बालकृष्ण शर्मा ' नवीन ' स्मृति सम्मान - 2025

    लालच में अच्छे कर्म नहीं होते हैं। जिससे सम्मान खत्म होता है।‌फिर भी लालच का त्याग करना पसंद नहीं करते हैं। जो लालच पर जीवन यापन करते हैं। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
       हम में हरेक के पास ईश्वर के द्वारा देय गुण और अवगुण सुप्त अवस्था में विद्यमान होते हैं। हम स्वयं ही उनमें से किन्हीं को प्रमुखता देकर चयन कर जाग्रत कर लेते हैं, फिर वे ही हमारा आचरण और स्वभाव बन जाते हैं और बाद में वही हमारी पहचान। अत: प्रारंभ में यह हमारे पालकों, शिक्षकों, परिजनों और परिचितों का दायित्व बनता है कि वे हमें गुणों को जाग्रत करने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणास्रोत बनें और फिर जब हम समझदार हों तब हम इतने सामर्थ्यवान हों कि गुणों को अपनाने में और  अवगुणों से  दूर रहने में विवेकपूर्ण निर्णय लें। लेकिन यह सब करना इतना सहज और सरल नहीं है। वर्ना सब में गुण ही गुण होते और किसी में अवगुण होते ही नहीं।  इसका कारण हमारे परिवार की स्थिति, हमारे आसपास का वातावरण, हमारी संगत, हमारी शिक्षा और सबसे विशेष यह कि हमारी स्वयं की मनोवैज्ञानिक आकर्षण,रुझान और ग्राह्यता। हम जिसे अपनाना चाहते हैं, वह स्वत: हमारे मन-मस्तिष्क में स्थान बना लेता है और जिसे नहीं वह अपने-आप छूट जाता है। इसीलिए हरेक के स्वभाव में गुण और अवगुण अलग-अलग होते हैं। इसी संदर्भ में बात जब हम लालच की करें तो लालच हम में सुप्त अवस्था में विद्यमान अनेक अवगुणों में से एक है, जो बेहद संवेदनशील अवगुण है और जरा-सी आहट से आवेशित हो उठता है और अपना स्थान बनाने में आकुल हो जाता है। इसलिए सजग रहते हुए लालच से हमेशा बचकर ही रहना हमारे लिए श्रेयस्कर होगा। वरना यह हमारी प्रवृत्ति में स्थान बना लेगा और फिर हमारे मान-सम्मान, हमारी सौहार्द्रता, हमारी मिलनसारिता, हमारे अपनापन, हमारे विश्वास को एक ही झटके में हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर देगा।  आशय यह की लालच हमारे स्वभाव और आचरण के लिए बहुत ही घातक यानी दुश्मन होता है। 

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

           लालच ऐसी प्रवृत्ति है जो इंसान के मूल स्वभाव पाई जाती है ! इंसान रोते हुए पैदा होता है ! दूध पिला क्षुधा शांत की जाती हैं ! पर इंसान जैसे जैसे बड़ा होता है ! मानवीय शारीरिक गुण बुद्धि विकसित होती है !जो उसे लालच स्वरूप अपने लक्ष्य तक पहुँचने या पहुचाने में अपने को प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए प्रेरित करती है! जिस तरह नशा एक प्रवृति है इसके भी दो पहलू हैं एक नशा इंसान को घातक विनाशक लालच की प्रवृति है ! जो बुरे से बुरे काम की ओर अग्रसर करती है ! इंसान अपने होशोहवास में नही लालच की प्रवृति लक्ष्य मान जीवन बर्बाद करता है और दूसरा नशा शिक्षा कामयाबी की मिशाल है जिसके लिए लालच छोड़ मन को काबू में कर इंसान को लक्ष्य निर्धारित करता है अपनी आदत स्वभाव बना लेता है । भले ही इसके लिए उसे अपने सम्मान और नैतिकता को छोड़ना पड़े। लालच सम्मान की दुश्मन है ! क्योंकि यह व्यक्ति को अपने सम्मान और नैतिकता को भूलने के लिए प्रेरित करती है।लालच व्यक्ति के संबंधों को टूटने का कारण बनती है, क्योंकि वह अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को धोखा देने से नहीं हिचकिचाता।व्यक्ति को असंतुष्ट बनाती है, हमेशा अधिक से अधिक की चाहत रखता है। संतुष्टि की भावना  विकसित कर व्यक्ति लालच से बच सकता है ! और अपने जीवन में शांति और सुख को प्राप्त कर सकता है !आभाव की ज़िन्दगी जीते लोग ईमान पर भरोसा कर मुँह का निवाला बाँट ज़िन्दगी तलाश खूबसूरत बना लेते है! जहाँ ज़िन्दगी बिना माँगे सब कुछ सुकून खुशियाँ से पार लगा लेते है किनारों पर खड़े सहारा नही ढूँढते! जहां लालच ना हो नियत नीति सीरत से खूबसूरत बनाते है दोस्ती में भी दुश्मनी का एहसास नही होता है सम्मान पा कर सम्मान बढ़ाते है

