पंकज शर्मा की लघुकथाएं

             पंकज शर्मा

पिता : श्री ओम प्रकाश शर्मा 

माता :  श्रीमती स्नेह लता शर्मा

जन्म : 19-09-1970, चंदौसी (मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश)

शिक्षा

स्नातक, कहानी-लेखन महाविद्यालय, अम्बाला छावनी से ‘लेख व फीचर लेखन’ का कोर्स। 

सम्प्रति : सेवारत रेल विभाग

लेखन   : देश की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित।

विधाएं :

 हास्य-व्यंग्य, कहानी, लेख, लघुकथा, कविता, संस्मरण, समीक्षा इत्यादि।

प्रकाशित पुस्तकें: - 

1. सिर्फ तुम (लघुकथा संग्रह)  

2. डोर (लघुकथा संग्रह)  

3. वह लड़की (कहानी संग्रह) 

4. मुफ्त बातों के मुफ्तलाल (व्यंग्य संग्रह), 

5. आखिरी दाना (कविता संग्रह) 

6. . मुफ्त बातों के मुफ्तलाल (व्यंग्य संग्रह) 

7. आख़िरी दाना (कविता-संग्रह) 

8. . सुनामी (मिन्नी कहानियाँ) (पंजाबी में)।

पुरस्कार : -

 हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला से लघुकथा संग्रह ‘सिर्फ तुम’, कहानी संग्रह ‘वह लड़की’ एवं कविता संग्रह

    ‘आखिरी दाना’ हेतु सहायतानुदान एवं पुस्तक ‘सिर्फ तुम’ (लघुकथा संग्रह) एवं ‘मुफ़्त बातों के मुफ़्तलाल’ (हास्य-व्यंग्य  संग्रह) को ‘श्रेष्ठ कृति पुरस्कार’, राशि 21000/- रुपए एवं 31000/- रुपए प्राप्त ।

   *‘साहित्य समर्था’, त्रैमासिक साहित्यक पत्रिका, जयपुर द्वारा ‘अखिल भारतीय डॉ. कुमुद टिक्कू कहानी एवं लघुकथा

                  प्रतियोगिता’ में श्रेष्ठ लघुकथा पुरस्कार (जनवरी, 2016)।

*‘पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी’, शिलांग द्वारा वर्ष 2010 में ‘श्रेष्ठ प्रतिभा सम्मान’, वर्ष 2015 में ‘श्री जीवनराम मुंगीदेवी       

  गोयनका स्मृति सम्मान’ एवं वर्ष 2023 में ‘उर्मि कृष्ण हिंदी सेवी सम्मान’ प्राप्त।       

          *‘यूएसएम पत्रिका एवं राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास (भारत)’, गाज़ियाबाद द्वारा ‘राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान- 2010’ 

           प्राप्त।

*‘हम सब साथ साथ’, नई दिल्ली द्वारा ‘युवा लघुकथाकार सम्मान’।

*‘साहित्य सभा’, कैथल (हरियाणा) द्वारा ‘बाबू जगदीश राम स्मृति साहित्य सम्मान 2015’ प्राप्त।

*‘हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मलेन, सिरसा’ द्वारा संचालित ‘हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच’ के तत्वाधान में ‘लघुकथा सेवी सम्मान, वर्ष-2016’ से सम्मानित।

*समग्र सेवा संस्थान, सिरसा द्वारा मातुश्री विद्यादेवी की स्मृति में ‘श्री गोपाल शास्त्री सारस्वत सम्मान-2021’ प्राप्त ।

विशेष:-

-  देश की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित।

- प्रसारित   : आकाशवाणी कुरुक्षेत्र, रोहतक एवं शिलांग से रचनायें प्रसारित।

- अभिरुचियाँ : पर्यटन, फोटोग्राफी, मित्रता, अध्ययन-मनन, संगीत सुनना, नेक कार्यों में रूचि।

संपर्क : - 

19, सैनिक विहार, सामने विकास पब्लिक स्कूल, जंडली, अम्बाला शहर–134005 (हरियाणा)।


       1. इस बहाने से

-आपको पता है आपका छोटा भाई क्या कर रहा है?

  -क्या?

  -हम उसकी दुकान से जो भी सामान लेते हैं, उसका वो हमसे कम दाम लेने की बजाय पूरा दाम वसूल कर रहा है।

  -जानता हूँ।

  -कमाल है! फिर भी आप सारा सामान उसी के पास से ले कर आते हो।

  -तो, उससे क्या अंतर पड़ता है?

  -क्यों, यह कोई अच्छी बात है कि कोई अपनों को ही लूटे। किसी बाहर वाले से करे तो समझ भी आता है।

  -यही तो तुम्हें समझ नहीं आया श्रीमती जी। बाहर वालों से करेगा तो जो थोड़ी बहुत दुकान चलती है, वो भी नहीं चलेगी।

  -तो हमसे क्यों?

  -क्योंकि हम अपने हैं, और अपने कुछ नहीं कह सकते।

  -तो इस बात का फायदा उठा रहा है।

  -तो उठाने दो न। मैं चाहता भी यही हूँ।

  -क्यों?

