गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की स्मृति में चर्चा परिचर्चा

      औलाद के बिना जीवन का कोई महत्व नहीं है। फिर भी अधूरे जीवन का खेल का कोई महत्व नहीं रह जाता हैं। मन की कोई परिभाषा काम नहीं करतीं है। जो जीवन की विभिन्न अंगों को प्रभावित करतीं हैं।यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- 
       देखा जाए औलाद और मन का रिश्ता निस्वार्थ प्रेम, तयाग और गहरी भावनाओं से जुड़ा होता है क्योंकि माता पिता का मन हमेशा अपनी औलाद की भलाई, सुरक्षा और सफलता के लिए चिंतत रहता है , माता पिता बच्चों के भविष्य के लिए तथा उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपनी इच्छाओं तक का त्याग कर देते हैं तथा अपने मन के भावों में  अपने औलाद के लिए अटूट प्रेम में बहते रहते हैं तो आईये आज इसी  बात पर चर्चा करते हैं कि औलाद बिखरे सपनों की कहानी है जबकि मन अपने अधूरे घर की कहानी है, मेरा तर्क है कि औलाद बिखरे सपनों की कहानी इसलिए है कि माँ बाप अपने बच्चों के सपनों को  साकार करने के लिए अपने सपनों को अपने मन को तथा अपने भावों को अपनी औलाद के भविष्य के लिए कुर्बान कर देते हैं जो निस्वार्थ प्रेम, त्याग और उम्मीदों की कहानी है, यहाँ तक मन की बात है यह बताता है कि घर केवल ईंट पत्थर से ही नहीं बनता बल्कि भावों, प्रेम, रिश्तों और सुकून से बनता है, यहाँ मन की  शांति और अपनापन मिलता हो वोही अपना घर होता है क्योंकि घर की नींव विचारों की समानता और भावनात्मक  जुड़ाव पर टिकी होती है, कहने का भाव औलाद त्याग और भविष्य का प्रतीक है और मन प्रेम और वर्तमान के सुकून का प्रतीक है,  यह सत्य है कि औलाद  और मन का रिश्ता निस्वार्थ प्रेम  त्याग और गहरी भावनाओं से जुड़ा होता है लेकिन हमारा मन अक्सर एक अधूरे घर की तरह होता है यहाँ कुछ न कुछ कमी जरूर रह जाती है लेकिन याद रखें कुछ अधूरी इच्छाएं ही जीवन जीने का मजा देती हैं और हमें आगे बढने के लिए प्रेरित करती हैं, अगर औलाद की बात करें तो औलाद सिर्फ खून का रिश्ता ही नहीं है बल्कि माता पिता की इच्छाओं, सपनों और आशाओं को  विस्तार से पूरा करने का होता है क्योंकि उनकी कुछ अधूरी हसरतें होती हैं जो माता पिता खुद नही कर पाते उन्हें अपनी औलाद के माध्यम से पूरा होते देखना चाहते हैं जिसके लिए वो दिन दुगुनी रात चुगुनि मेहनत करते हैं और अपनी इच्छाओं को बाँध कर बच्चों के सपनों का साकार करने में लगे रहते हैं चाहे वो सपने बिखरे रहें या पूरे हो जाएँ,  लेकिन जो इच्छाएं अधूरी रह जाती हैं वो हमें अधूरा घर भावनात्मक खालीपन लगता है जिसे हम अपनों के प्यार से या अपनी उपलब्धियों से भरने की कोशिश करते हैं जबकि मन का अधूरापन ही हमें इंसान बनाए रखता है जिससे जीवन निरंतर चलने की तरफ इशारा करता है, अन्त में यही कहुँगा कि माता पिता जो सपने साकार करने  के लिए अपने बच्चों  में अपनापन देखना चाहते हैं कि उनके रहे सहे सपने उनके बच्चे या उनकी औलाद पूरा करेगी वो सपने कभी कभी साकार हो जाते हैं तो कभी बिखरे सपने ही लगने लगते हैं जबकि मन की इच्छाएं कभी भी पूर्ण नहीं हो पाती जैसे घर की पूर्ती कभी भी संभव नहीं कुछ न कुछ कमी रह ही जाती है उसी प्रकार मन की कहानी भी अधिकतर अधूरी ही लगती है लेकिन मन के लगाव व अपनों के प्यार से इसे स्वीकार करना पड़ता है। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

