श्री रामकृष्ण परमहंस स्मृति सम्मान - 2026
ध्यान वह स्थिति है जिससे बड़े से बड़े ऋषि मुनियों ने तपस्या की है बड़ी से बड़ी ऋषि सिद्ध प्राप्त की हैं। जो ध्यान केंद्रित प्रणाली का प्रमुख स्रोत माना जाता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
ध्यान,वास्तव में मौन की स्थिति ही है। यह मौन केवल वाणी का ही नहीं,मन का भी होना चाहिए, मस्तिष्क का भी होना चाहिए तभी ध्यान संभव है। यदि यह अहसास रहे कि ध्यान लगा है तो सच मानिए आप मौन नहीं है और यह ध्यान नहीं,मात्र भ्रम है ध्यान का। इसीलिए कहा गया है कि मौन शांत दिमाग की स्थिति है।यह शांति भी इतनी गहन कि शांति होने का अहसास ही न हो। जिसके लिए 'शांतिरेव शांति' कहा गया है। ध्यान की स्थिति वह स्थिति है जिसमें जाने के बाद मानसिक और शारीरिक ताजगी मिलती है,तनाव समाप्त होता है,भय और चिंता गायब हो जाते हैं। इस मौन में, ध्यान में ही होता है ईश्वरीय साक्षात्कार और आत्म ज्ञान।मानव जीवन के विकास में ध्यान का बहुत महत्व है।यह मौन,ध्यान सहजता से उपलब्ध नहीं होता।यदि हो जाए तो यह ईश्वरीय वरदान से कम नहीं।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
ध्यान को केंद्रित करने के लिए हमें मौन होना पड़ता है अन्यथा मन चारों ओर भटकता है !! मैं धारण करने के पश्चात ही ध्यान केंद्रित करने की स्वस्थ आती है ! यदि व्यक्ति मौन धारण करता है तो स्वतः ही उसका दिमाग शांत होता है व वह आत्म चिंतन और सूक्ष्म विश्लेषण कर सकता है ! अतः मैं से ध्यान केंद्रित करने मैं सहायता मिलती है, व मन शांत होता है !
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
ध्यान और मौन एक दूसरे के परिपूरक हैं और दोनों ही स्थिति में ये ऊर्जा के अच्छे स्त्रोत होते हैं। ऐसी स्थिति में तन-मन में सकारात्मक ऊर्जा का तीव्रता से संचरण होता है जो स्वस्थ तन और स्वस्थ मन के लिए लाभदायक होती है। इससे विकारों का क्षरण तो होता ही है, बौद्धिक विकास भी होता है। हमारे संत, ज्ञानी, दार्शनिकों ने इन स्थितियों को जीवन के लिए महत्वपूर्ण और अनुशरण योग्य बतलाया है। ध्यान में जो मौन की स्थिति होती है, वह चित्त को स्थिर तो करती ही है, ईश्वर के सन्निकट की ओर भी ले जाती है। सामान्यत: ध्यान में मौन की अनिवार्यता होती है परंतु मौन में ध्यान की अनिवार्यता नहीं। मौन वास्तव में शांत रहने की प्राथमिकता है।स्थितियां कोई भी हों निरंतर प्रयास और अभ्यास से ईश्वरीय उन विशेष उपहारों को अर्जित कर स्वयं को विशेष और धन्य सकते हैं जो सामान्य स्थिति में लगभग कठिन या असंभव है।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
किसी भी चीज पर ध्यान देने के लिए, भली भांति विचार करने के लिए मौन रहकर सोचना पड़ता है, विचार करना पड़ता है। तब उससे संबंधित पूर्ण जानकारी तैयार होती है। मौन रहकर शांति प्राप्त की जाती है।जब दिमाग शांत होगा तभी विचारशील होगा, वस्तु विशेष पर मनन कर पाएगा। चाहे वह सांसारिक चीज हो या फिर योग। भावार्थ यही ,मौन रखकर ही ध्यान लगाया जा सकता है और दिमाग को शांति प्रदान की जा सकती है।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
अक्सर हम सभी लोग सदैव दुनियां की दौड़ धूप में रहते हैं। परिणामस्वरूप अपने जीवन को हम ध्यान से न जी पाते हैं और न ही देख पाते हैं। इसका परिणाम है कि हम अक्सर तनाव में रहते हैं। इस अवस्था में न तो, हम वर्तमान में होते हैं और न ही भविष्य में। इसके लिए हम अपने जीवन में चाहे कितनी भी किताबें पढ़ लें, कितने भी समाधान ढूंढ लें। लेकिन बिना ध्यान और इसके अभ्यास के हमारा जीवन कभी सुन्दर नहीं होगा। इसलिए हमें मानसिक सकून प्राप्त करने के लिए ध्यान का अभ्यास निरंतर करना चाहिए। इसके लिए हम प्रातः जब पूजा पाठ करते हैं, सबसे उपयुक्त समय होता है। इससे हमारा मन मस्तिष्क शांत और संयमित रहेगा। इसके लिए मौन का अभ्यास भी करना चाहिए। वास्तव में मनुष्य को वाणी का प्रयोग शांत संयमित होकर