विश्व महिला दिवस की पूर्व संध्या पर कवि सम्मेलन

     जैमिनी अकादमी द्वारा विश्व महिला दिवस के अवसर पर ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है। जो फेसबुक के साथ - साथ WhatsApp ग्रुप पर रखा गया है। जिसे ब्लॉग के माध्यम से पेश किया गया  है। जैमिनी अकादमी यह वर्ष पार्वती गिरि की जन्मशताब्दी के रूप में माना रहीं है। इसलिए डिजिटल के रूप में " पार्वती गिरि जन्मशताब्दी सम्मान - 2026 " के रूप में प्रदान करने का निर्णय लिया है।

     अनेक कवियों ने अपनी - अपनी रचनाएं ऑनलाइन पेश की है। सभी की‌ रचनाएं एक से बढ़कर एक रहीं हैं। परन्तु मुख रूप से विषय के अनुकूल रचनाएं होना आवश्यक है। जो रचनाएं विषय के अनुकूल रहीं हैं। उन रचनाऒं को सम्मानित करने का निर्णय लिया गया है। डिजिटल सम्मान के साथ - साथ रचनाएं पेश हैं :-

           सुनो स्त्री!


सुनो स्त्री!

अपने अधिकार के लिए 

आवाज उठाने में 

उतनी देर न करना 

जितनी देर 

तुमसे पहले वाली 

पीढ़ी ने लगाई 

अपने जीवन की संध्या में 

स्वयं के लिए,

और कहा गया उसे 

पगला गई हो इस उम्र में 

भजन-कीर्तन करो 

और दब गयी 

उसकी आवाज 

पूरे घर की हँसी के बीच,

तुम मरने से पहले न मरो

अपने टूटे सपनों की 

किरचें उठाये

अभिशप्त न बनो

इसके लिए सही समय पर 

आवाज उठाओ 

अपने लिए निर्णय स्वयं लो 

अपनी लड़ाई स्वयं लड़ो 

उससे भी बढ़ कर 

अपनी आवाज स्वयं बनो 

तभी विजय का गीत लिखोगी 

तभी नये कीर्तिमान गढ़ोगी।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

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    संघर्षों से घबराती नहीं


नारी केवल एक शब्द नहीं,

जीवन की मधुर कहानी है,

ममता की निर्मल गंगा है,

साहस की वह निशानी है।


कभी माँ बनकर छाया देती,

कभी बहन बनकर साथ निभाती,

कभी बेटी बनकर आँगन में,

खुशियों की कलियाँ खिलाती।


संघर्षों से घबराती नहीं,

हर मुश्किल से लड़ जाती है,

आँसू पीकर भी अक्सर वह,

सबके चेहरे पर मुस्कान सजाती है।


उसके कदम जहाँ पड़ते हैं,

वहाँ उम्मीदें जन्म लेती हैं,

उसकी मेहनत की तपिश से,

अधूरी राहें भी पूरी होती हैं।


वह शक्ति है, वह श्रद्धा है,

वह प्रेम की गहरी धारा है,

उसके बिना अधूरा जीवन,

उससे ही जग सारा है।


आओ आज प्रण हम लें सब,

नारी का सम्मान करेंगे,

उसकी मेहनत, उसके साहस को,

हर पल दिल से नमन करेंगे।


महिला दिवस का यह संदेश,

हर दिल तक पहुँचाना है,

नारी को उसका हक़ और सम्मान

इस दुनिया में दिलाना है। 

 - सुनीता गुप्ता 

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

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           कौन हूँ मै


सजग सजल सफल 

 हूँ में 

 प्रेम की प्रतिमूर्ति हूँ

ममता समता सरलता 

की धनी हूँ में

आस्था विस्वाश की 

जमीं हूँ  मै

भक्ति युक्ति मुक्ति हूँ

आशा  हूँ  भाषा हूँ

सुधा हूँ सरिता हूँ

श्रष्टी हूँ दृस्टि हूँ शक्ति हूँ 

