सरोजिनी नायडू स्मृति सम्मान - 2026

         आलस्य किसी बड़ी बीमारी से कम नहीं है। जो दरिद्रता को जन्म देता है। जिसे गरीबी कहते हैं। हमेशा आलस्य से बचना चाहिए। तभी जीवन में तरक्की आतीं है। तरक्की के लिए परिश्रम यानी कर्म आवश्यक होता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
     आलस्य दरिद्रता की कुंजी है यह बात बिल्कुल सत्य है। जहाँ आलस्य है वहाँ कर्म के प्रति निष्क्रियता है। श्रम ही नहीं है तो सफलता कहाँ मिलेगी। दुर्भाग्य का विस्तार होगा।धन के बिना गरीबी का साया पड़ेगा। अतः आलस्य मानव का सबसे बड़ा दुश्मन है। आलसी व्यक्ति के लिए समय का कोई महत्व नहीं। महात्मा बुद्ध ने भी यही कहा है कि आलसी व्यक्ति कभी आत्मविकास के बारे में नहीं सोच सकता। ऐसा व्यक्ति समाज, समुदाय और राष्ट्र के लिए कभी भी हितकारी नहीं माना जा सकता है। जीवन में उन्नति की राह पर अग्रसर होने के लिए आलस्य का त्याग अति अनिवार्य है। इसके अलावा हमारे कर्मों में ही भाग्य का निवास होता है। वर्तमान में अच्छे कर्म,पुरूषार्थ से  हम अपना भाग्य ,सौभाग्य  प्राप्त कर सकते हैं। पिछले कर्म हमारे प्रारब्ध में हमें प्राप्त होता है और वर्तमान में जैसे कर्म करेंगे वैसा ही फल मिलता है। 

- शीला सिंह

बिलासपुर ‌- हिमाचल प्रदेश 

      आलस्य में दरिद्रता का वास और कर्म में भाग्य का निवास होता है। यह जीवन के शाश्वत सत्य का अत्यंत प्रभावशाली उद्घोष है। क्योंकि ये मात्र नैतिक शिक्षा नहीं बल्कि कर्मप्रधान भारतीय दर्शन का सार प्रस्तुत करती हैं, जैसा कि भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कर्म को ही मनुष्य का अधिकार और धर्म बताया गया है। चूंकि आलस्य केवल शारीरिक निष्क्रियता नहीं है बल्कि मानसिक जड़ता है, जो व्यक्ति की प्रतिभा, आत्मविश्वास और अवसरों को नष्ट कर उसे विचारों और साधनों दोनों से दरिद्र बना देती है, जबकि कर्मशीलता मनुष्य को आत्मनिर्भर, आत्मसम्मानी और भाग्यनिर्माता बनाती है। इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने परिश्रम को साधना बनाया, उन्होंने परिस्थितियों को बदला है। वह व्यक्तित्व चाहे युवाओं को जाग्रत करने वाले स्वामी विवेकानंद हों या साधारण पृष्ठभूमि से उठकर राष्ट्र के सर्वोच्च पद तक पहुँचे डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम हों? इन सबका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि भाग्य कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं बल्कि निरंतर कर्म का प्रतिफल है। उल्लेखनीय है कि यह द्विपंक्ति भी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणा का दीप है। क्योंकि जब व्यक्ति कर्मशील होता है तो समाज सशक्त होता है और जब समाज कर्मयोगी बनता है तो राष्ट्र समृद्ध और गौरवशाली बनता है। कहने का अभिप्राय यह है कि "भाग्य" कदापि आकाश से नहीं उतरता है बल्कि वह कड़े परिश्रम, दृढ़ संकल्प और सतत प्रयत्न की अग्नि में तपकर ही निर्मित होता है और प्रमाणित करता है कि दरिद्रता का समूल नाश मात्र कर्म ही करता है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

          यह उक्ति मानव जीवन के मूल सत्य को अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। यह बताती है कि व्यक्ति का उत्थान या पतन किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि उसके अपने कर्म और स्वभाव से निर्धारित होता है। आलस्य और कर्म—ये दो ऐसे मार्ग हैं जो जीवन की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित करते हैं। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह व्यक्ति की क्षमता, प्रतिभा और अवसरों को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति आलसी होता है, वह अपने कर्तव्यों को टालता रहता है और समय का सदुपयोग नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप उसके जीवन में अभाव, असफलता और दरिद्रता का प्रवेश हो जाता है।आलस्य केवल आर्थिक दरिद्रता ही नहीं लाता, बल्कि मानसिक और नैतिक दरिद्रता भी उत्पन्न करता है। आलसी व्यक्ति आत्मविश्वास खो देता है और दूसरों पर निर्भर रहने लगता है। कबीरदास जी ने भी कहा है—