  -क्योंकि यह तो तुम जानती ही हो कि उसकी आर्थिक हैसियत मुझसे कम है। और यह भी जानती हो कि मुझसे सीधे रूप में उसने न कभी कुछ न मांगा है, और न कभी मांगेगा। तो जो मुझसे वह थोड़े-बहुत ज्यादा दाम वसूल करके ले लेता है, उससे उसकी थोड़ी सी सहायता हो जाती है। मुझे भी तसल्ली रहती है। बाकी तो तुम जानती ही हो जो आज हाल चल रहा है रोजगार और व्यापार का। तो इस बहाने से ही सही, कुछ तो मेरा कर्तव्य निभ जाता है। ००००

      2. ऑनर किलिंग 

सभी बैठे नाश्ता कर रहे थे। अचानक बेटी हंसते हुए से बोल पड़ी, "मेरी एक फ्रेंड का बॉयफ्रेंड था। उसके पापा को पता चला, तो वह उसको मोटरसाइकिल पर बिठाकर नहर की तरफ ले गए, और मोटरसाइकिल नहर में गिरा दिया।"

"हैं? फिर...?" मैंने आश्चर्यमिश्रित एवं चिंतित स्वर में प्रश्न किया।

उसने उसी रौ में उत्तर दिया,

"बन्दी डूब के मर गयी।"

"क्या! ओह!" मेरे मुंह से निकला। 

"पुलिस ने पकड़ा नहीं?" पत्नी बोल पड़ी।

"पता नहीं मम्मी", बेटी ने कहा, "पकड़ ही लिया होगा।"

"हां, " मेरे मुंह से निकला, 'पकड़ा हो या न हो क्या फ़र्क़ पड़ता है, 'ऑनर किलिंग' में अपनी बेटी से तो हाथ धो बैठा। क्या मिला? अब पता नहीं क्या क्या परिणाम भी भुगतने पड़ें?'

बड़ी बेटी पूछ बैठी, "पापा अगर हमारा बॉयफ्रेंड होता तो क्या आप भी ऐसे ही करते?"

मैंने हंसते हुए से कहा, "उनहूँ, मैं तो कहता भई, क्यों अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हो। सोच लो, अगर बच सकते हो तो निकल लो पतली गली से।"

...कह तो दिया, पर मेरा मन तब तक उस लड़की के प्रति संवेदना और सहानुभुति से भर चुका था, जो अब जीवंत से दिवगंत हो चुकी थी। एक और बेटी ऑनर किलिंग की शिकार हो चुकी थी। ००००

           3. कुलचे

उसकी बेकरी पर एक कार आकर रुकी।

“पांच दर्जन कुलचे पैक कर दो”, आते ही कार सवार ने आदेश दिया।

“खत्म हो गए जनाब”, बेकरीवाले ने जवाब दे दिया।

“खत्म हो गए...”, कार वाले ने वैसे ही अपने आपको दोहराया।

तत्क्षण उसकी नज़र कुलचों से भरे एक थैले पर पड़ी, “वो पड़े तो हैं...?”

“बिके हुए हैं जी”, बेकरी वाले ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“जरूरी चाहिये हैं, कहीं और मिले भी नहीं हैं, ...तुम दाम ज्यादा ले लेना”, उसने मिश्रित भाव से कहा।

“नहीं जी, ये तो मैं किसी भी हालत में नहीं दे सकता, मुझे खेद है”, बेकरी वाले के कहने पर वह चला गया।

उसके जाते ही नौकर बोला, “बाबू जी, जब वह ज्यादा दाम दे ही रहा था, तो दे देते उसे।”

“नहीं ओए भोले!” बेकरी वाले ने कहा, “कुलचे वाले गुरनाम को फिर मैं क्या देता? यह कार वाला तो भरे पेट वाला है, काम चला लेगा, ...कुछ और ले लेगा। पर गुरनाम, ...उसकी तो यह रोज़ी-रोटी है। कुलचे नहीं होंगे तो वह बेचेगा क्या और कमाएगा क्या? खुद भी भूखा और बच्चे भी भूखे, ...और तो और, जो लोग उसके कुलचे खाते हैं, वे भी भूखे रह जायेंगे। ...ऐसा पैसा क्या करना है...।” ००००

            4. गड्ढा

सड़क के बीचों-बीच एक गड्ढा था, जिसे वह बहुत दिनों से देख रहा था, और जो ज्यों का त्यों था, कभी भरा नहीं गया था। पता नहीं क्यों और कैसे? न तो आने-जाने वाले और न ही स्थानीय लोग उसकी परवाह कर रहे थे, और प्रशासन भी उदासीन ही था। किसी अखबार वाले या चैनल वाले ने भी उसकी सुध नहीं ली थी। शायद उनके लिए वह कोई ‘खबर’ नहीं था, जब तक कि कोई बड़ी दुर्घटना वहां घटित नहीं हो जाती।

  कुछ दिनों से वह वहीं से गुज़र रहा था। किसी काम से रोज उसका आना-जाना हो रहा था। और जब भी वह वहाँ से गुज़रता, वह गड्ढा उसे खटकने लगता, ‘...कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है।’ 

  आखिर उससे रहा न गया, ‘इतनी जान-पहचान कब काम आएगी?’

  उसने एक प्रतिष्ठित अखबार के स्थानीय पृष्ठ पर एक विज्ञापन-नुमा खबर छपवायी। 

  उसी गड्ढे के चित्र के नीचे लिखा था—‘प्रतियोगिता- लक्ष्मी नगर की सड़क के बीचों-बीच का यह गड्ढा कितने दिनों में भरे जाने की संभावना है, बताएं? सही जवाब देने वाले को उचित इनाम दिया जाएगा।’

  ...जवाब मिलने से पहले ही वह गड्ढा भरा जा चुका था। ००००

 5.छोटे भगवान बड़े भगवान       

सुरेश अपने दस साल के पुत्र को साथ लेकर स्थानीय मंदिर में माथा टेकने के लिए गया हुआ था। वहां भगवान की मूर्ति के आगे श्रद्धा से सिर झुकाते हुए उसने दान-पात्र में बीस रुपए का एक नोट डाल दिया, जैसा कि वह अक्सर किया करता था।

  अचानक पुत्र ने सवाल किया, “पापा, जब हम कहीं बाहर घूमने जाते हैं, और वहां के मंदिरों में जा कर माथा टेकते हैं, तब वहां तो आप सौ-सौ रुपए के नोट गुल्लक में डालते हो, फिर यहाँ बीस रुपए क्यों?”

