डॉ. अलका पांडेय की लघुकथाएं

       डॉ अलका पाण्डेय 


पिता का नाम-डा.शिव दत्त  शुक्ल 

माता का नाम - ऋषिकुमारी शुक्ल 

पति का नाम -देवेन्द्र पाण्डेय 

शिक्षा - ग्रेजुएट

जन्म 7 अक्टूबर

व्यवसाय - समाज सेविका और लेखिका 

प्रकाशित पुस्तकें -

१)महिलाओं के अधिकार कानून के दायरे में - लेख संग्रह 

२) बैचेन हुए हम - काव्य संग्रह 

३) लघु आकाश - लघुकथा संग्रह 

४) ओस थी बूंद- हाइकु संग्रह 

५) एक अकेली औरत : काव्य संग्रह 

६)गलियां :  लघु कथा संग्रह

७) मां की यादें ( काव्य संग्रह मां पर )

८) अदीता ( काव्य संग्रह बेटी पर)

९) नट खट बचपन( बालसंग्रह)

१०)अनुराग का अवसाद ( उपन्यास)

११)जनयिति काव्य संग्रह 

१२) नन्हे पंखों की उड़ान (बाल कविता संग्रह) 

१३) नया सूरज कहानी संग्रह 

१४) रेत का महल ( कहानी संग्रह) 

15/ जीवन दोहावली (दोहा संग्रह)

16/शब्द शब्द में तुम/(काव्य संग्रह)

17/अपराजिता (काव्य संग्रह)

सम्पादन - ७ पुस्तकें 

१) अग्निशिखा काव्य धारा 

२) अग्निशिखा कथा धारा 

३) काव्य जीवन चक्र 

४) जन्मदाता 

५) शब्दाचे शिल्पकार मराठी 

६) नवांकुर 

७)अग्नि ( गोल्डन वर्ड बुक रिकॉर्ड में दर्ज )

पत्र - पत्रिका ओ मे -मंगल दीप , नवभारत टाईम्स , मेरी सहेली , केरियर , आदि 

समाज सेवा 

पिछले तीस वर्षों से 

अखिल भारतीय अग्निशिखा के माध्यम से १) अश्लिलता विरोधी आंदोलन २) घरेलू हिंसा के विरुध ३) एड्स जनजाग्रति के लिये नुक्कड नाटक पूरे महाराष्ट्र में ४) कुटुम्ब विघटन को रोकना ५) महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम ६) सम्मान समारोह हर साल

 ७) आदिवासियों के लिये 

८) वृक्षा रोपण हर साल ७) अग्निशिखा गौरव सम्मान समारोह

 ९) डा शिवदत् शुक्ल स्मृति सम्मान समारोह 

१०) महिला दिवस पर 

११) हर माह काव्य गोष्ठी करवाना 

१२) विशेष अवसरों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाना

साहित्यक संस्थाओ से प्राप्त पुरस्कार

सम्मान - महिला गौरव 

विघावाचस्पति सम्मान - विक्रमशिला विघापीठ से 

रत्न ,हिरणी सम्मान , समाज गौरव सम्मान , समाज 

भूषण सम्मान , 

साहित्य मंडल श्रीनाथ द्वारा से ,(बाल साहित्य भूषण) 

जबलपुर कादंबरी से स्वर्गीय सुधीर बाजपेई स्मृति सम्मान 

साहित्य मंडल श्रीनाथ द्वारा से हिंदी साहित्य भूषण सम्मान 

अखिल भारतीय साहित्य परिषद कोटा से डॉ विमलेश श्रीवास्तव स्मृति सम्मान 

जैमिनी अकादमी, पानीपत - हरियाणा द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी जन्मशताब्दी सम्मान - 2024