“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।“

यह दोहा हमें आलस्य त्यागकर कर्म करने की प्रेरणा देता है।इसके विपरीत, कर्मशील व्यक्ति अपने जीवन का निर्माता स्वयं होता है। कर्म ही वह साधन है जिससे व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है। कर्म करने वाला व्यक्ति चुनौतियों से नहीं घबराता, बल्कि उन्हें अवसर में बदल देता है। भाग्य भी उसी का साथ देता है जो कर्म करता है। निष्क्रिय व्यक्ति भाग्य को दोष देता है, जबकि कर्मशील व्यक्ति अपने कर्मों से भाग्य का निर्माण करता है। भगवद्गीता में भी कहा गया है—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता में नहीं। इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने कर्म को अपना धर्म माना, वे ही महान बने। चाहे वैज्ञानिक हों, साहित्यकार हों या राष्ट्रनायक—सभी ने कठोर परिश्रम और कर्म के बल पर ही सफलता प्राप्त की। कर्म व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है, आत्मविश्वास देता है और जीवन में सम्मान दिलाता है। अतः स्पष्ट है कि आलस्य दरिद्रता और पतन का कारण है, जबकि कर्म सफलता और समृद्धि का आधार है। भाग्य उन्हीं का साथ देता है जो कर्म करते हैं। इसलिए हमें आलस्य त्यागकर कर्म को अपनाना चाहिए, क्योंकि—

कर्म ही जीवन का सच्चा आधार है, 

और कर्मशील व्यक्ति ही सच्चा भाग्य निर्माता होता है।”

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

     आलस्य में दरिद्रता का वास होता है और कर्म में भाग्य का निवास होता है. ये बात जग जाहिर है. आलस्य में रहने पर कोई काम समय पर नहीं होता है या होता ही नहीं है. जब कोई कर्म ही नहीं होगा तो फल कहाँ से मिलेगा. जब कोई फल नहीं मिलेगा वहां तो दरिद्रता का निवास होगा ही. जो कर्म करेंगे वो धन उपार्जन करेंगे. तो दरिद्रता वहाँ कैसे आ पायेगी. आलसी व्यक्ति को कुछ नहीं मिलने वाला. क्योंकि कर्म में ही भाग्य का निवास होता है. हम कर्म करेंगे तभी कुछ प्राप्ति होगी. जिससे हमारा भाग्य बनेगा. 

- दिनेश चन्द्र प्रसाद " दीनेश "

कलकत्ता - प. बंगाल 

          आलस्य करना अर्थात जीवन जीने के लिए श्रम , संघर्ष , प्रयास , कोशिश से दूर भागना !! आलस्य के चलते व्यक्ति अपने भाग्य को कोसते हैं , व मेहनत से कोसों दूर भागती है ! आलस्य के कारण आवश्यक कर्म नहीं करते , व अपनी दरिद्रता को दरिद्रता ही रहने देते हैं ! कई बार आलस्य के कारण , व्यक्ति धन धान्य, संपत्ति आदि , सब खो देता है ! जो कर्म करता है , मेहनत करता है व यथासंभव प्रयास करता है , वो अपने भाग्य को सुधारता भी है , व अपने भाग्य का निर्माण भी स्वयं करता है ! अतः सफल जीवन जीने के लिए  आवश्यक कर्म करने चाहिए , जिस से हमारा भाग्य संवरेगा !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

      भारतीय वांग्मय में कहा गया है -

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।

अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतः सुखम् ।। 

अर्थात आलसी व्यक्ति को विद्या (ज्ञान) नहीं मिलती, और जो विद्या नहीं रखता उसे धन नहीं मिलता। जिसके पास धन नहीं है, उसके मित्र नहीं होते और जिसके मित्र नहीं होते, उसे सुख नहीं मिलता।यह है आलस्य का परिणाम।जबकि कर्म के संबंध में कहा गया है -

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ इसका अर्थ है कि आपका अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं; कर्मफल की इच्छा को अपना कारण मत बनाओ, और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।इस संबंध में स्पष्ट सिद्धांत है - अवश्यमेव भोक्तव्यं शुभाशुभकर्मफलम्। इसलिए भाग्य , हमारे कर्मों का ही परिणाम होता है।यह जरुरी है कि सुखद भविष्य के लिए सुकर्म करते हुए आलस्य को त्यागना बहुत जरूरी है ‌

