फिल्म अभिनेता ओम प्रकाश स्मृति सम्मान - 2025
“क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता।” यह वाक्य सुनने में साधारण लगता है, पर जीवन के हर मोड़ पर इसकी प्रासंगिकता सिद्ध होती है। क्रोध वह अग्नि है, जो पहले स्वयं को जलाती है और फिर सामने वाले को। क्रोध में लिया गया निर्णय न तो विवेकपूर्ण होता है, न ही न्यायपूर्ण। महाभारत से लेकर आज के सामाजिक जीवन तक, असंख्य उदाहरण हैं जहाँ क्रोध ने संबंध तोड़े, अवसर छीने और आत्मसम्मान को खंडित किया। दूसरी ओर, “जो अपना नहीं है, वह किसी का नहीं होता”—यह कथन स्वामित्व के भ्रम पर प्रश्नचिह्न लगाता है। हम जिन वस्तुओं, पदों, संबंधों या व्यक्तियों को ‘अपना’ मान लेते हैं, वे वास्तव में स्थायी नहीं होते। समय, परिस्थिति और नियति सब कुछ बदल देते हैं। जब हम किसी चीज़ पर अत्यधिक अधिकार जताते हैं, वहीं से असंतोष और क्रोध जन्म लेता है। क्रोध और स्वामित्व, दोनों एक-दूसरे के पोषक हैं। जिसे हम अपना समझते हैं, उसके छिन जाने का भय हमें क्रोधित करता है। और क्रोध हमें यह सोचने पर विवश कर देता है कि सब कुछ हमारे नियंत्रण में होना चाहिए। यही सोच व्यक्ति को भीतर से अशांत करती है।भारतीय दर्शन ‘वैराग्य’ नहीं, बल्कि ‘संतुलन’ सिखाता है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—आसक्ति ही दुःख का मूल है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि न कोई वस्तु, न कोई व्यक्ति पूर्णतः हमारा है, तब क्रोध स्वतः क्षीण हो जाता है। तब मन शांत रहता है और निर्णय अधिक मानवीय बनते हैं।आज के तनावपूर्ण जीवन में इन दोनों वाक्यों की सार्थकता और भी बढ़ जाती है। क्रोध से संवाद टूटता है, जबकि समझ से समाधान निकलता है। स्वामित्व के मोह से रिश्ते बंधते नहीं, बल्कि घुटने लगते हैं। अतः आवश्यक है कि हम स्वयं से यह प्रश्न पूछें—क्या हम अपने क्रोध के स्वामी हैं, या क्रोध हमारा स्वामी बन चुका है? क्या जिसे हम ‘अपना’ कहते हैं, वह वास्तव में हमारा है, या केवल हमारा भ्रम? यहीं से आत्मचिंतन शुरू होता है—और यहीं से मनुष्यता की ओर पहला कदम पड़ता है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
कहा गया है जिसने क्रोध को जीत लिया, उसने दिल जीत लिया। असल क्रोध एक अनावश्यक आवेश होता है जो सबसे पहले समझ को दूर कर देता है। फिर वाणी को । जिससे क्रोधित व्यक्ति अपनी एक तरफा सोच को लेकर आवेश में ऊटपटांग यानी जो मन में आये बोलता रहता है। उसे तब न मान-सम्मान की फिक्र होती है, न मर्यादा की। न रिश्तों के निर्वहन की, न भविष्य में होने वाले दुष्परिणामों की। न जान-माल की अर्थात क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता है। उसे सबसे बुरा और घातक माना जाता है। क्योंकि क्रोध के बाद के परिणाम कभी-कभी पीढ़ियों तक को भुगतना पड़ते हैं। अत: प्रयास यही होना चाहिए कि क्रोध से बचा जा सके। दूसरा यह कि जो अपना नहीं है वह किसी का नहीं होता है, इस बात के तथ्य को भी समझना समझदारी होगी, जागरूकता होगी, सजगता होगी। जिन्दगी में अपना और अपनापन का महत्व विशेष होता है। इनमें रिश्तों की अहमियत,मिठास और विश्वास की महक होती है। ऐसे में जो इस महक की कद्र नहीं कर पाता। अपनों से रिश्ते नहीं पाता। फिर यह स्पष्ट ही है कि उससे दूसरों के प्रति क्या और कैसे उम्मीद की जा सकती है। जो अपनों का नहीं हुआ, वह दूसरों का हो ही नहीं सकता। सार यही है कि जीवन में पग-पग पर समझदारी और सजगता की आवश्यकता है और उसका महत्व भी।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