“वे सब बड़े भगवान जी हैं बेटा”, उसने प्यार से उत्तर दिया।

बच्चा मन ही मन ‘बड़े भगवान’ और ‘छोटे भगवान’ में तुलना करने लगा। ००००                                                    


   भाषा पात्रों के अनुरूप है

सभी लघुकथाएं आज की छोटी बड़ी, समस्याओं को उजागर करती हैं। पहली और तीसरी कहानी में मानवीय संवेदनाएंँ, खुलकर सामने लाई गई हैं। यह स्पष्ट रूप से न सही, पात्रों के संवादों के माध्यम से, समस्या का हल भी बताया गया है। गड्ढा कहानी में सरकार की, नगरपालिका की लापरवाही का अच्छा समाधान बताया है। ऑनर किलिंग कहानी में, लड़के लड़कियों की आज की ज्वलंत समस्या रखी है,समाधान कोई नहीं। अंतिम कहानी में बच्चे को कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया। कुलचे वाले का कहना, "ऐसा पैसा क्या करना है?" मन को अच्छा लगता है :-

१.इस बहाने से

बड़े भाई के उदार हृदय तथा छोटे का स्वाभिमान की गाथा है। बड़ा भाई, छोटे की कमजोर आर्थिक स्थिति देखकर, उसकी सहायता अनोखे तरह से करता है। बड़े को इससे कोई समस्या नहीं, बल्कि संतोष मिलता है। इस विषय पर पत्नी की आपत्ति पर, संतोषजनक उत्तर देकर वह, बड़ा भाई होने का कर्तव्य निभाता है। पिता तुल्य भाव रखता है। पत्नी ने सामान्य दुनियादारी की बातें कहीं। छोटे भाई की सहायता का बहाना, बड़े भाई को संतुष्टि दे रहा है। 

२.ऑनर किलिंग 

आज की एक बड़ी समस्या पर प्रश्न है। समाज में परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर, अपने ही किसी के प्राणों से खेलने पर प्रकाश डाला है। छोटी बेटी का जिज्ञासा, मेरी सहेली के पिता ने उसके पुरुष मित्र का पता लगता ही, उसे धोखे से मार डाला। बड़ी बेटी का प्रश्न, क्या आप हमारे साथ भी वही करते? उन्होंने कहा, मैं तो उसे सावधान करके, जीने के लिए प्रेरित करता। माँ के मन में संवेदना सहानुभूति जागी, कि अब एक और बेटी, ऑनर किलिंग का शिकार बन चुकी। 

३. कुलचे 

इस लघुकथा में कुलचे वाले का, मानवतावादी दृष्टिकोण दिखाई देता है। धनी लोग तो अपना काम कैसे भी चला लेंगे। गुरनाम नामक सामान्य कुलचे बेचने वाला, यदि वह इन कुलचों को नहीं बेच पाएगा, तो उसका परिवार क्या खाएगा? उसके ग्राहक भी निराश हो जाएंगे। इस स्वार्थी दुनिया में कुलचे वाले को देखकर लगता है, मानवता अभी भी बहुत से लोगों के हृदय में सजीव है। अधिक लाभ का लालच भी उसे डिगा नहीं पाया। उसे अपने लाभ से अधिक, गुरनाम की आमदनी करवा देना उचित लगा। 

४.गड्ढा

सड़क के बीचों-बीच हुए गड्ढे पर, स्थानीय लोगों की दृष्टि नहीं पड़ी,न ही प्रशासन की दृष्टि उस पर पड़ी। लेखक की दृष्टि वहांँ से आते-जाते समय, प्रतिदिन पड़ती थी। चैनल वाले भी उदासीन थे। बिना किसी दुर्घटना के किसी को भी, कुछ सुध नहीं आने वाली थी। अपने पहचान वाले प्रतिष्ठित अखबार के माध्यम से, इस समस्या का अद्भुत हल निकाला। आश्चर्य ,खबर छपते ही उत्तर मिलने से पूर्व ही, गड्ढा भरा जा चुका था। समाज की व्यवस्था को ऐसे भी ठीक किया जा सकता है। सभी का ध्यान आकृष्ट करने के लिए, यह तरीका अतुलनीय है। साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। 

५.छोटे भगवान बड़े भगवान 

इसमें मानव की सामान्य प्रवृत्ति की ओर संकेत है। मानो, बड़े मंदिर में बड़े भगवान रहते हों और छोटे मंदिर में छोटे भगवान। बच्चे के इस तर्कसंगत प्रश्न के उत्तर में, पिता का उत्तर ठीक नहीं लगता। हम सामान्य मानव ईश्वर के निवास में, भेदभाव कैसे कर सकते हैं? लगता है, पिता ने बच्चे की जिज्ञासा का उत्तर, बिना गंभीरता से विचार किये ही दे दिया। 

          सभी लघुकथाएं कुछ न कुछ संदेश दे रही हैं। मानवता का प्रश्न, प्रशासन की अनदेखी, लड़कियों लड़कों का सीमाओं से बाहर निकल जाना, और बिगड़ जाना। बच्चों की जिज्ञासा का उचित उत्तर न देना स्पष्ट दिखता है, सभी लघुकथाओं की विषय-वस्तु अच्छी है। भाषा पात्रों के अनुरूप है। आवश्यकता अनुसार संवादों का प्रयोग भी किया गया है। 

