बीजू पटनायक स्मृति में चर्चा परिचर्चा

        विचार तो विचार हैं। जो कर्म से बड़ा होता है। यानि आदर्श हो सकता है। जो जीवन की रूपरेखा तय करता है। फिर भी कर्म के बिना विचार का कोई मतलब नहीं होता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        विचारों से बड़ा हमेशा कर्म होता है, कर्म के बिना विचार अधूरा होता है.... इसमें कोई दो राय नहीं है...भारतीय संस्कृति और गीता के अनुसार कर्म को ही गीता का सार माना गया है, चूंकि कर्म पर ही हमारी पहचान , हमारा जीवन, हमारा भविष्य निर्धारित होता है किंतु  कहीं ना कहीं हम  जानते हैं कि  विचारों से ही कर्म की उत्पत्ति होती है बशर्ते कर्म को क्रियान्वित होना जरूरी है। यदि अच्छे विचार होंगे तो कर्म भी अच्छे होंगे। जीवन में सफलता के लिए अच्छे एवं उच्च विचारों का आना तो जरूरी है साथ ही उसे कर्म- रूप में क्रियान्वित करना भी आवश्यक है। केवल विचार करने से ही कुछ नहीं होता, अपने कर्म से उसे मूर्त रूप में भी लाना होता है। हमारे जीवन में कर्म का काफी महत्व है, चूंकि कर्म से ही हमारी पहचान बनती है। हमारा भविष्य भी हमारे द्वारा किए गए कर्म पर निर्धारित होता है।  निष्ठा, लगन, समर्पण भाव से जो कार्य करते हैं उसमें सफलता अवश्य मिलती है। अतः कर्म के बिना विचारों का होना अधूरा है।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

       विचारों से बड़ा कर्म होता है,और कर्म के बिना विचार अधूरा होता है। सही बात है। विचारपूर्वक किया गया कर्म से सफलता की गारंटी होती है। बिना विचार के कर्म करने पर पछतावा ही होता है।कहा गया है -

बिना विचारे जो करे,हो पाछे पछताय।

काम बिगारे आपनो जग में होता हंसाय।

इसी में आगे चित्त में चैन न मिलने की भी स्थिति आती है। जबकि विचार पूर्वक यानि वेल प्लान्ड कार्य संतोषजनक होता है, प्रसन्नतादायी होता है। यदि मात्र विचार या प्लान हो और उसका कार्यान्वयन न हो तो वह विचार अपूर्ण ही माना जाता है इसलिए विचार का कार्यान्वयन अवश्य किया जाना चाहिए।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

            यह अत्यंत गहन और सत्य कथन है. विचार केवल एक शुरुआत है, लेकिन कर्म ही उसे परिणाम में बदलता है. यह कहा जा सकता है कि विचार परिणाम की पहली सीढ़ी होता है. परिणाम तभी आ सकता है जब कर्म किया जाए. विचार उत्तम हों और कर्म सत्य-समर्पण-सत्पथ से प्रेरित तो परिणाम श्रेष्ठ ही होगा. यह कहना उचित होगा कि विचार और कर्म का अन्योन्याश्रित संबंध है.

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

        विचारों के ताने-बाने हमें कहीं नहीं ले जाएंगे। यदि हम भूतकाल के बारे में विचार कर रहे हैं तो न केवल अपना समय बर्बाद कर रहे हैं अपितु पछतावे  की दुनिया में जी रहे हैं। उसके बारे में सोच रहे हैं जिस पर हमारा कोई ज़ोर नहीं। यदि आप भविष्य के  बारे में सोच रहें हैं तो भी समय बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि यह विचार केवल विचार ही रह जाएगा। भविष्य भी अनिश्चत व हमारे कंट्रोल से बाहर है।भविष्य के बारे में अधिक सोचना हमें चिंता व तनावग्रस्त कर देगा।सर्वोत्तम है वर्तमान में कर्म  करना। जो सोचा-विचारा है उसे क्रियान्वित करना, अर्थात कर्म करना। यह ही  हमारा भविष्य निश्चित करेगा। कर्म किये बिना विचार, विचार ही  रह जाएगा और हमें कहीं नहीं ले जाएगा सिवाय चिंता, तनाव, पश्चताप और अवसाद देने के। कर्म ही हमारा वर्तमान व भविष्य है। कर्म ही जीवन है।

- रेनू चौहान 

नई दिल्ली

       एकदम सत्यवचन !! विचारों से बड़ा कर्म होता है क्योंकि विचार तो मात्र एक सोच है , जो कर्म के कारण ही क्रियान्वित होती है !! जितने मर्जी उच्च विचार एकत्रित कर लो , वे मात्र विचार ही रहते हैं और उन्हें व्यावहारिकता केवल व्यक्ति के सार्थक प्रयास और कर्म ही प्रदान करते है !! कुछ भी पाने के लिए दुनियां में , कर्म तो करना ही पड़ेगा !विचारों को वास्तविकता प्रदान करते है मनुष्य के कर्म , व कर्म बिना विचार , विचार ही रहते हैं !!  कुछ पाना है तो सोच की काल्पनिक दुनियां से निकलकर , कर्म द्वारा वांछित फल पाया जा सकता है !! 

