समरेश मजूमदार स्मृति में चर्चा परिचर्चा

    मैं कौन हूॅं । किसी को पता है। शायद किसी को पता नहीं है। फिर भी इंसान जन्म दर जन्म की बात करता है। सभी चाहते हैं कि पूर्व जन्म कैसा था। या पूर्व जन्म था भी या नहीं ? इन सबकी जानकारी हासिल करना , हर कोई चाहता है। सिर्फ सोचने से कुछ नहीं होता है। वास्तविकता क्या है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- 
            सब ही सोचता है मैं क्या हूँ जिस प्रकार व्यक्ति जीवन मरण को नही जानता ! ईश्वर प्रकृति के साथ मिल रचना कर जब संसार में भेजता है प्रकृति वातावरण सोच अनंत बना ईश्वर संसार में भेजा सबसे पहले भूख हवा पानी की आवश्यकता रोने से शुरू होती पूरी हो जाती है ! फिर सोचता मैं क्या हूँ ! फिर जैसे जैसे उसकी आवश्यकता पूरी होती है! बुद्धि ,विचार, भावनाएं, और अनुभव हैं जो उसे खास बनाते हैं।फिर एक शिल्पकार की भाँति , अपने जीवन को अपने तरीके से आकार दे रहे होते हो । तुम्हारे पास अपने लक्ष्य, सपने, और आशाएं हैं जो तुम्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। तो मैं कहूंगी तुम एक अनमोल रत्न हो, जो अपने आप में एक खजाना हो। तुम्हें अपने आप पर गर्व होना चाहिए । तुम सुखी हो तभी दूसरों को सुखी रह सकते और अपने जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए। फिर स्वस्थ वातावरण सभी क्षेत्रों से अग्रणी रहोगे । साथ साथ रह अपने लक्ष्य पा सकते हो !फिर अपने से प्रश्न पूछ कोई तो बताओं मैं क्या हूँ  ,तुम एक अनोखे और अद्वितीय व्यक्ति हो, जो अपने आप में एक दुनिया हो। तुम्हारे पास अपने विचार, भावनाएं, और अनुभव हैं जो तुम्हें खास बनाते हैं। तुम एक शिल्पकार हो, जो अपने जीवन को अपने तरीके से आकार दे रहे हो। तुम्हारे पास अपने लक्ष्य, सपने, और आशाएं हैं जो तुम्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। एक अनमोल रत्न हो, जो अपने आप में एक खजाना हो। तुम्हें अपने आप पर गर्व होना चाहिए और अपने जीवन को अपने तरीके से जीना चाहिए।  तब हम बता सकते है में क्या हूँ 

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

              मैं क्या हूं,कौन हूं इस प्रश्न का उत्तर सदियों पहले शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लेखित है। अहं ब्रह्मास्मि एको अहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो, न भविष्यति। "मैं ब्रह्म हूं", "मैं दिव्य हूं, मैं ही एकमात्र हूं, मेरे जैसा कोई दूसरा नहीं है, न तो अतीत में है और न ही भविष्य में कोई दूसरा होगा।" यही अद्वैत वेदांत दर्शन का सार है।एक ऋषि ने अपने शिष्यों को आत्मा और ब्रह्म की एकात्मकता को समझाने के लिए इसी मंत्र का प्रयोग किया। आदि शंकराचार्य भगवान ने इसका बहुत प्रचार प्रसार किया। अब जब वेद भगवान ने पहले बता दिया कि आत्मा और ब्रह्म एक है और हम उसी के परमात्मा के अंश है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है कि,ईश्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥ अर्थात प्रत्येक जीव (आत्मा) ईश्वर का ही एक अंश है, इसलिए वह अविनाशी (अमर, जिसका कभी नाश न हो) है। जीव चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख का भंडार (आनंदस्वरूप) है। यह मनुष्य के भीतर स्थित दिव्य शक्ति को दर्शाता है। तो भ्रम रहना ही नहीं चाहिए। फिर भी हम सब मैं कौन? जैसे प्रश्न की सीमा से बाहर नहीं निकल पा रहे। जब दिव्यचक्षु गुरु विरजानंद ने दयानंद से प्रश्न किया कि तुम कौन? तब दयानंद जैसे संत ने कहा था, कि यही जानने आया हूं कि मैं कौन? मैं क्या, मैं कौन यह प्रश्न हर मानव के मन में आता है, उत्तर जानते भी सब है,बस मानते नहीं। इस न मानने के कारण ही सांसारिक उलझनों में उलझे मन मस्तिष्क को चैन नहीं मिलता।

- डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

        बढ़िया सी बात है - - मैं क्या हूँ? यह भी कि-- दार्शनिकता कहती है हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं। हमारा उद्गम कहाँ से है। ये बहुत गहरी बातें हैं - - मानव जाति युगों युगों से इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोज पाई है। लेकिन सच्चाई ये है कि इंसान में प्राणों के साथ साथ बुद्धि भी है। संसार की हर शै के पास बुद्धि नहीं होती। जानवरों को बुद्धि है तो इंद्रियों की अनुशंसा  नहीं है। आँख नाक कान आदि और पंच तत्व नहीं हैं। इसलिये इस ब्रह्मांड में मानव मात्र ही ऐसा है जो सोच सकता है कि मैं कौन हूँ - - मैं क्या हूँ? मानव सृष्टि की अनुपम रचना है जिसे पंच इंद्रियों का वरदान मिला है। बस जरूरत इस बात की है कि मानव मात्र पंच इंद्रियों पर नियंत्रण रखे - - और तभी वह स्वयं को पहचानने का दावा करे। अहं ब्रम्हांस्मि का ज्ञान हो जाये तो इंसान न सिर्फ स्वयं को जान ले बल्कि युगों की परिभाषा बदल दे। "मैं कौन हूँ" का उत्तर ही मानव मात्र का निर्माण और निर्वाण-पथ है।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र

        सब ही सोचता है मैं क्या हूँ. मेरे ख्याल से शायद सब नहीं सोचते हैं. कुछ कुछ लोग ही ऐसा सोचते होंगे. वो भी तब जब वो निराश हो, उदास हो, व्यथित हो तभी अपने बारे में सोचते हैं. मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कहां से आया हूँ इत्यादि इत्यादि.आप एक आत्मा है परम पिता परमात्मा की सन्तान. जिसे कोई देख नहीं सकता. इसलिए कहा जाता है कि-

"नैनं छिन्दती शास्त्राणी नैनं दहति पावकः, 

न  चैनं कलेदयन्ती शोषयन्ती मारूतः."

यानी आत्मा को न तो शास्त्र से मार सकते हैं, न आग में जला सकते हैं न पानी में भिगा सकते है न ही हवा उसे सूखा सकती है. इसलिए शरीर से जब आत्मा निकल जाती है तो उस शरीर को मृत घोषित कर दिया जाता है. ज्योति ज्योति में मिल मिल जाती है. यानी आत्मा परमात्मा से जाकर मिल जाती हैं. इसलिए हम सभी कहते हैं ये मेरा शरीर मेरे हाथ, मेरा मन इत्यादि इत्यादि. इसका मतलब इस शरीर को चलाने वाला कोई अदृश्य शक्ति है जिसे हम देखते नहीं. आत्मा ही इस शरीर के द्वारा दुःख और सुख का अनुभव करती हैं. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद " दीनेश "

कलकत्ता - प. बंगाल 

       आज जीवन की आंधी दौड़े में, सब अपने जीवन को जीने के लिए , अपने गंतव्य को पाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं व किसी के पास यह सोचने का वक़्त ही नहीं , की मैं कौन हूँ !?. यदि कोई समय निकालकर सोचता भी है , तो कोई उचित उत्तर नहीं मिलता !!  मैं कौन हूँ .... का उत्तर तलाशते तलाशते कई लोगों ने वैराग्य अपनाया , भक्ति में लीन हुए , तपस्या की , पर संतोषजनक उत्तर नहीं मिला !!  मेरी व्यक्तिगत राय है कि जब हमने मनुष्य के रूप में जन्म लियों है तो हमें जीना पड़ेगा , व अपने कर्तव्य निभाने पड़ेंगे !! मैं एक आम मनुष्य हूं जो संसार में अपने कर्म करने आया है , व तमाम जीवन अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण करते हुए , एक दिन धरती में विलीन हो जायेगा !! रह जाएगा पीछे नाम.... कर्मों के अनुसार ।।।अच्छा या बुरा !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