       औलाद माता-पिता की दुनिया होती है ,माता-पिता का हर सपना औलाद से ही जुड़ा होता है ,अभी औलाद ने जन्म भी नहीं लिया होता है वह माता के गर्भ में होता है तभी से मां-बाप उसके भविष्य के सपने बुनने लगते हैं ।वास्तव में यह औलाद से जुड़ी हुई मां-बाप की भावनाओं,उम्मीदों के साथ- साथ उनके टूटने और संवरने की अभिव्यंजना है। मां-बाप अपनी औलाद के माध्यम से अपने सपनों को पूरा करने की उत्कंठ इच्छा रखते हैं लेकिन जब उनके सपने पूरे नहीं होते हैं, उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है या उनकी सोच के विपरीत, उनकी आशा के विपरीत परिणाम आते हैं तो उनके सपने बिखर जाते हैं। औलाद के पालन -पोषण में माता-पिता अपने कई निजी सपनों का त्याग करते हैं । शौक अधूरे रह जाते हैं, ताकि उनकी संतानें उनकी आशा पर खरी उतरे और मन में संजोये सपनों को पूर्णता मिले, अतःयह वाक्य उस त्याग और उससे मिलने वाले भावनात्मक संतुष्टि का परिणाम भी हो सकता है। कभी-कभी बिखरे सपनें नए और बेहतर सपनों की शुरुआत भी होते हैं । औलाद का अपना अलग व्यक्तित्व और जीवन की राह माता-पिता के पुराने सपनों को नई दिशा भी देते हैं। अफसोस हमारे समाज में नि:संतान दम्पति को भी बहुत गहरी पीड़ा को झेलना पड़ता है। उनके मन के सपनें उन्ही के साथ उपजते हैं और लुप्त हो जाते हैं। इसके अलावा यह वाक्य-मन अपने आधूरे घर की कहानी है अर्थात  जीवन में सार्थकता या पूर्णता हेतु हमारा मन सदैव कुछ नये की खोज और पाने के प्रयास में लगा रहता है। यदि सब कुछ मिल जाए तो जीने की तमन्ना ही खत्म हो जाऐ। जीवन लक्ष्य हीन होकर अर्थहीन हो जाता है। सत्य तो यह है कि मानव जीवन सदैव अधूरा ही है कभी पूरा नहीं हुआ। मरते दम तक कुछ न कुछ पाने की इच्छा मन में पलती रहती है। इसलिए मन अपने घर की अधूरी कहानी है। 

- शीला सिंह

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश

      जो सपने हम स्वयं नहीं पूरा कर पाते हैं या जो सपने हम देखते हैं और वह पूरा नहीं होता है वह हम अपने औलाद से पूरा करवाना चाहते हैं. और बिखरे सपनों को सहेजना चाहते हैं. बहुत से लोग अपने औलाद से करवा भी  लेते हैं. इस काम में लोग बहुत हद तक सफल भी हो जाते हैं. ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे. जो बाप अपने से न कर सका वो अपने बेटे से करवाता है. जो माँ अपनी इच्छा नहीं पूरी कर सकीं वह अपनी बेटियों से करवाती है. सिने जगत में ऐसे बहुत से उदाहरण है. लोगों को तो अपने मन में  बहुत सी बातेँ है जो कभी पूरा नहीं हो पाती और मन अधूरे घर की कहानी बन के रह जाता है. इस तरह से औलाद बिखरे सपनों की कहानी है और अपना मन अधूरे घर की कहानी है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पश्चिम बंगाल 

        हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार , परिवेश के अनुसार , व उपलब्ध साधनों के अनुसार अपने जीवन मैं सपने देखता है , लक्ष्य निर्धारित करता है , व पूरा करने का प्रयास भी करता है ! किसी कारणवश , जब वह ऐसा नहीं कर पाता , तो वह अपने अधूरे सपनों को पूरा करना चाहता है , अपनी औलाद द्वारा !! उनके द्वारा वह अपने बिखरे , अपूर्ण सपनों को पूरा करना चाहता है , व इस कार्य मैं जुट जाता है !! व्यक्ति का वांछित सपना , उसकी व्यक्तिगत पसंद का था , और हो सकता है कि औलाद का व्यक्तिगत सपना कुछ और हो !! मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि व्यक्ति को अपने अधूरे सपने, औलाद पर नहीं थोपने चाहिए .. क्योंकि पसंद अपनी अपनी , ख्याल अपना अपना !! दुनियादारी के चक्कर मैं व्यक्ति जी तो लेता है , पर अधूरे सपनों के कारण , उसका घर , अधूरा रह जाता है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन -हिमाचल प्रदेश