कौन कौन हूँ मै

अरे नारी नारी 

सब पर भारी हूँ मै

- डॉ बबिता चौबे शक्ति 

दमोह - मध्यप्रदेश 

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           नारी शक्ति


दुर्गा का साहस हो जिसमें,

चण्डी की सी हो हुंकार। 

आँधी-तूफानों से लड़कर,

करती नागिन सी फुंकार।।


त्याग-तपस्या की वह मूरत, 

करुणा का अनुपम भंडार।

महिषासुर का वध कर डाले,

आँखों में उसके अंगार ।।


सीता सा धीरज है उसमें, 

मीरा जैसा है विश्वास।

नारी कभी न हारी जग में,

किया जगत का है विन्यास।।


झांसी की रानी बन रण में

अरि दल का करती संहार।

मातृभूमि की रक्षा हित वह, 

प्राणों में करती संचार।।


उसके साहस से ही जग में , 

होता जीवन का विस्तार।।

ममता की जब  बहती गंगा ,

उसने जग को दिये विचार।।


ज्ञान सुधा से सींच जगत को, 

खोले उन्नति के तट बंध।।

जग विवेक के दीप जलाती, 

जग में फैलाती शुभ गंध।।


ममता-साहस,श्रम-सेवा से, 

बढ़ जाता है उसका मान।

माँ बनकर वह छाया देती,

हो जाता जग का कल्याण।।


संस्कारों की गंगा बहती,

देव रमण करते अभिमान। 

उसके दृढ़ संकल्पों से ही,

भारत का है नव निर्माण।।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

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          आम लड़की 


मैं, आम लड़की घबरा जाती हूँ

जब चार-पाँच शोहदों की मोटर साइकिलें आगे-पीछे

 दाएँ-बाएँ करते धौंस बन कर उतर आती   हैं


न मैं दुर्गा   न काली बन पाती  हूँ

न किसी  वीरांगना की कवच पहन पाती  हूँ

बेबस बेकल होती उनके घेरे में आ जाती हूँ


रास्ते चलते मैं डरती हूँ

न जाने कौन किधर से कब आ जाए

चौकन्नी रहती अंदर से हिम्मत बटोरती

मोबाइल से यूँ ही बतियाती

ऑनलाइन का मुलम्मा  चढ़ाती हूँ


माँ-पिता मुझे बाहर भेजकर

लौटते तक मेरी राह तकते  हैं

कमरे में बंद रह नहीं सकती

पढ़ने-लिखने,  नौकरी की खोज

जीने की जद्दोजहद


मैं एक आम लड़की

खास होने की कोई इच्छा नहीं

अपनी राहें सुरक्षित करती हुई

मंजिल पाना चाहती हूँ 

-'मीनू' मीना सिन्हा

 रांची - झारखंड

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            नारी शक्ति 


अपराजित है नारी शक्ति

सृष्टि की  रचनाकार हो

शक्ति का आधार है नारी,

मृदु है, कोमल है 

सहनशील है नारी।

 मस्तक पर  बिंदी है 

सारे जग का स्वाभिमान

उसमें धरा सी गम्भीरता 

  भर्ती ऊंची  उड़ान  

कदमों में उसके साहस

हृदय में  करुणा भरी 

रण में भी डटकर खड़ी हो जाती हो

दुश्मन के छक्के छुड़ाती हो

चूल्हा सुलगाने से लेकर 

रॉकेट की उड़ान तक

खेतों की मिट्टी में  पसीना बहाती

अंतरिक्ष के सम्मान तक 

कोई  ना रोकें ना कोई टोके 

नारी  तेरे बढ़़ते कदम

एक दिन नया युग लाएगी

तुम अबला नहीं  सबला हो

  दुर्गा का अवतार हो

स्वयं के भीतर समेटे

एक  सम्पूर्ण संसार हो 

जब भी नारी का वरण करो

नारी का सम्मान करो

 धर्म यही सिखाता है

 - अर्विना गहलोत

प्रयागराज - उत्तर प्रदेश 

