चौधरी चरण सिंह स्मृति सम्मान - 2025
आईये आज का रूख मौन अवस्था की तरफ ले चलते हैं की मौन क्या है,मेरे ख्याल में मौन एक सक्रिय अवस्था है यहां व्यक्ति खुद जुडता है,अपनी उर्जा को शक्तिशाली करता है और मानसिक रूप से मजबूत होता है, यह केवल चुप्पी नहीं है बल्कि एक शक्तिशाली साधना मानी गई है तो आईये आज इसी पर चर्चा करते हैं की मौन प्रकृति का बल होता है और व्यक्ति का आत्म बल होता है, यह अटल सत्य है कि मौन प्रकृति का बल होता है क्योंकि यह शक्ति, शांति और और आत्मबोध का खजाना है,यह हमें बाहरी शोर से दूर रख कर स्वयं जुडने के लिए मदद करता है जिससे मन शांत रहता है और जीवन में सकारात्मक विचार आते हैं,यह हमें आत्मविचारों को गहराई में समझने को मदद करता है, हम अनावश्यक बातचीत से बचकर अपनी मानसिक उर्जाको बढावा देते हैं जिससे हमें अधिक शक्तिशाली दिखते हैं कहने का भाव मौन उर्जा का बल है जिससे मानसिक शांतिऔर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है जिस से हमें वर्तमान में जीने की इच्छा तीव्र होने लगती है,कहने का मतलब हमें मानसिक शांति और नियंत्रण,शक्ति और उर्जा, तथा आत्म ज्ञान जैसी शक्तियों में बढोतरी मिलती है कहने का भाव मौन व्यक्ति का आत्म बल होता है जिससे हम अपने विचारों,भावनाओं और अस्तित्व को गहराई से समझ सकते हैं इसलिए मौन केवल प्रकृति का बल ही नहीं है अपितु व्यक्ति का आत्मबल भी है ।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
मौन : प्रकृति और पुरुषार्थ का अदृश्य बल है। “मौन प्रकृति का बल होता है। मौन व्यक्ति का आत्मबल होता है।” ये दोनों पंक्तियाँ मौन के उस गूढ़ स्वरूप को उद्घाटित करती हैं, जिसे हम प्रायः दुर्बलता समझ लेते हैं, जबकि वह शक्ति का सबसे परिपक्व रूप है। प्रकृति को देखिए—वह शोर नहीं मचाती, फिर भी सृष्टि का संचालन उसी के मौन से होता है। पर्वत मौन रहकर स्थिरता का संदेश देते हैं, नदियाँ बिना उद्घोष बहकर जीवन को पोषित करती हैं, वृक्ष बिना बोले छाया और फल देते हैं। सूर्य न प्रतिदिन अपनी उपस्थिति की घोषणा करता है, न चंद्रमा अपनी शीतलता का प्रचार। प्रकृति का प्रत्येक कार्य मौन में सम्पन्न होता है, और वही उसका बल है—अडिग, निरंतर और विश्वसनीय। मानव जीवन में भी मौन का यही स्वरूप दिखाई देता है। व्यक्ति जब शब्दों से नहीं, आत्मचेतना से बोलता है, तब उसका मौन आत्मबल बन जाता है। मौन वह क्षण है, जब व्यक्ति स्वयं से संवाद करता है, अपने भीतर झाँकता है और निर्णयों को परिपक्व करता है। क्रोध में चुप रह जाना, अपमान में संयम साध लेना, पीड़ा में धैर्य रखना—ये सभी मौन के ही स्वरूप हैं, और यही व्यक्ति की आंतरिक शक्ति को दर्शाते हैं। इतिहास गवाह है कि बड़े परिवर्तन शोर से नहीं, मौन से जन्मे हैं। महात्मा गांधी का मौन, बुद्ध का ध्यान, कबीर की चुप्पी—ये सभी आत्मबल के उदाहरण हैं। जहाँ शब्द सीमित हो जाते हैं, वहीं मौन असीम हो जाता है। मौन व्यक्ति को प्रतिक्रिया से ऊपर उठाकर उत्तरदायित्व की ओर ले जाता है। आज के शोरग्रस्त समय में मौन और अधिक प्रासंगिक हो गया है। निरंतर बोलते रहना, प्रतिक्रिया देते रहना व्यक्ति को थका देता है, जबकि मौन उसे संचित करता है। मौन न पलायन है, न कायरता—वह आत्मसंयम, आत्मबोध और आत्मसम्मान का शिखर है। अतः यह कहना उचित है कि प्रकृति अपने मौन से सृष्टि को थामे हुए है और व्यक्ति अपने मौन से स्वयं को। मौन को दुर्बलता नहीं, शक्ति के रूप में समझना ही जीवन की परिपक्वता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