- उषा कंसल 

बैंगलोर - कर्नाटक 

      पांचों की लघुकथा की समीक्षा 

१- इसी बहाने से 

 आज के संदर्भ में बहुत कथा , जिसमे खुद्दारी के भाव हो वो छल कपट से जीवन नहीं जीता उसे अपनी कीमत और सामान का सही एहसास होता है वह पूरी तरह लेनदार देनदार को आंकता है आगे उसकी मर्जी पिता ने भी वही किया जो सामान्य परिश्रम उपलब्ध हो उसकी कीमत आंक सहायता करदेना बुरी बात नहीं है ! जन सामान्य में भी यही व्यवहारिकता होनी चाहिये। 

२- कुलचे  

क्या आपकी कलम चलती है अवाक हूँ  आपकी विधा जन सामान्य के लिए जीवन जीने की कला प्रेरणास्रोत है ! हर इंसान में ऐसे भाव कुलचे वाले की तरह उभरे देश दुनिया के हालात बदल जाय घूसखोरी के बजाए ईमानदारी का डंका बजे जीने की राह आसान हो जाए सोच विश्वास से पूँजी संचित व्यय की जा सकती देश समाज को सुधारे के पहले ख़ुद को सुधारना आवश्यक है तभी आप स्वस्थ मानसिकता सोच में  सहायक हो सकते है ! आभार आपका 

३- गड्ढा

 क्या बात लिखा आपने कितने शांति पूर्ण व्यावहारिक बुद्धि का उपयोग करते आपने निराकरण कर दिया ! यही इंसानियत का तक़ाज़ा शांतिपूर्ण तर्कशीलता का गंभीर मामले को सुलझाना जिसने समूह की आवश्यकता नही प्रलोभन नाम का घमंड नहीं कार्य को सुचारू रूप से चलाना  दुर्घटनाओं से आगे बच बढ़ना है !

४-आनर किलर 

बहुत ही सधा हुआ जवाब आज के परिवेश माता पिता ही सही संरक्षक होते है बिटिया का प्रश्नग़लत नही था पतली गली से निकल ले याने समय के अनुरूप सूझबुझ से समस्या का निवारण किया ! ईश्वर की मर्जी  कह छोड़ा नही , ऐसी घटनाओं में सबसे पहले  वातावरण नहीं परिजन ही दोषी होते है जो सब कुछ जानते हुए । नजर अंदाज करते अपने स्ट्रेस ले अपने स्टेट्स का ध्यान रख अनुचित कदम उठा । ग़लत राह चुनते हैं जहाँ उन्हें आगाह की आवश्यकता होती हैं  बढ़ियालिखा 

५-बड़े भगवान और छोटे भगवान 

बाल मन की जिज्ञासा सही सवाल पूछा यदि मन के अंदर खोट है तो बड़ा या छोटा प्रश्न नहीं उठना चाहिए 

मन में श्रद्धा के भाव उपजे तो एक पुष्प भी ईश्वर स्वीकारते है  ! हम बचपन से बच्चों में मन में ये भाव भरते है वही बच्चा आगे चल अंतर समझ आचरण करने लगता है ये हमारी गलती है कथा के माध्यम से आपने आँखे खोल दी वर्तमान में  सभी राम की पूजा श्रद्धा समर्पण भाव से करने लगे किसी की आत्मा आहत नही होती है!

- अनीता शरद झा 

 रायपुर - छत्तीसगढ़ 

  अपनी कल्पना और कलम

       आदरणीय पंकज शर्मा जी की प्रस्तुत लघुकथाएं  समाज और परिवार की वे अनदेखे दृश्य जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। आदरणीय पंकज जी मानो उन्हें न केवल निर्निमेष निहारा है बल्कि पात्र बनकर जिया भी है :-     

1. इस बहाने से

     पारिवारिक अच्छी लघुकथा। कथ्य भी अच्छा। 

2. आनर किलिंग

        आज के परिवेश की बेहद संजीदगी से लिखी और सधी हुई लघुकथा। अच्छा कथ्य।

3. कुलचे 

बेहतरीन लघुकथा। अच्छा संदेश। नैतिक और सिद्धांतिक दृष्टि से जागरूक करने वाली।

4. गड्ढा

  बढ़िया लघुकथा। सामाजिक समस्याओं के निराकरण के लिए अपने-अपने तरीके से पहल करना। बढ़िया संदेश।

5. छोटे भगवान बड़े भगवान

 अच्छा कथ्य। अच्छी लघुकथा। व्यंग्य का पुट लिए हुए। 

      आदरणीय पंकज की सूक्ष्म दृष्टि से आसपास की गतिविधियों और दृश्यों से  उपजे परिदृश्य हैं। जिन्हें अपनी कल्पना और कलम से लघुकथा के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

 गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     अपनी कलम चलाई 

        पंकज जी ने साहित्य को समझने का प्रयास किया है और अपनी कलम चलाई है, तो मंजिल तक अवश्य पहुँचेंगे। इतना जरूर कहूँगी कि किसी भी विधा को पहले समझ कर आगे बढ़ें तो बेहतर होगा :-

1. इस बहाने से

यह लघुकथा सकारात्मक सोच के साथ चलती है। इस कथानक में बड़े भाई के द्वारा छोटे भाई की मदद करने की मनसा का चित्रण है। पात्र दो ही हैं, यह लघुकथा के लिए आवश्यक तत्व है। लेकिन दोनों के बीच संवाद काफी लंबे हो गए हैं। इस कारण शब्दों का दोहराव हो गया है, साथ ही मूल उद्देश्य समझने में समय लग जाता है। लघुकथा के संवाद में विराम चिन्हों का प्रयोग किया जाता है न कि (-) डैश का। पत्रों का संबंध भी पता नहीं चल पाता है। भाषा साधारण है, जो जनमानस को समझ आती है।

