श्रीनिवास रामानुजन स्मृति सम्मान - 2025

            पीड़ित कौन है ? जिसके साथ अपराध होता है। जो अन्याय की श्रेणी आता है। जब इंसाफ नहीं मिलता है तो कानून को अपने हाथ में लेता है। जिस को अपराध कहते हैं। कोर्ट में न्याय होता तो सड़कों पर मर्डर नहीं होते! यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
       अन्याय से अपराध जन्मता है, और न्याय ही राष्ट्र को न्याय देता है। यह मात्र एक वाक्य नहीं है बल्कि इतिहास का सत्य, संविधान का धर्म और मानवता का शाश्वत नियम है। जहाँ अन्याय पनपता है, वहाँ अपराध केवल विधि (कानून) तोड़ने से नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा टूटने से उत्पन्न होता है। अन्याय से उत्पन्न पीड़ा व्यक्ति को अपराध की ओर धकेल देती है। क्योंकि जिस व्यवस्था में सच को दबा दिया जाए, जहाँ निर्दोष को चुप करा दिया जाए, जहाँ न्याय पाने की आस पर ताले जड़ दिए जाएँ, वहाँ अपराध, विद्रोह और पतन स्वाभाविक परिणाम होते हैं। लेकिन, न्याय, मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विजय है। न्याय वह दीप है जो अंधकार में दिशा दिखाता है, वह शक्ति है जो टूटे हुए नागरिक को खड़ा करती है, वह धर्म है जिसके बल पर राष्ट्र जिंदा रहता है। न्याय मात्र दण्ड का निर्णय नहीं, बल्कि सत्य का उत्सव है। न्याय केवल आदेश नहीं, बल्कि मानवीय मौलिक अधिकारों की धड़कन है। न्याय केवल कागज़ नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की शपथ है। चूंकि राष्ट्र जब न्याय पर चलता है, तब अपराध मिटते हैं, भ्रष्टाचार टूटता है, और नागरिक चरित्रवान बनता है। न्याय भय नहीं पैदा करता बल्कि विश्वास उत्पन्न करता है। भारत का संविधान इसी न्याय पर खड़ा है। इस पवित्र भूमि में संविधान, विधान एवं साहित्य तक का संदेश यही रहा है कि अन्याय को सहना भी अपराध है, न्याय के लिए लड़ना धर्म है। इसलिए मैं स्पष्ट कहता हूँ कि एक ओर अन्याय की मिट्टी से अपराध उगते हैं, और दूसरी ओर न्याय के प्रकाश से राष्ट्र महान बनते हैं। भारत का भविष्य न्याय पर निर्भर है और जब तक हमारे भीतर विश्वास की एक चिनगारी भी शैष है, तब तक अन्याय पर न्याय की विजय अवश्य होगी। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर

        अन्याय से होता है अपराध बिल्कुल सही कहा आपने जब कहीं भी दो भाइयों के बीच, दो गुटों के बीच, ज़मीन ज़ायदाद को लेकर, घर परिवार को लेकर अथवा किसी संस्था के पद को लेकर, किसी मुख्य सत्ताधारी  लोगों को फैसला करना होता है तब जब किसी सही व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो पाता। जब किसी सभा में निर्णय लेना हो तब किसी योग्य व्यक्ति को उसका अधिकार न दे कर किसी अयोग्य व्यक्ति को चुना जाता है तब उस अन्याय के कारण क्रोध आता है उस क्रोध से अपराध पैदा होते हैं। जब तक दुनिया में हटात्- बलात् किसी के अधिकार छीने जाएंगे,  तब तक अपराध यूं ही पैदा होते रहेंगे। अपराधों की जननी अन्याय है। जब तक किसी भी जगह अन्याय होगा तब तक अपराधों की श्रृंखला बढ़ती जाएगी। जब किसी भी जगह पर न्याय के आधार पर काम होगा उस संस्था में हमेशा, हर बात में न्याय रहेगा। क्योंकि न्याय से होता है न्याय। न्याय से फैलती हैं न्याय की जड़ें और इसके विपरीत अन्याय से अपराध पनपता है इसलिए जब भी कहीं भी कोई भी निर्णय देना पड़े तब न्याय के साथ खड़े रहें।

- डॉ. संतोष गर्ग ' तोष '

पंचकूला - हरियाणा 

     अन्याय से होता है  अपराध. आजकल की यही सच्चाई है. जब कहीं पर अपराध होता है उसके पीछे अन्याय ही होता है. अपराध वहीँ जन्म लेता है जहां अन्याय होता है. जब कोई किसी का हक मारता है, किसी के साथ छेड़खानी होती है, कोई चोरी करता है उसके विरुद्ध पीड़ित व्यक्ति के तरफ से मार पीट हत्या वगैरह होता है वहीं अपराध होता है. कोई नियम विरुद्ध कार्य ही अपराध की श्रेणी में आता है. पीड़ित के साथ जब न्याय होता है वही न्याय कहा जाता उसके साथ न्याय हुआ. गलत तरीके से किया गया हर कार्य अन्याय कहलाता है और उसी अन्याय उत्पन्न होता है. 