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     हिला दे दुनिया सारी


नारी शक्ति स्वरूपिणी,

भिन्न भरे हर रंग।

दुर्गा ,काली,पार्वती,  

 मातु शैलजा संग।।

मातु शैलजा संग, 

अंत करती हर बाधा।

ममता की वे छाँव, 

वही है मीरा -राधा।।

मत करना अपमान,

हिला दे दुनिया सारी।

अबला से ये सृष्टि, 

शक्ति पुँज है यह नारी।।


 - वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

वाराणसी - उत्तर प्रदेश 

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     अनूठी प्रेम परिभाषा 



पावक पुत्री द्रौपदी 

     हे पांचाली---- कृष्ण सखी


      पुराण कहते हैं तुम पंचकन्याओं में से एक थीं


अहिल्या कुंती तारा मंदोदरी सी

तुम भी चिरकुमारिका थीं

     मानती हूँ मैं भी अग्नि पुत्री

तुम अग्नि की तरह चिर पवित्र थीं।। 

            लेकिन

नारी हूँ मैं जानती हूँ नारी हदय को

         विजेता योद्धा के प्रति विजित रमणी के प्रणय भाव को

कि

         प्रणय रंग से मुदित तुम्हारे अलस नयनों की मादकता

          अनुपम रस राजी को लजाती देहलता

    प्रफुल्लित हदय में महकता मधुमास

कंपित होठों में मचलता प्रीति मल्हार

     शापग्रस्त हो गया होगा 

 - - - - - माता कुंती के शब्दों से

      जब उन्होंने अनजाने ही

              दे दिया होगा तुम्हें "वस्तु" मानकर बाँट लेने का आदेश

           इसके साथ ही बँट गया तुम्हारा

                अस्तित्व तुम्हारी अस्मिता 

      और तुम अर्जुन की प्रणय-प्रणेती-विजिता पावकपुत्री प्रिया से

मात्र भोग्या, अंकशायिनी

          मान लीं गईं पाँच पतियों की!! 


लेकिन क्या बँट पायी होगी 

     तुम्हारे हदय में हिलोरें लेतीं प्रणयिणी सदानीरा 

    

अर्जुन के उत्तरीय के छोर से बँधे तुम्हारे आँचल की 

खुशबू में कौंधती निरंकुश अग्नि-दामिनी 

          जिनमें स्वप्न पुरुष अर्जुन 

              अगम्य अग्नि पुत्री को जीतने वाले विजेता के साथ 

              हदय-बंधनों को जीने की भावुक आस थी

       चिर पवित्र पावकपुत्री 

               सुधियों के द्वार पर सहसा 

दस्तक देती होंगी 

          आजानबाहु धनुर्धारी बाहें 

" घूमती मीन के नयनों को बिंधतीं"

     अग्नि पुत्री सच हो सकता है कि

"भर्तां देहिं" कहकर तुमने

पंचगंधर्व महादेवों से वर मांगा था

               तुम्हारा प्रियंम-भाव तो पाँच पुरुषों के लिए नहीं था

            नियति नटिनी के खनकते नुपूरों से

या सखा केशव से तुमने

   यह विडंबना तो नहीं मांगी होगी।। 

           अग्नि पुत्री पाँचाली

      वीर धनुर्धारी अर्जुन ने तुम्हें जीता था अपनी वीरता से

           मीन-मछली के नयनों को बींध कर

 - - - - "शायद वह मीन तुम थीं "

शापिता, प्रणयवंचिता, अरक्षिता

अन्यथा क्या पुनः-पुनः यूँ छली जातीं

          - - - - 

"वस्तु"मान कर पाँच पांडवों में बाँटी जातीं

आधिकारिक वस्तु की तरह जुएं में दाँव पर लगाई जातीं! 

