शीला सिंह की लघुकथाएं

            शीला सिंह

सेवानिवृत प्रवक्ता 

(वरिष्ठ साहित्यकार एवं समाज सेविका) 

पति का नाम -श्री हरनाम सिंह

(सेवानिवृत्त प्रिंसिपल) 

शिक्षा--बी. ए. -एम. ए. -बीएड

(महाविद्यालय बिलासपुर और विश्वविद्यालय शिमला,बीएड--चेन्नई विश्वविद्यालय)

प्रकाशित कृतियाँः -

1.जीवन मंथन (गद्य लेखन)

2.काव्य दर्शन (पद्य लेखन) 

3.हिमाचल प्रदेश -बिलासपुर की लोक संस्कृति संग्रह। 

*हिम-दीपिका*भाग--1

साझा काव्य संग्रह 

1.महकते फूल 2 रेशमी सफर 3. नए चिराग 4. ख्वावों की दुनिया 5.तेरे आगोश में 6. चाँद पर इश्क 7.तेरा-मेरा साथ 8.साहित्य रतन 9. काव्य लोक 10.साहित्य प्रेमी 11. साहित्य भ्रमण 12. सुनहरी किरणें 13.छंदबद्ध भारत का संविधान 

14.आराधना के स्वर। 

साझा कहानी संग्रह 

1.साहित्यानुराग लघु कथाएं 

2.लघु कथाएं (राम राम कहियो) 

पहाड़ी कविता साझा संकलन 

1'हिमाचली भाषा रे मणके'

2.बिलासपुरी पहाड़ी कविता संग्रह --(2 मंचों के माध्यम से)

 3. *बिलासपुर के कलमवीर* पहाड़ी संग्रह 

4.'वाग्धारा' साझा संग्रह (कुल : 20 )

सम्मान/ पुरस्कार:-

1.जिलाधीश बिलासपुर द्वारा रेड क्रॉस अवार्ड -19 (राशी सहित) 

2. केंद्रीय मंत्री श्री अनुराग ठाकुर के हाथों में 'एशिया एक्सीलेंसी अवार्ड '-19(अन्तराष्टीय साहित्यिक सम्मान) प्राप्त कर चुकी हूं। सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ साहित्यिक गतिविधियों में काफी बढ़ोतरी हुई है ।

 जनवरी 2020 से मैं 'अध्यक्षा' महिला साहित्यकार संस्था जिला बिलासपुर इकाई और फिर 'प्रदेश उपाध्यक्षा' म0 सा0सं0 (हि0प्र0) मई 2026 तक इमानदारी से कार्य किया । भाषा एंव संस्कृति विभाग बिलासपुर द्वारा आयोजित मासिक कवि सम्मेलनों में निरंतर भाग लेती रही हूंँ ।

3.(अन्य प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान)

साउथ एशिया (IDOL) वूमैन अचीवमैन्टस अवार्ड 2023 देहरादून में आयोजित। 

4.ग्लोबल एक्सुलैन्सी अवार्ड 2023 (राजस्थान) में आयोजित। 

5.'छन्दबद्ध भारत का संविधान' (गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड द्वारा प्रमाणित) में छंद और रोला लेखन में भागीदारी। (बाबा अंबेडकर अवार्ड)

6.अवार्ड आफ एप्रिशियेशन (अन्तरार्ष्ट्रीय महिला दिवस 2022)

7.अन्तरार्ष्ट्रीय महिला दिवस (2023)

(बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ)  Disstt. Administration Bilaspur.

8.(राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान) 

आउटस्टैडिंग अचीवमैन्टस अवार्ड (2024)योजना एवं तकनीकी शिक्षा विभाग राज्य मन्त्री के हाथों। 

9.अन्तराष्टीय महिला दिवस (2025)Disstt.Program Officer Bilaspur द्वारा आयोजित। 

10..अन्तरार्ष्ट्रीय महिला दिवस (2026) पर तकनीकी शिक्षा मन्त्री हिमाचल प्रदेश के हाथों। 

11.श्रेष्ठ शिक्षक प्रसंशा स्मृति चिन्ह स्थानीय विधायक महोदय के हाथों (2014)

12.मतदान जाग्रति अभियान में भागीदारी हेतु जिला दण्डाधिकारी बिलासपुर द्वारा अवार्ड स्मृति चिन्ह। (2020)

13..अन्तरार्ष्ट्रीय हिन्दी दिवस पर सम्मान -नेहरू युवा केंद्र बिलासपुर (2020)

