मेरी राय में यह बात बिल्कुल सार्थक है। बातों से सकारात्मकता का जन्म होता है, क्योंकि शब्द हमारे विचारों की दिशा तय करते हैं। अच्छी, सच्ची और प्रेरक बातें मन में उम्मीद जगाती हैं, आत्मविश्वास बढ़ाती हैं और दूसरों के मन को भी उजाला देती हैं। शब्द बीज की तरह होते हैं जैसे बोए जाएँ, वैसे ही भाव पनपते हैं। लेकिन कर्म से सकारात्मकता को सम्मान मिलता है। केवल अच्छी बातें करना आसान है, पर उन बातों को अपने आचरण में उतारना ही असली कसौटी है। जब सकारात्मक सोच कर्म में बदलती है ईमानदारी, परिश्रम, संवेदना और जिम्मेदारी के रूप में तब समाज उसे स्वीकार करता है, मान देता है और उस पर भरोसा करता है। बातें रास्ता दिखाती हैं, कर्म उस रास्ते पर चलकर मंज़िल तक पहुँचाते हैं। दोनों का संतुलन ही सच्ची सकारात्मकता है जो बोली में भी झलके और कर्म में भी दिखाई दे।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है और कर्म से सकारात्मकता को वास्तविक सम्मान प्राप्त होता है। मात्र शब्दों से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप किए गए कर्मों से ही समाज और राष्ट्र में विश्वास स्थापित होता है। मेरी राय यह है कि किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध नहीं है, बल्कि व्यवस्था को उसकी संवैधानिक मर्यादा की ओर पुनः उन्मुख करने का एक सकारात्मक प्रयास है। मैं संघर्ष नहीं समाधान चाहता हूँ। मैं टकराव नहीं, बल्कि न्यायसंगत संवाद की अपेक्षा करता हूँ।जब सत्य को वाणी दी जाती है और उस पर कर्म द्वारा अमल किया जाता है, तभी लोकतंत्र सशक्त होता है। अन्याय के विरुद्ध उठाई गई वाणी नकारात्मकता नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारने का संवैधानिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य है।इसलिए मेरी यह अभिव्यक्ति व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में प्रस्तुत एक दायित्व है, जिसे सुना जाना और उस पर विचार किया जाना आवश्यक है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
वाणी हमारे मन की अभिव्यक्ति है और उसमें निहित शब्दों की शक्ति अत्यंत प्रभावशाली होती है। जब हमारी वाणी प्रेमपूर्ण, सौम्य और प्रेरक होती है, तो वह न केवल स्वयं में सकारात्मकता उत्पन्न करती है, बल्कि दूसरों के मन में भी उत्साह और प्रेरणा भर देती है। उदाहरण के रूप में, किसी को प्रोत्साहित करना या उसकी मदद करने की बात कहना व्यक्ति में आत्मविश्वास और उमंग पैदा करता है। इसके विपरीत, कटु और नकारात्मक वाणी मन में असंतोष, ईर्ष्या और निराशा पैदा कर सकती है। इसलिए कहा जा सकता है कि वाणी सकारात्मक विचारों और भावनाओं का जन्मदाता है। वाणी जितनी प्रभावशाली है, उतना ही महत्व कर्म का भी है। हमारे कर्म, हमारे आचरण और प्रयास, समाज और व्यक्तित्व में स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं। जब कर्म सकारात्मक उद्देश्य के साथ किए जाते हैं, जैसे परोपकार, समाज सेवा, सत्य और ईमानदारी, तो वे केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं ही नहीं, बल्कि समाज में भी सम्मान और आदर उत्पन्न करते हैं। कर्म वह आधार है जो वाणी से उत्पन्न सकारात्मकता को वास्तविक रूप प्रदान करता है। वाणी और कर्म का आपसी संबंध अत्यंत गहरा है। सकारात्मक