सप्तश्रृंगी संस्थान से महाकाल साहित्य सम्मान 

शब्द गंगा शुद्ध अभियान सुमित्रा कुमारी सिन्हा स्मृति सम्मान 

यमुनाबाई मात्रा वंदन पुरस्कार 

शिव छत्रपति गौरव पुरस्कार इस प्रकार अभी  

तक  ( 800) से अधिक सम्मान मिले है ।


स्थाई पता -


देविका रो हाऊस प्लांट न.७४ सेक्टर -१ कौपरखैरीन् नवि मुम्बई  ४००७०९ मो . न. 9920899214/ 8369853084

E mail -alkapandey74@gmail.com

डॉ. अलका पांडेय की पांच लघुकथाएं :-



1. अंतिम आईना


रामू कई दिनों से बेचैन था। हर रात उसे लगता—जैसे उसके कमरे में कोई और भी मौजूद है।

अंधेरे में किसी की धीमी साँसों की आहट… दीवार पर काँपती परछाईं… और खिड़की से आती ठंडी हवा उसके रोंगटे खड़े कर देती।

वह अक्सर खुद से कहता

“यह सब मेरा वहम है… यहाँ कोई नहीं है।”

पर उस रात डर कुछ ज़्यादा ही गहरा था।

उसे साफ महसूस हुआ—जैसे कोई उसके पीछे खड़ा है।

रामू काँपती आवाज़ में बोला—

“क… कौन है वहाँ…? सामने आओ!”

कोई जवाब नहीं आया।

बस सन्नाटा और गहरा हो गया।

हिम्मत जुटाकर उसने झटके से लाइट जलाई।

कमरा खाली था।

चारों ओर वही सन्नाटा… वही ठंडी हवा।

उसकी नज़र सामने दीवार पर टंगे आईने पर पड़ी।

रामू कुछ पल तक उसे देखता रहा… फिर अचानक उसका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

आईने में उसका चेहरा नहीं था।

उसकी जगह धुँधले अक्षरों में कुछ लिखा उभर रहा था—

“जिसे तूने जिंदगी भर कुचला…

जिसकी चीखें तूने अनसुनी कीं…

आज वही तेरा सच बनकर खड़ा है।”

रामू घबराकर पीछे हट गया।

उसकी आवाज़ काँप रही थी—

“न… नहीं… यह झूठ है… मैं ऐसा नहीं हूँ…!”

पर आईने में लिखे शब्द और गहरे हो गए—

“अंतिम आईना झूठ नहीं बोलता।”

उस रात के बाद सुबह लोगों ने देखा—

रामू का कमरा खुला था…

पर रामू कहीं नहीं था।

बस दीवार पर टंगे उसी आईने में

एक नया चेहरा उभर आया था—

डरा हुआ…

मौन…

और जैसे किसी अनदेखे भय में कैद।

इंसान दूसरों से भले सच छिपा ले, पर अपने अंतरात्मा से नहीं।

अन्याय और अत्याचार की प्रतिध्वनि कभी न कभी लौटती है। ***



2.  बेख़बर राहें


स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर भीड़ थी। गाड़ियों की आवाज़, लोगों की चहल-पहल… और एक कोने में बैठा रवि, अपने बैग को थामे, चुपचाप लोगों को देख रहा था।

“कहाँ जाओगे?” पास खड़ी लड़की ने पूछा।

रवि ने कंधे उचकाए—“पता नहीं।”

लड़की चौंकी—“मतलब? टिकट लिया है या नहीं?”

“टिकट तो ले लूँगा… मंज़िल तय नहीं की,” वह हल्का-सा मुस्कुराया।

“अजीब हो तुम!” लड़की ने हँसते हुए कहा, “लोग पहले मंज़िल तय करते हैं, फिर सफर शुरू करते हैं।”

रवि ने सामने आती ट्रेन की ओर देखते हुए कहा—“और कुछ लोग सफर शुरू करते हैं, ताकि मंज़िल मिल सके।”

लड़की थोड़ी देर चुप रही—“घरवाले कुछ नहीं कहते?”