      भरी सभा में पाँच पतियों के होते 

यूँ लज्जावनत होतीं

       - - - जानती हूँ मैं अग्नि पुत्री

"अनुत्तरित रहेंगे हर युग में 

तुम्हारे प्रश्न "

जो तुमने भरी सभा में पूछे थे

         द्रौपदी - - चिर-पवित्र पावकपुत्री 

मान लो नियति कि

          पंचकन्या के छद्म भुलावे में 

      तुम ही थीं

 अर्जुन की विजिता मीन 

   हाँ--तुम ही तो थीं

बस और कुछ नहीं 

मान लो द्रौपदी - -  ये नियति

कि

            अग्नि पुत्री होने के साथ-साथ तुम एक नारी थीं 

            एक सामान्य मानवी थीं।।

अतीन्द्रिय सत्यम् प्रियम सुंदरम् की

          साकार प्रतिकृति थीं।।

मान लो द्रौपदी नियति।। 


- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

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    नारी तुम नारायणी हो


जिन्दगी सांस लेती तुझ में,

सबको जन्म तुम देती हो।

अपने आँचल की  छाँव में,

ममता को तुम लुटाती हो।

जगत की हो जीवनदायनी ,

नारी तुम नारायणी हो ।


पैरों में है लाख जंजीरें 

 कदम नहीं रोक पाती हो

दिखने में अबला लगती ,

दुश्मन के छक्के छुड़ाती हो ।

साक्षात हो दाक्षायणी ,

नारी तुम नारायणी हो ।


कभी माँ,तो कभी पत्नी ,

कभी बेटी बनकर आती हो।

हर रूप  तेरा अद्भुत होता,

स्नेह सर्वत्र लुटाती हो।

तुम हो देवी पारायणी ,

नारी तुम नारायणी हो ।


परिवार की कवच बनती ,

तुम ममता की मूरत हो।

पीछे मुड़कर नहीं देखती,

हालात से संघर्ष करती हो।

तुम हो जगदंबा कल्याणी  ।

नारी तुम नारायणी हो ।


   - रंजना वर्मा "उन्मुक्त "

        रांची - झारखंड 

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        साठ साला औरतें!


ये कल की साठ साला औरतें,

घर तक ही सीमित रहनेवाली,

बहुत हुआ तो

मंदिर, कीर्तन और जगराते में,

परिधान सदा सादे कपड़े,

पहन चली जाती थीं।

चटक-मटक अब कहाँ उन्हें शोभा देगा?

और कभी कभी तो 

आने-जाने की कुछ साड़ियां वर्षों तक

बक्से में रहतीं थीं,

बाहर गए तो पहन गए 

और 

आकर  उतार कर फिर धर दिया।

ये कल की साठ साला औरतें - 

हाथ पकड़कर 

पोते-पोतियों के

बहुत हुआ तो पड़ोस में बैठती रहीं,

कुछ अपने मन की कहती, 

 कुछ उनके मन की सुनती।

वही तो हमराज होते थे।

पति के साथ बतियाने का

रिवाज भी बहुत कम था,

जरूरत पर बतिया लो, 

पैसे मांग लो या 

कहीं भी बुलावे में जाना है, की जानकारी दे दो।

ये थी कल की साठ साला औरतें।

और 

आज की साठ साला औरतें-

ऐसा ही नहीं है कि साठ साला हैं,

तो खत्म हो गयीं या

सिमट गई चहारदीवारी में।

आज तो जिंदगी शुरू ही होती है,

साठ साल के बाद।

इससे पहले तो

घर से आफिस तक दौड़ते भागते, 

घर संभालते , रिश्ते समेटते, 

बच्चों के भविष्य को सजाते हुए

 निकल जाता है।

कब सजने की सोच पाए?

अब किटी पार्टी का समय आ गया है,

हाउजी और छिपे टेलेंट को

फिर से जीने की बारी आई है।

अब सखी ग्रुप में घूमने का समय आया है,

नहीं मिलती है, 

अब बच्चों को लेकर पार्क में,

खुद योग में डूबकर 

स्वस्थ रहना सीखती हैं।

तिरस्कार नई पीढ़ी का क्यों?

