डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की लघुकथाएं
डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
जन्म - 4 अक्टूबर 1957 देहरादून, उत्तराखंड में
माता - श्रीमती कमला वर्मा
पिता - श्री बाबूराम वर्मा
पति - राकेश आनंद बौड़ाई
संतान- एक पुत्री, एक पुत्र
शिक्षा -
एम० ए०हिंदीसाहित्य), बीएड०
डीफिल०(शोध द्वारा-गद्यकार बच्चन:
एक आलोचनात्मक अध्ययन-विषय पर)
सेवा-अरुणाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग में टी. जी. टी. पद पर 24 वर्ष कार्य करने के बाद अक्टूबर 2005 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उसके बाद से स्वतंत्र अध्ययन और लेखन।
प्रकाशित कृतियां : -
प्रकाशन- ( एकल संग्रह)
कविता संग्रह- 16
1--कविता का अरुणांचल (कविता संग्रह) 1985
2– उपहार (2018) कविता संग्रह
3– रंगों के साथ ( 2018) कविता संग्रह
4– अंतर्मन की यात्राएँ (2018) कविता संग्रह
5– आखर मीत (2018) काव्य संग्रह
६- मोहे बिटिया ही दीजो (2019) कविता संग्रह
७- अंजुरि भर प्रेम (2019) कविता संग्रह
८- आपातकाल में सृजन फुलवारी (2020) कविता
९- माँ-पा हमेशा एक दूसरे के साथ (कविता संग्रह) २०२०
संग्रह
१०- विविधा ( कविता संग्रह )
११- चीनू की डायरी ( कविता संग्रह )
१२- समर अभी शेष है ( कविता संग्रह )
१३- गुलमोहर तले (कविता संग्रह )
१४- अनहद नाद ( कविता संग्रह २०२४
१५- स्त्री मन ( कविता संग्रह ) २०२५
१६- प्रीति की प्रीत में ( कविता संग्रह )
आलोचना -
१४- बच्चन साहित्य:अध्ययन का उपक्रम (आलोचना) 1998
सृजक-सृजन-समीक्षा -
1५- सृजन समीक्षा ( 2018)
लघुकथा संग्रह -
1६- अनुभूतियों के दंश (2018)
1७- पगडंडियों पर चलते हुए ( 2019)
आलेख संग्रह—
18- कुछ रंग धूप के
विचार संग्रह -
19 —मेरी डायरी से
सम्मान एवं पुरस्कार-
- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ( पूर्व रक्षा मंत्री द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान के साथ अन्तरा शब्दशक्ति और साहित्य संगम संस्थान द्वारा कई सम्मान प्राप्त।
- जैमिनी अकादमी (पानीपत - हरियाणा) द्वारा पद्म भूषण विश्वनाथ सत्यनारायण स्मृति सम्मान - 2025 से सम्मानित
विशेष उपलब्धि -
- सामाजिक कार्य— अपने पति के “ अविराम प्रवाह” ट्रस्ट द्वारा किए जाने वाले सेवा कार्यों में सहयोग।
- अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
- 320 साझा संग्रह प्रकाशित
पता -
डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
95, ब्लॉक- H, दिव्य विहार
डांडा धर्मपुर, डाकघर- नेहरूग्राम
देहरादून-248001 ( उत्तराखंड )
१- ताई जी
“किटी पार्टी भी इन्हें आज मकर संक्रान्ति के दिन ही रखनी थी”..उठते ही अवनि बड़बड़ाने लगी।
“क्या हो गया भई…..आज सुबह से ही गरज के साथ धुआँधार बैटिंग?”