2. ऑनर किलिंग

यह लघुकथा समाज की विसंगतियों  को दिखाने का प्रयास है। यह विषय भी महत्वपूर्ण है। लेकिन भाषा के विचार से *बेटी ने हँसते हुए कहा* इतनी बुरी खबर को कोई हँसते हुए कैसे बता सकता है? वाक्य - विन्यास पर भी ध्यान देने की जरूरत है। शीर्षक दमदार होते हुए भी अंतिम संवाद लघुकथा की गंभीरता को समाप्त कर देते हैं। उद्देश्य स्पष्ट होते हुए भी कोई ठोस परिणाम पाठक को नहीं मिलता है। 

3. कुलचे

यह रचना बहुत ही समझदार व्यक्तित्व को उजागर करता है। समाज में इसी तरह लोग एक दूसरे का ख्याल रखें तो समाज में कोई भूखा नहीं रहेगा।रचना की शुरुआत बहुत अच्छी हुई है, लेकिन अंत में अगर बेकरी वाले का जवाब संक्षिप्त होता तो रचना का मर्म उभर कर सामने आता। कुछ अनकहा छोड़ना, पाठक के लिए छोड़ना  लघुकथा का कलेवर है। शब्द आम लोगों के ही लिए गए हैं, जो अच्छी बात है। शीर्षक पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह साधारण से कुछ अलग होना चाहिए। 

4. गड्ढा

यह रचना एक जागरूक नागरिक होने पर आधारित है।लेकिन बार-बार कई दिनों का जिक्र इसे काल-दोष की श्रेणी में ला खड़ा करता है। इसमें *जान - पहचान* के वाक्य की आवश्यकता ही नहीं है। उसके बिना भी रचना पूर्ण है। कथ्य पाठक को समझ आ जाता है। यह शब्दों का कसाव खोजती है। शीर्षक सही है। सारी घटना गड्ढे से ही जुड़ी है। यह प्रशासन और उसकी कार्य-प्रणाली पर भी करारा तंज है। उसके बावजूद एक नागरिक की हैसियत से किए गए समाधान की भी तारीफ की जानी चाहिए।

5. छोटे भगवान बड़े भगवान

भगवान का फर्क एक बच्चे को समझाने का यह तरीका किसी तरह भी जायज नहीं कहा जा सकता। ईश्वर तो हर मंदिर में हैं। जब शिक्षित लोग इस तरह की बातें बच्चों को सिखाएंगे, तो उनके भविष्य का क्या हाल होगा! पात्र दो ही हैं, लेकिन शिक्षा गलत दिशा में ले जा रही है। इसका कारण इससे इतर भी हो सकता था। जैसे - *हम यहाँ  बार - बार आ सकते हैं, लेकिन वहाँ एक बार ही जा पाते हैं।* या कुछ और...। इससे अभिभावक की मानसिकता इतनी नीचे नहीं गिरती। इसका उद्देश्य पाठक तक सही अर्थ में प्रेषित नहीं होता।

- संगीता गोविल 

पटना - बिहार 

   अपने आप में सम्पूर्ण

१. “ इस बहाने से “

अपनों को सहायता करने का बहुत आसान और सही तरीक़ा काश! सभी थोड़ा इस दिशा में समझ विकसित करें और सम्पत्ति की लड़ाई में भाई-भाई में मार-काट न हो। सार्थक संदेश देती लघुकथा।

२.  “ ऑनर किलिंग “ 

अस्पष्ट सी लगी लघुकथा ।क्रोध का अतिरेक, समाज में प्रतिष्ठा का प्रश्न ही ऑनर किलिंग की ओर धकेलता है।जो नहीं होना चाहिए।  कभी अपने बेटे-बेटी को मार देते हैं। कभी दूसरे की हत्या कर देते हैं। परिणाम तो दोनों परिवार का नुकसान ही है। 

३. “ कुलचे “

वाह !!! यह हुई न मानवता की बात ! जिन्हें ज़्यादा ज़रूरत है उनकी फ़िक्र ज़रूरी है। बेहतरीन लघुकथा।

 ४. “ गड्ढा “

बहुत रोचक तरीक़ा काम करवाने का। बहुत रोचक लघुकथा 

५.  “ छोटे भगवान बड़े भगवान “

दान भी मंदिर के आकार-प्रकार और महत्व को देख कर देता है इंसान। इंसान की मानसिकता का बहुत ही सटीक परिचय देती लघुकथा।

        पांचों लघुकथाएँ अपने आप में सम्पूर्ण और संदेश देती। सरल शब्दों में सार्थक संदेश देती। 

- डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘ 

         अमेरिका

सीधे संवाद करती प्रतीत होती 

         पंकज शर्मा जी की पाँचों लघुकथाएँ पढ़कर यह अनुभव होता है कि लेखक की दृष्टि जीवन के बहुत सामान्य प्रसंगों में छिपी असामान्य मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विसंगतियों और विडंबनाओं को पकड़ने में सक्षम है:-