      सपने, सपने ही होते हैं लेकिन कोई एक सपना साकार करने के लिए कितने ही सपनों की बलि चढ़ जाती हैं।जब यह स्वप्न साकार होता है तो कुछ पाने की खुशी में हम सब बहुत कुछ खो जाने का दर्द भूल जाते हैं।यह  स्थिति हर माता पिता के सामने आती है जब अपनी औलाद को अपने सपनों को साकार करने का माध्यम बना लें अथवा उनके सपने ही पूरे करने के लिए अपने सपनों को छोड़ दें।बस यह सपने छूटना या टूटना ही घर के अधूरे होने और उसी के अनुरूप मन हो जाता है। इसीलिए यह कहानी अधूरे बिखरे सपने और मन की कहानी बनकर रह जाती है।ऐसा कोई न कोई घटनाक्रम हर किसी जीवन में अवश्य होता है।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल '

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     ये पंक्तियाँ जीवन में छिपे गहरे भावों को बहुत ही मार्मिक ढंग से व्यक्त करती हैं। प्रथम पंक्ति हमें यह दर्शाती है कि माता-पिता अपनी संतान में पूरे जीवन अपने अनेक सपने संजोते रहते हैं। वे चाहते हैं कि जो इच्छाएँ,अभिलाषाएँ या लक्ष्य उनके जीवन में अधूरे रह ग‌ए हैं, उन्हें वे अपनी औलाद के माध्यम से पूरे करें। लेकिन समय बहुत बलवान होता है‌। वो ऐसी परिस्थितियाँ बना देता है कि पीढ़ियां अपने विचार बदल देती हैं और जो सपने माता पिता ने संजोए थे पलभर में त्राहि-त्राहि हो टूट कर कहीं बिखर जाते हैं। तब औलाद केवल उम्मीदों का केंद्र नहीं रहती, बल्कि टूटे और अधूरे सपनों का आईना मात्र बनकर रह जाती है। दूसरी पंक्ति मनुष्य के भीतर बसे उस खालीपन को दर्शाती है, जो अपनेपन और पूर्णता की तलाश में इधर-उधर उम्र भर भटकता रहता है। घर केवल ईंट-पत्थरों का मकान नहीं होता, बल्कि आपसी रिश्तों, प्रेम, अपनत्व और भावनात्मक संतोष का प्रतीक होता है। जब जीवन में संबंधों की गर्माहट कम हो जाती है, तब मन स्वयं को "अधूरे घर" जैसा महसूस करने लगता है।इन पंक्तियों में पीड़ा, अपेक्षाएँ, टूटन और भावनात्मक अकेलेपन का सुंदर समावेश है। ये पंक्तियां हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि जीवन में सपनों से अधिक जरूरी आपसी रिश्तों की समझ और भावनाओं का सम्मान करना होना चाहिए। इस पर विचार कर सभी को अधूरे घर को पूर्ण घर में बदलने की ताकत रखनी होगी। 

- नूतन गर्ग 

    दिल्ली

       हरेक के पास बचपन होता है और बचपन के पास होता है एक सपना। जो भविष्य के किसी कोने में टकटकी लगाये  बैठा इंतजार करता है, योग्य बनकर बड़े होने की।लेकिन... ये सपने सब के पूरे नहीं हो पाते। कारण कोई भी हो सकते हैं। उन्हीं सपनों में एक सपना औलाद का भी होता है और... औलाद के लिए भी होता है।  जो सपने पूरे नहीं हो पाते, वे उन सपनों को अपनी औलाद के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। ऐसे में वे यह न समझने की गलती कर देते हैं कि औलाद के खुद के ही  सपने हैं। जिनमें शायद आपके अधूरे सपनों को पूरा करना शामिल न हो। जैसे आपके सपनों में आपके पिता के अधूरे सपने शामिल नहीं थे। इस तरह सपनों की भी एक अजब कहानी है जो अधूरे होते हैं और पूरा होने के लिए सिसकते रहते हैं भटकते रहते हैं। स्वयं और औलाद के बीच। समझदारी यही है कि इतने सामर्थ्यवान और गुणवान बनो कि खुद के सपने खुद ही पूरा करो और न हो पायें तो औलाद के सपनों में न मिलाओ। उन्हें उनके सपने देखने दो और पूरा करने दो। वर्ना सपनों के मेलमिलाप में दोनों के सपने चकनाचूर न हो जायें। इसलिए अपने अधूरे सपने अपने मन के किसी कोने में, एक अधूरी कहानी के रूप में  रख लें।इस दिलासा के साथ कि 'सबको सब कुछ नहीं मिल जाता।'