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     आलसी व्यक्ति कर्म नहीं करता और भाग्य को दोष देता है। इसलिए उसमें दरिद्रता का वास होता है। संस्कृत में एक सूक्ति है "आलस्यं हि मनुष्याणाम शरीरस्थो महारिपु:"अर्थात मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका आलस्य होता है। कोई भी कर्म यदि सकारात्मक भाव लेकर किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है और भाग्य निर्मित होता है। इसीलिए कहा जाता है कि कर्म में भाग्य का निवास होता है। इसलिए आलस्य छोड़कर सभी अपना कर्म पथ निर्धारित करें। तभी उत्तम जीवन सुलभ हो पाएगा अर्थात भाग्य निर्माण होगा।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

 नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

         देखा जाए आलस्य और दरिद्रता में गहरा संबंध  है क्योंकि आलस्य व्यक्ति की प्रगति को रोकता है जिससे व्यक्ति दरिद्रता और अभाव का जीवन जीने को मजबूर हो जाता है, यह एक ऐसा रोग हेै जो मानसिक व शारीरिक कमजोरी पैदा करके व्यक्ति को अवसर से भी वंचित कर असफल बना देता है तो आईये आज की चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि आलस्य में दरिद्रता का वास होता है और कर्म में भाग्य का निवास होता है,  मेरा तर्क है कि आलसी व्यक्ति न केवल खुद परेशान रहता है बल्कि आज नहीं कल करूँगा कहकर समय बर्वाद करता रहता है जिससे महत्वपूर्ण समय व अवसर हाथ से निकल जाते हैं और सिवाय दरिद्रता के कुछ भी हाथ नहीं आता दुसरी तरफ अगर हम अपने कर्म व कार्य  नियमपूर्वक करते हैं तो हम अपने भाग्य को बदल सकते हैं क्योंकि कर्म ही व्यक्ति के भाग्य और जीवन का निर्माण करते हैं और सच्चे मन से किए गए प्रयासों में ही भाग्य का निवास होता है क्योंकि वर्तमान में किए गए अच्छे बुरे कर्म ही भविष्य का भाग्य निधार्रित करते हैं,  देखा जाए भाग्य एक अवसर है और कर्म उसकी वास्तविकता भाग्य हमें अवसर प्रदान करता है लेकिन उन अवसरों को सफलता में परिवर्तन कर्म करते  इसलिए जितने उच्चकोटि के हमारे कर्म होंगे इतना ही उज्जवल हमारा भाग्य होगा इसलिए कर्म में ही भाग्य का निवास होता है,  आखिरकार यही कहुंगा कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो सफलता, स्वास्थ्य और आत्म कल्याण  में बाधा डालता है इसके अतिरिक्त कर्म जीवन का आधार है जो व्यक्ति को उर्जा, सफलता और सम्मान प्रदान करता है लेकिन आलस्य जीवन के कीमती क्षणों को नष्ट कर देता है और शरीर को अंदर से खोखला कर देता है और विकास को रोक देता है जिससे व्यक्ति  के हाथ में असफलता और निराशा ही लगती है,  इसीलिए गीता में निष्काम कर्म को ही श्रेष्ठ माना गया है और कर्म को ही आलस्य का एक मात्र इलाज बताया गया है जो जीवन को सार्थकता देता है तथा अनुशासित और निरंतर प्रयास ही व्यक्तिगत और व्यावसायिक सफलता की कुंजी है जबकि आलस्य में दरिद्रता का वास निश्चित है जिसको कर्मों द्वारा ही दूर किया जा सकता है इसलिए कर्म और दरिद्रता का  गहरा संबंध है वास्तव में हमारे वर्तमान कर्म ही हमारी आर्थिक स्थिति तय करते हैं न की केवल भाग्य, दरिद्रता  अक्सर आलस्य या स्वार्थी कर्मों का परिणाम है जिन्हें दृढ़ निश्चय, मेहनत, दान और अच्छी आदतों से दूर किया जा सकता है इसलिए आलस्य को  कभी भी अपने पास पनपने नहीं देना चाहिए और कर्म से दूर नहीं भागना चाहिए ताकि हम शूरवीरों की भांति जीवन भयभीत कर सकें और एक होनहार व्यक्ति कहलायें। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू -  जम्मू व कश्मीर