1.इस बहाने से

लघुकथा में छोटा भाई अपने बड़े भाई से सामान का पूरा दाम लेता है, जबकि बड़ा भाई यह बात जानता है। पत्नी इसे अनुचित मानती है, लेकिन पति के भीतर की सोच कहानी को एक ऊँचाई प्रदान करती है।=वह कहता है कि छोटा भाई सीधे सहायता नहीं माँगेगा, इसलिए यदि वह सामान के बहाने कुछ अधिक पैसे ले लेता है तो उसे आर्थिक सहायता मिल जाती है और उसका आत्मसम्मान भी बचा रहता है। यही कहानी का मूल सौंदर्य है। ‘इस बहाने से’ केवल आर्थिक सहायता की लघुकथा नहीं बल्कि उस सहायता की कहानी है जिसमें देने वाला सामने वाले की गरिमा को चोट नहीं पहुँचाता। कहानी यह संदेश देती है कि सच्ची सहायता वही है जिसमें सहायता पाने वाले को एहसान का बोझ महसूस न हो।

2.ऑनर किलिंग

‘ऑनर किलिंग’ एक गंभीर सामाजिक विषय पर आधारित लघुकथा है। शीर्षक ही पाठक को सोचने के लिए बाध्य करता है कि हत्या को ‘ऑनर’ अर्थात सम्मान से कैसे जोड़ा जा सकता है? लघुकथा में पिता और बेटियों के बीच का संवाद सहज है, लेकिन उसी सहजता में एक गहरी सामाजिक त्रासदी छिपी हुई है। पिता का यह कहना कि वह ऐसी स्थिति में बच्चों को अपनी जिंदगी बर्बाद न करने की सलाह देगा, कथानक को एक मानवीय मोड़ देता है। अंत में लेखक की संवेदना उस मृत लड़की के साथ जुड़ जाती है और ‘ऑनर किलिंग’ की क्रूरता पाठक के सामने उभर आती है।यह लघुकथा बताती है कि सम्मान के नाम पर हत्या करने वाला व्यक्ति वास्तव में सम्मान नहीं, बल्कि अपराध और अमानवीयता को जन्म देता है।

3.कुलचे

‘कुलचे’ अत्यंत प्रभावशाली और मार्मिक लघुकथा है। कहानी का केंद्र एक बेकरीवाला है जिसके पास कुलचे खरीदने के लिए एक सम्पन्न व्यक्ति आता है। वह अधिक पैसे देने को तैयार है लेकिन बेकरीवाला वे कुलचे देने से मना कर देता है क्योंकि वे एक गरीब कुलचे-विक्रेता गुरनाम के लिए खरीदे गए हैं। लघुकथा का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि बेकरीवाला धन और आवश्यकता के बीच अंतर समझता है। सम्पन्न व्यक्ति कुछ और खा सकता है लेकिन गरीब विक्रेता के लिए वही कुलचे उसकी आजीविका हैं। यहाँ लेखक ने बहुत सुंदर ढंग से यह प्रश्न उठाया है कि क्या हर वस्तु केवल अधिक कीमत देने वाले की हो जानी चाहिए? लघुकथा का अंतिम कथन—‘ऐसा पैसा क्या करना है’ पूरी कथा का नैतिक सार बन जाता है। यह लघुकथा बाजारवाद के बीच बची हुई मानवीयता की सुंदर मिसाल है।

4. गड्ढा

‘गड्ढा’ एक व्यंग्यप्रधान लघुकथा है। सड़क का गड्ढा लंबे समय से प्रशासन, जनता और मीडिया—सभी की उपेक्षा का शिकार है। कोई दुर्घटना होने से पहले उसे ‘खबर’ नहीं माना जाता।लेखक का पात्र एक अनोखा उपाय करता है। वह गड्ढे को लेकर प्रतियोगिता की घोषणा करवा देता है और पूछता है कि यह गड्ढा कितने दिनों में भरेगा। परिणाम यह होता है कि प्रतियोगिता का उत्तर आने से पहले ही गड्ढा भर दिया जाता है।लघुकथा का अंत व्यंग्य की धार को तीखा कर देता है। यह हमारे उस तंत्र पर कटाक्ष है जो समस्या के समाधान से अधिक प्रचार और सार्वजनिक छवि से प्रभावित होता है। लघुकथा का कथ्य बहुत अच्छा है। इसमें व्यंग्य के साथ यह संकेत भी है कि कभी-कभी व्यवस्था को जगाने के लिए समस्या को ऐसे रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है जिस पर उसकी नजर अनिवार्य रूप से जाए।

5. छोटे भगवान बड़े भगवान

यह लघुकथा आकार में छोटी है लेकिन अपने भीतर एक बड़ा प्रश्न समेटे हुए है। पिता स्थानीय मंदिर में बीस रुपये चढ़ाते हैं, जबकि बाहर के मंदिरों में सौ-सौ रुपये। बच्चे के प्रश्न पर पिता का उत्तर—‘वे सब बड़े भगवान जी हैं बेटा’,कहानी को एक तीखा व्यंग्यात्मक मोड़ देता है। बच्चे का मन ‘बड़े भगवान’ और ‘छोटे भगवान’ की तुलना करने लगता है। यही बालमन की सहज जिज्ञासा समाज के धार्मिक व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।लघुकथा का अंत पाठक को मुस्कराने के साथ-साथ सोचने पर विवश करता है। क्या भगवान भी स्थान, प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा के आधार पर ‘बड़े’ और ‘छोटे’ हो गए हैं? लेखक ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया बल्कि उसे पाठक के मन में छोड़ दिया है और यही इसकी सफलता है।

         लेखक की दृष्टि मानवीय है और उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना स्पष्ट दिखाई देती है।भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और बोलचाल के निकट है, जिससे कथाएँ पाठक से सीधे संवाद करती प्रतीत होती हैं।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