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

     देखा जाए  लालच मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो धन शक्ति या किसी चीज की  अधिक और अतृप्त  इच्छा के कारण प्रकट होती है तो आईये आज इसी बात पर चर्चा करते हैं कि  लालच व्यक्ति की प्रवृत्ति  है और लालच सम्मान की दुश्मन है,मेरे ख्याल में लालच की प्रवृत्ति जरूरत से ज्यादा पाने की चाहत  से जुड़ी है जिससे अपनी जरूरतों ‌से ज्यादा इच्छा होने लगती है और दुसरों की भलाई कम क्योंकि लालच से कभी‌‌ संतुष्टि नहीं होती और व्यक्ति के सुख और शांति‌  तथा‌‌ चैन सब दूर होने लगते हैं और हर पल‌‌ धन  दौलत का नशा‌ सर पर चढ़ा रहता है, जिसको इसकी लत लग जाती है वो अपने जीवन से सुख शांति खोकर इसी‌ में डूबा रहता है और व्यक्ति अपने फायदे के लिए दुसरों को नुक्सान देने पर तुला रहता है और सही व गलत  का फर्क भूल जाता है, यही‌ नहीं लालच सम्मान का दुश्मन है क्योंकि यह व्यक्ति का‌ आत्म सम्मान खोने पर मजबूर करता है जिससे‌ समाज में  उसका‌ मुल्य और सम्मान कम होने लगता है और आत्म सम्मान की हानि होने लगती‌ है और व्यक्ति खुद की‌ नजरों में ही गिरने लगता है तथा उसके नैतिक मुल्यों का पतन होने लगता है क्योंकि लालच नेक मुल्यों पर हावी हो जाता है और व्यक्ति को अपने सिद्धातों पर समझोता करना पड़ता है  और लालच‌‌ कभी खत्म नहीं होता और व्यक्ति अपनी‌ संतुष्टि को खो कर  अपने सुख‌ को भी‌ खो देता है, अन्त में यही  कहुंगा की लालच एक बुरी भला है  और जिसको एक बार लालच की‌ लत‌ लग‌‌ जाती है वो कभी नहीं जाती लेकिन इसके‌ साथ सुख,चैन ,सगे संबधी,इज्जत, मान,सेहत व आयू  इत्यादि ‌चले‌ जाते हैं तभी‌ तो सिकन्दर ने कहा था‌ की मरते वक्त मेरे हाथ पांव फैला कर बाहर रखना क्योंकि इन्सान अन्त में खाली हाथ ही जाता है लेकिन साथ जाते हैं इज्जत, मान जो लालच से खत्म हो जाते हैं इसलिए इंसान को लालच से बचने का प्रयास ‌करना चाहिए ताकि इन्सानियत जिंदा रहे,तभी तो कहा है,साईं इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाये,मैं भी भूखा न रहुं साधू भी भूखा न जाए।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर 

         लालच मानव की प्रकृति है ।।।जो पाया है , उपलब्ध है , उससे कुछ और अधिक पाने की चाह , और इस और के चक्कर मैं व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता ! यदि ये लालच किसी लक्ष्य प्राप्ति के लिए है , और अधिक मान सम्मान के लिए है , तो फिर भी ठीक है , पर यदि लालच में आर्थिक लाभ आता है , तो व्यक्ति अधिक की लालच  में, बेशर्म हो जाता है , व मान सम्मान खो बैठता है ! और अधिक की चाह व्यक्ति को समाज की नज़रों गिरा देती है , क्योंकि उस समय वह सही गलत मैं अंतर करना भूल जाता है , और लालच उसके आत्मसम्मान की दुश्मन बन जाती है ! यदि कोई उंगली पकड़ाए , तो उसका हाथ खींच लेना लालच है , जो हमें नहीं करनी चाहिए ! संतुष्टि की सीमा तय करनेवाला कभी लालची नहीं होता , व खुश भी रहता है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