14. अन्तरार्ष्ट्रीय हिन्दी दिवस पर सम्मान (गुरुकुल सोसाइटी आफ एजुकेशन बिलासपुर) (2022)

15.सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों में श्रेष्ठ भूमिका निभाने हेतु स्थानीय पंचायत प्रधान द्वारा प्रसंशा पत्र। 

16..'छन्दबद्ध भारत का संविधान' में भागीदारी हेतु जिलाधीश बिलासपुर द्वारा सम्मानित। (2023)

17.अन्तरार्ष्ट्रीय कवि सम्मेलन ,*बैंकाक पटाया* थाईलैंड में आवाज-ए-अंदाज़ सम्मान पत्र। 

18. जैमिनी अकादमी ( पानीपत - हरियाणा) द्वारा विभिन्न सम्मान से सम्मानित :-

 - 2024 - रत्न सम्मान 

 - राकेश मित्तल स्मृति सम्मान - 2025

 - बसंत पंचमी रत्न सम्मान - 2025

 - 2025 - रत्न सम्मान 

 - मां सरस्वती रत्न सम्मान -2026

 - गणतंत्र दिवस रत्न सम्मान - 2026

 - आचार्य सीताराम चतुर्वेदी स्मृति सम्मान -‌2026

 - राम गणेश गडकरी स्मृति सम्मान - 2026

विशेष :-

            सेवानिवृत्ति से पहले और पश्चात सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए जिला बिलासपुर के प्रमुख सामाजिक, साहित्यिक, कल्याणकारी संस्थाओं से जुड़कर समाज में फैली कुरीतियों को जड़ से उखाड़ने के लिए कटिबद्ध रही। वर्ष 2019 में नेहरू युवा केंद्र के माध्यम से भिन्न-भिन्न स्थानों पर जाकर रिसोर्स पर्सन की भूमिका निभाते हुए शिक्षा ज्ञान बांटने का कार्य  किया।  हजारों युवाओं को नशे के खिलाफ जागरूक कर चुकी हूंँ तथा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के कई सेमिनार आयोजन में भाग ले चुकी हूंँ। जिसमें मुख्य उद्देश्य युवा वर्ग को सही मार्गदर्शन कराना रहा है ।

               कोरोना वैश्विक महामारी के चलते साहित्य का प्रचार प्रसार अब ऑनलाइन/ आफलाईन चल रहा है जिस कारण हिमाचल के साथ-साथ पूरे भारत से साहित्यिक गतिविधियों से जुड़ कर नारी सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रही हूँ । भिन्न-भिन्न साहित्यिक पटल, मंचों पर अपनी प्रतिभा दिखाने का सुनहरा मौका मिला है । मैं भारत के सात साहित्यिक मंचों से जुड़कर काव्य कला को और निखारने का सौभाग्य प्राप्त कर रही हूं । लॉकडाउन से लेकर अब तक लगभग 495 के करीब (डिजिटल) 'साहित्य सम्मान पत्र'  प्राप्त करने का अवसर मिला है

               इसके अलावा समाचार पत्रों में समसामयिक विषय पर लेख भेजने का कार्य करती हूंँ  जिसके मूल में शिक्षात्मक भाव समाहित रहता है । लॉकडाउन के दौरान सामाजिक कल्याणकारी कार्यों की तरफ विशेष ध्यान दिया गया ।प्रवासी मजदूरों को अन्न, वस्त्र, खाद्य सामग्री, जरूरत का अन्य सामान बांटा गया । मास्क बांटे गए सेनिटाइजर दिए गए । गांव की स्वच्छता पर विशेष ध्यान रखते हुए गांव की गलियों को,घरों को सैनटाइज करने का काम किया गया । कई कई सालों से बंद पड़े *प्राकृतिक स्त्रोतों के साफ सफाई करवाई गई पीने योग्य स्वच्छ जल की व्यवस्था की गई ।बेटियों के प्रति श्रद्धाभाव रखते हुए उनके जन्म पर मातृ शक्ति सम्मान देते हुए *वैष्णवी योजना* की  और  *हमारी धरोहर -हमारे बुजुर्ग*  सम्मान कार्यक्रम आरम्भ किया है । 

- शीला सिंह 

(सेवानिवृत प्रवक्ता) 