“तो क्या करूँ? इलाज के नाम पर जमे हुए हैं तुम्हारे गाँव से आए ताऊ-ताई जी। अब इन्हें भी झेलूँ और किटी पार्टी की तैयारी भी करूँ यह तो नहीं होगा। छोड़ो, तुमसे कह कर फायदा भी क्या? जौमेटो से ही मँगवा कर चलाऊँगी काम। इतना ही तो होगा दुगुना-तिगुना बैठ जाएगा खर्च।”
बात कमरे में बैठी ताई जी के कानों में पड़ी तो वे उठ कर बहू के पास गई और बोली…” मेरी बिटिया इतनी छोटी सी बात से परेशान है। तू ऐसा कर, बबुआ को भेज कर तिल, गुड, मूँगफली आदि मँगवा दे जल्दी से बस।”
“अब बोल रहीं हैं तो मँगवा ही देती हूँ, मेरे कहने से भी ये मानने वाली तो हैं नहीं।”…सोचते हुए विहान को उसने सामान लाने भेज दिया।
नाश्ता निबटने के बाद ताई जी ने रसोई my संभाली और पूरा काम निबटा कर ही दम लिया।
बैठक से किटियों के चहचहाने की आवाजें आ रही थीं…..वाओ! तिल के लड्डू, तिलकुट, तिलपट्टी, मूँगफली वाली गुड़ पट्टी! बहुत ही मजेदार! मकर संक्रान्ति मनाने का आनंद आ गया।बाजार की तो नहीं लग रही। घर पर बनाई तुमने?
“हाँ, पर मैंने नहीं, गाँव से आई मेरी ताई जी ने। अभी मिलवाती हूँ उनसे”…कहती हुई वह ताई जी के कमरे की ओर
दौड़ गई। ०००
२- जंग
जैसे ही गेट खोल कर संध्या अंदर आई तो बरामदे में बैठी सास ने चहकते हुए पूछा…..”हो गया त्यागपत्र मंजूर?”
“ हाँ मम्मी!
“ चलो अब मेरी तरह बच्चे को पालने के साथ घर-बार देखो, आखिर इस नौकरी में इतना मिलता भी क्या था?”
“ आप गलत समझ रही हो मम्मी! त्यागपत्र नौकरी से दिया है अपनी रुचियों और सपनों से नहीं। नाम मेरा संध्या अवश्य है पर अभी मेरे जीवन की दूसरी महत्वपूर्ण आशा भरी सुबह हुई है।”
“ अरे सुबह-शाम तो ऐसे ही होती रह जाती हैं।”
“तब तो आपने मुझे पहचाना ही नहीं, आपने तो अपनी रुचियों पर जंग लगा कर सब गुड़-गोबर कर लिया पर मैं ऐसा करने वाली नहीं। बच्चे के लिए नौकरी छोड़ी है, देखना इसे अपने ढंग से बड़ा करते हुए अपने सपनों का आकाश अपनी रुचियों के रंग से रंगते हुए इतना विस्तृत करूँगी कि चारों ओर इंद्रधनुष ही खिलते दिखाई देंगे”……कहते हुए संध्या ने अपने आठ माह के बेटे को गोद में उठाया और घर के अंदर चली गई। ०००
३- पहचान
अनन्या हुनरों की खान थी। जो कुछ भी करती धड़-फड़ में उल्टा-सीधा करके छुट्टी पा लेती। इसी कारण किसी भी काम में उसे किसी की भी प्रशंसा प्राप्त न होती।
अपनी बचपन की सहेली के घर में जब उसने उसे अपने कार्यों में अतिव्यस्त देखा, उसके घर में सजी ट्रॉफियों को देख वह उनके आकर्षण से खिंचती चली जा रही थी और वह सोचने को विवश हो गई कि कक्षाओं में सदा पीछे बैठने वाली, पढ़ने में भी औसत और आज उसका यह रूप!