अपने को अपनी उम्र में ढालें,

ऑप्शन बहुत मिल गये हैं, 

अपने शौक को सहेजकर 

नेट पर समय बिताते हैं,

अपनी गुणवत्ता से ही 

पहचान बनाने के नये मंच हैं।

जिंदगी जिओ जब तक,

जिंदादिली से जियो, 

जो संचित अनुभव है, 

बाँटो और खर्च करो,

पुरानी फ़ालतू बातें भूलकर

ये साठ साला औरतें लिखती हैं 

एक अलग नया इतिहास।

ये आज की साठ साला औरतें, 

युवाओं से भी जवान है।

जीना हमें भी आता है,

अपना वर्तमान खुद बुनती हैं,

वह कपड़े पहनती हैं जो सुख देता है,

सुर्ख रंगों में सजी महफ़िल संजोती हैं,

लेकिन अब भी लोगों की नजरों में

किरकिरी की तरह 

खटक जाती है जिंदादिली 

क्योंकि

आज की साठ साला औरतें  

सारी बेड़ियाँ तोड़ना चाहती है।

एक नया जीवन जी रहीं हैं, 

जीवन की दूसरी पारी 

जिंदादिली से जीने लगी हैं।

- रेखा श्रीवास्तव

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

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      शक्ति स्वरूपा दृष्टि है


 तू ही सृष्टि, तू ही सृष्टा, 

तू ही समग्र समष्टि है।

कण-कण में आभासित नारी

शक्ति स्वरूपा दृष्टि है। 


अम्बर तक से धरती तक तू

 क्षीर निर्झरिणी निर्मल है। 

आलोकित अलकें अवनी तू

प्रेम पुण्य का वत्कल है। 

शीतल चंदन वन मलयज सी 

तू ही मृदुला मिष्ठी है। 


कण- कण में आभासित तू ही,

शक्ति स्वरूपा दृष्टि है.. 