        जन्म के अनेक कारण और उद्देश्य का अनुमान लगाया जाता है। सब के अपने-अपने तर्क और मत हैं। सच भी यही है, केवल जन्म लेना, जीना और फिर मृत्यु। इस चक्र और क्रम में कुछ न कुछ कारण तो निहित होना संशय की पुष्टि तो करता है। इससे फिर एक तर्क यह भी बनता है कि जन्म या तो उपहार स्वरूप मिला है या दंड स्वरूप। इस उपहार और दंड को हम अन्य प्राणियों की तुलना से करके समझ सकते हैं कि मनुष्य जन्म श्रेष्ठ यानी उपहार के रूप में ही मिला है। लेकिन फिर इसके बाद जीवन में जो संघर्ष है, सुख-दुख है, मान-सम्मान है,वह ? तब इसका उत्तर कर्म का प्रतिफल  माना जा सकता है। यह प्रतिफल भी अपने-आप में भाग्य का प्रतिरूप तय कर सौभाग्य और दुर्भाग्य में कर्म के अनुसार विभक्त करता है।  इस तरह अब जीवन को प्याज के छिलके की तरह उतारते चले जाएं और अपने बौद्धिक सामर्थ्य से समझते और समझाते जाएं। यह जीवन दर्शन है, आध्यात्म है। जीवन की गुत्थी है, सुलझाते रहिए। सच तो यह है हमें जीवन मिला है और जीवनयापन करना है। इसी तरह औरों को भी जीवन मिला है और उन्हें भी जीवनयापन करना है। इसलिए इस तरह से जियें कि एक दूसरे के मददगार भी रहें और किसी को बाधा भी न पहुंचे।  यानी नैतिकता का पालन करते हुए मिलजुलकर रहें। यही इंसानियत है और हम इंसान। यही " मैं क्या हूं ? " का उत्तर है और वह है  " हम इंसान हैं। "

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

        मनुष्य चिंतनशील प्राणी है। अतः अपने अस्तित्व के बारे में सोच स्वाभाविक ही है । मैं इस पृथ्वी पर क्यों आया हूँ? क्या मेरे कर्तव्य  हैं ? उन्हे मुझे कैसे पूरा करना है  ? यह प्रश्न हम अपनी पहचान बनाने के लिए करते हैं। संसार के अनुभव और स्वयं के अंतर्मन के द्वंद को जब हम विवेक से गति देते हैं तब यह हमारा आत्मविश्लेषण नचिकेता के समान ही होता है पर हम सामाजिक  प्राणी हैं जो कि हम स्वयं से ही संतुष्ट नहीं होते। लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं इसके लिए हम दूसरे के नकारात्मक या सकारात्मक क्रियाकलाप एवं विचार से ही अपनी सोच की प्रयोगात्मकता के बाद ही सिद्ध कर पाते हैं कि लोगों की दृष्टि में मैं क्या हूं।  फिर भी हम चेतन आत्मा हैं ।शरीर मन बुद्धि से युक्त हैं। अतः नाशवान जगत में नैतिक कर्म धर्म करते हुए हमें अपनी सोच को मानवीय रखकर जीवन के उच्चतम सफल लक्ष्य पर केंद्रित रखना चाहिए । यही शास्त्र बताता है।