      मनुष्य के जन्म से ही जैसे-जैसे शारीरिक विकास होता है और माता-पिता के द्वारा बच्चों के गुण अवगुण पर ध्यान देकर उन्हें होशियार करने की प्रवृत्ति प्रत्येक माता-पिता में होती है।  शारीरिक विकास के साथ आसपास के वातावरण में और माता-पिता के द्वारा भी कभी-कभी लालच का गुण भी सिखा दिया जाता है। इसलिए कहा गया है की लालच हर मनुष्य में कहीं ना कहीं समाहित है।लालच की प्रवृत्ति कभी-कभी जीवन में निखार लाकर तरक्की के रास्ते पर अग्रसर कर देती है।लालच रखना चाहिए, किंतु अधिक लालच के बुरे परिणाम होते हैं जो हमें दैनिक दिनचर्या में दिखते ही हैं। इसलिए कहा गया है की लालच बुरी बला है। 

- रविंद्र जैन रूपम 

 धार -  मध्य प्रदेश

        लालच मनुष्य की एक ऐसी आदत होती है जो इंसान को अपने सही रास्ते से भटका देती है व्यक्ति को कम में संतोष नहीं होता और दो गुना का चौगुना करने के चक्कर में लालच में फँसता नुकसान के गड्ढे में गिर जाता है ,जहां से उसे निकलना मुश्किल हो जाता है ।उसका नैतिक पतन होता है। सम्मान को छोड़ लोग उसे हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। समाज उसके कृत्यों की किरकिरी करने लगता है । यह प्रवृत्ति वैसे ही है जैसे एक मक्खी शहद की मिठास से अधिक मिठास के चक्कर में गुड़ के अंदर धस जाती है, जहां से उसका निकलना मुश्किल होकर अपनी जान भी जोखिम में डाल लेती है । ऐसे ही इंसान भी कभी क्या अक्सर ही बह अपनी अक्षम,अपूर्ण असन्तुष्ट योग्यता या    कम धन के कारण दूसरे की चीजों को अपने नाम से अधिक लाभ  के लिए धोखाधड़ी, मिलावट जालसाजी करता है । वह सोचता है कि इससे लाभ होने पर मुझे लोग सम्मान की दृष्टि से देखेंगे पर इसके विपरीत होता है । यह लालची प्रवृत्ति व्यक्ति के सम्मान की दुश्मन बन जाती है जिसके परिणाम अच्छे नही होते ।देखा जाए तो लालच बहुत बुरी बला है। अभाव प्रभाव को छोड़कर व्यक्ति को अपने स्वभाव में जीना चाहिए ।

- डाॅ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     जीवन में लालच एक महाबिमारी से कम नहीं है। जिस तरह से दीमक घर में लग जाती है, खोखला करके रख देती है। उसी प्रकार से लालच भी एक बुरी बला है। लालच के चक्कर में सम्पत्ति विवाद लड़ाई झगड़ा, कोर्ट-कचहरी, राजनैतिक, समसामयिक रचनात्मक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जिसे हम वंशवाद का ग्रहण भी कह सकते है, मानसिकता,मानवीयता मान सम्मान जिससे हम निकल ही नहीं सकते है। लालच व्यक्ति की प्रवृति है, लालच सम्मान की दुश्मन है। अपने सम्मान की खातिर अपने-अपनत्व से लड़कर श्रेष्ठ समझने लगता है, अपने आपको उससे आगे निकलने की सोचता है। पूर्व काल, वर्तमान काल और भविष्य काल में कम नहीं होने वाला है, बल्कि और बढ़ सकता है। 

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

        बालाघाट - मध्यप्रदेश

     इसमें कोई दो राय नहीं है कि लालच व्यक्ति की प्रवृति है...जबकि वह इस उक्ति को अच्छी तरह जानता और समझता है कि "संतोष सदा सुखी" किंतु मनुष्य के और और की चाहत उसे कभी तृप्त होने नहीं देती..यही अतृप्त इच्छाएं उसे बेईमान, दगाबाज, स्वार्थी बना देता है। नैतिक पतन होता है।इस लालच के चलते वह अपनों का साथ, विश्वास,भरोसा खो देता है। धोखेबाज बन दूसरों का हक्क तो छीनता है अपने रिश्ते नातों को भी नहीं बख्शता। यही उसके पतन का कारण बनता है।सभी उससे कटने लगते हैं। उसका चरित्र, इज्जत,मान- सम्मान भी दांव पर होता है।

कबीर दास जी के दोहे से यह बात और स्पष्ट होती है... 

