सरदार उधम सिंह स्मृति सम्मान - 2025
"कर्म जिंदगी का परिणाम होता है, भाग्य कर्म का स्वरूप होता है" ये लाइन हमें हमारे कर्मों और उनके परिणामों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती है। हमारे द्वारा किए गए कार्य और प्रयास ही हमारे जीवन को आकार देते हैं और हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं। जब हम अच्छे कर्म करते हैं, तो अच्छे परिणाम और जब हम बुरे कर्म करते हैं तो बुरे परिणाम मिलते हैं।- *भाग्य ही हमारे कर्मों का संचित परिणाम है। यह हमारे पूर्वजन्म के कर्मों और इस जन्म के कर्मों का मिश्रण हो सकता है। भाग्य हमारे कर्मों का स्वरूप होता है,जोकि हमें अपने कर्मों की महत्ता को समझने के लिए प्रेरित करता है। हमारे कर्म ही हमारे जीवन को सफल या असफल बनाते हैं।अच्छे सोच विचार ही आत्मनिर्भरता की ओर प्रेरित करते है, क्योंकि हमारे कर्म ही हमारे भाग्य को बदल सकते हैं। अगर हम अच्छे कर्म करते हुए सकारात्मक सोच रखते हैं, तो हमारा भाग्य भी अच्छा ही होगा। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और भाग्य को अपने हाथों में लेना चाहिए। कहा भी है ..............
रह भरोसे भाग्य के
दुख भोग पछताते नहीं।
जीवन में कर्म और भाग्य का बहुत महत्व है क्योंकि यह हमें अपने निर्णय लेने में मदद करता है। अगर हम अच्छे कर्म करते हैं, तो हमें अच्छे परिणाम मिलेंगे।ऐसी सकारात्मकता सोच ही हमें जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
कर्म और भाग्य जीवन के दो ऐसे कारक हैं जिनके अनुसार जिंदगी जीने का अवसर मिलता है। सच पूछा जाये तो कर्म करने के आधार पर ही जीवन तय होता है, भाग्य तो केवल उत्प्रेरक का कार्य करता है। कहा भी गया है, " कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।जो जस करहिं तो तस फल चाखा। " अर्थात कर्म को प्रधान माना गया है। आशय यही कि जीवन में सदैव सद्कर्म ही करना चाहिए। इसके लिए इतनी समझ तो सभी रखते हैं कि कौनसा कार्य अच्छा है, कौनसा बुरा। फिर हम कभी तो समझ की बात मानकर जो कर्म अच्छा होता है, वह कर लेते हैं लेकिन कभी-कभी हम लोभ, मोह,माया,अहम के चक्कर में अपनी समझ को अनसुना कर वह कर्म कर लेते हैं जो अनुचित होता है। इन दोनों स्थितियों में किए गए कार्य ही हमारा भाग्य बनकर उत्प्रेरक की तरह काम कर हमारे जीवन के स्वरूप को तय करते हैं। इस प्रकार कर्म का परिणाम और भाग्य का स्वरूप भी दो तरीके का होता है। एक प्रकार में तो हमारा जन्म, उम्र, वर्ग, प्रतिभा, सम्पन्नता, रूप और स्वास्थ्य तय करता है और दूसरे प्रकार में दैनिक जीवन के उतार-चढ़ाव तय करता है। ऐसा महसूस भी किया होगा हर दिन और हर रात प्राकृतिक रूप से एक जैसी ही होती हैं किंतु हमारी मानसिक और शारीरिक स्थिति रोज समान नहीं होती। कभी खुशमिजाज होते हैं तो कभी किसी बात को लेकर तनाव हो जाता है।इन दोनों प्रकार के पीछे, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में हमारे कर्म का आधार ही कारक होता है। पूरे जीवन में किये गये कर्म से पहला प्रकार और प्रतिदिन किए गए कर्म से दूसरे प्रकार का आधार यानी परिणाम मिलता चलता है। अत: यह कहना,समझना और मानना गलत नहीं होगा कि कर्म जिन्दगी का परिणाम होता है। भाग्य कर्म का स्वरूप होता है। ऐसा मेरा मानना है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
कर्म व्यक्तित्व जीवन का आधार होता है जिसके कर्म स्वरूप ही व्यक्ति अपने जीवन को सफल सार्थक बनाता उपलब्धियां हासिल करता चुनौतियों का सामना,समाजस्य बिठा लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन अपने साथ दूसरों का जीवन भी सुख समृद्ध बना आगे बढ़ता जाता है !भाग्य पर नही कर्म पर भरोसा कर आगे बढ़ता नेक राह चल समस्याओं को सुलझाता जाता है ! भाग्य ही कर्म का स्वरूप होता है ! किस्मत हाथों की लकीरों से नही कर्म हुनर हाथों से चमकाया जाता है छोटी लकीर के नीचें बड़ी लकीर खिंचे आगे बढ़ा मय से नही स्वयं के कर्म धर्य शालीनता पूर्वक व्यवहार कर आगे बढ़ने कोशिश में कामयाबी हासिल करने की कोशिश में लगा रहता है ! यही सद्गति होती है उचित सँगी का साथ निभा नियति पर नहीं ख़ुद पर भरोसा करना सीख जाता है जीवन कर्म आधार को सही मानता है ! कर्म ही जीवन के परिणाम को सद्गति प्रदान करता हैं! यही भाग्य का निश्चल स्वरूप होता हैं !