 - डॉ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     कभी अपने विषय में सोच कर तो देखो की मैं क्या हुँ ताकि एक स्वाभाविक मानवीय सोच बन जाए जो हमारे जीवन, संघर्षों और आगे  की दिशा को खोजने  की इच्छा से पैदा  होती है न की दुसरों की राय से तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं की सब सोचता है मैं क्या हुँ कोई तो बताओ मैं क्या हुँ, मेरे ख्याल में हम  वही हैं जो हम अपने कर्मों और विचारों द्वारा निर्मित करते हैं न की  जो दुसरे जो हमारे बारे  में सोचते हैं इसलिए आप वही हो जो आप खुद को मानते हो और जो अपने जीवन में हर पल में चुनते हो,  इसलिए मैं क्या हुँ का प्रश्न आत्म खोज, आस्तित्व और पहचान से जुड़ा है जिस का अर्थ है कि हम अपनी क्षमता और जीवन के उद्देश्य को समझना चाहते हैं तथा अपने जीवन, संघर्ष और आगे की दिशा को खोजने की इच्छा से पैदा होती है,बैसे भी हम एक ऐसे इंसान हैं जिनमें  और, सपनों और यादों का संसार समाया है वास्तव में इंसान एक चलता फिरता  ही शरीर नहीं है बल्कि  अपनी सोच, कर्मों, और मैं की चेतना से बना एक जीवंत  अस्तित्व है जो लगातार खुद को खोज रहा है क्योंकि मनुष्य खुद को एक अनसुलझी पहेली  की तरह है तथा विचारों, भावनाओं और  तर्कशक्ति से बना एक प्राणी है जो निरंतर अर्थ ज्ञान और संबंध की तलाश  करता है जो एक ऐसा जीव है जो  प्रेम व परोपकार जैसे  गुणों को अपनाता है तथा इंसान एक ऐसा जीव है जो न केवल जीता है बल्कि अपने जीने का मतलब भी खोजता है, अन्त में यही कहुंगा कि सही  वो है जिसमें दया, करूणा, ईमानदारी और धैर्य जैसे गुण हों लेकिन   इंसान  चाहत का कोई अन्त नहीं वह संतुष्ट न होकर हमेशा बेहतर जिंदगी चाहता है, वास्तव में हम इस दूनिया में कर्म करने आए हैं और हमारा स्वभाव निस्वार्थ  और सकारात्मक होना चाहिए। 

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर

      मैं कौन हूँ,आखिर कौन हूँ मैं! इसी में उलझता रहा है व्यक्ति और मन-मस्तिष्क।जब भी उठता है प्रश्न मन के भीतर इसी सोच में उलझा व्यक्ति कहीं से भी उत्तर नहीं पाता। तब वह सोचता है जड़ हो या चेतन, मानव हो यापशु हो, स्त्री हो या पुरुष हो..सभी तो अंश हैं उसी एक ईश्वर के, तो मैं ईश्वर का अंश हूँ और सभी उसके ही अंश हैं जो किसी न किसी विशेष निमित्त के लिए इस वसुधा पर आए हैं।जिस दिन वह निमित्त पूर्ण हो जायेगा तो समाप्त हो जायेगी इस “ मैं “ की यात्रा भी। हम जिसके अंश हैं उसी में मिल कर हो जायेंगे एकाकार। तब क्यों और किसलिए उलझें इस प्रश्न में आखिर कौन हैं? हम ईश्वर के अंश हैं जो अपने कल से निखरते हुए आज हैं।बस पथ चुनें अपने घर/परिवार और देश को समृद्ध बनाने का, उस पर चलने को कटिबद्ध होने का, सृजन की शक्ति बन कर गिरते को थामने वाला हाथ बनने का और असहायों के अधरों की मुस्कान बनने का और इसके साथ ही अपने अंतर्मन में झाँकने का। ऐसा सोचने-करने लगें तो स्वयं ही मिलेगा अपने इस प्रश्न का उत्तर.. मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ?

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

       "मैं क्या हूँ?'' सोचने के लिए पहले तो खुद से मुलाकात करनी पड़ती है. आजकल तो खुद से मुलाकात करने का न तो किसी के पास समय है, न ही जिज्ञासा. कभी कोई सोचता भी है कि "मैं क्या हूँ?'' तो उत्तर अनेक मिलते हैं मैं शरीर हूँ, मैं आत्मा हूँ, मैं आकांक्षाओं का पुलिंदा हूँ, आदि-आदि. 

जाकी रही भावना जैसी, 

प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!