- सुखमिला अग्रवाल भूमिजा 

मुम्बई - महाराष्ट्र 

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       नवयुग की नारी


नवयुग की नारी हूँ मैं अब

नहीं रही किसी पर भार। 

धरती, गगन, जल ,थल में

सभी जगह मेरा अधिकार।। 


झांसी की हूँ मैं लक्ष्मीबाई। 

शिवाजी की माँ जीजाबाई। 

देशभक्त मैंने पैदा कर दिए--

कभी नहीं बनी  मैं लाचार।। 

नवयुग की नारी हूँ मैं अब

नहीं रही किसी पर भार।। 


धरती जैसी सहनशक्ति है। 

मीरा जैसी निष्ठा भक्ति है। 

स्रष्टा की हूँ अनूठी रचना--

सृष्टि का अनुपम उपहार।। 

नवयुग की नारी हूँ मैं अब

नहीं रही किसी पर भार। । 


स्वाभिमान नहीं कभी गिराया। 

चरित्र अपना नहीं डगमगाया। 

त्रि देव पलने में झुलाये हैं मैंने--

बना कर बच्चों का सा सिंगार। 

नवयुग की नारी हूँ मैं अब

नहीं रही किसी पर भार।। 


मैं नहीं द्रौपदी भोली भाली । 

पन्ना सा बलिदान हूँ आली  । 

अर्जुन के गांडीव की शक्ति-

कान्हा के गले का हूँ पुष्पहार। 

नवयुग की नारी हूँ मैं अब

नहीं रही किसी पर भार।। 

- कृष्णा जैमिनी

गुरुग्राम - हरियाणा 

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       निखरती नारियाँ


भरा है दूध आँचल में, विजय मुस्कान आँखों में।

सफल है आज की नारी, लिए बल आज पाँखों में।

घुमड़ते अब न बादल ये, नयन के कोर से बरसें।

कि अब तो नेह की खातिर, न इनका मन कभी तरसे।


रखें अरमान भी ऊँचे, करें अब पूर्ण भी उनको।

विगत में तो असंभव ही, लगा पाना सदा जिनको।

धरातल निज बिना भूले, उड़ानें उच्च लेती हैं।

सभी निज बांधवों को भी, उचित सम्मान देती हैं।


मृदुल हैं भाव उरतल में, नहीं हैं ज्ञान में कमतर।

सुघड़ हर क्षेत्र में अपने, रहे निज गेह या दफ्तर।

बनी हैं स्वावलंबी भी, जगत में मान पाया है।

शिखर हर क्षेत्र का अब तो, इन्होंने भी सजाया है।


लुटाती नेह बस उनपर, करें सम्मान जो इनका।

कठिन जीवन बनाती हैं, कुचलते मान जो, उनका।

न अत्याचार के सम्मुख, झुकातीं शीश ही अपना।

रखें ऊँचा सदा मस्तक, करें पूरा सभी सपना।


कभी बंदूक भी कर में, खनकती चूड़ियाँ भी हैं।

सँवरती हैं सुकोमल सी, समर वीरांगना भी हैं।

सँवारा स्वत्व यह अपना, युगों से ही तराशा है।

सुखद परिणाम भी पाया, नहीं कोई निराशा है।

- रूणा रश्मि 'दीप्त'

रांची - झारखंड 

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       मैं भारत की बेटी हूँ


मैं भारत की बेटी हूँ

भिन्न भिन्न मेरे रूप

सुख दुःख की प्रतिमूर्ति हूँ

सहज है मेरा रूप ।


माँ, बहन, सुता, सहधर्मिणी

सब रूपों में हूँ मैं

गहन धूप की घनी छांव

ममता का उन्मुख आँचल मैं ।


मैं कोमल और कमजोर नही

मैं नारी शक्ति स्वरूपा हूँ

विष का प्याला पी जाती हूँ

दुश्मन दल से लड़ जाती हूँ ।


मर्यादा की सीमा में रह

मैं अपना फर्ज निभाती हूँ

अपनी सतीत्व की रक्षा हेतु

विरांगना बन जाती हूँ ।


आसान नहीं सारे रिश्ते 

एक साथ निभाना भारी है

स्त्री कहो कांता, भामिनी

मुझे गर्व है मैं विश्व की नारी हूँ ।


नारी से ही संसार चले

माता का दर्जा मिला मुझे

महाकाली का रूप हूँ मैं

अत्याचार सहन जब भारी लगे ।

- डॉ. अर्चना दुबे 'रीत'

मुंबई - महाराष्ट्र 

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            मैं कौन हूँ ?


मैं कौन हूँ ? 

मैं भी जानूं, 

मैं भी पहचानूं !! 


मैं एक माँ हूं , 

जिसकी हर साँस 

मैं रहती है चिंता !! 


मैं एक गृहिणी हूं , 

गृहकार्यों मैं व्यस्त , 

हौसला न होता पस्त !! 


मैं एक बहन हूं , 

करती हूं मार्गदर्शन , 

हितैषी भाइयों की हरदम !! 


मैं एक पत्नी हूं , 

पतिसेवा में लीन , 

शक्ति न होती क्षीण !! 


मैं एक बेटी हूं , 

मानती हूं कहना , 

हौसला जिसका गहना !! 


मैं इन सबका संगम !! 

किरदार देखो मेरा , 

विस्तृत और विहंगम !! 


- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

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                नारी 


अबला नही मैं सबला हूँ 

नारी की सुन्दर प्रतिमा हूँ 

निराकार को साकार देखती 

कमजोर नही लाचार नही हूँ 


नर हाथों की नही कठपुतली 

क्रूर दानव कर धरा को बांध लिया है 

क्रन्दन की गुहार लगा इंसान खड़ा हैं 

नभ मंडल पर अलंकृत नाम नारी हैं 


कैसा है इंसान यहाँ हैवान बन खड़ा हैं 

ढोंगी अत्याचारी बाबाओं का राज हो गया 

अब अबला नही अब सबला हूँ


क्रूर अत्याचारी व्यभाचारी को मार जाऊँगी 

धरती अम्बर विशाल काल ग्रास समा जाऊँगी 

अबला अब नही सबला हूँ !


