य पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि समस्या का समाधान वास्तव में प्राथमिकता में है या केवल औपचारिकता में।

2. चांदी

यह कथा महँगाई और मध्यमवर्गीय/ग्रामीण जीवन की आर्थिक विवशता का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है।“चांदी के भाव बढ़ जाना” केवल वस्तु का मूल्य नहीं अपितु सपनों का लगातार दूर होना दर्शाता है।माँ का व्यावहारिक समाधान “नकली मंगलसूत्र” जीवन की कठोर सच्चाई को सरल भाषा में रखता है। यह कथा संवेदना और यथार्थ का संतुलन बनाए रखती है।

3. अपना राज

यह लघुकथा राजनीति में परिवारवाद और अवसरवाद पर करारा व्यंग्य है।एक ही परिवार के सभी सदस्यों का अलग-अलग पार्टियों में जाना यह दिखाता है कि निष्ठा विचारधारा से नहीं, सत्ता-सुरक्षा से तय होती है। “अंदर से एक, बाहर से विरोधी”—यह पंक्ति आधुनिक राजनीति की सबसे तीखी विडंबना बनकर उभरती है।कथा अत्यंत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक है।

4. रक्तदान – जीवनदान

यह कथा व्यंग्य के साथ-साथ एक मानवीय संदेश भी देती है।धनवान सेठ का मृत्यु-भय और रक्तदान का उपाय, जीवन और मृत्यु के बीच की असुरक्षा को दर्शाता है।यह कथा थोड़ी लंबी होते हुए भी अंत में सामाजिक जागरूकता (रक्तदान का महत्व) को प्रभावी ढंग से स्थापित करती है। यह व्यंग्य से अधिक शिक्षाप्रद कथा बन जाती है।

5. काम-धंधा

यह लघुकथा समाज में कार्य-चयन की विकृत मानसिकता पर व्यंग्य करती है।राजनीति, कथावाचन और दलाली—इन तीनों उदाहरणों के माध्यम से लेखक ने यह दिखाया है कि योग्यता नहीं अपितु अवसर और चालाकी कई बार पेशा तय करती है।यह कथा अपने छोटे आकार में तीखा सामाजिक कटाक्ष प्रस्तुत करती है।

        डॉ. मधुकांत की ये लघुकथाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठक को समाज, व्यवस्था और नैतिकता पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती हैं।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

‌   कलयुग के स्वार्थ केन्द्रित

       मधुकांत जी की पाँचों लघुकथाएँ कलयुग के स्वार्थ केन्द्रित व्यक्ति पर करारा व्यंग्य कसती हैं। इसके अतिरिक्त ये भटके व्यक्ति को राह भी दिखाती हैं। इनकी लघुकथाएँ मनोदशा बदलने की सामर्थ्य भी रखती हैं :-

'सरकारी अर्थचक्र' 

सिस्टम पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है कि क्यों सरकार तम्बाकू को बैन नहीं करती जब पता है कि इससे कैंसर होता है।

'चांदी' 

लघुकथा में  चांदी महंगी होने के कारण गरीब का विवाह नहीं हो पाता तो 'गिल्ट' का मंगलसूत्र बनवाने पर माँ सहमत हो जाती है। यह लघुकथा दहेजप्रथा पर चोट करती है।

'अपना राज'

 राजनीति के पैंतरों से अवगत कराती है।

'रक्तदान जीवनदान'

 एक प्रेरक लघुकथा है जो हर व्यक्ति द्वारा पढ़ी जानी चाहिए और इस पर अमल होना चाहिए।

'काम-धंधा' 

आज के शातिर समाज की चालाकी का रेखाचित्र खींचती हुई सावधान करती है कि व्यक्ति किस आड़ में धंधा करते हैं।

     सभी लघुकथाएँ समाजि दाँवपेंच उजागर करती सावधान करती हैं। मधुकांत जी को सार्थक लघुकथाओं के लिए बहुत बहुत साधुवाद।

- डॉ अंजु दुआ जैमिनी

फरीदाबाद - हरियाणा

Comments

  1. डॉ. मधुकांत जी की पाँचों लघुकथाएँ समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करती हैं। 'सरकारी अर्थचक्र' व्यवस्था की विडंबना, 'चांदी' आर्थिक विवशता, 'अपना राज' राजनीति के अवसरवाद, 'रक्तदान–जीवनदान' सामाजिक चेतना तथा 'काम-धंधा' नैतिक मूल्यों के ह्रास पर सार्थक प्रहार करती है। सरल भाषा, प्रभावी संवाद और मारक अंत इन लघुकथाओं को पठनीय एवं विचारोत्तेजक बनाते हैं।सभी लघुकथाएं लोगों को दिल को छूती है कथा शैली शिल्प बहुत ही प्रभाव छोड़ती हैं।
    - अलका पाण्डेय
    मुम्बई - महाराष्ट्र
    (WhatsApp से साभार)

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