- दिनेश चन्द्र प्रसाद " दीनेश "

कलकत्ता - प. बंगाल 

        अन्याय से होता है अपराध, न्याय से ही होता है न्याय...  इसमें कोई दो राय नहीं है... अन्याय हमेशा नकारात्मकता लिए रहती है ... जब किसी व्यक्ति के साथ अनुचित और गलत या असामान्य व्यवहार होता है  तब वह गुस्से और क्रोध से भर जाता है और इसी वजह से वह अपना आपा खो बैठता है... ऐसी स्थिति में उससे अपराध होने की संभावनाएं बढ़ जाती है...उसमें प्रतिरोध की भावना बढ़ जाती है।  निर्दोश को गुस्सा आना स्वाभाविक है... वहीं न्याय सकारात्मक भाव लिए होता है... न्याय प्रणाली का उद्देश्य ही अपराध रोकना और निर्दोष व्यक्ति को, पीड़ित को न्याय दिलाना होता है। व्यक्ति को जब न्याय मिलता है तभी वह न्याय प्रणाली पर विश्वास करता है यानी न्याय व्यक्ति में विश्वास एवं सकारात्मक भाव लाता है।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

         जीवन में नैतिकता से अपने कर्तव्यों को निभाना ही मानव धर्म का मूल मंत्र है। इस निर्वहन में निष्पक्षता होना नितांत आवश्यक है। नैतिकता और निष्पक्षता के निभाने में हमारी जरा सी भी भूल-चूक, जरा-सी भी  गलती के लिए हमारे द्वारा किया गया कार्य, हमारा अपराध हो जाता है। निष्पक्षता के समकक्ष में न्याय भी होता है।सामान्य रूप में दोनों के भाव और उदेश्य एक ही और मानववाद से ओतप्रोत होते हैं।  अत: हमें इन्हीं के अनुरूप अपना चरित्र,कृत्य और जीवन शैली रखना चाहिए वरना इसके विपरीत जो भी  हमारे द्वारा होगा वह अपराध की श्रेणी में होगा, नैतिकता और मानववाद के विरुद्ध होगा। पक्षपात से अन्याय और अन्याय से अनुचित, अनुचित से अनैतिक, अनैतिक से अपराध और अपराध से अधर्म होता है। यानी जीवन जीने का पूरा पथ ही दिशाहीन हो जाता है। ऐसे में हम अपने दायित्व से तो विमुख होते ही हैं, विश्वास को भी चकनाचूर कर देते हैं और पीड़ित को दुख एवं त्रास का अतिरिक्त भार दे देते हैं। जो उनके हिस्से का था ही नहीं और जिसके हिस्से का था, उसका बचाव कर उसे दोष से भारमुक्त कर देते हैं। यानी हम निष्पक्ष और न्याय न कर, अपने दायित्वों का निष्ठा से निर्वहन न करने का अपराध कर लेते हैं। अत: हमें यह समझना बहुत ही आवश्यक है कि   " अन्याय से होता है अपराध "

" न्याय से होता है न्याय। "

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       यह विषय-वाक्य अपने आप में गंभीर सामाजिक–नैतिक विमर्श का द्वार खोलता है। “अन्याय से होता है अपराध, न्याय से ही होता है न्याय” केवल कथन नहीं, बल्कि समाज की जड़ समस्याओं की ओर संकेत करता है। अन्याय व्यक्ति के भीतर आक्रोश, हताशा और विद्रोह को जन्म देता है। जब शोषण, भेदभाव, पक्षपात और असमानता लंबे समय तक बने रहते हैं, तब व्यक्ति अपराध को ही अपने अस्तित्व और प्रतिरोध का माध्यम मानने लगता है। कई बार अपराध जन्मजात प्रवृत्ति नहीं होता, बल्कि परिस्थितियों की देन होता है—जहाँ न्याय की अनुपस्थिति व्यक्ति को गलत राह चुनने पर मजबूर कर देती है। इसके विपरीत न्याय समाज में संतुलन, विश्वास और सुरक्षा की भावना उत्पन्न करता है। न्याय केवल दंड देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि समान अवसर, निष्पक्ष सुनवाई और अधिकारों की रक्षा का माध्यम है। जब व्यक्ति को यह भरोसा होता है कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे उचित समाधान मिलेगा, तब अपराध की संभावना स्वतः कम हो जाती है। निष्कर्ष यही है कि अपराध रोकने के लिए केवल कानून सख्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि न्याय को सुलभ, निष्पक्ष और संवेदनशील बनाना अनिवार्य है। जिस समाज में न्याय जीवित होता है, वहाँ अपराध अपने आप कमजोर पड़ जाता है।

 - डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

           अन्याय से होता है, अपराध न्याय से होता है, न्याय। यह विषय बहुत ही संवेदनशील होने के साथ-साथ बहुत ही बृहत भी है। इसमें कोई संदेह नहीं की जब-जब लोगों पर अन्याय बढ़ा है तब-तब अपराध उसी गति से बढ़ा है। जन्म से कोई अपराधी पैदा नहीं होता। समाज और परिस्थितियां मनुष्य को इस ओर धकेलती हैं। मनुष्य की तीन मूलभूत अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। यदि मनोवैज्ञानिक तथा आनुवांशिक कारणों को छोड़ दिया जाए तो, रोटी , कपड़ा और मकान इनमें से कोई एक पूरी न हो तो मनुष्य उसकी पूर्ति के लिए संघर्ष करता है। लेकिन यदि इनमें से रोटी न मिले तो मनुष्य अच्छा-बुरा न्याय-अन्याय नैतिकता भूलकर भूख मिटाने के लिए अपराध भी कर बैठता है। इसका कारण यह नहीं कि व्यक्ति ने जान बूझकर अपराध किया है। इसके लिए व्यवस्थागत दोष या दूसरे शब्दों में कहें अन्याय उत्तरदाई है।  अपराध शास्त्र के सिद्धांत भी यही कहते हैं कि यदि बच्चे का पालन-पोषण और उसकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी होती हैं तो, उसकी परवरिश संतुलित होती है और वह एक जिम्मेदार नागरिक बनता है। इसके विपरीत जिस व्यक्ति या बच्चे से भेदभाव होता है तो, स्वाभाविक है कि उस भेदभाव के कारण उसके दिलो-दिमाग में भेदभाव करने वाले के प्रति आक्रोश पैदा होगा। यही आक्रोश उसकी प्रवृत्ति को अपराध की ओर ले जाता है। कहने का भाव यही है कि समाज में समानता , समरसता के साथ-साथ आर्थिक समानता भी आवश्यक है। साधन विहीनता से सामाजिक अन्याय या भेदभाव, सांप्रदायिकता, नशा, गलत संगत,बेरोजगारी ऐसे कारण हैं कि इनसे उपजने वाले झगड़े और उन झगड़ों को निपटाने के दोष और देरी ही अन्याय कहलाते हैं। यही अन्याय अपराधों के प्रमुख कारणों में से है। वर्तमान में यह समस्या गंभीरता धारण करती जा रही है। जिसका मुख्य कारण राजनीति है। राजनीति सत्ता प्राप्ति के लिए समाजहित तो दूर की बात देशहित भी नहीं देख रही। असामाजिक और देश विरोधी शक्तियों के साथ सत्ता प्राप्ति के लिए षड्यंत्र, देश में एक गलत संदेश दे कर, सौहार्द बिगाड़ने का काम करते हैं। ऐसी राजनैतिक परिस्थितियों में लोगों में मानवीय मूल्यों का विघटन सामाजिक अन्याय की ओर धकेलता है। एक सेवा निवृत पुलिस अधिकारी के नाते, मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि आपराधिक न्याय प्रणाली भी इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। पुलिस को उसका वास्तविक काम निष्पक्षता से करने नहीं दिया जाता है। राजनैतिक इस्तेमाल और हस्तक्षेप से अपराध और अन्याय को समाप्त करने जैसा उसका मूल उद्देश्य पूर्ण नहीं हो रहा है। इसी तरह न्यायपालिका का भी वही हाल है जिन अभियोगों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहिए, उन्हें निपटा नहीं रही है। औचित्य हीन एवं विवादास्पद विषयों के प्रति उसका रुझान है। जिससे लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा है। देश में करोड़ों लोग अदालतों में  सुनवाई के लिए पड़े करोड़ों लंबित केसों के कारण न्याय का इंतजार कर रहे हैं। जो इस बात की पुष्टि करता है कि न्याय में देरी भी अन्याय ही होता है। इस विश्लेषण से इसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि अन्याय से अपराध और न्याय से न्याय मिलता है।