“कहते हैं… बहुत कुछ,” रवि ने गहरी साँस ली, “पर उनकी आवाज़ में मेरे दिल की आवाज़ दब जाती है।”

“तो भाग आए?” उसने सीधे पूछा।

“भागा नहीं… बस खुद को सुनने‌ ,पहचानने निकला हूँ।”

लड़की ने अपना बैग नीचे रखा—“मैं भी रोज़ यहाँ आती हूँ, ट्रेन पकड़ती हूँ… लेकिन हर दिन लगता है जैसे कहीं पहुँच ही नहीं रही।”

“क्यों?” रवि ने पूछा।

“क्योंकि जो कर रही हूँ, वो मेरा नहीं है,” उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

कुछ पल खामोशी रही। फिर रवि ने कहा—“तो एक दिन ऐसा भी चुनो, जब टिकट मंज़िल का नहीं, मन का हो।”

लड़की ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा—“और अगर रास्ता गलत निकला तो?”

रवि ने प्लेटफॉर्म पर दौड़ते एक बच्चे की ओर इशारा किया—“देखो उसे… गिरता है, उठता है, फिर दौड़ता है। कोई उसे गलत नहीं कहता… क्योंकि वो सीख रहा है।”

लड़की की आँखों में चमक आ गई—“तो तुम मानते हो कि भटकना भी ज़रूरी है?”

“भटकना नहीं… तलाश,” रवि ने कहा, “फर्क सिर्फ शब्दों का है।”

ट्रेन आ चुकी थी। लड़की ने जल्दी से पूछा—“कौन-सी ट्रेन लोगे?”

रवि ने मुस्कुराकर कहा—“जो सबसे पहले दिल को ठीक लगे।”

लड़की ने अपना टिकट फाड़ दिया—“आज मैं भी वही ट्रेन लूँगी।”

दोनों अलग-अलग डिब्बों की ओर बढ़े, लेकिन उनके कदमों में अब हिचक नहीं थी।

भीड़ वही थी, स्टेशन वही… पर दो लोग अब रास्तों से नहीं, अपने भीतर से चल पड़े थे।



3. मौन की कीमत



दादी की मय्यत आँगन में रखी थी। सफ़ेद चादर पर सजे फूल, धूपबत्ती की हल्की खुशबू, और हवा में फैला हुआ एक गहरा दुख…

पर उस दुख के बीच कुछ आवाज़ें अजीब-सी लग रही थीं।

“अरे यार, ज़रा साइड हो… फोटो क्लियर नहीं आ रही,” एक युवक ने मोबाइल ऊपर उठाते हुए कहा।

दूसरा हँसकर बोला, “हाँ, और थोड़ा झुककर खड़े हो… ऐसे लगे कि हम बहुत करीब थे दादी के।”

पास खड़ी एक महिला ने धीमे से कहा,

“बहन, थोड़ा रोने जैसा चेहरा बना लो… ऐसे हँसते हुए फोटो ठीक नहीं लगेगी।”

दूसरी ने हल्की हँसी दबाते हुए जवाब दिया,

“अरे, स्टेटस डालना है… दुख तो दिखना ही चाहिए ना।”

नेहा ne यह सब सुना तो भीतर कुछ टूटने लगा।

इतने में एक बुज़ुर्ग आगे बढ़े और ठहरी हुई आवाज़ में बोले,

“बेटा… ये फोटो खिंचवाने की जगह नहीं है, ये किसी के दुख का घर है।”

युवक ने बिना भाव बदले कहा,

“dadi, बस दो मिनट… आजकल यही तरीका है बताने का कि हम भी आए थे।”

बुज़ुर्ग की आँखें भर आईं,

“क्या अब आने का सबूत भी देना पड़ता है…?

दर्द बाँटने का नहीं, दिखाने का ज़माना आ गया है क्या?”

