दुनिया बहुत बड़ी है परन्तु जिंदगी बहुत छोटी है। फिर भी लोग एक-दूसरे से छुपते फिरते रहते हैं। कुछ लोग मिलने का कोई ना बहाने तैयार कर लेते हैं। यही जिंदादिली जिंदगी है। इसे ज़ीना आना चाहिए। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है।अब आयें विचारों में से कुछ को पेश करते हैं:- कौन-कौन मिलता है अपनों से किसी न किसी बहाने से—यह प्रश्न अपने भीतर पूरे जीवन का दर्शन छिपाए है। नवम्बर की सर्दियों में जब हवा हल्की-हल्की चुभन लिए बहती है, तो मन भी गर्माहट की तलाश में अपनों की ओर खिंच जाता है। कभी त्योहार का बहाना, कभी किसी का जन्मदिन, तो कभी बस यूँ ही चाय की प्याली पर यादों का हवाला—इन्हीं बहानों के सहारे रिश्ते फिर से जीवंत हो उठते हैं। कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जो बरसों बाद सामने आकर भी अपनेपन की वही पहली-सी चमक लौटा लाते हैं। अपनों से मिलना दरअसल जीवन की उस ऊष्मा का संग है, जो ठंडी हवाओं में भी दिल को सुकून देती है, मानो रिश्ते ही मन का असली कंबल हों। ऐसे मिलन मनुष्य को यह एहसास कराते हैं कि दुनिया चाहे कितनी भी व्यस्त क्यों न हो जाए, अपनापन ...