दिनेश नंदिनी डालमिया स्मृति सम्मान - 2026

        उद्देश्य और ज्ञान से कुछ भी किया जा सकता है। जो होगा। वह सकारात्मक अवश्य होगा । यही उद्देश्य और ज्ञान ही भाग्य में योगदान देते हैं। जीवन शैली का एकमात्र उपाय कर्म है । जो उद्देश्य और ज्ञान को परिभाषित करता है।‌ भाग्य सिर्फ कर्म से बदला जा सकता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- 
     जीवन के परिप्रेक्ष्य में उद्देश्य होना चाहिए, उसी के आधार पर कार्यों में प्रगतिशील बनता है और कर्म प्रधान होता चला जाता है। उद्देश्य के बिना कर्म संभव नहीं है, ज्ञान के बिना कर्म सफल नहीं है। वास्तविकता की झलक दिखाई पड़ती है। जब तक ज्ञान न हो कर्म हो ही नहीं सकता है। अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें ज्ञान वीर बनना अति आवश्यक हो जाता है, जिसके बिना समस्त कार्य अधूरेपन में होने लग जाते है, जिसे पूर्णता की ओर अग्रसरित करना हमारा कर्तव्य हो जाता है.....

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

      बालाघाट - मध्यप्रदेश

       किसी भी कार्य में सक्रिय होने के लिए उद्देश्य का होना अत्यंत आवश्यक है. उद्देश्य के बिना इधर-उधर भटकना ही हो सकता है. इसलिए कहा गया है कि उद्देश्य के बिना कर्म संभव नहीं है. उद्देश्य निर्धारित हो जाए और कर्म के लिए सक्रिय भी हो जाएं, लेकिन ज्ञान के बिना कर्म सफल नहीं हो सकता. अपने विवेक या किसी ज्ञानी के मार्गदर्शन में कर्म करने से सफलता हासिल हो सकती है. इसलिए कहा गया है कि ज्ञान के बिना कर्म सफल नहीं है. उद्देश्य, ज्ञान और कर्म की त्रिवेणी से ही सफलता संभव हो सकती है.

- लीला तिवानी 

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

    मनुष्य कोई भी कर्म करता है तो उसका कोई न कोई उद्देश्य रहता है. बिना उद्देश्य के कर्म सम्भव ही नहीं है. बिना उद्देशय का कर्म अकर्म हो जाता है. मनुष्य जब भोजन करता है तो उसका भी उद्देश्य होता है पेट भरना. पानी पीना यानी प्यास बुझाना. किताब पढ़ना ज्ञान अर्जन करना इत्यादि इत्यादि. इस तरह हम देखते हैं कि हर कर्म के पीछे कोई न कोई उद्देश्य है. रही इसकी सफलता की तो कोई भी कर्म करने के लिए उसे कैसे किया जाय इसकी  पूरी जानकारी होनी चाहिए. नहीं तो वह कर्म सफल नहीं हो सकता है. जैसे राह चलना है तो कैसे चलना है, कैसे कदम बढ़ाना है इसकी जानकारी होनी चाहिये नहीं तो जाकर हम कहीं गिर जाएंगे या कहीं ठोकर खा सकते हैं. इसलिए कर्म करने के लिए ज्ञान जरूरी है. 

 - दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - प. बंगाल 

        मानव जीवन कर्म प्रधान है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में निरंतर कर्म करता रहता है, चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या बौद्धिक। किंतु कर्म का वास्तविक मूल्य तभी सिद्ध होता है, जब उसके पीछे एक स्पष्ट उद्देश्य हो और उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उचित ज्ञान का सहारा लिया जाए। इस संदर्भ में यह कथन अत्यंत सार्थक है कि “उद्देश्य के बिना कर्म संभव नहीं है, और ज्ञान के बिना कर्म सफल नहीं है।” यह कथन कर्म, उद्देश्य और ज्ञान के त्रिकोणीय संबंध को स्पष्ट करता है। सबसे पहले, उद्देश्य कर्म का आधार है। उद्देश्य वह प्रेरणा है, जो व्यक्ति को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। बिना उद्देश्य के किया गया कर्म दिशाहीन होता है। जैसे एक नाव बिना पतवार के समुद्र में भटकती रहती है, वैसे ही उद्देश्यहीन कर्म व्यक्ति को भ्रम और असफलता की ओर ले जाता है। विद्यार्थी का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना होता है, इसलिए वह अध्ययन करता है। किसान का उद्देश्य अन्न उत्पादन होता है, इसलिए वह खेती करता है। यदि इन कर्मों के पीछे उद्देश्य न हो, तो कर्म करने की प्रेरणा ही समाप्त हो जाएगी। इस प्रकार उद्देश्य कर्म को दिशा और अर्थ प्रदान करता है।दूसरी ओर, केवल उद्देश्य होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उचित ज्ञान भी आवश्यक है। ज्ञान वह प्रकाश है, जो कर्म के मार्ग को स्पष्ट करता है। बिना ज्ञान के किया गया कर्म अक्सर असफल हो जाता है, क्योंकि उसमें सही विधि, सही समय और सही साधनों का अभाव होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति चिकित्सक बनना चाहता है, तो केवल इच्छा या उद्देश्य पर्याप्त नहीं है; उसे चिकित्सा विज्ञान का ज्ञान भी प्राप्त करना होगा। इसी प्रकार, यदि किसान को खेती का उचित ज्ञान नहीं होगा, तो वह अच्छी फसल प्राप्त नहीं कर पाएगा।भारतीय दर्शन में भी ज्ञान और कर्म के इस संबंध को विशेष महत्व दिया गया है श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान और कर्म के संतुलन का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि ज्ञान से युक्त कर्म ही सफल और सार्थक होता है। केवल कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे सही ज्ञान और विवेक के साथ करना आवश्यक है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि ज्ञान और कर्म का समन्वय ही व्यक्ति को महान बनाता है।ज्ञान के बिना कर्म करना अंधकार में चलने के समान है। ऐसा व्यक्ति परिश्रम तो करता है, परंतु उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता। इसके विपरीत, ज्ञान से युक्त कर्म व्यक्ति को सफलता और संतोष दोनों प्रदान करता है। ज्ञान व्यक्ति को यह समझने में सहायता करता है कि कौन-सा कर्म करना उचित है और उसे किस प्रकार करना चाहिए। अंततः यह कहा जा सकता है कि उद्देश्य, ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। उद्देश्य कर्म को प्रेरणा देता है, ज्ञान कर्म को दिशा देता है और कर्म उद्देश्य को साकार करता है। यदि इनमें से किसी एक का भी अभाव हो, तो सफलता प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसलिए जीवन में सफल होने के लिए व्यक्ति को अपने उद्देश्य को स्पष्ट करना चाहिए और उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उचित ज्ञान प्राप्त कर कर्म करना चाहिए। यही सफलता और सार्थक जीवन का मूल मंत्र है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

        कोई भी कर्म करने के पहले उद्देश्य तो होता ही है, इसके बिना कर्म सम्भव ही नहीं है। हाँ, उदेश्य में सकारात्मकता अथवा नकारात्मकता हो सकती है। यानी उद्देश्य उचित या अनुचित, नैतिक या अनैतिक, शोभनीय या अशोभनीय, अर्थपूर्ण या निरर्थक हो सकता है।  कहा जाता है कि उद्देश्य कर्म का आधार होता है और कर्म से चरित्र का निर्माण होता है और इसीलिए उद्देश्य सार्थक,उचित और शोभनीय होना चाहिए ताकि उसके परिणाम सम्मानजनक हों। संतुष्ट करने वाले हों। दूसरी बात यह कि ज्ञान के बिना कर्म सफल नहीं है। ऐसा मानना लाजिमी है। अधूरा ज्ञान , जोखिम के अलावा कुछ भी नहीं और इससे सफल होने का कोई अवसर नहीं होता। किसी भी उद्देश्य को पूरा और उसमें सफल  होने के लिए ज्ञान की आवश्यकता और महत्ता होती है। जब तक उद्देश्य में सफल होने के लिए  किये जाने वाले कर्म का ज्ञान नहीं होगा तब तक जो भी कर्म होगा वह अधूरा ही होगा। खामियों और कमियों से युक्त होगा जिससे किये जा रहे कर्म से, सफलता मिलना तो दूर निरर्थक भी होगा।अत: सार यही कि उन्नत,समृद्ध और सफल होने के लिए यथोचित उदेश्य और ज्ञानयुक्त कर्म आवश्यक होता है।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

        निरुद्देश्य जीवन समुद्र में भटकती नैया जैसा होता है जिसका कोई किनारा नहीं है। किनारा पाने की चाहत ही नैया और नाविक का ध्येय होता है। लेकिन यह भी बात उतनी ही सही है कि जब तक मंजिल का ज्ञान न हो तब तक नैया लहरों पर ही डोलती रहेगी। जरूरत है कि उद्देश्य ही नैया का कर्म होता है। उद्देश्य के बिना कर्म नहीं होगा और कर्म के बिना मंजिल नही मिलेगी। और एक बात कर्म के साथ ज्ञान भी उतना ही जरूरी होता है। ज्ञान न हो तो मंजिल नहीं मिलती।

- हेमलता मिश्र मानवी

नागपुर - महाराष्ट्र 

        उद्देश्य के बिना कर्म संभव नहीं,हर कर्म के मूल में कुछ न कुछ उद्देश्य होना स्वाभाविक है।अब उद्देश्य है और कर्म भी कर रहे हैं हम लेकिन उस संबंध में ज्ञान न हो तो वह कर्म सफल नहीं होगा। हम धन कमाना चाहते हैं, उसके लिए कर्म भी करते हैं जैसे व्यापार आदि, लेकिन उसके बारे में ज्ञान का अभाव हो तो कर्म सफल नहीं होता यानी व्यापार में हानि हो जाती है।किये जा रहे कर्म से संबंधित ज्ञान का होना उस कर्म की सफलता की गारंटी बन जाता है।तभी तो एक व्यक्ति सफल होता है,दूसरा असफल हो जाता है। इसके मूल में ज्ञान का अभाव ही होता है।इसलिए किसी भी कार्य से पूर्व उसके संबंध में ज्ञानार्जन करना ही चाहिए, सफलता निश्चित प्राप्त होगी।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