गाँव व डा.पनोह 

तह. घुमारवीं बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश  पिन 174004

  1. राष्ट्र का गौरव हिन्दी

सुभाष शर्मा किसी बड़े शहर में बहुत बड़े व्यवसायी थे। उनका इकलौता बेटा किसी उच्च स्तर के अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा ले रहा था। पिता बहुत बड़े व्यावसायी होने के नाते राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेते रहते थे। 14 सितंबर हिन्दी दिवस के अवसर पर उन्हें मुख्य अतिथि का मान देते हुए जिला के किसी सरकारी स्कूल में आने का निमन्त्रण दिया गया था। जब से निमन्त्रण मिला था सुभाष शर्मा जी चिंता में पड़ गये थे कि हिन्दी में भाषण वो किससे लिखवायेंगे। उस दिन सुबह 5 बजे से ही वह अपने बेटे को आवाजे देते हुए उठा रहे थे। 

हैलो राहुल, 'गैट- अप, गैट-

अप,एंड राइट फार मीं अ सौर्ट सपीच, प्लीज़ माई सन, माई लवली सन।'

राहुल झुंझलाते हुए बोला, 'ओह डैड' 'बट आई डोंट नौ हाऊ टू राइट हिन्दी।'

'सौरी डैड' सौरी। 

सुभाष बड़ी देर तक सोच में डूबा रहा,  'आखिर कसूर किसका। ' ००००

      2. नन्ही शिक्षिका

सरला की बेटी कनिका जोर -जोर से कविता पाठ कर रही थी। 

'जल ही जीवन है, जल को बचाना है। 

जल को बचाना है, जीवन बचाना है।'

कनिका के पापा भी उसी स्कूल में अध्यापक है जिस स्कूल में आज कविता प्रतियोगिता रखी गई थी। 

कनिका देख रही थी कि उसके पापा सुबह से ही अपनी गाड़ी को धो रहे हैं। बहुत सारा पानी बरबाद कर रहे हैं। कनिका की सहेली के घर पानी पीने के लिए भी मुश्किल से मिलता था। 

स्कूल में प्रतियोगिता शुरू होती है सभी बच्चे अपनी -अपनी बारी से कविता करते गए।अंत में कनिका की बारी आती है। 

'कनिका की कविता'

'जल की कीमत क्यों नहीं समझे कोई। 

मेरे पापा ने अपनी गाड़ी चार घंटे धोई।।

कोई तो जल की नित ही करते बरबादी। 

लेकिन पीने को तरसती है आधी आबादी।।'

अभि कनिका के पापा भी भाषण देने वाले थे मगर कनिका ने अपनी कविता के माध्यम से जल का महत्व समझा दिया था। कनिका की कविता पर क्रोध भी आ रहा था। 

आखिर कसूर किसका? ००००

  3. जबरदस्ती के सपनें

'अरे मेरा बेटा तो डाक्टर बनेगा।'

'नहीं मेरा बेटा तो इंजीनियर बनेगा।'

मि. प्रभुदयाल और उनकी घर्मपत्नी की यह बहस खाते-पीते ,सोते-जागते एक आम- सी बात हो गई थी। बच्चा उनकी बातें सुन-सुन कर बड़ा हुआ था।खानें की मेज से लेकर बैडरूम तक बस यही वार्तालाप चलता ही रहता। बच्चा हर समय इसी सोच में पड़ा रहता मन ही मन कहता रहता --डाक्टर या इंजीनियर, इंजीनियर या डाक्टर। 

दसवीं का परिणाम निकला मगर बच्चा इतने अंक नहीं ले सका कि माता पिता की इच्छानुसार विषय में पढ़ाई कर सके। बच्चा सोच -सोच कर बीमार पड़ गया, आत्मविश्वास टूट गया। हास्पिटल में इलाज के लिए दाखिल कराया गया ,मगर हालत बिगड़ती गई। हास्पिटल के डाक्टर हैरान थे कि बच्चे की सेहत में सुधार क्यों नहीं आ रहा। उन्होने बच्चे से बात की --बच्चा फफक-फफक कर रोने लगा और कहने लगा---' डाक्टर अंकल मैं आपकी तरह डाक्टर नहीं बन पाऊंगा और न ही इंजीनियर ही बन पाऊंगा। मेरे माता पिता के सपने चूर-चूर हो जायेंगे।'

बच्चे के माता पिता दोनों उसकी बात सुन कर एक दूसरे से नजरे चुराते हुए शर्मिन्दगी महसूस कर रहे थे 

और सोच रहे थे ---

आखिर कसूर किसका? ००००

   4. समधिन की सीख

'हमारी बेटी राजकुमारी है, परी है, कोमल है, नाजों से पली है वह घर का काम भला क्यों करेगी।'