मौन व्यक्ति का वह आत्मबल होता है जो उसे प्रकृति से, ईश्वर से जुड़ने में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है। मौन आत्मसाक्षात्कार के साथ साथ अलौकिक साक्षात्कार भी कराता है। जिससे उन शक्तियों का ज्ञान होता है जिनके प्रति अब तक अनभिज्ञता थी।मौन व्रत रखकर कितने ही लोगों ने अनेक सिद्धियां प्राप्त कर ली। मौन से शांति मिलती है,मन मस्तिष्क में शांति हो तो हमारी ग्रहण शक्ति,धारण शक्ति बढ़ जाती है और फिर एक ऐसा परिवर्तन जीवन में होता है जो जीवन की दिशा ही बदल देता है। यह एक ऐसा प्राकृतिक बल है जो ईश्वरीय प्रदत्त होता है और ईश्वर से हमको जोड़ता है। मौन रहकर देखिए,ऐसी अलौकिक घटना से साक्षात्कार होगा ऐसा अनुभव होगा जो कि ईश्वरीय साक्षात्कार से कम नहीं होगा।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
बहुत गहरा है यह कथन--मौन की साधना बहुत कठिन होती है जिसने मौन को साध लिया समझ लीजिए सब कुछ पा लिया।" मौनं सर्वस्व साधनम " एक चुप हजार प्रश्नों से उबार लेती है। मौन से आत्मबल बढता है। बेकार की बातों में सयय गँवाने से बेहतर है मौन साधें। हाँ ध्यान रखना चाहिए कि हमारा मौन किसी के लिये दुःखदायी या हानिकारक न हो। हम अपने आत्मसम्मान आत्मबल को बढाने के लिए मौन की आदत डाल लें और हमारे मौन के चलते दूसरे को कष्ट हो जाये तो यह मौन आत्म बल नहीं पापबल हो जायेगा। प्रकृति सदैव मौन रहती है लेकिन जब प्रकृति पर अन्याय हो तो वह भी बाढ मूकंप सूखा जैसी प्रतिक्रियाओं से हमें चेताती है। अतः ध्यान रहे कि अति सर्वत्र वर्ज्यते। उचित-अनुचित ज्ञान के साथ मौन रहकर आत्मबल बढायें--प्राकृतिक. शक्ति अर्जित करें।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर -महाराष्ट्र
मौन प्रकृति का बल होता है. इसलिए तो कहा गया है कि मौन की भाषा जो समझे अंदर का सुख वो पता है. मिल जाती है शक्ति उसे आत्म बल बढ़ जाता है. मौन में इतनी शक्ति होती है कि वो अच्छे से अच्छे वक्ताओं को सहज में ही हरा देता है. मौन आध्यात्मिक सोच की तरफ ले जाता है जिसे हमारे मन मे फालतू विचारों का प्रवेश नहीं ही पाता है. और हमें आंतरिक ऊर्जा की प्राप्ती होती है. ऐसे भी कहा गया है कि जब मन उदास हो या विचारों में भटकन हो तो एकदम शांत हो जाना चाहिए. एक साधारण सी बात है.ज्यादा बोलने से मनुष्य थक जाता है. ज़्यादा बोलने से एनर्जी क्षय होती है. तब चुप होना पड़ता है. और एनर्जी का क्षय होना रुक जाता है और वहीं एनर्जी हमारे आत्मिक बल को बढ़ाता है. इसलिए मौन व्यक्ति का आत्म बल होता है. ऐसा सभी मानते हैं.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
"मौन प्राकृतिक बल होता है, मौन व्यक्ति का आत्म बल होता है" यह कथन बिल्कुल सही है क्योंकि मौन सिर्फ़ चुप रहना नहीं, बल्कि विचारों और ऊर्जा को भीतर समेटकर आत्म-शक्ति बढ़ाने, एकाग्रता लाने, तनाव दूर करने और अंतरात्मा से जुड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम है, जो व्यक्ति को मानसिक शांति और आंतरिक बल प्रदान करता है। यह एक साधना है जो हमें खुद से जुड़ने और सूक्ष्म शक्तियों को महसूस करने में मदद करती है, जिससे व्यक्तित्व में गंभीरता आती है और हम जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होते हैं। मौन कमजोरी या डर का प्रतीक नहीं है, साहस और निर्भयता का परिचायक है। कभी-कभी मौन अन्याय का कारण बन जाता है। ऐसी परिस्थिति में मौन को मुखर हो जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि समय और परिस्थिति को देखते हुए मौन धारण करना चाहिए। अगर कोई समझ सके तो मौन का स्वर अत्यंत शक्तिशाली होता है।