तोड़ समाज की ज़ंजीरों को गाड़ जाऊँगी 

एक नया इतिहास बना जाऊँगी 

मयदानव को दिन में तारे दिखा जाऊँगी 

भारत माता हूँ अबला नही अब सबला हूँ 


कर हाथों से मुक्त भारतमाता 

को करा जाऊँगी । 

एक नया इतिहास रचा जाऊँगी 

 नारी सहासिक गरिमा की होती पहचान

  

लक्ष्य भेद शंखनाँद कर घर की होती 

नारी लक्ष्मी सरस्वती है जय भारत जय भारती 


नित नये ,स्नेह ,कर्तव्य की गंगा में पारिवारिक सामाजिक दायित्यों को निभाते ममत्व बाण ले शिक्षा दीक्षा देती नारी रामबाण ब्रह्म वाक्य में लीन सुप्रभात 


- अनिता शरद झा 

रायपुर - छत्तीसगढ

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          नारी-शक्ति  


समुन्दर की रेत नहीं, तुम्हारी बंद मुट्ठी से फिसल कर बिखर जाऊँ,


जलती-बुझती राख की चिंगारी, जलाने का अपार साहस रखती  हूँ. 


विद्रोह के स्वरों की चिंगारियाँ बुझी नहीं, कभी भी भड़क सकती हूँ. 


नारी-जाति-प्रतिनिधि बन, समष्टि-दानव-संहार की सनक रखती हूँ.


बलात्कार-व्यभिचार-अत्याचार, मार की शिकार बन लाचार नहीं हूँ. 


दर्द-वेदना की मारी लुटी-पिटी बेबस, बेजुबां अश्रुओं की धार नहीं हूँ.


आँखों से अंगारे बरसाने का रुतबा है, अनाम रिश्तों  का भार नहीं हूँ.


तुम क्या जानो मेरी अदम्य शक्ति? क्या चण्डी का अवतार नहीं हूँ?


- शील निगम

मुंबई - महाराष्ट्र 

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   महिला किसी से कम नहीं


पन्ना का तू पृष्ठ है , लक्ष्मी सी माँ  वीर।

है सुनीति की सीख माँ , सीता -सी वह पीर।।


माता की महिमा बड़ी , उससे है संसार।

हर साँचे में वह ढले , करती हर किरदार।।


माँ ही लक्ष्मी शारदा , करना जग सम्मान।

नहीं बहें आसूँ कभी ,   करना मत  अपमान।।


त्याग प्रेम  की गंग है , करे नहीं वह भेद।

  लगा सभी को वह  गले , करे न जग विच्छेद ।।


रहे धैर्य से वह भरी , भोली  - सी नादान।

 लगे प्रकृति सम सदा ,  कुदरत का वरदान।।


अपने में तू एक है , तेरे रूप  अनेक।

पीहर ओ ससुराल में , काम करे सब नेक।।


जैसी है वैसी भली , दिल से माँ दिलदार।

 खुद रह  भूखी बाल को , दे भोजन दमदार।।


तुम हो घर की धुरी , जग की रचनाकार।

भू पर लगती ईश की , दिव्य मूर्ति साकार ।।

 

संस्कृति की तू  ढाल है , तेरे से त्यौहार ।

रीति रिवाज नस्ल तक  ,  करती वह गुलजार।।


प्रेम दया की धार हो , जीवन की पतवार।

चले जगत तुझ से सदा , मानवता का सार।।


 - डॉ मंजु गुप्ता

 मुंबई - महाराष्ट्र 

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                नारी


चंचल नयन उज्जवल मन, 

स्नेही मयी तू बड़ी करुण क्रंदन, 

जिस घर आंगन होता सम्मान तेरा, 

वो घर आंगन बन जाता स्नेह का निधिवन।।

तू जननी ,सुता, भार्या ,सखी, सहेली नर की, 

चाहे स्नेह मान सम्मान निज हेतु अंजुल भर की, 

बन जननी जन्म देती तू सृष्टि का पालन करें, 

होती सहज धरा सी सूखे को मिटाने हेतु वृष्टि करें।।

भरती संस्कारों की निधि नित अपनी संतान में, 

हजारों रथि महारथी झुकें सदैव तेरे सम्मान में,

सदैव धर्म का प्रतीक नारी तू बनी मिटा अधर्म को,

मानव कों पाठ पढ़ाती रण चंडी सी महाभारत संग्राम में।।

- ज्योतिराज मधुरिमा 

धामपुर( बिजनौर) - उत्तर प्रदेश

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             मैं स्त्री हूॅऺ


सामाजिक ढाँचे में छटपटातीं-कसमसातीं मैं

नए रिश्तों की जकड़न-उलझन में पड़ कर 

पर पुराने रिश्तों को भी निभाकर

हरदम जीती-चलती-मरती हूँ मैं

रिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा ....