 जब से चारू की शादी हुई थी चारू की माँ अपनी बेटी की सास के सामने बस यही वाक्य दोहराती।चारू भी ससुराल में कोई काम नहीं करती, यहाँ तक कि चाय भी उसकी सास बनाकर देती थी। सौभाग्य से चारू की ननद सपना की शादी चारू के छोटे भाई से हो गई। सपना बहुत संस्कारी और गुणी लड़की थी। ससुराल में सारा काम करती मगर अपने मायके में चारू का व्यवहार देख कर बहुत दुखी थी। उसने भी ससुराल में काम करना बंद कर दिया, चाय तक नहीं बनाती। सपना की सास अर्थात चारू की माँ एक दिन सपना के मायके में उसकी माँ से यही शिकायत करने चली गई। 

देखो समधिन-- 'आपकी बेटी तो कोई काम -धाम नहीं करती, वह तो चाय तक बना कर नहीं देती वह भी हमें ही बनानी पड़ती है।'

तभी सपना की माँ उसी वाक्या को दोहराती है --'देखो जी, मेरी बेटी तो राजकुमारी है, नाजों से पली है ,यह घर का काम नहीं कर सकती।'

फिर  क्या था--दोनों समधिन नजरें इधर -उधर करती हुई अपनी मूर्खता का एहसास करती हुई सोचने पर विवश हो गई।

आखिर कसूर किसका? ००००

      5. पनपते संस्कार

'अरे विवेक बेटा -'यह चश्में का शीशा टूट गया, कल इसको जरूर बनवा देना बेटा।

दूसरे दिन विवेक आफिस से घर आते वक्त अपने पिता जी चश्मा बनवाकर ले आया। 

उससे अगली सुबह जैसे ही विवेक आफिस के लिए चलने को तैयार हुआ उसके पिताजी आवाज लगाते है। 

अरे बेटा विवेक-'  आज आफिस से जल्दी आकर मुझे जरा डाक्टर के पास दिखा आना, कानों में कुछ कम सुनाई दे रहा है। '

विवेक झुंझलाते हुए कहता है पापा के कामों का भी हर रोज का झंझट रहता है। बुड्ढा चैन से नहीं बैठता। विवेक का छोटा बेटा यह दृश्य और बातें सुन रहा था। 

शाम को विवेक जब भी आफिस से घर आता था तो वह पानी के लिए अपने बेटे अंशु को आवाज लगाता था  और अंशु झट पानी का गिलास ले आता है।

आफिस से आकर आज जब विवेक ने अपने बेटे अंशु को पानी के लिए आवाज़ लगाई तो अंशु ने वही झुंझलाहट दिखाई और कहने लगा---'पापा आपके कामों का भी हर रोज का ही झंझट रहता है, बुड्ढे हो रहे हैं चैन से रहा करो, पानी खुद ही ले लिया करो।'

विवेक पलट कर उसे डाँट भी नहीं सका क्योंकि वह खुद शर्मिंदा था। 

आखिर कसूर किसका? ००००

अपने अंदर झाँकने पर मजबूर

         स्वतंत्रता दिवस के महीने में ये सभी लघुकथाएं विशेष महत्व रखती हैं। इन सब में अंत में दी गई एक पंक्ति "आखिर कसूर किसका?" पाठक को अपने अंदर झाँकने पर मजबूर करती हैं :-

1) राष्ट्र का गौरव हिंदी

शीर्षक छोटा और गूढ़ हो सकता था। क्योंकि अब हमें शब्दों के समुद्र में गोते लगाने चाहिए।  'हिंदी की तलाश ' या कुछ और।व्यवसायी परिवार में अंग्रेजी की महत्ता समझ आती है। यह बहुत लोगों की पसंद बन गई है। इस रचना में एक अच्छी बात है कि हिंदी दिवस पर हिंदी में भाषण देने की बात सोची गई। शर्मा जी बेटे से हिंदी में भाषण लिखने कहते हैं। लेकिन बेटा राहुल "सॉरी डैड सॉरी" कह कर सुभाष जी की सोच को एक झटका दिया है। मिश्रित शैली में लिखी यह रचना शब्दों में कसाव माँगती  है। संवाद बहुत वजनदार है। परंतु इसमें (-) डैश का अर्थ समझ नहीं आया।विराम-चिन्हों की त्रुटियाँ ज्यादा दिख रही हैं। इसे ध्यान देना जरूरी है, इससे प्रवाह टूटता है। 