- नंदिता बाली

सोलन - हिमाचल प्रदेश

      विचारों से बड़ा हमेशा कर्म होता है, क्योंकि केवल सोचने से कोई कार्य पूरा नहीं होता।विचार मन में दिशा देते हैं, लेकिन उन्हें वास्तविकता में बदलने का काम कर्म ही करता है। यदि मनुष्य केवल अच्छे विचार करता रहे और उन्हें कर्म में न उतारे, तो वे विचार अधूरे ही रह जाते हैं। इसलिए जीवन में सफलता और परिवर्तन के लिए कर्म आवश्यक है। अच्छे विचारों को कर्म के साथ जोड़ने पर ही उनका सच्चा महत्व दिखाई देता है।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

       लोगों के चरित्र में विविधता भी होती है और विचित्रता भी। कुछ लोग जैसा सोचते हैं,वैसा कहते हैं और वैसा करते भी हैं। कुछ लोग जैसा सोचते हैं, वैसा कहते नहीं हैं और जैसा कहते हैं वैसा करते नहीं है। आशय यह कि चरित्र के तीन चरण होते हैं। मन, वचन और कर्म। जिसके मुख्य चरण दो ही सार्वजनिक होते हैं, वचन और कर्म। किसी के मन में क्या है? इसका अनुमान तत्काल नहीं लग पाता किंतु उसके कर्म करने के बाद अनुमान लगाया जा सकता है या यूँ कहें कि प्रगट होता है। यानी सच यही है कि विचारों से बड़ा हमेशा कर्म होता है। कर्म के बिना विचार अधूरा होता है। कर्म करने से ही विचार की पूर्णता भी होती है और पुष्टि भी। क्योंकि विचार जब तक वचन में हैं तब तक शंकित होते हैं। वे विश्वास या अविश्वास दोनों विकल्प लिये होते हैं। इसलिए जो वचन सुनकर आकर्षित होते हैं और विश्वास कर लेते हैं, धोखा खा जाते हैं और अपना नुकसान कर बैठते हैं। वचन की वास्तविकता तो कर्म करने के उपरांत ही प्रगट होती है। इसीलिए कहा जाता है कि वचन या कथन पर विश्वास सावधानीपूर्वक करना चाहिए। सार यही है कि विचार और वचन से बड़ा कर्म होता है, जो पूर्ण भी होता है और परिणाम भी होता है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       विचारों की सार्थकता तभी सिद्ध हो पाती है जब वे कर्म का बाना पहन कर अपनी पहचान बनाते हैं। व्यक्ति के मस्तिष्क में हर समय धाराप्रवाह विचार आते रहते हैं पर उनको कोई जान नहीं पाता। जब वे कर्म के रूप में बाहर निकल कर परिणाम प्रस्तुत करते हैं तभी घर, समाज और राष्ट्र उन्हें जान पाता है, अच्छे परिणाम देने वाले वाले कर्म और उनके पीछे छिपे विचारों का अनुकरण-अनुसरण होता है और बुरे परिणाम देने वाले कर्म और उनमें निहित विचारों की आलोचना होती है और उन्हें भुला दिया जाता है। इस तरह यह एकदम स्पष्ट है कि कर्म ही विचारों को पूर्ण करते हैं, कर्म ही व्यक्ति की उसके व्यक्तित्व की और उसके विचारों की सही पहचान होते हैं और व्यक्ति को सफलता और जीवन को सही उद्देश्य और सार्थकता प्रदान करते हैं।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