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      औलाद अर्थात संतान माता-पिता के लिए ईश्वर का वरदान होती है। बेटा बेटी और उनके साथ जुड़े रिश्तों की कहानी ही जीवन कहलाती है। जिस दिन संतान माँ के गर्भ में आती है उससे माँ का रिश्ता  - - सब रिश्तों से उपर "नौ" महीने पुराना होता है। लेकिन आज के दौर में यह अनमोल रिश्ता जहरीला हो गया है। गरिमा खो चुका है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में बच्चे बदल गये  हैं। सचमुच आजकल औलादें बिखरे सपनों की कहानी बन चुकी हैं। अपनापन सर्वथा खत्म हो गया है। लेकिन क्या सिर्फ बच्चे ही दोषी हैं? - - नहीं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में माता-पिता भी अंधे हो गये हैं। संतान से अपेक्षायें सुरसा के मुँह की तरह फैलती जाती हैं। बहुत पहले एक विज्ञापन आता था"मेरी साड़ी से उसकी साड़ी सफेद कैसे" - - बस इसी तरह माँ बाप गणना करते हैं। मेरा बच्चा पडोसी के बच्चे से किसी तरह से कम न हो ऐसी भावनाओं के चलते प्यार को तरसते बच्चे माता पिता से शनैः शनैः दूर होते चले जाते हैं और माता पिता के बिखरे सपनों की कहानी बन जाते हैं - - और माता पिता का मन अपने अधूरे सपनों को अधूरे घर में टूटता देखकर भी रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाता है। पीढियों का अंतराल अंतहीन हो जाता है - - सच कहें तो यह विषय "छोटी सी दुनिया की लंबी कहनी है"जो युगों युगों से चली आ रही है और चलती रहेगी। संतान कहीं राम और कृष्ण हैं तो कहीं रावण और कंस - -  सपने अपनी जगह हैं सच्चाई अपनी जगह। नियति के खिलौना है मानव जीवन। बस  - - इससे अधिक नहीं।

- हेमलता मिश्र मानवी

 नागपुर - महाराष्ट्र 

         मानव जीवन में औलाद केवल रक्त संबंध नहीं होती, वह माता-पिता के सपनों, संघर्षों और उम्मीदों का विस्तार होती है। हर माँ-बाप अपने बच्चों में अपना भविष्य देखते हैं। वे अपने अधूरे सपनों को संजोकर औलाद की आँखों में नया आकाश तलाशते हैं। किंतु जब वही संतान दूरियों, परिस्थितियों या बदलते समय के कारण भावनात्मक रूप से अलग हो जाती है, तब माता-पिता का मन बिखरने लगता है। “औलाद बिखरे सपनों की कहानी है” — यह पंक्ति उस पीड़ा को व्यक्त करती है, जहाँ जीवन भर संजोए गए सपने समय की आँधी में बिखर जाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के लिए त्याग करते हैं, सुख छोड़ते हैं, पर जब वृद्धावस्था में अपनापन कम हो जाए, तो वही सपने टीस बन जाते हैं। “मन अपने अधूरे घर की कहानी है” — घर केवल ईंट-पत्थरों का ढाँचा नहीं, बल्कि प्रेम, संवाद और साथ का नाम है। जब परिवार में दूरी, अकेलापन और संवेदनहीनता बढ़ती है, तब घर अधूरा लगने लगता है। मन उन बीते पलों में भटकता है जहाँ कभी हँसी, अपनापन और रिश्तों की गर्माहट थी। आज के भौतिकवादी युग में रिश्तों की नींव कमजोर होती दिखाई देती है। सफलता की दौड़ में लोग अपनों से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में यह पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि औलाद केवल जिम्मेदारी नहीं, संस्कारों की विरासत है; और घर केवल मकान नहीं, भावनाओं का संसार है।यदि परिवार में संवाद, सम्मान और अपनापन बना रहे, तो न सपने बिखरेंगे और न ही घर अधूरा लगेगा। रिश्तों की सच्ची पूँजी प्रेम और संवेदना ही है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