कुछ पल के लिए सब खामोश हो गए, लेकिन फिर मोबाइल की स्क्रीनें फिर चमक उठीं।

कोई वीडियो बना रहा था—

“हाँ दोस्तों, हम यहाँ अंतिम संस्कार में आए हैं… भगवान आत्मा को शांति दे…”

एक महिला बोली,

“जल्दी करो, मुझे और भी दो जगह जाना है… यहाँ तो बस औपचारिकता निभानी थी।”

तभी कोने में बैठी दादी की बहू की सिसकियाँ सुनाई दीं।

वह रोते हुए बोली,

“माँ चली गईं… और लोगों को यहाँ भी जल्दी है…”

उसकी आवाज़ में ऐसा दर्द था कि दिल काँप गया।

नेहा  आगे बढ़ी और धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा,

“यह जगह दिखावे की नहीं… संवेदना की होती है।

यहाँ शब्द नहीं, मौन बोलता है…

और आज… हम उस मौन को भी शोर में बदल रहे हैं।”

तभी एक छोटी बच्ची अपनी माँ का हाथ खींचते हुए बोली,

“मम्मी, सब लोग मोबाइल क्यों चला रहे हैं?

क्या दादी को अच्छा लगेगा ये सब?”

माँ चुप रही… उसकी आँखें झुक गईं।

बुज़ुर्ग ने गहरी साँस लेकर कहा,

“जब दुख में भी इंसान अभिनय करने लगे,

तो समझ लेना… संवेदनाएँ कहीं खो गई हैं।”

पूरा आँगन एक पल को थम गया।

मोबाइल नीचे झुक गए… कुछ नज़रें भी।

दादी का चेहरा शांत था,

जैसे कह रहा हो—

“मुझे फूलों की नहीं… तुम्हारी सच्ची संवेदना की ज़रूरत थी।”

उस दिन समझ आया,

मौत से बड़ा दुख ये नहीं कि कोई चला गया…

बल्कि ये है कि पीछे रह गए लोग

दुख की गरिमा भी भूलते जा रहे हैं। ***


4. हक़ीक़त


बरामदे में बैठी माँ खामोशी से दरवाज़े की ओर देख रही थीं।

सांझ उतर आई थी, पर उनकी आँखों में इंतज़ार अब भी उजाला किए था।

आरती ऑफिस से लौटी तो माँ को उसी मुद्रा में पाया।

“माँ… अभी तक यहीं बैठी हो?” उसने थके स्वर में पूछा।

माँ मुस्कुराईं— “सोचा, आज तू जल्दी आ जाएगी… साथ चाय पीते।”

आरती ने बैग एक तरफ़ रखते हुए कहा— “माँ, इतना काम रहता है… हर रोज़ तो संभव नहीं।”

माँ ने धीरे से सिर हिलाया— “हाँ, अब समझ गई हूँ… समय बदल गया है।”

थोड़ी देर खामोशी रही।

आरती ने मोबाइल उठाया—संदेश चमक रहा था— “आज नहीं आ पाऊँगा, बहुत काम है।” – दीपक

उसने हल्की झुंझलाहट से कहा— “सबके पास बस ‘काम’ है… किसी के पास समय ही नहीं।”

माँ ने उसकी ओर देखा— “तुझे बुरा लगा?”

“हाँ माँ! जब अपने ही समय न दें तो…” उसकी आवाज़ भर्रा गई।

माँ ने चाय का कप उसकी ओर बढ़ाते हुए शांत स्वर में कहा— “बेटी, यही तो हक़ीक़त है… जब हम अपनों से समय चाहते हैं, तब समझ आता है कि समय कितना कीमती होता है।”

आरती  चुप हो गई।

माँ फिर बोलीं— “आज तू मुझे कह रही है कि ‘समय नहीं है’… और वही बात जब तुझे किसी अपने से सुनाई दी, तो दिल दुख गया न?”