"माखी गुण में गड़ी रहे, पंख दियो लिपटाय।

हाथ मले औ' सर धुने, लालच बुरी बलाय।।

 - चंद्रिका व्यास

 मुंबई - महाराष्ट्र 

     लोभ: पापस्य कारणं। लोभ पाप का कारण होता है। लोभ आते ही पाप की अनुभूति होती है।यह अलग बात है कि कहते या जाहिर नहीं करते और स्वयं को महान सिद्ध करते रहते हैं।ऐसी स्थिति में सम्मान की बात बेमानी हो जाती है। सम्मान मिलने और होने की सोचना भी व्यर्थ है।जब स्वयं के मन में ही अपना सम्मान नहीं रहा तो फिर किसी अन्य से सम्मान मिलने की सोचना व्यर्थ है।लालची का सम्मान नहीं होता वह तो मुसीबत में फंसे सकता है कभी भी।लोभी के सिर पर चक्र वाली कथा सभी ने सुनी है।ऐसी अनेक कथाएं हैं जो बताती है कि लोभ के कारण सम्मान ही नहीं, जीवन से भी हाथ धोना पड़ जाता है।

 - डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश 

       लालच मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है, परंतु इसका अनियंत्रित रूप समाज और व्यक्ति, दोनों के लिए विनाशकारी सिद्ध होता है। जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा में उलझ जाता है, तब उसके भीतर का संतुलन डगमगाने लगता है। लालच का आधार हमेशा “और अधिक” की चाह पर टिका होता है—फिर चाहे वह धन हो, पद हो, सत्ता हो या मान-सम्मान। यही चाह धीरे-धीरे मनुष्य के निर्णय, व्यवहार और मूल्य व्यवस्था को प्रभावित करने लगती है। सम्मान का आधार सदाचार, विश्वसनीयता, संतुलन और मर्यादा पर टिका होता है। जबकि लालच इन सबका प्रतिपक्ष है। एक लालची व्यक्ति सम्मान की इच्छा तो रखता है, परंतु उसके व्यवहार में वह स्थिरता और उदारता नहीं होती जो सम्मान को आकर्षित करे। वह तात्कालिक लाभ के लिए ऐसे निर्णय लेने लगता है, जो उसकी छवि, विश्वास और सामाजिक प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाते हैं। इतिहास और समाज दोनों प्रमाणित करते हैं कि लालच अंततः व्यक्ति को अकेला कर देता है—क्योंकि सम्मान पाने के लिए दूसरों को कुछ देना होता है, जबकि लालच केवल लेने की प्रवृत्ति पैदा करता है।लालच न केवल व्यक्ति के चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, अपितु उसके पास मौजूद अच्छाइयों को भी धीरे-धीरे क्षीण कर देता है। यह मन में असंतोष और अशांति पैदा करता है, जिससे व्यक्ति कभी भी प्राप्त चीज़ों का आनंद नहीं उठा पाता। इसके विपरीत, जो व्यक्ति मर्यादा, संतोष और संतुलन को अपनाता है, वह समाज में आदर पाता है और उसकी वाणी का वजन बढ़ता है।इस प्रकार यह कथन पूर्णतः सार्थक सिद्ध होता है कि लालच व्यक्ति की प्रवृत्ति तो हो सकती है, परंतु यह उसके सम्मान की सबसे बड़ी दुश्मन है।