         अगर हम विचार और कर्म की बात करें तो यह जिंदगी में दोनों ही महत्वपूर्ण हैं अगर विचार बीज है तो कर्म वृक्ष है क्योंकि एक सही विचार कर्म द्वारा ही फलित होता है वास्तव में धर्म युक्त कर्म ही समाज के लिए हितकारी होता है तो आईये आज की चर्चा को आगे बढाने का प्रयास करते हैं कि  विचारों से  बड़ा हमेशा कर्म होता है और कर्म के बिना विचार अधूरा होता है, मेरा मानना है कि कर्म को ही सर्वोच्च माना जाता है क्योंकि विचारों को हकीकत में बदलने के लिए कर्म अनिवार्य हैं, बिना कर्म के विचार केवल कल्पना बन कर रह जाते हैं, अच्छे कर्म ही भाग्य को बदल सकते हैं जो सफलता की कुन्जी कहलाते हैं यह भी सत्य है कि हर चीज की शुरुआत एक विचार से होती है जो मानसिक कर्म के रूप से कार्य करता है लेकिन कर्म ही मनुष्य के  भविष्य और भाग्य का निर्माण करता है, कहने का भाव कर्म  के बिना बिचार अधुरा है, सिर्फ सोचने से परिणाम नहीं मिलते यह तो कार्य करने से मिलेंगे  क्योंकि हमारा अधिकार केवल कर्म करने पर है न कि फल पर, विचार तो हमें सिर्फ दिशा दे सकते हैं लेकिन विचारों को  सच्चाई में बदलने के लिए मेहनत जरुरी है वास्तव में सफलता के लिए कर्म और विचार दोनों अनिवार्य हैं जब हम कर्म छोड़ देते हैं तो हम अक्सर परेशान रहते हैं और तरह तरह के विचार मन में  लाते हैं लेकिन जब तक हम अपने कर्मों को आकार नहीं देते तब तक हमारा भविष्य अन्धकारमय में रहता है, अन्त में यही कहुंगा कि कर्म और विचार जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं क्योंकि हमारे बर्तमान विचार ही हमारे भविष्य के कर्म बनते हैं, अच्छे विचार और सकारात्मक कर्म ही मानसिक सुख व सफलता लाते हैं और भाग्य को उज्जवल  बनाते हैं इसलिए कर्म ही इंसान का सच्चा परिचय है जिससे वर्तमान और भविष्य की नींव को ऱखा जा सकता है, क्योंकि यहाँ कर्म उज्जवल होंगे  भाग्य वहीं चमकेगा, देखा जाए कर्म और विचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, विचार हमें दिशा देते हैं लेकिन  हमें मंजिल तक कर्म की  पहुंचाते  हैं, लेकिन कर्म विचारों से बड़ा ही होता है, विचार कभी भी कर्म के बिना परिणाम नहीं दे सकते मगर विचार कर्मों की  ही नींव  हैं इसलिए कर्म हमेशा विचारों से बडे़ होते हैं। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

    मनुष्य के जीवन में विचार और कर्म दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं, परंतु विचार तब तक अधूरे रहते हैं जब तक वे कर्म में परिणत न हों। विचार एक बीज की तरह है, जबकि कर्म उस बीज को वृक्ष बनने की प्रक्रिया देता है। केवल अच्छे विचार रखने से समाज या जीवन में परिवर्तन नहीं आता, जब तक उन्हें व्यवहार में न उतारा जाए। इतिहास में जितने भी महान परिवर्तन हुए हैं, वे केवल विचारों से नहीं, बल्कि उन विचारों को कर्म में ढालने से संभव हुए। अनेक लोग बड़े-बड़े आदर्शों की बात करते हैं, परंतु उन्हें जीवन में लागू करने का साहस कम ही लोग जुटा पाते हैं। वास्तव में वही व्यक्ति समाज में प्रेरणा बनता है जो अपने विचारों को आचरण में उतारता है। हालाँकि यह भी सत्य है कि कर्म का मार्ग भी विचारों से ही निकलता है। सही विचार दिशा देते हैं और कर्म उस दिशा को वास्तविकता में बदलता है। इसलिए विचार और कर्म का संबंध पूरक है—विचार मार्गदर्शक है और कर्म उसकी सिद्धि। अंततः कहा जा सकता है कि विचारों की ऊँचाई तभी सार्थक है, जब वे कर्म की धरती पर उतरकर समाज और जीवन को बेहतर बनाने का कार्य करें। सच्चा विचार वही है, जो कर्म बनकर दुनिया में दिखाई दे।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर -  राजस्थान

बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय। 

काम बिगाड़े आपना जग में होत हसाय।।

सचमुच कर्म सदैव विचारों से बड़ा होता है। एक बड़ी पुरानी कहावत है कि "विचारों विचारों में मारवाड़ डूब गया" इसलिये ध्यान रखना चाहिए कि कहीं विचारों में ही समय ना बीत जाये। विचार से बड़ा सत्य और तथ्य कर्म होता है। बचपन से सुनते आये हैं "कर्म ही पूजा है" - - अतः कर्म की राह पर चलें तो विचार सहज ही फलीभूत होते हैं। आज हम देख रहे हैं कि हमारी पीढियां आधुनिकता के फेर में पड़ कर कर्म हीन हो रही है। ए आई जैसे नव प्रयोग भरमा  रहे हैं। जरूरत है कि इन प्रलोभनों से बचें और अभिनंदन करें  - - पूजन करें अपने कर्म का ।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

" मेरी दृष्टि में " कर्म के आगे विचार बौना साबित होता है। कर्म से विचार की महानता बनतीं है। कर्म है तो विचार बलवान होते हैं। बिना कर्म के विचार शून्य है। इसलिए कर्म प्रथम रहता है।‌ विचार आते रहते हैं और जातें रहते हैं। जिस विचार पर कार्य हुआ है तो विचार अमर हो सकता है। यही विचार ओर कर्म का संबंध है। बाकि तो सब कुछ कर्म पर निर्भर होता है।

      - बीजेन्द्र जैमिनी 

      (संचालन व संपादन)

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