आरती की आँखें झुक गईं।

वह धीरे से माँ के पास बैठ गई— “माँ… मैं समझ गई… गलती मेरी ही थी।”

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— “रिश्ते बड़े काम से नहीं… छोटे-छोटे समय से चलते हैं।”

आरती ने तुरंत मोबाइल उठाया और दीपक को जवाब लिखा— “काम के बीच थोड़ा समय निकालना… क्योंकि रिश्ते इंतज़ार में नहीं, एहसास में जीते हैं।”

फिर उसने माँ का हाथ थाम लिया— “चलो माँ… आज की चाय साथ पीते हैं… बिना किसी ‘काम’ के बहाने के।”

माँ की आँखों में सुकून उतर आया।

हक़ीक़त यही है—

हम जिस समय को बचाने में लगे रहते हैं,

वही समय हमारे रिश्तों को खो देता है। ***


5. गुमराह



“माँ, बस थोड़ा सा पैसा लगाओ… सब लोग लगा रहे हैं, डबल हो जाएगा,” रवि ने मोबाइल स्क्रीन दिखाते हुए उत्साह से कहा।

माँ ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा—

“बेटा, इतना आसान होता तो सब अमीर क्यों नहीं हो जाते?”

रवि हँस पड़ा—

“आप समझती नहीं हो माँ, ये नया सिस्टम है… बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं इसमें।”

पास बैठे पिता ने गंभीर स्वर में कहा—

“बड़े लोग नाम से नहीं, काम से बड़े होते हैं। जांच की है तुमने?”

“पापा, आप हर चीज़ में शक करते हो,” रवि झुंझला गया।

शंकर करना ही चाहिए आंख बंद करके धोखा मिलता है ..

रवि उठ कर चला गया ...

कुछ दिनों बाद…

रवि का चेहरा बुझा हुआ था। मोबाइल बार-बार देख रहा था, पर स्क्रीन पर सिर्फ “सरवर नाट फाउन्ड” दिख रहा था।

माँ ने घबराकर पूछा—

“क्या हुआ बेटा?”

रवि की आवाज काँप गई गला रुंध गया..

“माँ… वो कंपनी… गायब हो गई… सारे पैसे…”

पिता ने गहरी साँस ली—

“कितने?”

“मेरे ही नहीं… दोस्तों और मोहल्ले वालों के भी… सबने मुझ पर भरोसा करके लगाए थे…”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा—

“पैसा गया है बेटा, लेकिन सबक मिल गया… अब खुद को मत खो देना।”

रवि की आँखों से आँसू बह निकले—

“मैं गुमराह हो गया था माँ… लालच और दिखावे में सच देख ही नहीं पाया…”

पिता ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—

“गलती से सीख लो, यही समझदारी है। गुमराह वही होता है जो गलती है सबक लेना छोड़ देता है।”

रवि ने आँसू पोंछे—

“अब किसी को बिना सच जाने राह नहीं दिखाऊँगा… पहले खुद जांच पड़ताल करुंगा।” ***


लघुकथाओं पर समग्र साहित्यिक समीक्षा

प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ समकालीन समाज, मानवीय संवेदनाओं, आत्ममंथन, रिश्तों की सच्चाई तथा बदलते सामाजिक मूल्यों का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण करती हैं। लेखक ने सरल, प्रवाहपूर्ण एवं संवेदनात्मक भाषा के माध्यम से जीवन के विविध पक्षों को गहरी मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है। प्रत्येक कथा अपने भीतर एक सशक्त संदेश समेटे हुए है और पाठक को अंत तक बाँधे रखने की क्षमता रखती है।


1. “अंतिम आईना”