2) नन्ही शिक्षिका

हम वरिष्ठों को सीख देती है। बच्चों के माध्यम से लेखिका ने जल के प्रति जागरूक बनाने का प्रयास किया है।कथानक में एक बच्ची अपने पिता पर कविता बना कर उन्हें जल का महत्व समझाती है। इसमें कुछ वर्तनी-दोष भी है। जैसे *अभि - अभी* कनिका की कविता पर किसे *क्रोध* आया? अनुत्तरित प्रश्न है।

3) जबरदस्ती के सपने

सही में परिवार के अंदर इस तरह की बातें बच्चों के साथ घटती हैं, परिणामस्वरूप बच्चे बीमार पड़ जाते हैं या फिर आत्महत्या की राह चल पड़ते हैं। कथानक लंबे अंतराल को अपने में समेटे हुए हैं। जिससे यह छोटी कहानी का रूप ले रही है। यहाँ भी शीर्षक छोटा किया जा सकता है। 

4) समधिन की सीख

विषय बहुत पुराना है। अपनी बेटी के काम करने पर आपत्ति जताना और बहू को काम करने के बाद भी बदनामी देना। यह ओछे व्यक्तित्व को दर्शाता है। इस रचना में भी चारु की शादी से लेकर भाई की शादी और उसके बाद की घटना को उकेरा गया है, जो लघु कथा का कलेवर लिए है। लघुकथा एक क्षण की घटना का परिणाम होता है। इसमें कई घटनाएँ पिरोई गई हैं।  अत: यह लघुकथा की श्रेणी में ही नहीं है।

5) पनपते संस्कार

 संस्कारों की कड़ी का उदाहरण पेश करती है। बच्चे जैसा देखते हैं, वैसा ही सीखते हैं।  इस रचना में तीन दिन का जिक्र है, जो लघुकथा के कलेवर से अलग है। इसमें भी (-) डैश का प्रयोग तथा अवतरण - चिन्ह का प्रयोग पर ध्यान देना आवश्यक है।

- संगीता गोविल 

   पटना - बिहार 

 अपनी सूक्ष्म दृष्टि के कौशल

 ‌    आदरणीया शीला सिंह जी की प्रस्तुत लघुकथाएं पारिवारिक लघुकथाएं हैं। एक तरफा सोच से पनपने वाले विकारों को उन्होंने अपनी सूक्ष्म दृष्टि के कौशल  से उन्हें समझा है और अपनी लघुकथा के माध्यम से ऐसी सोच रखने वालों को सजग भी किया है :-

1.  राष्ट्र का गौरव हिन्दी

     अच्छी लघुकथा। अच्छा कथ्य। यही विडंबना है कि एक तरफ हिन्दी हमारे राष्ट्र गौरव का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर अनेक ऐसे धनाढ्य वर्ग के परिवार हैं जहाँ हिन्दी भाषा के लिए कोई स्थान नहीं। 

2. नन्ही शिक्षिका

कथ्य अच्छा है। शिल्प भी अच्छा। अच्छी प्रस्तुति।

3.जबरदस्ती के सपने

बहुत अच्छी लघुकथा। अच्छा कथ्य। यथार्थ चित्रण। अधिकांश परिवार में ऐसा ही होता है। माता-पिता अपने सपने बच्चों में पूरा होते देखने की चाह में न केवल बच्चों के सपने छीन लेते हैं बल्कि वर्तमान को भी बोझिल कर व्यथित कर देते हैं।

4.समधन की सीख

    बहुत अच्छी लघुकथा।अच्छा कथ्य। 

5.  पनपते संस्कार

अच्छी लघुकथा।बढ़िया शिल्प।

       संक्षेप में कहें तो आदरणीया शीला सिंह जी की उपरोक्त सभी लघुकथा सार्थक और आवश्यक कथ्य के साथ उद्देश्यपूर्ण संदेश लिए बेहतरीन लघुकथाएं हैं। 

-नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

शीला सिंह जी की लघुकथा की समीक्षा 

1. राष्ट्र का गौरव हिन्दी — 

यह लघुकथा हिन्दी दिवस जैसे महत्वपूर्ण विषय पर तीखा व्यंग्य करती है। कथानक यह उजागर करता है कि हिन्दी का सम्मान करने का दावा करने वाले लोग स्वयं अपने घर में हिन्दी से दूर हो चुके हैं। अंत का प्रश्न— "आखिर कसूर किसका?"— पाठक को आत्मचिंतन के लिए विवश करता है। विषय समसामयिक और प्रभावशाली है।