वाणी प्रेरणा देती है, और सकारात्मक कर्म उस प्रेरणा को सशक्त बनाते हैं। यदि केवल वाणी सकारात्मक हो पर कर्म निष्क्रिय या नकारात्मक हों, या केवल कर्म अच्छे हों पर वाणी कठोर और कटु हो, तो उनका प्रभाव अधूरा रह जाता है। इसलिए जीवन में वाणी और कर्म दोनों का संतुलित और सकारात्मक प्रयोग अत्यंत आवश्यक है। यही कारण है कि वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है और कर्म से उसे सम्मान मिलता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
वाणी से सकारात्मकता का जन्म कैसे हो सकता है. सकारात्मकता का जन्म तो विचारों से होता है. विचार में जो जन्म लेता है वाणी उसे ही प्रस्तुत करती है. विचार जो भी उत्पन्न करता है चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक वाणी उसे ही प्रस्तुत करती है. वाणी से सकारात्मक और नकारात्मक दोनों का जन्म होता है. हाँ ये बात सत्य है कि कर्म से ही सकारात्मकता को सम्मान मिलता है. सकारात्मकता को सम्मान तभी मिलेगा जब कर्म श्रेष्ठ हो. कर्म श्रेष्ठ नहीं होने से. उदेश्य पूर्ण नही होने से सकारात्मकता को सम्मान नहीं मिल पाएगा.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
सदा सकारात्मक रहो,देगा शुद्ध प्रकाश। आभा मंडल आपकी,तम का करे विनाश।।
यह बात सच है कि हमारे सकारात्मक रहने का हमारे अगल बगल भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सकारात्मकता हमें स्वस्थ रखता है,हमारी वाणी सकारात्मक रखता है और फिर इससे प्रकाशित होनी वाली ऊर्जा भी सकारात्मक पथ की ओर अग्रसर होती है जिससे हमारे सभी कर्म भी सकारात्मक रहते हैं।यह किसी का विध्वंस नहीं चाहता है बल्कि जीवन के उत्थान के लिए सकारात्मक ही रहता है।
कितनी भी स्थिति हो कठिन, मुश्किल हो संसार।
बने सकारात्मक रहो,मत कर दुर्व्यवहार।।
मत कर दुर्व्यवहार, सकारात्मक हो वाणी।
सुंदर होंगे कर्म,सफल तुम होगे प्राणी।।
- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'
वाराणसी - उत्तर प्रदेश
देखा जाए वाणी मनुष्य का वास्तविक रूप प्रकट करती है,इसके साथ साथ जब हमारे विचार, वाणी और कर्म पवित्र होते हैं तो तब हमारी आत्मा में शान्ति और शक्ति अवश्य आती है और हमारे मन में विचार में सकारात्मकता का जन्म होता है, तो आईये आज की चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं की वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है और कर्म से सकारात्मकता को सम्मान मिलता है, यह सत्य है की वाणी और कर्म दोनों ही हमें सकारात्मकता की और ले जाते हैं क्योंकि हमारे विचार ही हमारी वाणी बनते हैं और वाणी से ही कर्म निकलते हैं,मन वचन और कर्म में पवित्रता और एकरूपता ही सच्ची शांति,शक्ति और उन्नति का मार्ग है जिससे जीवन में सकारात्मकता आती है, वास्तव में वाणी को शुद्ध रखना दुसरों का सम्मान करना और रचनात्मक शब्दों का प्रयोग करना हमें भीतर से मजबूत और सकारात्मक बनाता है जिससे हम पिछले कर्मों के नकारात्मक प्रभावों को भी कम कर सकते हैं अगर देखा जाए सकारात्मक वाणी और कर्म एक दुसरे से जुड़े हैं और इनसे जीवन में शांति और आनंद की प्राप्ति होती है,इसलिए वाणी और कर्म को पावित्र रखना जरूरी है क्योंकि मन के विचार, वाणी और शरीर से किए गए कर्म आपस में जुड़े होते हैं जिस से सुख ,दुख और जीवन का फल मिलता है, अन्त में यही कहुंगा की हमारी वाणी और हमारे कर्म ऐसे होने चाहिए जो सत्य, प्रेम और दया पर आधारित हों जो दुसरों का भला कर सकें और सकारात्मकता फैलाऐं और व्यक्ति का चरित्र मजबूत करें इसलिए मन वचन और कर्म में समानता रखना महात्माओं का गुण है जिस से व्यक्ति जो सोचता है वही बोलता है और वही करता है ताकि वो सुख और आनंद प्राप्त कर सके और यही इन्सानियत का सच्चा धर्म है ,इसमें कोई शक नहीं की वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है और कर्म से सकारात्मकता को सम्मान मिलता है,तभी तो कहा है,ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये,औरन को शीतल करे खुद भी शीतल होये।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
वाणी से ही सकारात्मकता का जन्म होता है, और कर्म उसे स्थापित करते हैं, यह बात जीवन की गहरी सच्चाई को दर्शाती है। अच्छे विचार मन में तो आ सकते हैं, लेकिन उन्हें आकार तब मिलता है जब हम उन्हें व्यक्त करते हैं। मधुर, संयमित और सच्ची वाणी वातावरण को प्रकाशित करती है। चाहे किसी दुखी हृदय को दिलासा देनी हो या उम्मीद की किरण जलानी हो, सकारात्मक शब्द ही सबसे पहले सहारा बनते हैं। जब हम वही करते हैं जो हम कहते हैं, तभी सकारात्मकता को मान्यता और सम्मान मिलता है। झूठे वादे जल्दी ही भूल जाते हैं, जबकि सच्चे कर्म हमेशा याद रहते हैं। जो लोग कम बोलते हैं और ज्यादा काम करते हैं, वही समाज में विश्वास का प्रतीक बनते हैं।इसलिए, जीवन में संतुलन ज़रूरी है।वाणी में उत्साह हो और कर्म में ईमानदारी हो तब सकारात्मकता न केवल पैदा होती है, बल्कि सम्मान और स्थिरता भी प्राप्त करती है।
- सीमा रानी
पटना - बिहार
बिल्कुल सच है वाणी ही सकारात्मक सोच हमारे भीतर लाती है ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय
औरन को सीतल करे आपहुं सीतल होय
मन को शीतल और शांत करने वाली वाणी से ही जीवन में सकारात्मक विचारों का उद्गम होता है। सकारात्मक विचार जीवन को सही दिशा निर्देश करते हैं। जीवन जीने का सलीका सिखाते हैं। जीवन जीने की कला के लिये सही कर्म का मार्ग सकारात्मक सोच से ही मिलता है। नकारात्मकता जीवन को गलत दिशानिर्देश करती है। हर सच्ची बात में बुराईयां खोज कर नकारात्मक सोच हमें समाज से दूर कर देती है। ये अपराधी सोच गलत करने को और हर बात को गलत सोचने को मजबूर करती है जो आगे चलकर हमारा स्वभाव बन जाता है जिसके चलते हम हर किसी के विषय में गलत ही राय बनाते रहते हैं और लोगों के बीच अवांछित व्यक्तित्व बन जाता है हमारा। लोग दूरियां बना लेते हैं। अपनापन नहीं मिलता कहीं से भी। तात्पर्य यही कि अपने विचारों में सदैव शुद्धता श्रेष्ठता स्नेह प्यार सम्मान भरी समृद्ध समझदारी रखें - - किसी को गलत न समझें तो यह सकारात्मक सोच आपको चार लोगों में सम्मानित रखेगी अन्यथा आप समाज के अवांछित व्यक्ति बन कर अपने दुश्मन आप बन जायेंगे - - मानसिक शारीरिक बीमारियों के शिकार हो जायेंगे। दूर की सोच रखें - - सकारात्मक बने दूसरों को सकारात्मक बनाये--जीवन बड़ा ही सहज सरल निर्मल और आत्मीय होगा।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