मानव मात्र के पाँच अवगुण कहे गये हैं यथा "काम क्रोध मद मोह लोभ " ये अवगुण इंसान को दिशा भ्रष्ट करते हैं। सचमुच क्रोध में इंसान अंधा हो जाता है भले बुरे का भान खो जाता है। अधिकतर अपराध क्रोध के आवेश में ही होते है। इसलिये सदैव ही क्रोध को पाप का मूल कहा है। इंसान वेद-पुराणों में पढते हैं क्रोध पाप अपराध का मूल है। स्वयं को सँभालें---अपने आप को परखें। जो क्रोध के वशीभूत होकर अपना नही रह जाता वह किसी का नहीं होता है। स्वयं को जाने - - स्वयं को परखें। जो अपना आप को जान लेता है वही परम सत्ता को पहचान लेता है। जो अपना नही हो पाया वह किसी का भी नहीं होता है इसीलिए ज्ञानी मुनि विज्ञानी कह गये हैं कि क्रोध न करें स्वयं को पहचानें। स्वयं को परमेश्वर का दूत मानते हुये शांत चित्त से रहें यही जीवन का सार है। सबको अपना बनाये - - - आप सबको साथ ले कर चलें निःसंदेह स्वर्ग यहीं है यहीं है यहीं है
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन क्रोध ही होता है.यह किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता है. क्रोध मनुष्य के विवेक को खा जाता है. आजतक क्रोध से किसी का भला नहीं हुआ है तो वह दूसरे का भला कैसे कर सकता है. क्रोध करने से क्रोध करने वाले का ही नुकसान होता है. तो जो चीज़ अपना नुकसान करेगा वह तो दूसरे का भी नुकसान करेगा.महर्षि बाल्मीकि ने क्रोध किया और रामायण में प्रसंग गलत लिख बैठे. शास्त्रों के अनुसार उन्हें सीता का वनवास नहीं लिखना था. लेकिन रामायण लिखते समय एक पक्षी ने उनके ऊपर विष्ठा कर दिया, और उन्होंने क्रोध से उसे देखा वह जल मरा.उसके बाद उनका दिमाग भ्रमित हो गया और वो उल्टा रामायण लिख बैठे. इस तरह से बहुत से ऋषि मुनि क्रोध कर के नुकसान और पश्चाताप किए हैं. तो उसे तरह मनुष्य भी य़ह जानते हुए क्रोध करते हैं और अपना रक्तचाप बढ़ा लेते हैं. और दूसरे का नुकसान हो या न हो पहले अपना नुकसान कर लेते हैं. क्रोध तो कभी अपना हो ही नहीं सकता तो वह दूसरे का क्या होगा. इसलिए क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता है. इसे सदा ही बचकर रहना चाहिए. क्योंकि क्रोध जाने के बाद पश्चाताप दे जाता है. इसलिए क्रोध से हमेशा बच के रहिए और दूसरे को भी बचाएँ.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
हम अपने क्रोध को जायज ठहराने के लिए कई तर्क देते रहते हैं जैसे मैं क्रोध करता नहीं मुझे आ जाता है, थोड़ा क्रोध तो करना पड़ता है, जरूरी होता है, ना करो तो कोई सुनता नहीं है, क्या करूँ आदत पड़ गयी है, इसे रोकना किसी के हाथ में थोड़े ही होता है, ऐसा कर लें तो भगवान ही न बन जाए आदि...। चाहे कितने ही तर्क क्यों न दें उनसे क्रोध अच्छा नहीं हो जाएगा। क्रोध हमारे शरीर व मन को तो नुकसान पहुँचाता है रिश्ते भी खराब कर देता है और एक बार खराब हुए रिश्तों को ठीक करना बड़ी मेहनत का काम है। मेहनत करने पर भी रिश्ते ठीक हो जायेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है इसलिए क्रोध को स्वयं से दूर रखने का प्रयास करना ही अपने व अपने रिश्तों को बचाये रखने का एकमात्र उपाय है।
- दर्शना जैन
खंडवा - मध्यप्रदेश