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
अगर कर्म और भाग्य की बात करें तो कर्म ही जीवन के परिणाम होते हैं क्योंकि अच्छे कर्म सुख शान्ति तथा उन्नति की तरफ ले जाते हैं और बुरे कर्म ,दुख और अशान्ति लाते हैं,इसलिए हमें हर कार्य का फल मिलता है जो हमारे भविष्य को अकार देता है,अगर भाग्य की बात करें तो यह सचमुच कर्म का ही स्वरूप होता है, क्योंकि जो हम बोते हैं वही काटते भी हैं तो आईये आज इसी चर्चा पर बात करते हैं की कर्म जिन्दगी का परिणाम होता है और भाग्य कर्म का स्वरूप, मेरे ख्याल में जीवन एक उपहार है और इसे सर्वोत्तम तरीके से जीना चाहिए,अपने कर्मों को शुद्ध रख कर हर कार्य करना चाहिए क्योंकि कर्म ही हमारे प्रतिबिंब होते हैं यही हमारे जीवन को उदेश्पूर्ण बनाते हैं,अगर भाग्य की बात करें तो भाग्य कोई पूर्व लिखित नियति नहीं है भाग्य भी हमारे कर्मों का ही प्रतिबिंब हैं इसलिए भाग्य को कोसने के अतिरिक्त अच्छे कर्मों पर ध्यान देना जरूरी है जिनसे हमारा भविष्य उज्ज्वल बन सके हां बिना प्रयास किए अच्छे अवसर मिलना भाग्य हो सकता है लेकिन उन अवसरों का सदुपयोग करना हमारा कर्म है,देखा जाए कर्म मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाता है और भाग्य को अर्थहीन बना सकता,भाग्य को अच्छे कर्मों से बदला जा सकता है क्योंकि मनुष्य योनि में नया कर्म करने की शक्ति होती है जिससे व्यक्ति अपने भाग्य को बदल सकता है, अन्त में यही कहुंगा की कर्म हमारे द्वारा वर्तमान में किए गए कार्य, विचार और इरादे हैं जो भविष्य का परिणाम तय करते हैं जबकि भाग्य कईबार पिछले कर्मों का फल होता है जिन्हें हमें भोगना पड़ता है लेकिन कर्म वो हैं जिन्हें हम करते हैं और भाग्य उनके परिणामों का ही एक रूप होता है जिसे अच्छे कर्मों से बदला जा सकता है इसलिये कर्म जिंदगी का परिणाम होता है और भाग्य कर्म का स्वरूप ।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
जिस तरह जीवन बीमा जिंदगी के साथ होता है और जिंदगी के बाद भी इसी तरह कर्म भी जिंदगी के साथ होते हैं और जिंदगी के बाद भी. कर्म जिंदगी का परिणाम होता है भाग्य कर्म का स्वरूप होता है कथन कर्म और भाग्य के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता है, जहाँ कर्म जीवन का परिणाम यानी, आपके कार्य आपके वर्तमान जीवन को बनाते हैं और भाग्य कर्म का स्वरूप यानी, आपके पिछले कर्म ही आपका भाग्य तय करते हैं, जो बताते हैं कि आपका आज का काम ही कल का भाग्य बनता है और भाग्य के फल यानी, सुख-दुःख) भी कर्मों पर ही आधारित होते हैं; मनुष्य अपने कर्मों से भाग्य बदल सकता है और उसे कर्म पर ही ध्यान देना चाहिए. क्योंकि कर्म जिंदगी का परिणाम होता है और भाग्य कर्म का स्वरूप होता है.