- डाॅ.छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

        लालच मनुष्य की एक सहज प्रवृत्ति अवश्य है, परंतु मेरे विचार में लालच वह विष है जो सम्मान, विश्वसनीयता और चरित्र की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती है।मैंने जीवन भर यह अनुभव किया है कि जिस व्यक्ति के भीतर सिद्धांतों की ज्योति प्रज्वलित रहती है, उसकी राह में लालच कभी टिक नहीं सकता। सम्मान उन लोगों के चरण चूमता है जो सत्य, नैतिकता और कर्तव्यनिष्ठा को अपने जीवन का आधार बनाते हैं।मेरी सकारात्मक सोच यह कहती है कि मनुष्य का वास्तविक वैभव धन, पद या लालच से नहीं—बल्कि उसके कर्म, उसके विचार और उसकी निष्ठा से पहचाना जाता है। जब कोई व्यक्ति राष्ट्रहित, मानवाधिकारों और न्याय की रक्षा के लिए अडिग होकर खड़ा होता है, तब सम्मान स्वयं उसके चरणों में आकर खड़ा हो जाता है। मैं मानता हूँ कि सच्ची सफलता उस मार्ग पर चलने में है जहाँ कठिनाइयाँ तो आती हैं, परंतु अंतरात्मा का प्रकाश हर अंधेरे को परास्त करता है।सम्माननीयों, लालच जहाँ पतन का मार्ग है, वहीं सत्य और कर्तव्यनिष्ठा वह ऊँचाई हैं जहाँ पहुँचकर मनुष्य केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि इतिहास में अपनी अमिट छाप भी छोड़ता है।

 - डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू )-जम्मू और कश्मीर

     लालच मनुष्य की प्रवृत्ति है।मनुष्य के अतिरिक्त कोई भी पशु, पंछी कल की चिंता में नहीं घुलता रहता। मनुष्य को ही आज का भरपेट खाने के उपरांत कल की, परसों की, अगले वर्ष की तथा आने वाली अगली कई पीढ़ियों के लिए बचाने की चिंता बनी रहती है। इस चक्कर में वह  लालच, लालच तथा और लालच में पड़ा रहता है। इससे न केवल अपना कर्म, अपना वर्तमान नष्ट करता है अपितु लालच व भ्रष्टाचार के कारण अपना मान- सम्मान भी खोता है।  काम, क्रोध, लोभ,  मोह आदि को मनुष्य के विकारों के रूप में देखा जाता है। परंतु आजकल बड़े बड़े साधु-महात्मा होने का दम भरने वाले लोग भी इन विकारों से ऊपर नहीं उठ पाते तथा एक ना एक दिन उनका जाता  है और वो अपना सम्मान खो देते हैं । ऐसे ही नहीं कहा गया कि लालच बुरी बला है। 

 - रेनू चौहान 

नई दिल्ली

        लालच एक ऐसी प्रवृति है जो प्रायः सबके अंदर कमोबेश कुछ न कुछ रहती ही है. भले उसका रूप भिन्न-भिन्न होता है. किसी को पैसे के रूप मे किसी को जमीन जायदाद के रुप मे तो किसी को रूप सौंदर्य के रूप में. देहधारी जितने भी प्राणी है सभी लालच के वशीभूत हैं. लालच किसी को नहीं छोड़ा है. दुनिया में अगर कोई बुरी चीज़ है वो है लालच. जो लालच के वश में आया उसका तो सर्वनाश निश्चित रूप से होना ही है. और लालची व्यक्ति कहीं भी सम्मान नहीं पता है. कहा भी गया है लालच बुरी बला. इस लालच के चलते ही आज हर तरफ वैमनस्य भष्टाचार लूट खसोट होता रहता है. इस लालच से कोई अछूता नहीं बचा है. यहां तक कि जो लोगों को लालच और माया मोह के बंधन से लोगों को दूर रहने कों कहते हैं वहीं इसमें फंसे रहते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे देश के तथाकथित कथा वाचक हैं.लेकिन भोली जनता उनका भी सम्मान करती है. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - प.  बंगाल 

       व्यक्ति की सामान्य प्रवृत्ति है लालच और इसी लालच के कारण सेल लगने पर बहुत-सी व्यर्थ चीजें खरीदना और जमा करते जाना मनुष्य का स्वभाव बन गया है. कहीं भी मुफ्त खाने-पीने का आह्वान हो, वह तुरंत चल पड़ता है. यह लालच ही सम्मान की दुश्मन है. जो लालची होता है उसे सम्मान कैसे मिल सकता है, दोनों एक दूसरे के विरोधी जो हैं! अगर मन में लालच की भावना हो तो वह उजागर हो ही जाती है भले ही ऊपर से आप कितने भी सामान्य क्यों न बनें या दिखें! लालच से ही वोट बैंक के लिए कंबल और शराब पैसे आदि लेकर वोट देना, मुफ्त चीजें देने का वादा करने वालों को वोट देना ये सब लालच का ही तो परिणाम है! लालच चाहिए या सम्मान यह निर्णय करना आपका काम है- 

जहाँ टिके लालच, 

वहाँ न टिके सम्मान!