      बिना ध्येय, बिना उदेश्य किये गये काम में दिशाहीन भटकन अवशय होती है।हर कार्य के पीछे एक प्रेरणा अथवा लक्ष्य होता है। सीधे लक्ष्य को साध कर किये गये कार्यों में सफलता अवश्य मिलती है महाभारत में द्रौपदी स्वयंवर के दौरान अर्जुन ने रखे हुए पात्र में नीचे से घूमती हुई मछली के प्रतिबिम्ब को देखकर, केवल उसकी आँख को अपना एकमात्र लक्ष्य बनाया और सटीक निशाना लगाकर उस समय वह कठिन परीक्षा में सफल हुए।मनुष्य का हर छोटा या बड़ा कार्य किसी न किसी इच्छा या लक्ष्य से अवश्य प्रेरित होता है। बिना उदेश्य के कर्म करना निरर्थक है।जब हमारे सामने कोई ठोस लक्ष्य होता है तो उस काम के प्रति हमारी लगन, निष्ठा, श्रद्धा और साहस बढ़ जाता है।जैसे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का एकमात्र और सर्वोपरि उदेश्य भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से पूरी तरह मुक्त कराकर एक संप्रभु राष्ट्र बनाना था। सन 1857 से 1947 तक चले इस संघर्ष में, महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन से लेकर भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रातिकारियों के बलिदान तक, सभी का लक्ष्य स्वराज्य और आजादी प्राप्त करना था। सभी ने एकजुट होकर मतभेद मिटाकर भारत को आजाद कराया। उन सभी का यह कर्म सोदेश्यपूर्ण ही था। इसके अलावा ज्ञान के बिना कर्म अंधा है, दिशाहीन है। किसी भी कर्म को सफलता तक पहुंचाने के लिए ज्ञान एक मार्गदर्शक नेत्र की भान्ति कार्य करता है। उदाहरण के लिए एक पायलट का प्राथमिक गुण विमान का गहन ज्ञान, कठिन प्रशिक्षण और उड़ान के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जो उन्हें विमान संचालन में योग्य बनाता है। वे न केवल उड़ान भरते है बल्कि मौसम, नेविगेशन, आपातकालीन प्रक्रियाओं और तकनीकी प्रणालियों में योग्य होते हैं क्योंकि उन्होने उसका विस्तार से ज्ञान ग्रहण किया है। अतः ज्ञान के बिना कर्म में सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती है। 

- शीला सिंह

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

      उद्देश्य के बिना कर्म सम्भव नहीं है और ज्ञान के बिना कर्म सफल नहीं है। उक्त सिद्धान्त मानव जीवन, समाज और न्याय व्यवस्था का शाश्वत सत्य है। क्योंकि उद्देश्य ही वह प्रेरक शक्ति है जो मनुष्य को निष्क्रियता से निकालकर कर्मपथ पर अग्रसर करती है और ज्ञान वह प्रकाश है जो उस कर्म को सही दिशा, वैधता और प्रभावशीलता प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि बिना उद्देश्य के किया गया कर्म दिशाहीन होकर केवल श्रम का अपव्यय बन जाता है, जबकि बिना ज्ञान के किया गया कर्म त्रुटिपूर्ण होकर अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता है। अतः जब उद्देश्य स्पष्ट, पवित्र और न्यायसंगत हो तथा ज्ञान संविधान, सत्य और विधि पर आधारित हो, तब किया गया कर्म न केवल व्यक्तिगत सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है बल्कि समाज में न्याय, समानता और व्यवस्था की स्थापना का माध्यम भी बनता है, क्योंकि इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने स्पष्ट उद्देश्य, गहन ज्ञान और अडिग कर्मनिष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन किया, उन्होंने असम्भव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों को भी परिवर्तित कर दिया है। इसीलिए प्रत्येक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने उद्देश्य को उच्च, अपने ज्ञान को प्रामाणिक और अपने कर्म को निष्ठापूर्ण बनाए। क्योंकि यही वह मार्ग है जो व्यक्ति को सम्मान, समाज को न्याय और राष्ट्र को सशक्तता प्रदान करता है और मानव का जीवन सार्थक करता है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली 

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

" मेरी दृष्टि में " जिस उद्देश्य में ज्ञान शामिल हो जाता है। वह कर्म सर्वोत्तम हो जाता है। जो भाग्य को शिखर पर पहुंचा देता है। यह सब कुछ समय पर ही सफल होते हैं। बाकि तो जीवन चक्र का खेल है। हर जन्म में कुछ ना कुछ विशेष होता है। जो जीवन दर जीवन की व्याख्या करने के लिए पर्याप्त होता है। जिससे हम भाग्य भी कहते हैं। 

           - बीजेन्द्र जैमिनी 

        (संचालन व संपादन)

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