यह लघुकथा मनुष्य की अंतरात्मा, अपराधबोध और कर्मफल की अवधारणा को रहस्यात्मक शैली में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी का वातावरण भय, मनोवैज्ञानिक तनाव और आत्मसंघर्ष से भरपूर है। “अंतिम आईना झूठ नहीं बोलता” जैसी पंक्ति पूरी कथा का केंद्रीय सत्य बनकर उभरती है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि इंसान संसार से भले अपने अपराध छिपा ले, पर स्वयं की अंतरात्मा से कभी नहीं बच सकता। कथा का अंत अत्यंत प्रभावकारी और विचारोत्तेजक है।


2. “बेख़बर राहें”


यह कहानी आत्मखोज, जीवन की तलाश और अपने भीतर की आवाज़ सुनने की प्रेरणा देती है। स्टेशन और यात्रा का प्रतीकात्मक प्रयोग अत्यंत प्रभावी है। संवाद सहज, स्वाभाविक और जीवन-दर्शन से परिपूर्ण हैं। “भटकना नहीं… तलाश” जैसी पंक्ति आधुनिक युवा मन की बेचैनी और उसके उत्तर की खोज को गहराई से व्यक्त करती है। यह लघुकथा युवाओं को अपने सपनों और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का सकारात्मक संदेश देती है।


3. “मौन की कीमत”


यह अत्यंत मार्मिक और सामाजिक यथार्थ पर तीखा प्रहार करने वाली लघुकथा है। लेखक ने आधुनिक डिजिटल युग में संवेदनाओं के क्षरण और दिखावटी सामाजिक व्यवहार को बहुत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। अंतिम संस्कार जैसे गंभीर अवसर पर सोशल मीडिया प्रदर्शन की प्रवृत्ति समाज के खोते मानवीय मूल्यों को उजागर करती है। “यहाँ शब्द नहीं, मौन बोलता है” जैसी पंक्ति पूरी कथा की आत्मा है। यह कहानी पाठक को आत्ममंथन करने के लिए बाध्य करती है।


4. “हक़ीक़त”


यह लघुकथा रिश्तों में समय, संवेदना और भावनात्मक उपस्थिति के महत्व को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत करती है। माँ और बेटी के संवाद जीवन की वास्तविकता को सहजता से उजागर करते हैं। “रिश्ते बड़े काम से नहीं… छोटे-छोटे समय से चलते हैं” जैसी पंक्ति आज की भागदौड़ भरी जिंदगी के लिए गहरा संदेश है। कथा भावनात्मक रूप से अत्यंत स्पर्शकारी और जीवन के निकट प्रतीत होती है।


5. “गुमराह”


यह कहानी आधुनिक समय के लालच, ऑनलाइन भ्रम और बिना सत्यापन के अंधविश्वास पर गंभीर चेतावनी देती है। परिवार के संवाद अत्यंत यथार्थपूर्ण हैं। “गलती से सीख लो, यही समझदारी है” जैसी पंक्ति कहानी को केवल चेतावनी नहीं, बल्कि सकारात्मक जीवन-पाठ भी बनाती है। यह लघुकथा सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने में सक्षम है।

समग्र समीक्षा / टिप्पणी

पाँचों लघुकथाएँ विषय-वस्तु, संवेदना, शिल्प और संदेश की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली हैं। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और पाठक के मन को सीधे स्पर्श करने वाली है। कथाओं में आधुनिक समाज का यथार्थ, मानवीय रिश्तों का द्वंद्व, आत्मविश्लेषण और नैतिक चेतना अत्यंत प्रभावी ढंग से उभरकर सामने आती है। इन रचनाओं की विशेषता यह है कि ये केवल कहानी कहने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पाठक के भीतर प्रश्न जगाती हैं और उसे आत्मविश्लेषण की ओर प्रेरित करती हैं। समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में ऐसी रचनाएँ निश्चित रूप से सार्थक, विचारोत्तेजक और समाजोपयोगी मानी जाएँगी।