2. नन्ही शिक्षिका — 

यह लघुकथा बच्चों के माध्यम से समाज को सीख देने का सुंदर उदाहरण है। कनिका अपनी कविता से अपने पिता की जल-बर्बादी पर प्रश्न उठाकर कथनी और करनी का अंतर सामने लाती है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश सहज, मार्मिक और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत हुआ है।

3. जबरदस्ती के सपने — 

यह लघुकथा अभिभावकों द्वारा बच्चों पर थोपे गए सपनों की त्रासदी को संवेदनशीलता से चित्रित करती है। बच्चे के मानसिक दबाव और टूटते आत्मविश्वास का चित्रण हृदयस्पर्शी है। कहानी माता-पिता को बच्चों की रुचि और क्षमता का सम्मान करने की प्रेरणा देती है।

4. समधिन की सीख — 

यह लघुकथा व्यवहारिक शिक्षा और समान दृष्टिकोण का संदेश देती है। जब वही परिस्थिति चारू की माँ के सामने आती है, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है। कथा सहज शैली में यह बताती है कि संस्कार और गृहकार्य केवल बहुओं के लिए नहीं, बल्कि हर बेटी के लिए समान रूप से आवश्यक हैं।

5. पनपते संस्कार — 

यह लघुकथा इस सत्य को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। विवेक का अपने पिता के प्रति असम्मान अंततः उसी के सामने उसके पुत्र के व्यवहार में लौटकर आता है। कथा पारिवारिक संस्कारों के महत्व को मार्मिक और सशक्त ढंग से रेखांकित करती है।

समग्र टिप्पणी :

शीला सिंह जी की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हैं। सरल भाषा, स्पष्ट कथ्य, प्रभावी संदेश और अंत में आत्ममंथन के लिए छोड़ा गया प्रश्न— "आखिर कसूर किसका?"— इनकी विशेषता है। ये लघुकथाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठकों को अपने व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।

- अलका पाण्डेय 

 ‌मुम्बई - महाराष्ट्र 

गलतियों को सुधारने का संदेश 

       आदरणीय शीला जी की लघुकथाओं  में आज के जीवन की सच्चाई , सरल व्यंग्यात्मक शैली में मैं चित्रित की गई हैं !! भाषा सरल व सटीक है व हर लघुकथा का संदेश सीधे दिल तक पहुंचता है , क्योंकि ये लघुकथाएं यथार्थ पर आधारित हैं !! जब अनुभव लेखनी मैं उतरता है टो ऐसी उत्कृष्ट रचनाओं का सृजन होता है !!

 राष्ट्र का गौरव हिन्दी

राष्ट्र का गौरव हिंदी मैं हिंदी का आज जो वर्तमान मैं स्थान है , वो परिलक्षित होता है

नन्ही शिक्षिका 

नन्ही शिक्षिका में जल के महत्व को तीखे कटाक्ष द्वारा समझाया गया है !

जबरदस्ती के सपने

जबरदस्ती के सपने मैं अभिभावकों की आकांक्षाओं को कैसे नन्हे बच्चों पर थोपा जा रहा है , का मार्मिक चित्रण है !

समधिन की सीख

समाधान की सीख में, बहुत खूबसूरती से इस तथ्य का चित्रण किया गया है कि सफल गृहस्थी हेतु कौनसे संस्कार व सीख चाहिए !

पनपते संस्कार

पनपते संस्कार में, आज की आधुनिकता की दौड़ मैं कैसे संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं हम , और कैसे संस्कारों से दूर कर रहे हैं सब .... का चित्रण बखूबी किया गया है !!

             कुल मिला के इनकी हर लघुकथा , आधुनिक मानव की गलतियों को सुधारने का संदेश देती हैं !!

- नंदिता बाली

सोलन - हिमाचल प्रदेश

सामान्य घटनाओं पर आधारित


१- राष्ट्र का गौरव हिन्दी

राष्ट्र का गौरव हिंदी भाषा गौरव है आप चाहे नेता अभिनेता बन जाए भारत देश हिंदीभाषा सम्मान शिक्षा है आख़िर क़ुसूरवार आप ही है !