ऐसे ही रहती आई हूँ मैं

ऐसे ही रहना है मुझे ?


उलझी रहती हूँ उनसुलझे सवालों में मैं

जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में मैं

जीतने हो सकते हैं बदनामी का ठिकरा

हमेशा लगातार फोड़ा जाता है मुझ पर

उलझी रहती हूँ मैं

 लेकिन

हँसते-हँसते सब बुझते -सहते

हो जाती हूँ कुर्बान मैं


कब-कब , क्यूँ-क्यूँ , कहाँ-कहाँ , कैसे-कैसे

 छली , कुचली , मसली और तली गई हूँ मैं

मन की अथाह गहराइयों में

दर्द के समुद्री शैवाल छुपाए मैं 

शोषित, पीड़ित और व्यथित मैं

मन, कर्म और वचन से प्रताड़ित मैं


मानसिक-भावनात्मक और

सामाजिक-असामाजिक

कुरीतियों-विकृतियों की शिकार मैं

लड़ती हूँ पुराने रीति-रिवाजों से मैं

करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षित मैं

अंधविश्वासों की आँधी से

खुद रहती हूँ हरदम अभावों में मैं

पर देती हूँ सबको अभयदान मैं


नारी औरत हूँ मैं

जुझारू और जीवट

 जोश और संकल्पों से लैस मैं

सामाजिक-राजनीतिक चादर की गठरी में कैद मैं


ना तो हमारा हद तय करो

ना तो हमारे हद को पार करो


हाँ मैं स्त्री हूँ मैं!

- विभा रानी श्रीवास्तव 

  पटना - बिहार 

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               नारी


जननी कहो या कहो चिर संगिनी

तम में शिखा स्वरूप,मन बसा उसका ही रूप

पिलाती निज वक्ष क्षीर 

पालना झुलाती कभी

बनता चुभन तो

शर्म सार होती अटूट

लड़ता युद्ध रण

सारे रण क्षेत्र यदि

पुचकारती कहती प्रवीण  मां

दामिनी कभी प्राण दायिनी बनी

दुर्गा कभी बनी कालिका कुरूप

अन्नपूर्णा  कभी वरदान दायिनी रण चण्डिका कभी वीणा वादिनी बनी

देहप्राण सी कभी प्यारी प्रेरणा बनी

- अपर्णा गुप्ता 

लखनऊ - उत्तर प्रदेश 

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  पिता के उद्गार बेटी के लिए


जीवन संवार दिया, कुल को है तार दिया, ऐसी बेटी पर मुझे, बड़ा अभिमान है।

जितने भी दोहे, गीत लिख- लिख नाम पाऊं,   

ऐसा लगे बेटी मेरे छंदों की ही जान है।।

लोगों में जो सुनता हूं, जब मैं बड़ाई बड़ी, 

ऐसा लगे बेटी मेरी, हीरों की ही खान है।

आन- बान बनी मेरी, बेटी ही के नाम पर, बेटी ही तो मेरी पीली, पगड़ी की शान है।।

बेटी मेरी गीता बनी, बेटी मेरी भागवत, बेटी ही से मेरी अब, पद - पहचान है।

सपनों में बेटी देखूं, अपनों में बेटी देखूं , बेटी गंगा- यमुना मां, तीरथों का मान है।।

अब तो है ठान लिया, मन ने है मान लिया, बेटी गुरु ज्ञान और, बेटी भगवान है।।

कहां मैं विफल हुआ, जीवन सफल हुआ, बेटी घर, गांव और बेटी हिंदुस्तान है।।

 

- डॉ. संतोष गर्ग 'तोष'

 पंचकूला  - हरियाणा 

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