- डॉ इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर


  कथ्य की स्पष्टता, संवादों की जीवंतता


डॉ. अलका पांडेय द्वारा प्रस्तुत ये पाँचों लघुकथाएँ समकालीन समाज की मानसिक, नैतिक और भावनात्मक विडंबनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उजागर करती हैं। इनकी लघुकथाओं की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे जीवन के अत्यंत सामान्य प्रतीत होने वाले प्रसंगों में असाधारण संवेदनात्मक गहराई खोज लेती हैं।


1. अंतिम आईना


 मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध और अंतरात्मा की प्रतिध्वनि को मनोवैज्ञानिक और रहस्यात्मक शैली में प्रस्तुत करती है। कहानी का वातावरण पाठक में कौतूहल और भय दोनों उत्पन्न करता है। आईना यहाँ केवल वस्तु नहीं अपितु आत्मा का प्रतीक बनकर उभरता है। अंत अत्यंत प्रभावशाली है और यह संदेश देता है कि व्यक्ति संसार से झूठ बोल सकता है, पर स्वयं से नहीं।


2. बेख़बर राहें


यह कथा आज के युवा मन की तलाश, असमंजस और आत्मपहचान की यात्रा को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है। स्टेशन और सफ़र यहाँ जीवन के प्रतीक बनकर आते हैं। संवाद बहुत स्वाभाविक और विचारोत्तेजक हैं। “भटकना नहीं… तलाश” जैसी पंक्तियाँ कथा को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करती हैं। यह रचना युवाओं को अपने भीतर की आवाज़ सुनने की प्रेरणा देती है।


3. मौन की कीमत


समकालीन समाज में संवेदनाओं के क्षरण और सोशल मीडिया के दिखावे पर तीखा व्यंग्य करती अत्यंत मार्मिक लघुकथा। अंतिम संस्कार जैसे गंभीर अवसर का भी प्रदर्शन में बदल जाना आज की कटु सच्चाई है। कथा में संवादों के माध्यम से कृत्रिमता और वास्तविक दुख का विरोधाभास बहुत प्रभावी बन पड़ा है। “यहाँ शब्द नहीं, मौन बोलता है”—यह पंक्ति पूरी कथा का सार बन जाती है।


4. हक़ीक़त


यह एक सरल किंतु अत्यंत प्रभावशाली पारिवारिक लघुकथा है, जो समय और रिश्तों के महत्व को रेखांकित करती है। माँ-बेटी के संवाद सहज और भावपूर्ण हैं। कथा पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है कि व्यस्तता के बीच हम अपने सबसे निकट संबंधों को ही अनदेखा कर देते हैं। अंत में दिया गया संदेश जीवन की सच्चाई को बहुत कोमलता से सामने लाता है।


5. गुमराह


यह लघुकथा वर्तमान समय के ऑनलाइन निवेश, लालच और दिखावे की मानसिकता पर सार्थक प्रहार करती है। कथा में पारिवारिक संवादों के माध्यम से अनुभव और आवेग का अंतर स्पष्ट होता है। “गुमराह वही होता है जो गलती से सबक लेना छोड़ देता है”—यह कथन लघुकथा का नैतिक केंद्र है। युवाओं के लिए यह एक जागरूकता और सावधानी का संदेश देती है।

पाँचों लघुकथाएँ विषय-विविधता से परिपूर्ण होते हुए भी मानवीय संवेदना की एक साझा धारा से जुड़ी हुई हैं। लेखन में कथ्य की स्पष्टता, संवादों की जीवंतता है।

-डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान





Comments

Popular posts from this blog

हिन्दी के प्रमुख लघुकथाकार ( ई - लघुकथा संकलन ) - सम्पादक : बीजेन्द्र जैमिनी

हिन्दी की प्रमुख महिला लघुकथाकार ( ई लघुकथा संकलन ) - सम्पादक : बीजेन्द्र जैमिनी

जीवन की प्रथम लघुकथा ( लघुकथा संकलन ) - सम्पादक : बीजेन्द्र जैमिनी