२-नन्ही शिक्षिका

नन्ही शिक्षिका ने अपने पिता को सिखा दिया जल ही जीवन है आस पास वातावरण से सीखते हैं नव युग के प्रणेता कर्णधार है 

३-जबरदस्ती के सपने

जबरदस्ती के सपने से सुकून असंभव है माता पिता सही मूल्यांकन जरूरी है कभी सपने चूर चूर नही होते हैं अपना भविष्य सुरक्षित रखते हैं 

४- समधिन की सीख

समधिन की सीख ने नही है बदलते हालत समय दिखाता हैं ऐसा अक्सर होता हैं  इंसान अपनों का अपने हारता है 

५-पनपते संस्कार

पनपते संस्कार घर परिवार समाज की कड़ी अपने के बनाए होते है वक़्त की मार से सम्हालते है अपने आपको लज्जित होने बचते हैं 

     हार्दिक बधाई शीला जी आपकी कथा जीवन की सामान्य घटनाओं पर आधारित सीख लिए हुए हैं उद्देश्यपूर्ण रचना निखार आता है पंच लाइन आख़िर क़ुसूर क्या है 

- अनिता शरद झा

रायपुर -  छत्तीसगढ़ 

सामाजिक चेतना की लघुकथाएँ


1. राष्ट्र का गौरव हिन्दी

यह लघुकथा हिन्दी दिवस जैसे गंभीर विषय पर व्यंग्य के माध्यम से भाषा-विरोधाभास को उजागर करती है। कथ्य प्रभावी और समकालीन है। कथानक सहज गति से आगे बढ़ता है। अंतिम प्रश्न "आखिर कसूर किसका?" पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करता है। पंचलाइन सशक्त है।

2. नन्ही शिक्षिका

जल संरक्षण जैसे सामाजिक सरोकार को बाल-दृष्टि से प्रस्तुत करना इस लघुकथा की विशेषता है। कथ्य स्पष्ट और संदेशपरक है। कनिका की कविता ही कथा का निर्णायक मोड़ बनती है। पंचलाइन प्रभावशाली है, पर अंत में प्रश्न की अपेक्षा पिता की आत्मग्लानि का सूक्ष्म चित्रण इसे और प्रभावी बना देता।

3. जबरदस्ती के सपने

अभिभावकों की महत्वाकांक्षा और बच्चों पर उसके मानसिक दबाव को संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कथ्य प्रासंगिक है और सामाजिक चेतावनी देता है। अस्पताल का दृश्य कथा में भावनात्मक प्रभाव बढ़ाता है। पंचलाइन विचारोत्तेजक है तथा पाठक को अपनी भूमिका पर सोचने के लिए प्रेरित करती है।

4. समधिन की सीख

यह लघुकथा दोहरे मापदंडों पर तीखा व्यंग्य करती है। कथ्य पारिवारिक जीवन की यथार्थ समस्या को सहज भाषा में सामने लाता है। दोनों समधिनों का आमना-सामना कथा का प्रभावी मोड़ है। पंचलाइन आत्मबोध उत्पन्न करती है और कथा को सार्थक निष्कर्ष तक पहुँचाती है।

5. पनपते संस्कार

बच्चे अनुकरण से सीखते हैं—यह शाश्वत सत्य इस लघुकथा का मूल कथ्य है। घटनाक्रम स्वाभाविक और विश्वसनीय है। बेटे द्वारा पिता के ही शब्द लौटाना अत्यंत प्रभावशाली मोड़ है। पंचलाइन बिना उपदेश दिए गहरा नैतिक संदेश छोड़ती है और सबसे अधिक असरदार बनकर उभरती है।

            समग्र रूप से शीला सिंह की ये पाँचों लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों पर आधारित, सरल भाषा में लिखी गई संदेशप्रधान रचनाएँ हैं। इनमें कथ्य की स्पष्टता और पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करने की क्षमता है। यदि कुछ स्थानों पर शब्द-संयम बढ़ाया जाए और अंत को थोड़ा अधिक व्यंजक बनाया जाए, तो इनकी साहित्यिक प्रभावशीलता और भी सशक्त हो सकती है।

- छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर - मध्यप्रदेश 

सामाजिक सरोकारों से संपृक्त लघुकथाएँ

       शीला सिंह की इन पाँचों लघुकथाओं का मूल स्वर सामाजिक चेतना, पारिवारिक संस्कार और आत्ममंथन है।इन रचनाओं की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक कथा के अंत में “आखिर कसूर किसका?” प्रश्न पाठक को आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करता है :-

 राष्ट्र का गौरव हिन्दी

यह लघुकथा आज के भाषाई विडंबना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। हिन्दी दिवस पर भाषण देने वाला व्यक्ति स्वयं हिन्दी लिखने में असमर्थ है और उसका पुत्र भी हिन्दी नहीं जानता। कथा का सबसे मार्मिक क्षण राहुल का यह कहना है कि वह हिन्दी लिखना नहीं जानता।यह कथा केवल भाषा का प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता और पारिवारिक प्राथमिकताओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