ही करना चाहिए। मौन का अर्थ, शब्दों का अभाव नहीं, यह आत्मा की भाषा है। जब आप मौन में बैठते हैं तो, भीतर से अनसुनी ध्वनियां उठती हैं। अंतर्ध्यान और मौन से अंतर्ज्ञान, प्रेरणा और प्रेम की उत्पति होती है। मौन में उतरना मतलब भीतर के अंधकार में दीपक जलाना होता है। यही वह संगीत है, जिसे केवल शांत मन ही सुन सकता है। मौन हमें यह सिखाता है कि सच्चे उत्तर शब्दों में नहीं, अनुभूति में मिलते हैं। जो मौन को सुन ले, वह जीवन को समझ लेता है। मौन मन की थकान को मिटाता है और आत्मा की शक्ति को लौटाता है। जब भीतर का अंतर्द्वंद्व और कोलाहल थम जाए, तभी दिव्यता की अनुभूति होती है। मौन ही वह स्थान है, जहां आत्मा और परमात्मा दोनों मिलते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि ध्यान ही मौन की स्थिति है। जिससे शांति प्राप्त होती है क्योंकि यही मन मस्तिष्क को स्थिर करता है।
- डॉ. रवीन्द्र कुमार ठाकुर
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
मौन की साधना आसान नहीं होती है हम सामान्य मानव नित्य नवीन उलझनों से जूझते रहते हैं और समस्याओं के समाधान की कोशिशों मे लगे रहते हैं। ऐसी स्थिति में मौन रहना कठिन होता है। कहते हैं "मौनं सर्वस्व साधनम " लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। मौन को आपकी मूक सहमति मान कर एकतरफ़ा निर्णय ले लिये जाते हैं जो आपके लिये सदैव ही उचित नहीं होते। मानती हूँ मैं कि मौन रहने से दिमाग़ को शान्ति मिलती है लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि आपने हथियार ही डाल दिये है। विरोध की स्थिति सदैव अच्छी नहीं होती लेकिन जहां अपना पक्ष रखने की बात है वहाँ मौन तजकर वाणी का प्रयोग अवश्य करना होता है अन्यथा आपके मौन को मूक सहमति मानकर बडे़ बडे़ निर्णय लिए चले जाते हैं जिनका भुगतान आपके लिये सजा बन जाता है। इसलिये उचित है कि दुनिया के साथ चलें। उचित अनुचित का भान रखें और फूंक फूंक कर कदम बढायें। दुनिया हर कदम धोखे का संसार है। बच कर चलें - - सुरक्षित रहें।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
जब ऋषि मुनी एकाग्रचित होकर मौन ध्यान करते थे, तो अलौकिक रूप से मन को शांति मिलती थी और अपने लक्ष्य की ओर अग्रसरित होते थे। ध्यान तो मौन की स्थिति है, मौन शान्त दिमाग की स्थिति है। जिसमें सम्पूर्ण लक्ष्य निर्धारित कर मन इंद्रियों को स्थिर करती है। ध्यान, मौन और शांत का प्रतीक होता है। बड़े-बुजुर्ग हमेंशा इसलिए कहा करते थे, ध्यान लगाकर पढ़ाई-लिखाई करें, घर संसार के झगड़ों को भी शान्त रूप से निपटाने का प्रयास करते रहते थे ताकि किसी भी प्रकार की स्थिति निर्मित न हो......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
ध्यान और मौन—ये दोनों शब्द केवल आध्यात्मिक अवधारणाएँ नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक संतुलन और आत्मिक जागरण के मूल आधार हैं। जब हम कहते हैं कि ध्यान मौन की स्थिति है, तो इसका अर्थ केवल बाहरी चुप्पी नहीं, बल्कि भीतर के विचारों, द्वंद्वों और अशांति का शांत हो जाना है। मौन का वास्तविक अर्थ शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि मन की स्थिरता है। जब मन विचारों के अनावश्यक प्रवाह से मुक्त हो जाता है, तब वह मौन की अवस्था में प्रवेश करता है। यही मौन ध्यान का द्वार खोलता है। ध्यान वह स्थिति है जहाँ मन वर्तमान क्षण में पूर्णतः जागरूक और एकाग्र होता है, जहाँ न अतीत का बोझ होता है और न भविष्य की चिंता।