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
मौन एक बहुत ही पवित्र साधना होती है। यह विशेष इसलिए भी , क्योंकि मौन से हम वाणी को नियंत्रित कर सकते हैं और क्रोध के आवेश में अप्रिय और कटु भाषा के प्रयोग से बचाव भी कर सकते हैं। दूसरे मौन रहने से हम स्वयं में इतनी ऊर्जा का संचयन कर सकते हैं कि वह हमारे प्राकृतिक बल को समृद्ध करने और सामर्थ्यवान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। पहले ऋषि-मुनि इसी मौन शक्ति से इतने सामर्थ्यवान होते थे कि वे जिसे जो वरदान या शाप देते थे वह यथार्थ में हो जाता है। कहने का आशय यही कि मौन अपने-आप में एक साधना, आत्मबल तो है ही, तात्कालिक किसी अप्रिय स्थिति के बचाव का उत्तम जरिया भी है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
मौन प्रकृति का बल है। मौन रह कर ही प्रकृति निस्वार्थ भाव से अपने सारे कार्य करती है। इसी लिए प्रकृति को माँ भी कहा गया है। फल, फूल, अन्न, लकड़ी, औषधि कौन सी वस्तु है जो हमें प्रकृति से प्राप्त नहीं होती?यह सब दे कर भी प्रकृति हमें जताती नहीं। यही मौन उसका बल है। मनुष्य थोड़ा सा भी किसी के लिए कुछ करता है तो उसे सौ बार बताएगा, जताएगा और सौ बार अपेक्षा करेगा कि वह व्यक्ति जिसके लिए कुछ किया गया है आभार से दोहरा होता जाए। उसके एहसान से दबता चला जाए। परंतु जो व्यक्ति ऐसी अपेक्षा नहीं करता अपितु मौन रह कर निस्वार्थ भाव से कार्य करता है वह वास्तव में जीवन व कर्म का मर्म समझता है। कहा जा सकता है कि वह व्यक्ति आध्यात्मिक है तथा एक बलशाली आत्मा का स्वामी है। क्यों कि यह कार्य आसान नहीं है । यह मौन उसकी दृढ़ता व आत्म बल का द्दोत्तक है।
- रेनू चौहान
नई दिल्ली
मौन मात्र चुप्पी नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शक्ति है, जो अपने नियमों और संतुलन से सृष्टि को नियंत्रित करती है। प्रकृति अपने तत्वों के बीच सामंजस्य बनाए रखती है, वैसे ही मौन व्यक्ति का आत्मबल उसे हर परिस्थिति में स्थिर और दृढ़ बनाए रखता है। मौन शक्तिहीनता का संकेत नहीं, बल्कि आंतरिक विवेक, संयम और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह वह शक्ति है जो शब्दों की असफलता में भी न्याय और सत्य की उपस्थिति सुनिश्चित करती है। क्योंकि जो व्यक्ति अपने मौन को जागृत कर आत्मबल में बदल लेता है,वह किसी भी चुनौती, अन्याय या दमन के सामने अडिग रहता है। वह शक्ति, शब्दों के शोर से नहीं, बल्कि धैर्य, विवेक और नैतिक दृढ़ता से उत्पन्न होती है। ऐसा व्यक्ति परिस्थितियों की कठिनाइयों, सत्ता के दबाव और सामाजिक असमानताओं के सामने भी सशक्त, प्रभावशाली और गरिमामय खड़ा रहता है। मौन, केवल प्रतीक्षा नहीं, यह साहस, धैर्य और न्याय के प्रति सर्वोच्च प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह आत्मा की पुकार है जो भीतर से न्याय का संकल्प बोलती है, और यही वह बल है जो व्यक्ति को न केवल अपने लिए, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी निर्णायक और संरक्षक बनाता है।इसलिए, मौन व्यक्ति की शक्ति उसका सबसे बड़ा हथियार है, और उसका आत्मबल उसके व्यक्तित्व, संघर्ष और न्यायबोध का साक्ष्य है। चूंकि जहाँ शब्द असफल होते हैं, वहाँ उसका मौन इतिहास और न्याय की दिशा को निर्धारित करता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर
मौन प्राकृतिक का बल होता है, मौन व्यक्ति का आत्मबल होता है... बिल्कुल सही कहा है... जैसे सागर मौन रहकर गहराइयों के साथ रहने के बावजूद अपनी आंतरिक आवाज यानी अपने अंदर की हलचल को शांति से सुनता है.. उसी तरह सूर्य, चंद्र मौन रहकर अपना काम करते हैं, आकाश बादल सभी तो अपना काम खामोशी से करते हैं...यही तो प्राकृतिक की शक्ति और बल है ...यदि प्रकृति मौन तोड़ अपनी उर्जा बहाती है तो ....परिणाम क्या होगा हमें मालूम है...ठीक उसी तरह मौन से व्यक्ति को अपनी आंतरिक आवाज सुनने, आत्म-विश्लेषण करने और निर्णय लेने की शक्ति मिलती है। मौन से जिह्या पर नियंत्रण होता जिससे वाणी के आवेगों में विराम होता है। व्यक्ति जब खुद मौन रहता है तभी वह दूसरे की बातें सुनता है जिससे आगे बात नहीं बढ़ती। मौन भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है। मौन का मतलब चुप रहना ही नहीं है , यह एक अभ्यास है ...यही मौन व्यक्ति को आध्यात्म की ओर ले जाता है और...प्रभु को पाने के लिए, ईश्वर की भावना में डूबने के लिए मौन का अभ्यास ही रास्ता है...।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
मौन का प्राकृतिक बल ऐसा होता है जहां हमारे अंतर में भावों विचारों की बहुत उथल-पुथल हो साथ ही हमारे चारों ओर के बाहरी वातावरण में मानो बहुत शोर शरावा हो रहा हो तब भी इन सब स्थितियों से निष्प्रभ होकर वह व्यक्ति आंतरिक रूप से शांति महसूस करें तथा अपनी सोच और वाणी पर नियंत्रण रखें और ईश्वरीय सत्ता से अपने को जुड़ा हुआ महसूस करें ।अपने लक्ष्य पर टिका रहे , यही प्राकृतिक बल है यह बहुत विरले ही लोग होते हैं जो इस रूप में देखे जाते हैं। इन लोगों को अक्सर अंतर्मुखी भी कह सकते हैं । ऐसे लोग जीवन के हर क्षेत्र में ऊपर से अलग और अंदर से अलग दिखते महसूस होते हैं अक्सर ऐसे लोगों को जो मौन रहते हैं उन्हें लोग अहंकारी भी कहने लगते हैं क्योंकि यह अल्पभाषी होते हैं ।अध्यात्म से इनका जुड़ाव बहुत होता है । कभी-कभी इन्हें जीवन जगत में होने वाली होनी अनहोनी का पूर्वाभास हो जाता है। यही इनका आत्म बल होता है।जिसके सहारे यही जीवन जगत के सभी कार्यों को सहज रूप से निर्वाह कर लेते हैं।
- डॉ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
" मेरी दृष्टि में " मौन से जीवन यापन में बहुत कुछ सम्भव है। जिससे जीवन में संतुलन आता है। जो जीवन के विभिन्न यापन की पूर्ति करता है। फिर भी संसार में शन्ति बनाए रखने के लिए मौन आवश्यक होता है।
बहुत बहुत-बहुत धन्यवाद जैमिनी अकादमी एवं बिजेंद्र जैमिनी सर। प्रतिदिन ही विचारोत्तेजक अनमोल विषय के साथ अनिवार्य उपस्थिति 🙏🙏 साहित्य की दिशा में तपस्या सा प्रयास। साधुवाद स्वीकारें करें। मैं और अनेक साहित्य सेवी बिना चूके लिखते हैं और एक दूसरे के सार्थक विचारों से लाभान्वित होते हैं। ज्ञानवर्धन की इस अनोखी परंपरा से जैमिनी अकादमी की अनवरत साहित्य सेवा अनवरत प्रवाहित रहे यही शुभाकाँक्षा 💐💐🙏🙏👏👏
ReplyDelete- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
( फेसबुक से साभार)