- डॉ रवीन्द्र कुमार ठाकुर

बिलासपुर -  हिमाचल प्रदेश

     निःसंदेह अन्याय अपने आप में बहुत बड़ा अपराध है। अन्याय से बड़ा कोई पाप नहीं है। निरंकुशता के चलते इंसान अन्याय की ओर बढता है। अपने आप पर नियंत्रण रखें - - अपनी भावनाओं को पाप पुण्य की बाधाओं से परे रखकर दिमाग से सोचें दिल से नहीं। न्याय की सोच कई बार अनेक प्रलोभनों में फंसकर धूमिल होने लगती है लेकिन हमें भावनाओं के बहाव में नहीं बहना है बल्कि बल्कि प्रॅक्टिल होकर इस अपराध भावना से बचना है। मानते हैं कि हम भगवान नहीं है गलती कर सकते हैं लेकिन अन्याय को समझ कर भी न समझने का ढोंग करके हम खुद को माफ कर देंग तो अपने आप पर अनायास अन्याय कर बैठेंगे। सत्य की राह पर चलें--न्याय की राह पर चलें

 - हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र

       अगर आज की चर्चा में न्याय और अन्याय की बात पर चर्चा करें तो यह अटूट सत्य है की अन्याय से अपराध होता है न्याय से  ही होता है न्याय क्योंकि सही और निष्पक्ष करने से ही, सही परिणाम और व्यवस्था आती है कहने का मतलब जब हम खुद निष्पक्षता से कार्य करते हैं तो दुसरों के‌ साथ भी निष्पक्ष व्यवहार करते हैं तभी‌ जा कर  न्याय स्थापित होता है जो एक  कानूनी सिदांत है जो सभी‌ के लिए समान अवसर,उचित व्यवहार औत संतुलित परिणाम देता है जबकि अन्याय लोगों को गलत काम करने के लिए उकसाता है और इससे भी बढ़कर अन्याय को सहन करना या‌ उसके‌ खिलाफ  आवाज़ न उठाना खुद एक बड़ा अपराध माना जाता है क्योंकि यह अपराधीयों का हौसला  बढता है तथा समाज पर गलत असर डालता है, देखा जाए अन्याय अपराधों की जड़ है इसको सहन करना एक बड़ी समाजिक गलती है जिससे समाज में  अव्यवस्था फैलती है इसलिए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और उसे रोकना जरूरी है ताकि एक बेहतर और सुरक्षित समाज का निर्माण हो सके,दुसरी तरफ जब हम दुसरों के साथ भी निष्पक्ष व्यवहार करते हैं तभी समाज में न्याय स्थापित होता है  अन्त में यही कहुंगा की अन्याय सहन करना इतना आसान नहीं होता जिससे सहन कर्ता सहन करते करते खुद  परेशान होकऔर अपराध करने पर  मजबूर हो जाता है,दुसरी तरफ न्याय अगर ‌सोच समझ कर किया जाए तो  ऐसा न्याय  समाज  में  पारदर्शी लाता है जिससे समाज में तरक्की होती है, और समाज से गरीबी ,बेरोजगारी और असमानता जैसी‌ समस्याएं दूर हो जाती हैं।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा,

जम्मू - जम्मू व कश्मीर 

      अपराध अन्याय से उत्पन्न होता है, और न्याय ही इसे मिटा सकता है। अपराध कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है; यह अक्सर अन्याय के अँधेरे में पनपता है। जब लोगों की बातों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, उनके अधिकारों का हनन होता है, या वे लगातार अपमानित होते हैं, तो उनके भीतर एक बेचैनी जन्म लेती है। यह गुस्सा, जो कभी-कभी सहनशीलता की सीमा को पार कर जाता है, अपराध का रूप ले लेता है। इसलिए, यह कहना गलत नहीं होगा कि अन्याय अपराध की पहली और सबसे महत्वपूर्ण वजह है। इसके विपरीत, न्याय एक ऐसी शांत छाँव है जो समाज को स्थिरता प्रदान करता है। न्याय केवल कानूनी प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सही-गलत की गहरी समझ, निष्पक्ष निर्णय और मानवीय भावनाएँ भी शामिल हैं। जब किसी व्यक्ति को यह भरोसा होता है कि उसे न्याय मिलेगा, तो वह धैर्य रखता है और कानून में विश्वास करता है। इसलिए, एक बेहतर समाज का निर्माण अन्याय को रोकने और न्याय को हकीकत में बदलने पर निर्भर करता है। क्योंकि अन्याय अपराध का कारण बनता है, जबकि सच्चा न्याय ही अपराध को पूरी तरह से समाप्त कर सकता है।

 - सीमा रानी                       

  पटना - बिहार 

" मेरी दृष्टि में " अपराध वहीं होता है। जिसमें कानून का उल्लघंन होता है। परन्तु पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता है। यही समाज में अपराध को बढ़ावा देता है। न्याय मिल जाता तो शायद आगे अपराध नहीं बढ़ता। इसलिए हर स्थिति में न्याय होना चाहिए। यही से जीवन व्यवस्था सुचारू रूप से चलतीं है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)



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