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

यह ठीक है कि लालच मनुष्य की प्रवृत्ति है और लालच ही मनुष्य को डूबो देता है। अभी हाल ही में पंजाब के एक डीआईजी साहब घूस के एक मामले में पूरे देश में बदनाम हुए। सोचने की बात है कि एक आईपीएस अधिकारी जिसके पास मालिक का दिया हुआ धन, वैभव, पद, सभी कुछ था और लालच में इतना डूबा हुआ था कि उसे अपने पद की गरिमा का लालच वश कोई एहसास ही नहीं था। वह कहां बैठा है ? क्या कर रहा है ? मनुष्य की लालच की प्रवृत्ति जो होती है, वह उसके विवेक को मार देती है। वह भूल जाता है कि एक पल में किसी की हाय, भगवान की मार उसका सम्मान यूं , क्षण में भंगुर कर देती है। जैसा उन महोदय के साथ हुआ। सोचिए जब हम आस्तिक, शिक्षित, अच्छे बुरे में भेद करने वाले हैं। उस परम सत्ता के ऊपर विश्वास करते हैं। तब हम यह क्यों भूल जाते हैं कि यदि हम किसी व्यक्ति से लालच वश छल कर रहे हैं। अपने दोषों, कुकर्मों को उससे तो छुपा रहे हैं, परन्तु परम सत्ता भगवान से, कैसे छुपा पाएंगे ? वह तो सब देख रहा है। यह ठीक है कि जब व्यक्ति को खाने के लिए भोजन नहीं, पहनने के लिए वस्त्र नहीं, रहने के लिए मकान नहीं है तो, ऐसे में कहीं जाकर मजबूरी में जीने के लिए लालच की प्रवृत्ति वश कुछ कर ले। तब तो हम समझ सकते हैं कि जीवन संघर्ष में लालच की प्रवृत्ति ने ईमान को बलि चढ़ा दिया। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य  को मान सम्मान की परवाह होती भी नहीं। तब बात समझ आ जाती है कि लालच हो गया। आजकल के संदर्भ में उन लोगों का क्या ? जिन्होंने लालच वश लोगों की सेवा के बहाने राजनीति को निवेश का, एक साधन बना लिया है। आम जनता की मेहनत का हिस्सा लूट करके, अपनी जेब में भर रहे हैं। फिर भी लोग उन्हीं को सम्मान दिए जा रहे हैं। समझ से बाहर.....है। लेकिन इतना जरूर है इसका हिसाब उनकी परजीवी भावी पीढ़ियों को भोगना या देना पड़ता है। तब जाकर के उनकी आंखें खुलती हैं, यदि उनके जीते जी, हो जाए। अन्यथा दुनियां तो देखती ही है कि लूट व लालच के पैसे का परिणाम क्या होता है ?  लालच वश उन्होंने झूठा सम्मान जो अर्जित किया था। उसे इसी तरह नष्ट होना था। कहने का भाव यही है कि लालच मनुष्य की प्रवृत्ति है। लेकिन उसको वश में करके, जीतना पड़ता है। वरना सम्मान को यही लालच, इस तरह से डूबोता है कि मनुष्य, उस समय सोचता है कि काश ! पृथ्वी फट जाती तो वह उसमें समा जाता, लेकिन ऐसा होता नहीं है। उसे जीते जी लज्जित होना पड़ता है।

- डॉ.रवीन्द्र कुमार ठाकुर

 बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश

" मेरी दृष्टि में " लालच का परिणाम कभी अच्छा नहीं होता है। फिर भी लालच में फंस जाते हैं और लालच कर बैठते हैं। अतः लालच से इज्जत को ठेस पहुंचती है। यही लालच का परिणाम होता है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)


Comments

  1. लालच जड़ बुराई का,जाने सकल जहान ।
    लालच से जो बच गया, वही बना भगवान।।
    - लाल बिहारी लाल,नई दिल्ली
    ( WhatsApp ग्रुप से साभार)

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