  पांचों लघुकथा की समीक्षा 

1. इस बहाने से —

यह लघुकथा रिश्तों में निहित त्याग, संवेदना और आत्मीय सहयोग को बहुत सहज ढंग से प्रस्तुत करती है। बड़े भाई का अपने छोटे भाई की आर्थिक सहायता करने का तरीका कहानी को मार्मिक बना देता है। अंत में आया भाव कथा का प्रभाव कई गुना बढ़ा देता है और पाठक को रिश्तों का वास्तविक अर्थ समझने पर विवश करता है।

2. ऑनर किलिंग — 

यह लघुकथा 'ऑनर किलिंग' जैसी अमानवीय सामाजिक कुरीति पर तीखा प्रहार करती है। पारिवारिक संवाद के माध्यम से लेखक ने गंभीर विषय को सहजता से प्रस्तुत किया है। अंतिम पंक्तियाँ पाठक के मन में करुणा और संवेदना जगाती हैं तथा बेटियों के जीवन और सम्मान के पक्ष में सशक्त संदेश देती हैं।

3. कुलचे —

यह लघुकथा मानवीय संवेदनाओं और व्यापारिक नैतिकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। बेकरी वाले का निर्णय बताता है कि सच्चा व्यापार केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि दूसरे की आजीविका की रक्षा करना भी है। छोटी-सी घटना के माध्यम से लेखक ने बड़े मानवीय मूल्य को प्रभावशाली ढंग से स्थापित किया है।

4. गड्ढा — 

यह व्यंग्यात्मक लघुकथा प्रशासनिक उदासीनता और मीडिया की कार्यप्रणाली पर सार्थक कटाक्ष करती है। लेखक ने अनोखी युक्ति के माध्यम से समस्या के समाधान का रोचक चित्र प्रस्तुत किया है। कथा संक्षिप्त होते हुए भी व्यवस्था पर प्रभावी प्रश्नचिह्न लगाती है और पाठक को मुस्कराने के साथ सोचने पर भी मजबूर करती है।

5. छोटे भगवान, बड़े भगवान — 

यह लघुकथा बालमन की सहज जिज्ञासा के माध्यम से आस्था में व्याप्त व्यवहारिक भेदभाव को उजागर करती है। बच्चे का सरल प्रश्न बड़े लोगों की मानसिकता पर गहरा व्यंग्य करता है। कम शब्दों में गहरी बात कहने की दृष्टि से यह एक प्रभावशाली और विचारोत्तेजक लघुकथा है।

- अलका पाण्डेय

 मुम्बई - महाराष्ट्र 

मानवीय संवेदना से ओतप्रोत 

      पंकज शर्मा की सभी लघु कथाएं मानवीय संवेदना से ओतप्रोत है। समाज में जिंदा रह रही इंसानियत उनकी हर लघु कथा में दिखती है :-

'इसी बहाने से '

लघु कथा में भाई के प्रति  प्यार और आशीर्वाद दिखाई पड़ता है। जहां आज के समय में भाई-भाई का दुश्मन बन रहा है भाई के प्यार को दिखाते अच्छी लघु कथा है।

 

'ऑनर किलिंग' 

बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। हालांकि इस तरह  के संवाद घर में बहुत कम होते है।  लेकिन इस तरह की जितनी भी घटनाएं होती हैं हमें बहुत लंबे समय तक विचलित करती हैं। सहानुभूति और संवेदनाएं  पीड़ित के साथ रहती है ।

'कुलचे' 

 मानवीय संवेदनाओं की प्रकाष्ठा को  प्रकट करता है । जहां  लोग पैसे के पीछे अपना ईमान बेच रहे हैं उसका यह कहना  कि आमिर के पास बहुत से विकल्प होते हैं लेकिन गरीब को तो कुलचे बेच  कर ही पेट भरना है ।

'गड्ढा'

आजकल सड़कों पर सड़के कम और गड्ढे ज्यादा है और इन  गड्ढों का सरकार को तभी पता चलता है जब कोई बहुत बड़ी दुर्घटना हो जाती है तो  सिर्फ दो मिनट का मैं  या संवेदना प्रकट करके चुप हो जाते हैं । उस पर कोई कार्यवाही न आम लोग करते हैं और ना ही सरकार करती हैं । बहुत बढ़िया सुझाव भी दिया है उन्होंने लघु कथा के माध्यम से।

'छोटे भगवान बड़े भगवान' 

हम सब ने भगवान की परिभाषा अपनी सुविधा और सोच के अनुसार गढ़ ली है धर्म के प्रति आस्था न रहकर सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा को निहित मान लिया है

   -   डॉ. नीलम नारंग नील 

         मोहाली - पंजाब 

   शिक्षाप्रद संदेश निहित

          भारतीय लघुकथा विकास मंच, हिंदी भवन, जैमिनी अकादमी पानीपत, हरियाणा की ओर से श्री पंकज शर्मा की पांच लघुकथाएँ पढ़ी। पाँचों लघुकथाओं में शिक्षाप्रद संदेश निहित है :-

 'इस बहाने से' 

एक भाई धन के मामले में थोड़ा गरीब है वह दुकान चलाता है। बड़ा भाई अमीर है। वह छोटे भाई की दुकान से सामान खरीदता है और पैसे देकर आ जाता है। पत्नी कहती है कि आपके भाई ने तो दूसरों से भी ज्यादा दाम लिए हैं फिर भी आप उसी से लेते हैं, ऐसा क्यों। पति ने कहा मेरा भाई स्वाभिमानी है वह मुझसे पैसे नहीं मांगेगा लेकिन मैं उससे मंहगे दाम में सामान लेकर उसकी मदद करना चाहता हूँ। ये होता  है भाई का आत्मिक प्रेम। ‌वह जताता भी नहीं है और छोटे भाई का स्वाभिमान भी बनाए रखता है। बहुत शानदार लघुकथा है             