- लीला तिवानी
सम्प्रति -ऑस्ट्रेलिया
जीवन के परिदृश्य में कर्म प्रधान होता है, उसी के परिप्रेक्ष्य में अंतिम समय तक हमारा रहस्य,लक्ष्य निर्धारित करता है, इसी के परिवेश में कर्म जिन्दगी का परिणाम होता है, भाग्य कर्म का स्वरूप होता है। अच्छा कर्म प्रतिदिन करोगें तो उसका मुल्यांकन होगा, नहीं तो 24 घंटे में एक भी अकर्म हो जाता है, तो हमारा कर्म प्रधान शून्य हो जाता है, समय बताकर नहीं आता है,अच्छा कर्म करते घटेश्वर हो जाता है। एक कहावत है, भाग्य के भरोसे कर्म करते है, अगर भाग्य में ही कुछ नहीं लिखा है, तो कर्म करने से भी कुछ नहीं मिलता। जैसा कर्म करते जायेंगे वैसे-वैसे भाग्य के स्वरूप को बल मिलता जाएगा....
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
कहा गया है कि ये मानव जीवन बड़ा कठिन से मिलता है. तो ये जिंदगी जो हमें मिली है उसमें हमने क्या किया. कौन-कौन से अच्छे कर्म किए कौन से कर्म बुरे किए. यानी जिंदगी में हमने क्या-क्या किए. वहीं जिंदगी का परिणाम हो जाता है. मतलब कर्म ही हमारे जिंदगी का परिणाम हो जाता है. जो आप कर्म किए वहीं परिणाम बनकर जिंदगी को परिभाषित करता है. और भाग्य कर्म का स्वरुप होता है. क्योंकि हम जैसे कर्म करते हैं हमारा भाग्य वैसा ही बनता जाता है. इसलिए कहा जाता है कर्म जिंदगी का परिणाम होता है और भाग्य कर्म का स्वरुप होता है.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
मनुष्य का जीवन प्रश्नों, संघर्षों, आशाओं और संभावनाओं से भरा हुआ है। इन्हीं प्रश्नों में सबसे गहन और स्थायी प्रश्न कर्म और भाग्य का सम्बन्ध है। सामान्यतः भाग्य को ऐसा तत्व मान लिया जाता है जो मनुष्य के नियन्त्रण से बाहर है, जबकि कर्म को सीमित और क्षणिक प्रयास समझा जाता है। किंतु गहन विचार करने पर स्पष्ट होता है कि वास्तव में कर्म ही जीवन की मूल रचना है और भाग्य उसी कर्म का विस्तारित, परिष्कृत और समयानुसार प्रकट होने वाला स्वरूप है। कर्म का अर्थ केवल शारीरिक श्रम या प्रत्यक्ष कार्य नहीं है। मनुष्य के विचार, उसकी नीयत, उसकी संवेदनाएँ, उसके शब्द और उसकी सभी प्रतिक्रियाएँ कर्म के ही सूक्ष्म रूप हैं। जब कोई व्यक्ति सकारात्मक सोच रखता है, न्यायपूर्ण दृष्टि अपनाता है और सत्य के मार्ग पर चलता है, तो वह ऐसे कर्म करता है जो भले ही तत्काल फल न दें, परन्तु दीर्घकाल में उसके जीवन की दिशा को सकारात्मक रूप से निर्धारित करते हैं। यही कर्म आगे चलकर भाग्य का रूप धारण करते हैं। भाग्य को यदि कर्म से अलग कर दिया जाए, तो जीवन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है। ऐसा मानना कि सब कुछ पहले से तय है और मनुष्य केवल कठपुतली है, व्यक्ति को निष्क्रिय, निराश और पलायनवादी बना देता है। इसके विपरीत, यह विश्वास कि भाग्य कर्म का ही स्वरूप है, मनुष्य को उत्तरदायित्वशील बनाता है। वह अपने जीवन की हर परिस्थिति के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानता है और सुधार की प्रक्रिया भीतर से आरम्भ करता है। कर्म का सिद्धान्त हमें यह भी सिखाता है कि हर कार्य का फल तत्काल मिलना आवश्यक नहीं है। जीवन में अनेक बार ऐसा होता है कि सत्य, सत्यनिष्ठा और परिश्रम का मार्ग अपनाने वाला व्यक्ति अस्थायी रूप से संघर्ष और कठिनाइयों से घिर जाता है, जबकि अनुचित मार्ग अपनाने वाले लोग तात्कालिक लाभ उठाते दिखाई देते हैं। किन्तु यह मात्र समय का भ्रम है। कर्म का न्याय समय की कसौटी पर होता है, और अन्ततः वही कर्म स्थायी फल देता है जिसमें नैतिकता और सत्य निहित होता है। सकारात्मक कर्मों का सबसे बड़ा प्रभाव मनुष्य के आंतरिक व्यक्तित्व पर पड़ता है। जब व्यक्ति सही कर्म करता है, तो उसका आत्मसम्मान सुदृढ़ होता है। वह परिस्थितियों से टूटता नहीं, बल्कि उनसे सीखता है। यही आंतरिक दृढ़ता आगे चलकर बाहरी परिस्थितियों को भी परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। ऐसा