आज के युग में, जहाँ मनुष्य निरंतर भागदौड़, तनाव और सूचनाओं के बोझ से दबा हुआ है, ध्यान और मौन का महत्व और अधिक बढ़ गया है। मौन हमें स्वयं से जोड़ता है, हमें अपनी वास्तविक पहचान से परिचित कराता है। यह हमें आत्ममंथन का अवसर देता है, जिससे हम अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। मौन में ही सृजन की शक्ति निहित होती है। महान विचार, श्रेष्ठ निर्णय और गहन अनुभूतियाँ प्रायः मौन की गोद में ही जन्म लेती हैं। जब मन शांत होता है, तब वह अधिक स्पष्टता से सोच सकता है, और जीवन की जटिलताओं का समाधान सहजता से खोज सकता है। ध्यान हमें सिखाता है कि सच्ची शांति बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर विद्यमान है। मौन हमें उस शांति का अनुभव कराता है। यह हमें संतुलन, धैर्य और आत्मबल प्रदान करता है। अतः कहा जा सकता है कि ध्यान और मौन केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक, संतुलित और आनंदमय बनाने की कला हैं। जब मनुष्य मौन को अपनाता है और ध्यान की अवस्था में प्रवेश करता है, तब वह स्वयं को, जीवन को और इस सृष्टि को अधिक गहराई से अनुभव कर पाता है। मौन में ही मन की शांति है, और शांति में ही जीवन का सच्चा ध्यान।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
मौन रहना ही ध्यान की स्थिति है. क्योंकि ध्यान में जाने के लिए हमें मन को एकाग्र करना पड़ता है. और मन को एकाग्र करने के लिए मौन यानी चुप रहना जरूरी होता है. और मन शांत दिमाग की स्थिति है. दिमाग शांत रहेगा तभी हम मौन रह सकते हैं. यदि मन में उथल-पुथल होगा तो हम मौन नहीं रह पायेंगे. जबतक हम मौन नहीं रहेंगे तबतक ध्यान लगाना सम्भव नहीं हो सकता है. शांत मतलब शांत. मन से भी और वाणी से भी. तभी हम पूर्ण रूप से ध्यान लगा पायेंगे.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प. बंगाल
ध्यान, मौन हुए बिना संभव नहीं। केवल शब्दों का ही नहीं अपितु विचारों का मौन होना भी आवश्यक है। यदि मस्तिष्क विचारों की भीड़ से भरा रहेगा तो ध्यान संभव नहीं हो पाएगा। अतः मौन शांत दिमाग़ की भी स्थिति है। मौन से ही शांति की और अग्रसर हो सकते हैं।शांति और मौन से ही ध्यान संभव हो सकता है।
- रेनू चौहान
नई दिल्ली
ध्यान मौन की स्थिति है और मौन शान्त मस्तिष्क की स्थिति है। यह अत्यंत गहन और अनुभूतिपूर्ण सत्य को व्यक्त करता है। वास्तव में ध्यान कोई बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि मस्तिष्क की आंतरिक संतुलित अवस्था है, जहाँ विचारों का अनावश्यक शोर थम जाता है और चेतना सजग, स्थिर तथा जागरूक बन जाती है। मौन का अर्थ केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि मानसिक अशान्ति, द्वंद्व और विक्षेपों का शान्त हो जाना है। जब मस्तिष्क वर्तमान क्षण में टिक जाता है और अतीत-भविष्य की अनावश्यक उलझनों से मुक्त हो जाता है, तब जो स्थिति उत्पन्न होती है वही सच्चा ध्यान है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति की निर्णय क्षमता अधिक स्पष्ट होती है, भावनाएँ संतुलित रहती हैं और आत्मबल प्रखर होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह सिद्ध है कि ध्यान मस्तिष्क के उस भाग को सुदृढ़ करता है जो विवेक, धैर्य और तर्क से जुड़ा है, तथा तनाव को कम करता है। इसलिए मौन शक्तिहीनता नहीं, बल्कि केंद्रित और अनुशासित ऊर्जा का प्रतीक है। शान्त मस्तिष्क ही सत्य को देखने, न्यायपूर्ण निर्णय लेने और जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त करने का आधार बनता है। वास्तव में ध्यान आत्मनियंत्रण की सर्वोच्च कला है और मौन उसकी दिव्य अभिव्यक्ति है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
" मेरी दृष्टि में " ध्यान का प्रथम चरण मौन है। जिससे आगे बढ़कर ध्यान की विभिन्न स्थितियों को प्राप्त किया जा सकता है। विभिन्न साधकों ने विभिन्न ध्यान प्रणालियों को जन्म दिया है। सब कुछ अलग - अलग होते हुए भी एक है। वह है ध्यान। ध्यान और मौन में बहुत कम अन्तर है। जो अन्तर समझ गया। वह ध्यान में निपुण हो गया।
मौन ,ध्यान , शांति और ज्ञान का परस्पर गहरा संबंध है। जब मौन रहकर ध्यान लगाया जाएगा, तब शांति प्राप्त होगी।और शांति में ज्ञान कपाट खुल जाएंगे। यहीं पर अध्यात्मिक दर्शन प्राप्त होगा जो जीवन को नई दिशा प्रदान करेगा।
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