 'ऑनर किलिंग'

 ये लघुकथा समाज में फैली ऐसी बुराई जिसको समाज के ठेकेदार बुरा नहीं मानते। लघुकथा के अनुसार बेटी पिता को बताती है कि मेरी सहेली का बाॅयफ्रेंड था। उसके पापा को पता चला तो उसे मोटरसाइकिल समेत नहर में गिरा दिया। बेटी ने कहा पापा अगर मेरा बाॅयफ्रेंड होता तो आप मुझे भी मार देते क्या? पिता भी सोचते हैं कि लड़की से हाथ धो बैठे और उस लड़की के प्रति संवेदना मन में भर गई। बहुत उम्दा संदेश दिया गया है ।           

 'कुलचे'

 इस लघुकथा में भी मुख्य पात्र बेकरी का काम करता है। वह भी गरीबों का हमदर्द है। एक अमीर कार वाले को कुलचे न देकर एक छोटे दुकानदार को देने के लिए बचा है। पूछने पर कहता है कि इस अमीर को क्या फर्क पड़ता है और कहीं से खरीद लेगा लेकिन गुरनाम के बच्चे और ग्राहक भूखे मर जाएँगे क्योंकि वह गुरनाम को सस्ते दाम पर  देता था। अगर वह चाहता तो कुलचे दुगनी कीमत पर बेच सकता था। उसमें संवेदना है, सहानभूति है। अतः कुलचे लघुकथा बेहतरीन कथानक के साथ संदेश प्रद भी है।

' गड्डा '

वह किसी काम से प्रतिदिन उस सड़क से गुजरता था। उस सड़क के बीचोंबीच एक बड़ा सा गढ़ा था जिसके कारण कोई भी दुर्घटना हो सकती थी। कई दिन बाद भी किसी ने सुध नहीं ली तभी उसे युक्ति समझ आई। विज्ञापन निकलवा दिया कि प्रतियोगिता है जो भी सबसे पहले उक्त गढ़े को भरेगा उसे ईनाम दिया जाएगा। उससे पहले गढ़ा भरा जा चुका था। ये लघुकथा यही संकेत देती है कि ईनाम के लालच में जल्दी काम होता है। वरना कोई ध्यान नहीं देता  है। 

' छोटे भगवान बड़े भगवान '

इस लघुकथा में सुरेश नामक व्यक्ति मंदिर जाता है तब उसका 10 साल का बेटा भी साथ था। मंदिर मे सुरेश ने20 रूपये चढ़ाये। बेटा बोला उन बड़े मंदिर में आप 100 रुपये चढ़ाते है यहाँ 20 रूपये ऐसा क्यों?  तब सुरेश ने कुछ न सूझ कर कह दिया वे बड़े भगवान हैं और ये छोटे भगवान् जी। बेटा दोनों में अंतर करने लगा। 

           पाँचों लघुकथाओं में बेहतरीन संदेश समाहित हैं। विचारणीय है । मामूली लगने वाली बातों में भी अच्छी लघुकथा बनती है ये कलम सिद्धहस्तता है। सभी लघुकथा पठनीय, सरल, सुबोध भाषा में लिखी गई है। लेखक पंकज शर्मा जी को बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ। आपका भी बहुत आभार आदरणीय बीजेंद्र जैमिनी जी। आपके मंच से बेहतरीन लघुकथाएँ पढ़ने को मिली। 

- डॉ. कृष्णा जैमिनी

गुरुग्राम - हरियाणा 

पंकज शर्मा की लघुकथाओं की समीक्षा 


इस बहाने से

जैसा कि हम देखते हैं ऑनलाइन सामान उपलब्ध होने के कारण से सभी व्यापारियों के हालात अच्छे नहीं हैं  पंकज शर्मा जी की लघुकथा कथानक की दृष्टि से उत्तम लघु कथा बन पाई है। भाषा सहज और सरल है। इस लघु कथा में एक ओर बेचने वाले की चालाकी ज्यादा दाम लेना और दूसरी ओर लेखक की समझ और संवेदनशीलता मन को छू रही है।

ऑनर किलिंग 

सच्चाई को तो छू रही है लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि ऐसी लघु कथाएं कई बार उलझनें बढ़ा देती हैं।

कुलचे

वाह! बहुत खूब लिखा पंकज जी!अति उत्तम लघुकथा   सोच, विचार, भाव, भाषा शैली, संवाद, संवेदना, प्रेरणादायक !!!

गड्डा

 हा- हा -हा गड्ढा कथानक की दृष्टि से अच्छी- सच्ची- सुच्ची- ऊंची सोच की लघुकथा! समाज सुधार का अति उत्तम तरीका।

छोटे भगवान बड़े भगवान

बच्चे जो कुछ भी देखते हैं अक्सर अनेक सवाल करते हैं फिर भी । बच्चों को धर्म समाज के लिए कुछ अर्पित करने की व झुककर रहने की भावना सिखाती हुई लघुकथा।

- डॉ संतोष गर्ग 'तोष' 

पंचकूला -  हरियाणा

Comments

  1. 👆 हार्दिक आभार बिजेन्द्र जी। आपने तो अच्छी खासी समीक्षा करवा दी। अच्छा लगा।
    समयाभाव के कारण बहुत ही कम, बल्कि न के बराबर ही लिख-पढ़ पा रहा हूँ, अत: सक्रिय भी नहीं हूँ।
    परंतु आपके प्रयास सकून भी देते हैं और प्रेरणा भी।
    पुनः हार्दिक आभार।
    🙏🙂👏👍❤️
    - पंकज शर्मा
    अम्बाला शहर - हरियाणा
    (WhatsApp से साभार)

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