भाग्य केवल सुविधा या सफलता तक सीमित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति को आत्मिक सन्तोष, स्थिरता और गरिमा भी प्रदान करता है। भाग्य के परिवर्तनशील स्वरूप को समझना अत्यन्त आवश्यक है। यदि भाग्य पूर्णतः स्थिर होता, तो सुधार, संघर्ष और परिवर्तन की कोई सम्भावना ही नहीं रहती। किन्तु इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों और समाजों ने अपने कर्म बदले, उन्होंने अपना भाग्य भी बदला। शिक्षा, अनुशासन, परिश्रम और नैतिक मूल्यों को कर्म का आधार बनाने वाले समाजों ने प्रगति, सम्मान और स्थायित्व प्राप्त किया। इसके विपरीत, जहाँ अन्याय, भ्रष्टाचार और स्वार्थ को कर्म बना लिया गया, वहाँ पतन अनिवार्य हुआ। मुझे जानने और पहचानने वाले मेरा वर्तमान मूल्यॉंकन कर सकते हैं? व्यक्ति के जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ कर्म-पथ की परीक्षा होती हैं। संघर्ष यह देखने आता है कि मनुष्य परिस्थितियों के दबाव में अपने मूल्यों से समझौता करता है या नहीं। जो व्यक्ति कठिन समय में भी सकारात्मक और न्यायपूर्ण कर्म करता है, वही अन्ततः ऐसे भाग्य का निर्माण करता है जो उसे केवल सफलता नहीं, बल्कि अनुभव, परिपक्वता और दूरदृष्टि भी प्रदान करता है और सत्य भी यही है कि जो वह देखता है उसे पागल कहने वाले नहीं देखते हैं। सेवा और परोपकार कर्म का सर्वोच्च रूप हैं। जब मनुष्य निस्वार्थ भाव से समाज, राष्ट्र और मानवता के हित में कर्म करता है, तो उसका भाग्य केवल व्यक्तिगत सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। ऐसा भाग्य सामूहिक चेतना से जुड़ जाता है और व्यक्ति को व्यापक अर्थों में सार्थकता का अनुभव कराता है। यही वह स्थिति है जहाँ जीवन केवल ‘जीना’ नहीं रह जाता, बल्कि ‘उपयोगी होना’ बन जाता है। कर्म और भाग्य के इस अनमोल सम्बन्ध को स्वीकार करने से जीवन में शिकायतों का स्थान उत्तरदायित्व ले लेता है। व्यक्ति दूसरों को दोष देने के बजाय आत्मविश्लेषण करता है और अपने कर्मों को सुधारने का प्रयास करता है। यही दृष्टिकोण उसे निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और उसे आंतरिक रूप से स्वतन्त्र बनाता है। आज के समय में, जब समाज त्वरित परिणामों और सतही सफलताओं की ओर आकर्षित है, कर्म का यह दर्शन अत्यन्त प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें धैर्य, निरन्तरता और नैतिक साहस का महत्व समझाता है। यह सिखाता है कि सही कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते हैं वे चाहे तुरन्त फल दें या समय लेकर, अन्ततः जीवन को दिशा और उद्देश्य अवश्य प्रदान करते हैं। अन्ततः यह कहा जा सकता है कि कर्म जीवन की आधारशिला है और भाग्य उसी पर खड़ा हुआ निर्माण। यदि आधार सत्य, न्याय और सकारात्मकता से बना है, तो भाग्य का स्वरूप भी उज्ज्वल, स्थिर और सम्मानजनक होगा। इसलिए मनुष्य का मौलिक कर्तव्य यह है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में अपने कर्म को श्रेष्ठ बनाए, क्योंकि वही कर्म आगे चलकर उसके जीवन का भाग्य बनते हैं और यही भाग्य "सौभाग्य" बनकर माननीय न्यायालय के सम्मानित पदों पर बैठे भ्रष्ट न्यायाधीशों को भी कटघरे में खड़ा करने में सक्षम हो जाता है।यही वैचारिक चेतना मनुष्य को निराशा से आशा की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर और निष्क्रियता से सृजनशीलता की ओर ले जाती है। यही कर्म का सत्य और यही भाग्य का वास्तविक स्वरूप है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर
" मेरी दृष्टि में " भाग्य और कर्म। एक नदी के दो किनारे है। जो कभी नहीं मिलाते है। परन्तु फिर भी एक रहते हैं। जन्म बदल जाते हैं भाग्य फिर भी अपना काम करता रहता है। शायद यही कर्म और भाग्य का खेल है। समझने आसान भी है ओर मुश्किल भी है।
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