क्रोध को क्षणिक पागलपन कहा गया है। यह स्वयं के साथ साथ दूसरों को भी भारी क्षति पहुंचाता है। इसके कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि व्यक्ति का अपनी ही वाणी और कर्म पर नियंत्रण नहीं रहता।क्रोधावेश में स्वयं का भी भारी नुक़सान होता है शरीर में हार्मोनल डिस्टर्बेंस होता है और क्रोध से शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर कई रोग उत्पन्न जैसे: हृदय गति और रक्तचाप बढ़ना, तनाव हार्मोन (एड्रेनालाईन) का स्राव, सोचने-समझने की क्षमता का कम होना, रिश्तों में तनाव, और शरीर में पाचन संबंधी समस्याएँ व सूजन, जो अंततः सिरदर्द, डिप्रेशन, और हृदय होने लगता है।इस तरह क्रोध कभी अपना नहीं होता यानी एक शत्रु के समान है क्रोध। इसलिए जहां तक संभव हो क्रोध करने से बचना चाहिए।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता, जो अपना नहीं किसी का नहीं हो सकता...यह बिल्कुल सत्य है... यह कहावत है ना..! "क्रोध का अस्त्र चालक को ही घायल करता है"... किसी भी कारणवश जब व्यक्ति को क्रोध आता है, तो वह अपने आप को काबु में नहीं रख पाता... उस समय उसके क्रोध की इंद्रीय इतनी सक्रिय होती है कि उसके सम्मुख विवेक, बुद्धि, धैर्य, संयम कुछ भी मायने नहीं रखती। कहने का मतलब उसकी क्रोध की इंद्रिय काबु में नहीं रहती, वह विवेकहीन हो जाता है ऐसी अवस्था में वह अपने आप को काफी नुकसान पहुंचाता है । क्रोध के समय व्यक्ति का दिमाग अस्थिर एवं अशांत होता है जिसकी वजह से क्षणिक आवावेश में आकर वह अपने ही स्वजनों से विमुख हो जाता है। गलत फैसले लेने लगता है ,रिश्ते टूट जाते हैं, संबंध टूटते हैं, मन अशांत रहता है, स्वास्थ पर बुरा प्रभाव पड़ता है आदि आदि... इसीलिए तो कहते हैं कि जो अपना नहीं है वह किसी का नहीं हो सकता ... अर्थात जिसका खुद पर नियंत्रण नहीं है वह दूसरे को क्या संभालेगा....
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
क्रोध किसी भी परिस्थिति में उपयोगी नहीं होता। क्रोध व्यक्ति की विवेक शक्ति को क्षीण करता है, निर्णयों को धुँधला करता है और सम्बन्धों को चोट पहुँचाता है। क्रोध अस्थायी होता है पर उसका प्रभाव स्थायी घाव छोड़ देता है। इसलिए शान्ति, धैर्य और अनुशासन ही श्रेष्ठ मार्ग हैं, भले ही इन पर नियंत्रण रखना कभी-कभी असम्भव सा प्रतीत हो। परन्तु यही नियंत्रण व्यक्ति को व्यक्तित्व से महानता तक ले जाता है। जहाँ तक ‘जो अपना नहीं है वह किसी का भी नहीं होता’ का प्रश्न है यह वाक्य नैतिकता का शाश्वत सिद्धान्त है। व्यक्ति, पद, अधिकार, सम्पत्ति, या सफलता, यदि वह सत्य, परिश्रम और नैतिक श्रम से प्राप्त न हों, तो टिक नहीं पाते। अनैतिक साधनों से अर्जित वैभव क्षणिक है। क्योंकि समय उसे धूल में बदल देता है। इतिहास इसी सत्य का साक्षी है। आज राष्ट्र, समाज, शासन और न्याय, सभी एक विमर्श-स्थल पर खड़े हैं। समय और परिस्थिति हमसे सत्य, शान्ति, संयम और राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानने की माँग कर रहे हैं। चरित्रहीन उन्नति राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकती, चरित्रशील समर्पण ही राष्ट्र को महान बनाता है।किन्तु यहाँ एक गम्भीर विडम्बना भी है जो राष्ट्रनिर्माण से जुड़ी दो महत्वपूर्ण आधारशिलाएँ हैं, जिनमें पहली आधिकारिक आधारशिला स्वर्ण सिंह समिति है और दूसरी जस्टिस वर्मा कमेटी की अनुशंसाएँ हैं, जिन्हें आज तक पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया है। यह भारतीय संविधान, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक सुधारों की दिशा में एक अधूरा अध्याय है। हालांकि इससे भी बड़ी विडम्बना यह है कि माननीय उच्चतम न्यायालय के विद्वान मुख्य न्यायाधीश श्री सूर्यकांत शर्मा जी के संरक्षण में कार्यरत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली तथा माननीय जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति श्री अरूण पल्ली जी के संरक्षण में कार्यरत राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण करोड़ों रुपये जागरूकता के नाम पर खर्च तो कर रहे हैं, परन्तु प्रेस कोर कॉउन्सिल के आवाहन के बावजूद विद्यालयों और महाविद्यालयों में स्वर्ण सिंह समिति एवं जस्टिस वर्मा कमेटी की अनुशंसाओं पर जन-जागरण नहीं करा रहे। यह राष्ट्रहित, संविधानबोध और लोकतांत्रिक चेतना की सबसे बड़ी अनदेखी है। फिर भी सत्यमेव जयते यही कहता है कि हमारा ध्येय क्रोध से नहीं, विवेक से; संघर्ष से नहीं, समाधान से, अधिकार से नहीं, मौलिक कर्तव्य से, और व्यक्तिगत लोभ से नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्रेम से संचालित होना चाहिए।क्योंकि प्रेस कोर कॉउन्सिल संगठन अपने मौलिक कर्तव्य, नैतिकता और सत्यनिष्ठा के आधार पर खड़ा है। जो अपना कर्तव्य निभाता है, वही न्याय पाने का अधिकारी है। जो सत्य पर चलता है, समय उसके साथ खड़ा होता है। और जो राष्ट्रहित में अपना जीवन अर्पित करता है, वास्तव में वही आने वाले इतिहास का निर्माता बनता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
यह बात सच है कि क्रोध करना किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता है क्योंकि इससे हमारा मानसिक स्वास्थ्य खराब होने के साथ साथ पारिवारिक, सामाजिक रिश्तों में टूटन के हालात पैदा हो जाते हैं। क्रोध अक्सर उपेक्षित ,असफल होने की स्थिति में या फिर अन्याय का प्रतिकार स्वरूप होता है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोधात्मक प्रतिक्रिया करना व्यक्ति का स्वभाव बन जाता है जो कलह कारी होता है और फिर यह इतना विनाशकारी होता है कि व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होने लगती है। स्मृति का नाश होने लगता है । क्रोधी व्यक्ति अपना भला बुरा नहीं सोच सकता। विवेक शून्य होकर दूसरे की मारक स्थिति बना लेता है या कभी स्वयं अति का शिकार होकर अपने को ही समाप्त कर बैठता है। वर्तमान समय में बालक विधार्थी तथा युवा वर्ग द्वारा जीवन के हर क्षेत्र में तनिक भी असफल होने पर क्रोध की क्रियाओं में बहुत आगे बढ़कर अपना नुकसान तो करते ही हैं साथ में दूसरे का भी। कभी कभी क्रोधी व्यक्ति विपरीत कार्यों के लिए पूरी लॉबी ही तैयार कर लेते हैं जो कि देश और समाज के लिए बहुत गलत होती है । इससे व्यक्ति समाज में मान सम्मान खो बैठता है। क्रोधी व्यक्ति जब अपना ही अच्छा बुरा नहीं सोच सकता तो वह किसी दूसरे का क्या सहयोग करेगा।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
क्रोध किसी भी स्थिति में सही नहीं होता जो अपना नहीं किसी का नहीं होता। आज की चर्चा परिचर्चा का विषय बहुत ही सामयिक और ज्वलंत है। क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दोनों बातें हर किसी के मुख से सुनी जा सकती हैं। क्योंकि प्रतिदिन की दिनचर्या में इन दोनों बातों का सामना किसी न किसी रूप में किसी न किसी को करना ही पड़ता है और दोनों ही बातें मनोभावों से जुड़ी हुई हैं। यानि मनोविज्ञान की दृष्टि से दोनों ही मनोविकार हैं। क्योंकि क्रोध किसी भी स्थिति में जब किया जाता है तो केवल उससे स्वयं को ही किसी न किसी रूप में हानि उठानी पड़ती है। यह क्षणिक मनोवृति कई बार इतनी घातक हो जाती है कि इसके परिणाम जीवन पर्यंत पछतावे के रूप में भुगतने पड़ते हैं। इसके द्वारा प्रकट हुई हानियां छोटी से लेकर अंतिम सीमा वाली हो सकती हैं। सामाजिक दृष्टि से क्रोध तीन प्रकार का होता है प्रथम तामसिक क्रोध:- वास्तव में यह क्रोध खतरनाक श्रेणी में आता है। इससे मनुष्य को बचना बहुत ही अनिवार्य है। क्योंकि इसमें मनुष्य किसी दूसरे व्यक्ति को हानि पहुंचाना चाहता