       आज माता-पिता और औलाद के साथ संबंधों की गहराई पर वास्तविकता की विभिन्नताएं कभी यथार्थ से जुड़ी तो कभी-कभी मात्र कल्पना ही बनी रह जाती हैं। सोचते कुछ हैं , होता कुछ है। परिस्थितियां, समय, पीढियों का अंतर सब कुछ मायने रखता है । हर माता-पिता की औलाद ही उनका सुनहरा भविष्य होता है जिस पर वह सुख का महल टिका देखना चाहते हैं। स्वयं का बचपन , उम्मीदें , आकांक्षाओं से जुड़ी भावी योजनाओं के सचित्र सपनों की झांकी बच्चों में ही देखने की उम्मीद से भरपूर सुखदायक प्रतीत होती है ।अपना तन- पेट कसकर औलाद के लिए हर संभव सुख- सुविधाएं जुटा कर हर वर्ग के माता-पिता अपने बच्चों के पालन- पोषण और उनका करियर अपने से अच्छा बनाने में अपने सुख चैन को ताक पर रखकर बनाते ही हैं। हां कहीं कहीं औलादे माता-पिता के संस्कार उससे प्रभावित होकर उनके त्याग को वास्तव में ईमानदारी से ॠण चुकता करते दिखते भी हैं।वह मेहनत से पढ़कर अच्छा पद अच्छा पद पाकर आर्थिक और चारित्रिक दृष्टि से संपन्न होकर मां-बाप को भगवान के समान दर्जा देकर परिवार का नाम भी रोशन करते हैं। वह बच्चे जानते हैं, समझते हैं की माता-पिता ने गरीबी के बाद हम औलाद के सपनों को अमीर रखा। पर कहीं-कहीं यह भी देखा जाता है कि आज के माता-पिता औलाद से उम्मीदें तो बहुत रखते हैं पर स्वयं भी आधुनिकता के रंग में रंग कर बच्चों पर इसका दूरगामी प्रभाव क्या होगा यह नहीं सोचते । छुटपन से बच्चों को आया पर छोड़ना और एकाकी परिवार में मगन रहना, बच्चों का विदेश में बस जाना इत्यादि स्थितियां आज मां-बाप के लिए बिखरे सपने बनकर रह गए हैं। फिर होता क्या है? बुढ़ापे में वह तन- मन से इतने अधूरे होकर टूट जाते हैं कि औलाद का साथ और सहायता चाहने पर भी नहीं मिलता। उन्हें अपना घर काटने को दौड़ता है । वृद्ध आश्रमों  में माता-पिता का शरणागत होना यह सब बिखरे सपनों और अधूरे घर की कहानियों से भरे पड़े हैं।

 - डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

         औलाद का पालन पोषण करने में उम्र बीत जाती है।इंसान अपना स्वयं का वजूद खो देता है। अपनी अभिलाषाओं ,आकांक्षाओं को मार देता है। संतान प्रथम स्वयं गौड़, इस तरह का मानवीय स्वभाव बन जाता है। इसीलिए कहते हैं औलाद बिखरे सपनों की कहानी है। मन मार कर सबकी ख्वाहिश पूरी करना,घर की संभाल करना दायित्व बन जाता है। मन अपने अधूरे घर की कहानी के समान हो जाता है जिसकी पूर्ति कभी नहीं हो पाती। 

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " अधूरे मन की कहानी का कोई महत्व नहीं होता है। बल्कि जीवन बोझ बन जाता है। यही कुछ जीवन में औलाद का महत्व स्पष्ट करता है। फिर भी जीवन में अधूरेपन की परिभाषा बन जाता है। जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करता है।

 ‌‌          - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)


Comments

  1. औलाद बिखरे सपनों की कहानी है अर्थात् बेटा वह है जो बिखरे हुए कहानी को भी प्राप्त कर लेता है,आत्मसात कर लेता है।मन वह है जो अधूरे घर की कहानी है।इसमें हमेशा अधूरे मन की ही कहानी मिलती है।रवीन्द्रनाथ टैगोर हमारे आदरणीय थे।ये प्रथम ऐसे कवि थे,जो दो देशों के लिए राष्ट्र गान लिखकर विश्व प्रसिद्धि प्राप्त किए थे।ये ऐसे प्रथम साहित्यकार हुए ,जिसे गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था।टैगोर हमारे प्रेरणा स्रोत थे।हमें इन पर गर्व है।शत_शत नमन।
    - दुर्गेश मोहन
    पटना - बिहार
    ( WhatsApp से साभार )

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