अब तो दिन-रात अनन्या का आत्मविश्लेषण चलने लगा और उसने यह पाया कि उसने अपनी रुचियों को पहचाना तो नहीं, समय भी नहीं दिया और मन लगा कर कोई काम भी कभी नहीं किया। सारा खाली समय तो वह लोगों की ताक-झाँक करने में बिता देती थी।
घर में आए अतिथि जब उसके बनाए खाने की प्रशंसा करते, बच्चों के प्रोजेक्ट के लिए पर लिखे पर जब बच्चे पुरस्कार पा कर उसे सराहते तो वह उसे साधारण सी बात समझती थी, पर अब उसे समझ आया कि ये तो उसके मनचाहे काम थे जिन्हें वह केवल कर्तव्य समझ कर करती थी।
अब तो अनन्या एक अलग ही अनन्या बन गई थी। वह अपनी बनाई स्वादिष्ट चीजों की फोटो खिंचती, विडियो बनाती, फेसबुक पर डालती। अपने बच्चों की सहायता से यू ट्यूब पर अपने विडीयो डालने और अपने मन के भाव डायरी में लिखने शुरू किए। फिर तो जैसे अनन्या को पँख लग गए। ताका-झाँकी तो छूट ही गई थी।
एक साहित्यिक कविता प्रतियोगिता में जब उसे वरिष्ठ कवि जितेंद्र कमल आनंद जी के हाथों प्रथम पुरस्कार,स्मृति चिह्न और व्यंजन प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार और स्मृति चिह्न कुनाल कपूर के हाथों मिला जिनकी कविताएँ वह पढ़ती और बनाए व्यंजन रूचिपूर्वक देखती और अपना कुछ मौलिक मिला कर बनाती आ रही थी तो उसकी प्रसन्नता का पारावार नहीं था।
ट्रॉफियों के आकर्षण ने अनन्या को उसकी रुचियों का चुनाव करवा कर उसे अपनी एक पहचान दिलवा ही दी थी। ०००
४- दिशा
आज वह बेहद दुखी था। सारी बातें एक-एक करके याद आ रही थीं।
एक बड़ी संस्था से जुड़ कर उसके लिए निस्वार्थ भाव से पूरे समर्पण से काम किया। जब भी कोई काम होता उसका फोन टनटनाया जाता था पर दूध-मलाईं खाने में सब सफेदपोश बने अधिकारियों के सामने सबसे आगे रहते थे।
समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी तो एक बाल आश्रम के लिए भी जी-जान लगा कर समाज से सहायता लेकर वहाँ पहुँचाने कितने ही चक्कर काटता था।
अपने मोहल्ले का कोई भी काम हो…समिति का, वृक्षारोपण का, सड़क बनवाने में भागदौड़ करने का…सबसे आगे रहता। एक आवाज पर खाना तक छोड़ कर निकल जाता था। पत्नी गुस्सा करती तो उससे भी लड़ पड़ता था।
ह्रदयाघात क्या हुआ….. ठीक होने के बाद भी इस दुनिया के लिए मैं ऐसा हो गया जैसे मैं हूँ ही नहीं। और आज मोहल्ले वालों ने बुलाना तो दूर बताने की जरूरत तक नहीं समझी!
दुनिया को मेरी परवाह नहीं तो मैं क्यों दुनिया की परवाह करूँ? मेरे पास तो वह अनमोल खजाना है जिसे मैं आने वाली भावी पीढ़ियों को देकर जा सकता हूँ।
वह उठा और अपना रजिस्टर खोल कर लिखने बैठ गया।०००
५- लिफाफे
पड़ोस की महिलाओं का सजा-धजा समूह बड़े ठसके और नजाकत से चलते हुए सजे विवाह समारोह स्थल में भिन्न-भिन्न मुद्राएँ बना मोबाइल से चित्र लेने में तल्लीन हो गया।
शोभना की पक्की सखी के बेटे का विवाह था। कई बार उसने पति को साथ लेकर आने को कहा था। तो उसने सोचा पंद्रह मिनट में वह सखी को बधाई देकर और शगुन लिखवा कर लौट आएँगे। लगभग दो साल के कड़े संघर्ष के बाद आज पहली बार वह पति के साथ किसी विवाह समारोह में गई थी।
जैसे ही पहुँची पड़ोस की महिलाओं ने जैसे लाम बंद ही कर लिया।
बड़ा अच्छा लगा आज भाई साहब और आपको देख कर। बस सब ईश्वर की कृपा है।
तभी एक आवाज आई पहले खाना निबटा लेते हैं फिर शगुन लिखवा लेंगे।
दूसरी आवाज आई नहीं पहले खाना ठीक नहीं लगेगा शगुन ही लिखवा लिया जाए।
शोभना भी अपने पर्स से पैसे निकाल कर पति को एक कुर्सी पर बैठा कर उनके साथ चली।
तभी एक मोटी सी थुलथुली महिला बोली अरी शोभना! इतना शगुन लिखवा रही है तो शगुन के लिफाफे में ही डाल कर ले आती। ऐसी भी क्या कंजूसी?
सोचा सखी सबसे मिलने में व्यस्त रहेगी
तो हाथ में शगुन दे पाना कठिन होगा और लिखवाने में लिफाफे का कोई काम मुझे नहीं लगा।
सारी महिलाओं के दिए लिफाफे पैसे निकालने के लिए बेदर्दी से फटे हुए मायूस से मानो शोभना को कह रहे थे तुम ही सही हो। ०००
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