है। दूसरे को पहुंचाई गई हानि, दूसरे के साथ-साथ अपनी भी बहुत बड़ी हानि कर देती है। क्योंकि उसके परिणाम स्वयं को ही भुगतने पड़ते हैं। नंबर दो क्रोध शासकीय होता है जिसमें मलिक अपने नौकर को दंड का भय दिखा करके अपनी सीमाओं के भीतर रहने के लिए क्रोध के माध्यम से इंगित करता है। तीसरे नंबर का क्रोध सात्विक होता है यह क्रोध गुरु द्वारा, शिष्य के लिए या गुणीजनों द्वारा अपनों के लिए बड़े ही सौम्य ढंग से जताया जाता है ताकि वह जीवन की दौड़ में अपने लक्ष्य को मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत कर सकें। इसलिए प्रथम प्रकार के गुस्से को कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता यह क्रोध हर स्थिति और परिस्थिति में घातक ही होता है। इसके परिणाम स्वयं को आहत करने वाले ही होते हैं। ऐसा व्यक्ति कभी भी अपना नहीं हो सकता और जो अपना नहीं हो सकता वह किसी का हो ही नहीं सकता।
- डॉ रवीन्द्र कुमार ठाकुर
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
अगर क्रोध की बात करें तो क्रोध सभी मनुष्यों में पाई जाने वाली एक बुनियादी और स्वाभाविक मानवीय भावना है जो निराशा, अन्याय या खतरे से उतपन्न होती है,लेकिन क्रोध एक ऐसी भावना है जो किसी भी स्थिति में अच्छी नहीं होती क्रोधी व्यक्ति अक्सर अपना और दुसरे का भी नुकसान कर देता है तो आईये आज इसी चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं की क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता जो अपना नहीं वह किसी का नहीं होता,बिल्कुल सत्य है कि क्रोध अपना सगा नहीं होता तो किसी का भला कैसे कर सकता है ,अक्सर हम क्रोध में आने से अपना ही नहीं दुसरों का भी नुक्सान कर देते हैं अगर धार्मिक ग्रन्थों की बात करें तो गीता में साफ कहा गया है कि क्रोध से भ्रम पैदा होता है,भ्रम से स्मृति का नाश होता है और स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है जिससे पता चलता है कि क्रोध केवल भावना ही नहीं है बल्कि विनाश की जड़ है, इससे मानसिक अशांति,बेचैनी और चिड़चिड़ापन जैसी बिमारीयां जन्म लेती हैं,यही नहीं क्रोधी व्यक्ति से रिश्तेदार,दोस्त संबधी दूर होने लगते हैं जिस से ज्ञात होता है कि क्रोध किसी भी स्तिथि में अच्छा नहीं होता यह न अपने आप को नष्ट कर देता है बल्कि दुसरों को भी नुक्सान देता है क्रोध में सिर्फ अपनापन ही नहीं खो जाता बल्कि दुसरों की इज्जत भी मिट्टी में मिल जाती है, इसमें सही गलत का अनुमान नहीं लगताऔर जल्दबाजी में अपना और दुसरों का नुकसान हो जाता है तथाअपनी सेहत पर गहरा प्रभाव पड़ता है,अन्त में यही कहुंगा की क्रोध को अपने पास पनपने नहीं देना चाहिए अगर ऐसी स्तिथि बन भी जाए तो थोड़ा धीरज से काम लेना चाहिए क्योंकि कुछ देर के बाद क्रोध शान्त होने लगता है नहीं तो मनुष्य जल्दबाजी में आपा खो बैठता है जिससे वो अपनी हानि तो करता ही लेकिन दुसरों पर भी भारी पड़ता है ऐसे व्यक्ति से सभी दूर होने लगते हैं और वो खुद को अकेला महसूस करने लगता है और अपना चैन तो खो ही देता है लेकिन दुसरों की नजरों में भी गिर जाता है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
" मेरी दृष्टि में " क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। लगभग हत्या जैसे अपराध अक्सर क्रोध में होते हैं। इसलिए क्रोध से बचाव अवश्य करना चाहिए। बाकी तो परिवार के संस्कार पर निर्भर करता है। या कहें कि कर्म मतलब भाग्य ही सब-कुछ करता है। अतः इंसान और क्रोध का संबंध उम्रभर का होता है।
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