यह कथन जीवन के एक गहरे सत्य को बताता है कि वाणी (शब्दों) से सकारात्मकता उत्पन्न होती है, जैसे अच्छी बातें कहने से मन और दूसरों पर असर पड़ता है, लेकिन उस सकारात्मकता को सम्मान और ठोस पहचान कर्मों से मिलती है, क्योंकि कर्म ही व्यक्ति के चरित्र को परिभाषित करते हैं और उसे समाज में स्थान और सम्मान दिलाते हैं; यह विचारों, शब्दों और कार्यों के संतुलन की बात है जहाँ शब्द बीज बोते हैं और कर्म फसल देते हैं।जब आप अच्छी बातें बोलते हैं, दूसरों को प्रेरित करते हैं, या अपने विचारों को सकारात्मक रूप से व्यक्त करते हैं, तो यह सकारात्मक ऊर्जा पैदा करती है। सिर्फ बोल देने से काम नहीं चलता, जब उन बातों के अनुसार आप कार्य (कर्म) करते हैं, तो आपके व्यवहार में वह सकारात्मकता झलकती है और लोग आपके उस कर्म को महत्व देते हैं, जिससे आपको सम्मान मिलता है। आप किसी को "आपकी मदद करूँगा" कहते हैं (वाणी), लेकिन जब आप सच में मदद करते हैं (कर्म), तब उस वचन का मूल्य होता है। इसलिए कहा गया है-
वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है,
कर्म से सकारात्मकता को सम्मान मिलता है।
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है, जूझते युवाओं नव संकल्प ज्ञान होना चाहिए वाणी की मधुरता से नव संकल्प ज्ञान होना चाहिए ।वाणी के महत्व को समझना समझनाहमारे
बाह्य आंतरिक शांति वाणी का उपयोग सकारात्मक तरीके से करने से हमें आंतरिक शांति मिलती है।हम संबंधों में मजबूतीवाणी का उपयोग सकारात्मक तरीके से करने से हमारे संबंधों में मजबूती वाणी से हमें प्रेरणा और ऊर्जा मिलती है। दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। सकारात्मक वाणी की मधुरता से हर जंग जीत होती है ! जब आपका पेट भरा होटल आपकी सोच अपार है कर्म सम्मान की जीत होती है
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
यह निस्सन्देह सत्य है कि वाणी से सकारात्मकता का जन्म होता है और फिर जो हम कर्म करते हैं उससे हमें समाज में सम्मान मिलता है ।साधु संत और हमारे शास्त्र सभी का कहना है कि वाणी मधुर, विनम्र ,दूसरों को शांति देने वाली और सुख देने वाली होती है तब स्वयं भी हम आनंदित रहते हैं और दूसरों को भी हम शीतलता प्रदान करते हैं जैसा कि कबीर दास जी ने भी कहा है" ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोय।औरन को शीतल करें आपहुं शीतल होय।" जब हमारी बोली दूसरों को प्रिय सुख शांति देने वाली लगेगी तो यह हमारे जीवन के लिए एक सकारात्मक पक्ष होता है इससे क्रोध और घृणा खत्म हो जाते हैं रिश्तो में प्रेम और सद्भाव बढ़ता है समाज में आदर और सम्मान मिलता है, स्वयं भी हम तनाव से दूर होकर संतोष महसूस करते हैं। फिर जब कोई हमारा दुश्मन ही नहीं होगा तो फिर जीवन में जो भी हम कार्य करेंगे वह सकारात्मक सिद्ध होगा साथ में सम्मान प्रदान करने वाला भी होगा ।तुलसीदास ने भी माना है की मधुर वचनों से देवता भी प्रसन्न होते हैं और पुण्य प्रदान करते हैं। वाणी के संदर्भ में देखें तो कोयल की मीठी बोली सबको अत्यंत प्रिय होती है वही कौवे के कटु वचन सभी को अप्रिय ही होते हैं अतः हम सभी को यदि अपने जीवन में मान सम्मान आनन्द और सकारात्मकता चाहिए तो वाणी पर नियंत्रण रखकर यानि शब्दों नाप तौल कर ही बोलना चाहिए जो कि सबको प्रिय हो ।
- डाॅ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
Comments
Post a Comment