नन्ही शिक्षिका

यहाँ बच्ची अपनी कविता के माध्यम से पिता को शिक्षा देती है। कथानक में कथनी और करनी का विरोधाभास बहुत प्रभावी ढंग से उभरता है। दिया गया संदेश स्वाभाविक लगता है और बच्ची का चरित्र विश्वसनीय बनता है। जल संरक्षण का विषय बाल-दृष्टि से प्रस्तुत हुआ है।

जबरदस्ती के सपने

यह लघुकथा आज की प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था और अभिभावकीय दबाव पर सार्थक प्रहार करती है। यह कथा बताती है कि बच्चों पर थोपे गए सपने उनके व्यक्तित्व और मानसिक स्वास्थ्य को तोड़ सकते हैं।

समधिन की सीख

यह कथा दोहरे मापदंड पर तीखा व्यंग्य करती है। जो माँ अपनी बेटी को काम न करने देना चाहती थी, वही बहू के संदर्भ में शिकायत करती है। घटनाक्रम चक्राकार है और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। कथा का संदेश स्पष्ट है कि संस्कार केवल अपनी बेटी के लिए नहीं, दूसरों की बेटी के लिए भी समान होने चाहिए।

पनपते संस्कार

इसमें अनुकरण का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत अत्यंत स्वाभाविक ढंग से उभरता है। पिता द्वारा दादा के प्रति किया गया व्यवहार उसी रूप में पुत्र द्वारा लौटाया जाता है।अंत में विवेक की चुप्पी और शर्मिंदगी कथा को गहरा प्रभाव देती है। बिना उपदेश दिए संस्कारों का गहरा संदेश दिया गया है।

              पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि समाज की अधिकांश समस्याओं की जड़ बाहर नहीं हमारे अपने व्यवहार, संस्कार और निर्णयों में निहित है। यही इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि है। लेखिका का उद्देश्य मनोरंजन से अधिक सामाजिक सुधार और मूल्यबोध स्थापित करना है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान



                   

Comments

  1. शीला सिंह जी की पाँचों लघुकथाएँ , रोचक हैं और एक सूत्र बद्ध हैं - आख़िर क़सूर किसका ? इन में जो विरोधाभास है , उसके जनक हम स्वयम् ही हैं , ऐसा कहना है लेखिका का ।
    लेकिन सूत्रबद्धता के चलते कथा अपनी स्वाभाविकता और सहजता से विमुख भी हो जाती है , कहीं -कहीं ऐसा लगता है ।
    ‘ ज़बरदस्ती के सपने ‘ में यही फ़ार्मूला कथा पर हावी है । अब यह कथन एक बच्चे का नहीं एक परिपक्व सोच का है कि - “ डॉक्टर अंकल मैं आपकी तरह डॉक्टर नहीं बन पाऊँगा और न ही इंजीनियर । मेरे माता पिता के सपने चूर -चूर हो जाएँगे ।”
    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इन कथाओं का अंत अनाड़ी पन से किया गया है , पंच से नहीं । सारांश देना लघुकथा शैली में अभीष्ट नहीं है । यथा -
    बच्चे के माता पिता दोनों ( इस शब्द की यहाँ ज़रूरत ही नहीं थी ) उसकी बात सुन कर एक दूसरे से नज़रें चुराते हुए शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे ।
    यह कथा में लेखकीय प्रवेश है ।
    नन्हीं शिक्षिका , एक बढ़िया लघुकथा है ।
    समधन की सीख , हमारे दैनिक जीवन का यथार्थ है । हमारी अपेक्षाएँ दूसरे से हैं , अपने से नहीं ।
    पनपते संस्कार , भी सुंदर रचना है , लेकिन अंत लेखक जब स्वयम् ही स्पष्ट कर दें तो पाठक को कथा कचोट कैसे पाएगी ?
    - डॉ आदर्श / उधमपुर
    मोब - 9149504226
    (WhatsApp से साभार)

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  2. साहित्य जगत में मेरी प्रतिभा को निखरने का सुअवसर प्रदान करने के लिए और मुझे इतना मान सम्मान देने के लिए हृदय की गहराइयों से बहुत बहुत साधुवाद 🙏🙏
    -शीला सिंह
    बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
    ( WhatsApp से साभार)

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