        यह कथन पूर्णता सत्य है कि आलस्य में दरिद्रता का वास होता है जब हम किसी कार्य को करने में आलस्य करेंगे तो  फिर जीवन जगत के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं कर पाएंगे जैसा कि कहा भी गया है" पराधीन सपने सुख नाहि कर्महीन कछु पावत नाहि। " यह अनुभव की बातें हैं जो आलसी व्यक्ति के संदर्भ में कसौटी पर खरी उतरती हैं क्योंकि "आलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम। अधनस्य  कुतो मित्र।" अर्थात आलसी व्यक्ति कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाता है फिर जब कर्म ही नहीं करेगा तो भाग्य का निर्माण भी नहीं होगा, हर जन्म में वह अपने प्रारब्ध को भोगेगा, क्योंकि कहा भी गया है---  "सकल पदारथ है जग माहि। कर्महीन कछु पावत नाहिं।" धन-धान्य से संपन्न राजा बनाने में कर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और ठीक इसके विपरीत आलसी व्यक्ति को आजीवन गरीब रंक दीन हीन ही रहना पड़ता है ।

- डाॅ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     जीवन में जिसने आलस्य किया और वह तरीके से गया, आलस्य दिमक की तरह अपने शरीर को आलसी बना देती है, खा जाती है। आलस्य में दरिद्रता का वास होता है, कर्म में भाग्य का निवास होता है। वर्तमान परिदृश्य में यही चल रहा है। वास्तविक रूप में आलस्य से दरिद्रता वास करती है और जैसा कर्म करेगा, वैसा फल प्राप्त होता है.....

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

       बालाघाट - मध्यप्रदेश

        जहाँ आलस होगा वहाँ कर्म नहीं होगा। जहाँ कर्म नहीं होगा वहाँ कर्म कैसे बनेगा और भाग्य कैसे बनेगा व बदलेगा। बिना उन्नति, बिना बदलाव के केवल प्रारब्ध रह जाएगा वह भी अवनति की ओर अग्रसर होता हुआ। कर्म नहीं तो सौभाग्य नहीं, सौभाग्य नहीं तो आलस और दरिद्रता का वास तो रहेगा ही। परिश्रम से हम न केवल अपना कर्म, भाग्य और किस्मत बदल सकते हैं अपितु प्रारब्ध  भी बदल सकते हैं। आलस्य हमारे जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। जब हम हर समय शत्रु से घिरे रहेंगे तो उन्नति कैसे कर पाएंगे। ऐसे में मानव और पशु के जीवन में क्या अंतर रह जाएगा?

 - रेनू चौहान 

नई दिल्ली

          परिश्रम, हमारा सबसे बड़ा मित्र और आलस्य हमारा सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। शत्रु, इसलिए कि वह हमारे प्रगति के सभी रास्ते बंद कर  देता है। स्पष्ट भी है कि आलस्य के रहते हम कुछ कर नहीं पाते, सिवाय बेकार में समय गंवाने के। कोई भी अभिलाषा पूरी करने के लिए ,  उससे संबंधित कार्य किया जाना आवश्यक होता है, जब वह कार्य पूरा होता है तब उसमें किये गए परिश्रम के अनुरूप उसके परिणाम मिलते हैं। लेकिन आलस्य में तो कोई कार्य  उद्देश्य के साथ किया ही नहीं जाता। तब परिणाम में असफलता ही मिलती है। इससे जो उन्नति होना थी वह नहीं हो पाती बल्कि धीरे-धीरे जो होती है वह खत्म होने लगती है। यही दरिद्रता का देवतक होती है। या यूँ माने यही दरिद्रता है। जबकि कर्म करने से ,उस कर्म में किये गये परिश्रम से परिणाम मिलता है। कर्म के लिए किये गए परिश्रम में अप्रत्यक्ष रूप से भाग्य का स्वरूप भी निहित होता है।  कर्म में जितनी गुणवत्ता होगी, भाग्य उतना ही प्रखर होगा और परिणाम यानी उन्नति यानी समृद्धि भी उसी अनुरूप में होगी। संक्षिप्त में कहा जा सकता है कि कर्म में भाग्य का निवास और आलस्य में दरिद्रता का वास होता है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " आलस्य और कर्म एक दूसरे के विपरीत मानें जातें हैं। कर्म से भाग्य बनते हैं भाग्य में आलस्य नहीं होना चाहिए। आलस्य से ज़िन्दगी की तरक्की रुक जाती है। बाकि तो कर्म का खेल है। जैसा कर्म होगा वैसा भाग्य होगा।

                - बीजेन्द्र जैमिनी 

         ( संचालन व संपादन)


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