मीरा जैन : लघुकथा कसौटी : सोच का दायरा
" मंगल ! मुझे मालूम था तुम हर बार की तरह इस बार भी दुकान जरूर लगाओगे , लाओ इक्कीस दीये दे दो।"
" जी साहब।"
" अरे जग्गू बेटा ! साहब जी को इक्कीस दीये देना।"
दस वर्षीय जग्गू के चेहरे पर असीम मुस्कुराहट हाथ मे दियो का पैकेट-
" लिजिए अंकल ! पूरे इक्कीस दीये रख दिए हैं।"
" शाबाश बेटा ! यह लो रुपए, पढ़ते हो ?"
"जी अंकल ! पांचवी कक्षा मे हूं।"
" बहुत बढ़िया , मन लगाकर पढ़ाई करना नही तो अपने पिता की तरह ही जिंदगी भर कुम्हार का काम करते रह जाओगे।"
" जी अंकल!"
दीये का पैकेट ले प्रमोद ने जैसे ही स्कूटर स्टार्ट की उसी वक्त मंगल उनके करीब आ हाथ जोड़ कहने लगा-
" माफ करिएगा साहब जी ! आपसे एक बात कहना चाहता हूं।"
" हां-हां कहो "
"साहब जी !आज जो बात आपने जग्गू से कहीं फिर कभी मत कहिएगा ।"
" क्यों , मैंने ऐसा क्या कह दिया जिससे तुम्हें बुरा लगा ?"
" आपने एक बात तो बहुत अच्छी कही कि खूब मन लगाकर पढ़ाई करना किंतु साथ ही आपने यह भी कहा कि- 'नहीं तो मेरी तरह कुम्हार बनकर रह जाएगा' इस तरह की बातें बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डालती है उनके मन में अपने पैतृक व्यवसाय के प्रति हीनता के भाव जन्म लेने लगते हैं बड़े होकर खुदा ने खास्ता उसकी कहीं नौकरी नहीं लगी तो वह तनाव में कोई गलत कदम उठा सकता है यदि वह पैतृक व्यवसाय से जुड़ा रहेगा तो अपनी रोज रोटी कमा ही लेगा इसीलिए मै स्कूल की छुट्टी के दिन इसे अपने साथ कुछ समय के लिए लेकर आता हूं ताकि वह अपने पैतृक व्यवसाय को समझ सके उसका सम्मान करे।"
मंगल के विचार सुन प्रमोद का मुंह आश्चर्य खुला का खुला रह गया। मन ही मन सोचने लगा कितनी सकारात्मक सोच है मंगल की, काश! यही सोच आम जनों में भी व्याप्त हो जाए।
- मीरा जैन
उज्जैन - मध्यप्रदेश
यह लघुकथा शिक्षा और रोजगार को लेकर लिखीं गई है। मंगल अनपढ़ जरुर है। परन्तु रोजगार के प्रति सकारात्मक सोच रखता है। शिक्षा के बाद भी रोजगार के प्रति जागरूक है। जो प्रमोद को भी आश्चर्य में डाल देता है। यही लघुकथा की सफलता है।
पंचलाइन:
मै स्कूल की छुट्टी के दिन इसे अपने साथ कुछ समय के लिए लेकर आता हूं ताकि वह अपने पैतृक व्यवसाय को समझ सके उसका सम्मान करे।
संदेश:
पैतृक रोजगार के प्रति हीन भावना नहीं होनी चाहिए ।
चिंतन:
पैतृक रोजगार का महत्व
लघुकथा का प्रकार:
रोजगार परक लघुकथा
नवीनता :
बाप - बेटे के बीच तीसरे का कोई महत्व नहीं
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