यहाँ यही बात लागू होती है. जिसका जैसा भाव है, अपने को वह वैसा ही समझता है. ऐसे में कोई किसी और को या आपको कैसे बता सकता है कि "मैं क्या हूँ?'' इसका उत्तर तो सबको समय निकालकर जिज्ञासा का भाव रखकर बड़ी गहराई से खुद के भीतर डुबकी लगाकर ही खुद ही खोजना पड़ता है. तब लगता है कि "डुबकी भी कितनी खुशबूदार होती है! 

चलिए अभी ही डुबकी लगाकर सब सोचते हैं कि- "मैं क्या हूँ?'' 

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

       सब ही सोचता है मैं क्या हूं, कोई तो बताओ मैं क्या हूं.... आज के भाग दौड़ वाली जिंदगी में आदमी स्वयं को भूल जाता है....यानी स्वयं इतना व्यस्त रहता है कि खुद के लिए कुछ करने को उसके पास समय नहीं होता। कोल्हू के बैल की तरह वह पीसता है। बस अपने द्वारा किए गए कर्म-पूर्वक अनुभव का वैयक्तिकरण अर्थात उसके व्यक्तिगत अनुभव का आकलन दूसरे करते हैं कि वह क्या है? उसके अथक परिश्रम का आंकलन कोई और करता है। सकारात्मक कर्म तो वह करता है किंतु फल चखने के आने तक वह इतना थक जाता है कि वह खुद को पहचान नहीं पाता। किंतु दूसरों से अपने द्वारा प्राप्त अनुभव की प्रशंसा अवश्य जानना चाहता है।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

        यह पंक्ति केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व और पहचान की गहरी खोज को व्यक्त करती है। जब व्यक्ति अपने भीतर झाँकता है, तब उसे यह जिज्ञासा होती है कि वास्तव में उसकी पहचान क्या है—क्या वह दूसरों की नज़रों से परिभाषित होता है या अपने कर्मों और विचारों से? समाज में हर व्यक्ति को लोग अलग-अलग रूप में देखते हैं। कोई उसे मित्र मानता है, कोई प्रतिद्वंद्वी, कोई आदर्श और कोई सामान्य व्यक्ति। इसी कारण मन में यह प्रश्न उठता है कि “मैं वास्तव में कौन हूँ?”वास्तव में मनुष्य की पहचान केवल बाहरी रूप, पद या प्रशंसा से तय नहीं होती। उसकी सच्ची पहचान उसके कर्म, संवेदना, विचार और चरित्र से बनती है। जो व्यक्ति दूसरों के दुख को समझता है, समाज के लिए उपयोगी कार्य करता है और अपने भीतर मानवीय मूल्यों को जीवित रखता है, वही अपनी वास्तविक पहचान प्राप्त करता है।यह पंक्ति आत्ममंथन का निमंत्रण देती है। यह हमें याद दिलाती है कि हमें अपनी पहचान दूसरों की राय से नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य और मूल्यों से तय करनी चाहिए। जब व्यक्ति अपने भीतर की अच्छाई, करुणा और सत्य को पहचान लेता है, तब उसे किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं रहती कि “मैं क्या हूँ।”अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य वही है जो वह अपने कर्मों और मानवीयता से बनता है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

" मेरी दृष्टि में " संत ही पूर्व जन्म की जानकारी दे सकते हैं। जिन की संख्या ना के बराबर होती है। फिर कहा जा सकता है कि पूर्व जन्म भी है। ऐसा सभी सोचते हैं। वास्तविकता से सभी दूर नज़र आते हैं। बाकी क्या कुछ हैं। सब के अपने - अपने विचार हैं।

         - बीजेन्द्र जैमिनी 

         (संचालन व संपादन)


Comments

  1. मनुष्य हर युग में बस एक ही प्रश्न को सुलझाने में लगा है मैं कौन हूं मेरे जन्म लेने का उद्देश्य क्या है। जिस दिन वह मोह माया झूठ के जाल से बाहर आ जायेगा उस दिन ही उसे समझ में आ जायेगा वह क्या है और क्यों है ?
    - अर्विना गहलोत
    प्रयागराज - उत्तर प्रदेश
    (WhatsApp से साभार)

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