सागर का जल
प्रावक्थन (भूमिका)
पानीपत साहित्य परम्परा का अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है। जहां पर अनेक कलमकारों ने जन्म लिया या फिर कर्म भूमि के रूप में साहित्य परम्परा को आगे बढ़ाया है। डॉ. लालचंद गुप्त ' मंगल ' के निर्देशन में " सुखप्रीत " ने वर्तमान साहित्य पर " पानीपत नगर : समकालीन हिन्दी - साहित्य का अनुशीलन " शोध कार्य में बेखुबी किया है। जिससे डां. निरंजन सिंह योगमणि , डॉ. योगेश्वर देव , डॉ. राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी , डॉ . हरिशरण शर्मा हरि , जमनादास , कृष्ण दत्त तूफान पानीपती , सुदर्शन पानीपती, दीपचंद्र निर्मोही, उत्तम चंद शरर , सूरज प्रकाश भारद्वाज, टेकचंद गुलाटी, बीजेन्द्र जैमिनी, पी पी सिंगला, सत्यप्रकाश बेकरार, योगेन्द्र मोदगिल, आदि का उल्लेख किया है। यह शोध कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के अधीन 1993 में हुआ है। फिलहाल जाने माने कवि कृष्ण दत्त तूफान पानीपती जी की पुस्तक " सागर का जल " पर प्रकाश डालते हैं पुस्तक में सागर के जल की विभिन्न स्वरूपों को पेश किया गया है। जो मानव जीवन की संवेदनाओं की विवेचना करता है। वास्तव में दुनिया में सागर से बड़ा कुछ नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु तक का सफर जल से ही होता है। यही सब कुछ पुस्तक में दिया गया है :-
आंसू रूपी सागर का जल
गहरा गहरा, खारा खारा
शांत और गम्भीर घना यों
जैसी किसी सुयोगी का मन
कवि के सामने सागर है। जिस की तुलना योगी से कर रहा है। कवि की सोच का आईना है। ये पंक्तियां अपने आप में बोलतीं है ये सिर्फ तस्वीर नहीं है। यह आत्मा का स्वरूप है। पढ़ने वाले पढ़ते हैं समझने वाले बहुत कुछ समझते हैं।
किसी गीत की धुन में खोकर
ऑंखो में सपनों को बोकर
कहीं छांह में ठोर खोज कर
निश्चल - सा , धरती पर चित्त हो -
शान्त भाव से बाट जोहता -
निष्कर्मा - सा हारा - हारा !
सागर के जल की आवाज को संगीत बनते देर नहीं लगती है। कवि की सोच का परिणाम सामने है। पुरी - पुरी स्थिति पेश कर दी है। यह स्थिति सिर्फ कवि की हो सकती है। जो वातावरण की खुशबू को समझता है।
मंडराते मेघों के दल से
भावुकतावश प्रश्न पूछती
कोई भी उत्तर न पाकर
मन - सा मोर, चुप रह जाती
तब उस की नीली आंखों में
लहरता है नीला - नीला
सागर तो सागर होता है। पता नहीं उसमें क्या - क्या छुपा होता है। कभी उसकी स्थिति स्त्री जैसी होती है । वह अपनी व्यथा का प्रकट करतीं है। परन्तु अन्त में स्थित सागर जैसी हो जाती है । यही कवि की कल्पना का विस्तार होते-होते सागर का स्वरूप सामने पाता है।
डूबे रहे सूरज के संग ही
मंद - प्राय - सा हो जाता है
नील गगन की नीली यह में
अनजाने गीतों की लह में
लुप्त छंद - सा खो जाता है
गहरा गहरा । गहरा गहरा ।
ऊपर जा कर गहरा - गहरा।
वाह ! कवि की कल्पना बहुत सुंदर है। शाम के समय का चित्रण किया गया है। जिसमें वातावरण के साथ - साथ अनजाने गीतों को महसूस किया है। यही आनंद प्राकृतिक चिकित्सा का कार्य करता है। सुबह की सैर , शाम की सैर आदि वरिष्ठ उदाहरण है।
अतः कवि भाषा कभी सीधी नहीं होती है। परन्तु तूफान जी भाषा स्पष्ट व साफ सूथरी है। जो वातावरण के चित्रण को परिभाषित करता है। ऐसा विश्वास कवि के ऊपर किया जा सकता है। आज कवि दुनिया में नहीं है। परन्तु उन का साहित्य शोध के साथ - साथ स्कूल - कालेज के सेलेब्स का हिस्सा है। यही कवि की उपलब्धि है। कवि के बच्चे अपने पिता की सम्पत्ति के साथ - साथ साहित्य की देखभाल कर रहे हैं। कृति शर्मा व देवेन्द्र तूफान के आर्थिक प्रयास से पुस्तकें प्रकाशित हो रही है। यह कवि की अच्छी परवरिश का परिणाम है। कवि कृष्ण दत्त तूफान जी की स्मृति में सबसे पहले सम्मान जैमिनी अकादमी ने श्री राजेन्द्र सारथी ( दैनिक भास्कर) को दिया था । उस के बाद पानीपत साहित्य अकादमी , मीडिया क्लब पानीपत, अंकन साहित्यिक संस्था, श्री कृष्ण दत्त तूफान मैमोरियल साहित्यक सेवा समिति आदि संस्था समय - समय पर कार्य करतीं रहतीं है। जिस से तूफान जी, आज भी लोगों के हृदय में बसते है। तूफान जी की स्मृति में पानीपत क्षेत्र से लेकर देशभर के कवि सम्मानित हो रहें हैं। फिर भी बहुत पुस्तकें अप्रकाशित है। समय - समय पर इन सब पुस्तकों को प्रकाशित किया जाएगा। तूफान जी का परिवार बहुत बड़ा है। जो वर्तमान में पानीपत क्षेत्र से बाहर सफीदों, जींद, गुरुग्राम व चण्डीगढ़ में फैला हुआ है। ये साहित्यिक यात्रा ऐसा ही चलती रहें....... ! इसी उम्मीद में सब को प्रणाम। जय हिन्द!
Comments
Post a Comment