हलीम आईना से साक्षात्कार
जन्म : 06 जून 1966 को सकतपुरा - कोटा - राजस्थान के प्रतिष्ठित सूफी परिवार में जन्म
शिक्षा : एम . ए . हिन्दी , बी. एड , फिल्म कथा - पटकथा लेखन पाठ्यक्रम
प्रकाशित पुस्तकें : -
हँसो , मत हँसो
हँसो भी , हँसाओ भी
सम्मान : -
- हरिशंकर परसाई राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन
- साहित्य भास्कर सम्मान
विशेष : -
- हास्य -व्यंग्य कवि एवं मंच संचालक
- अन्सारी दर्पण व मोमिन इण्डिया का सम्पादन
- विभिन्न भाषाओं में कविताओं का अनुवाद
- राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित
पता : -
निकट बी. एड. कालेज , सकतपुरा - कोटा - राजस्थान
प्रश्न न. 1 - आप ने किस उम्र में लिखना प्रारंभ किया और आपके प्रेरणा स्रोत कौन हैं?
उत्तर - देखिये बीजेन्द्र जी! वैसे तो हर कला गॉड गिफ्ट होती है. जब मैं बारह वर्ष का था तब से कोटा दशहरे में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन रात भर सुनता डायरी -पेन लेकर बैठता था लोग तालियाँ पीटते मैं अच्छी पंक्तियाँ नोट करता...अशोक चक्रधर, हुल्लड़ जी, शैलजी... आदि हास्य -व्यंग्य कवियों को सुनता तो मन ही मन अपने आप से कहता 'यार!अपन भी लिख सकते हैं ऐसा तो...!'और इस तरह मैं विषमताओं पर लिखने लगा था...
प्रश्न न.2 - आपकी पहली रचना कब व कहाँ प्रकाशित हुयी?
उत्तर - जब मैं दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था तब उस जमाने में राष्ट्रदूत अखबार के साथ साप्ताहिक राष्ट्रदूत पत्रिका आती थी 1980 की बात है मैंरी पहली हास्य -व्यंग्य कविता 'अत्याधुनिक परिभाषाएं' शीर्षक से छपी... बेहद ख़ुशी हुई... उसके बाद तो छपने और पढ़ने का क्रम चल निकला.
प्रश्न न.3 - आप किन -किन विधाओं में लिखते हैं और सहज रूप से किस विधा में लिखना पसन्द करते हैं?
उत्तर - आपका सवाल रोचक है. थोड़ा बहुत तो गीत, ग़ज़ल, हाईकू, दोहे,मुक्तक,कुंडलियाँ, छंद मुक्त कविताएँ लिखी... किन्तु मेरी पहचान हास्य -व्यंग्य कविता से है उसी ट्रेक पर दौड़ रहा हूँ.लोग मंच से सुनते भी हैं और पढ़ते भी हैं.
प्रश्न न.4 - आप साहित्य के माध्यम से क्या सन्देश देना चाहते हैं?
उत्तर - देखिए बिजेन्द्र जी!मेरा पहला कविता संग्रह 2013 में राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से आया 'हँसो भी, हँसाओ भी' उसके बाद 2018 में किताबगंज से 'हँसो, मत हँसो' आया हर कविता में संदेश है. फिर भी आप पूछते हैं तो मैं इतना ही कहना चाहता हूँ दुनिया के सारे मानव भाई -भाई हैं किसी से घृणा न करें, किसी का दिल न तोडें ... कथनी -करनी का अंतर मिटे, आचरण की शुद्धि पर ध्यान दें...!
प्रश्न न.5 - वर्तमान साहित्य में आपका पसंदीदा कवि या लेखक कौन है और कौनसी पुस्तक?
उत्तर - कबीर से बड़ा व्यंग्य कवि कोई नहीं... नागार्जुन, धूमिल... ने भी व्यंग्य कविता ऊँचाइयाँ दी... किन्तु कविता के तेवर के हिसाब से मुझे फारसी के कवि हाफ़िज शिराजी का संग्रह 'दीवान -ए -हाफ़िज ' तथा धूमिल की 'संसद से सड़क तक ' पसंद है... आज भी लोग लिख रहे हैं किन्तु व्यंग्य कविता में खालीपन दिखाई देता है.
प्रश्न न.6 - क्या आपको आकाशवाणी या दूरदर्शन से प्रसारित होने का अवसर मिला ये अनुभव कैसा रहा?
उत्तर - कई बार अवसर मिला, वहाँ उनके नियम -कायदों के अनुसार रचनाएँ पढ़नी होती हैं...पहले वह रचनाओं को देखते हैं उसके बाद ही पढ़ने कई अनुमति देते हैं.. मेरी एक व्यंग्य कविता में मारुती नंबर...शब्द था निदेशक महोदया ने हँसते हुए कहा- 'सर!आप इसे गाड़ी नम्बर करलें..'समय, काल, परिस्थिति के अनुसार बदलना पड़ता है.. बदलाव प्रकृति का नियम भी है...।
प्रश्न न.7 - आप वर्तमान में कवि सम्मेलनों को कितना प्रासंगिक मानते हैं और क्यों?
उत्तर - कविता को जिन्दा रखने में कवि सम्मेलनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता... समय के साथ हर चीज में बुराई आ जाती है तो उसे दूर भी किया जा सकता है... अच्छे और नये लोगों को अवसर दिये जाएँ...।
प्रश्न न.8 - आपकी नज़र में साहित्य क्या है? तथा फेसबुक के साहित्य को किस दृष्टी से देखते हैं?
उत्तर - जो मानवता के हित का काम करे, दिलों को जोड़ना जिसका ध्येय हो,समाज में नई चेतना भरे, दिशा -निर्देश देते हुए आत्मा के तारों को झंकृत करे.. मनोरंजन द्वारा लोकानुरंजन करने वाला सशक्त शब्द समूह ही साहित्य है...। कुछ अपवादों को छोड़ कर फेसबुक पर साहित्य लेखन की बजाय फेस दिखाने का काम हो रहा है जिसे हम साहित्य की श्रेणी में नहीं रख सकते...।
प्रश्न न.9 - वर्तमान साहित्य के क्षेत्र में मिलने वाले सरकारी, गैर सरकारी पुरस्कारों की क्या स्थिती है?
उत्तर - पारदर्शिता होनी चाहिए, विशेष क्या कहें सब जानते हैं...।
प्रश्न न.10 - क्या आप अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटना या सम्मान का उल्लेख करेंगे?
उत्तर - प्रतिभा कभी छिपती नहीं... मुझे याद है कवि सम्मेलन के मंच से नीचे उतरा तो इंटरनेशनल कवि मयूख साहब ने पीठ थपथपाते हुए यह कहना- 'तेरे भीतर काव्य प्रतिभा है तू आगे तक जायेगा...!' उसी तरह निरोगधाम पत्रिका के सम्पादक का पत्र -'आपके दोहों की ख़ूब डिमाण्ड है...।'
प्रश्न न.11 - आपके लेखन में परिवार की क्या भूमिका है?
उत्तर - परिवार की कोई विशेष भूमिका नहीं... माता -पिता से ईमानदारी, नैतिकता, मानवता... विरासत में मिली है। पत्नी का सहयोग रहा है वो मेरे लेखन के समय मुझे पूर्ण सहयोग करती है... । अंत में एक दोहा सुना कर बात समाप्त करता हूँ... । बिन पंखों से नाप ले, धरती अरु अस्मान /कोई सीमा ही नहीं, कवि जब भरे उड़ान।






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