डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की लघुकथाएं

   डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

जन्म - 4 अक्टूबर 1957 देहरादून, उत्तराखंड में 

माता - श्रीमती कमला वर्मा 

पिता - श्री बाबूराम वर्मा 

पति - राकेश आनंद बौड़ाई 

संतान- एक पुत्री, एक पुत्र 

शिक्षा - 

एम० ए०हिंदीसाहित्य), बीएड०

          डीफिल०(शोध द्वारा-गद्यकार बच्चन:

         एक आलोचनात्मक अध्ययन-विषय पर)

सेवा-अरुणाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग में टी. जी. टी. पद पर 24 वर्ष कार्य करने के बाद अक्टूबर 2005 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उसके बाद से स्वतंत्र अध्ययन और लेखन।

प्रकाशित कृतियां : - 

प्रकाशन- ( एकल संग्रह)

कविता संग्रह- 16

1--कविता का अरुणांचल (कविता संग्रह) 1985

2– उपहार (2018) कविता संग्रह 

3– रंगों के साथ ( 2018) कविता संग्रह 

4– अंतर्मन की यात्राएँ (2018) कविता संग्रह  

5– आखर मीत (2018) काव्य संग्रह 

६- मोहे बिटिया ही दीजो (2019) कविता संग्रह  

७- अंजुरि भर प्रेम (2019) कविता संग्रह 

८- आपातकाल में सृजन फुलवारी (2020) कविता 

९- माँ-पा हमेशा एक दूसरे के साथ (कविता संग्रह) २०२०

     संग्रह 

१०- विविधा ( कविता संग्रह )

११- चीनू की डायरी ( कविता संग्रह )

१२- समर अभी शेष है ( कविता संग्रह )

१३- गुलमोहर तले (कविता संग्रह )

१४- अनहद नाद ( कविता संग्रह २०२४

१५- स्त्री मन ( कविता संग्रह ) २०२५ 

१६- प्रीति की प्रीत में ( कविता संग्रह )

आलोचना - 

१४- बच्चन साहित्य:अध्ययन का उपक्रम (आलोचना) 1998

सृजक-सृजन-समीक्षा -

1५-   सृजन समीक्षा ( 2018)

लघुकथा संग्रह - 

1६-  अनुभूतियों के दंश (2018)

1७- पगडंडियों पर चलते हुए ( 2019)

आलेख संग्रह— 

18-  कुछ रंग धूप के 

विचार संग्रह -

19 —मेरी डायरी से 

सम्मान एवं पुरस्कार- 

- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ( पूर्व रक्षा मंत्री द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान के साथ अन्तरा शब्दशक्ति और साहित्य संगम संस्थान द्वारा कई सम्मान प्राप्त।

- जैमिनी अकादमी (पानीपत - हरियाणा) द्वारा पद्म भूषण विश्वनाथ सत्यनारायण स्मृति सम्मान - 2025 से सम्मानित 

विशेष उपलब्धि - 

- सामाजिक कार्य— अपने पति के “ अविराम प्रवाह” ट्रस्ट द्वारा किए जाने वाले सेवा कार्यों में सहयोग।

- अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित

- 320 साझा संग्रह प्रकाशित 

 पता - 

डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई

95, ब्लॉक- H, दिव्य विहार 

डांडा धर्मपुर, डाकघर- नेहरूग्राम 

देहरादून-248001 ( उत्तराखंड )


                 १- ताई जी 

           “किटी पार्टी भी इन्हें आज मकर संक्रान्ति के दिन ही रखनी थी”..उठते ही अवनि बड़बड़ाने लगी।

           “क्या हो गया भई…..आज सुबह से ही गरज के साथ धुआँधार बैटिंग?”

             “तो क्या करूँ? इलाज के नाम पर जमे हुए हैं तुम्हारे गाँव से आए ताऊ-ताई जी। अब इन्हें भी झेलूँ और किटी पार्टी की तैयारी भी करूँ यह तो नहीं होगा। छोड़ो, तुमसे कह कर फायदा भी क्या? जौमेटो से ही मँगवा कर चलाऊँगी काम। इतना ही तो होगा दुगुना-तिगुना बैठ जाएगा खर्च।”

             बात कमरे में बैठी ताई जी के कानों में पड़ी तो वे उठ कर बहू के पास गई और बोली…” मेरी बिटिया इतनी छोटी सी बात से परेशान है। तू ऐसा कर, बबुआ को भेज कर तिल, गुड, मूँगफली आदि मँगवा दे जल्दी से बस।”

             “अब बोल रहीं हैं तो मँगवा ही देती हूँ, मेरे कहने से भी ये मानने वाली तो हैं नहीं।”…सोचते हुए विहान को उसने सामान लाने भेज दिया।

                नाश्ता निबटने के बाद ताई जी ने रसोई my संभाली और पूरा काम निबटा कर ही दम लिया।

               बैठक से किटियों के चहचहाने की आवाजें  आ रही थीं…..वाओ! तिल के लड्डू, तिलकुट, तिलपट्टी, मूँगफली वाली गुड़ पट्टी!  बहुत ही मजेदार! मकर संक्रान्ति मनाने का आनंद आ गया।बाजार की तो नहीं लग रही। घर पर बनाई तुमने?

                “हाँ, पर मैंने नहीं, गाँव से आई मेरी ताई जी ने। अभी मिलवाती हूँ उनसे”…कहती हुई वह ताई जी के कमरे की ओर 

दौड़ गई। ०००

                   २- जंग 

         जैसे ही गेट खोल कर संध्या अंदर आई तो बरामदे में बैठी सास ने चहकते हुए पूछा…..”हो गया त्यागपत्र मंजूर?”

            “ हाँ मम्मी!

     “ चलो  अब मेरी तरह बच्चे को पालने के साथ घर-बार देखो,  आखिर इस नौकरी में इतना मिलता भी क्या था?”

          “ आप गलत समझ रही हो मम्मी! त्यागपत्र नौकरी से दिया है अपनी रुचियों और सपनों से नहीं। नाम मेरा संध्या अवश्य है पर अभी मेरे जीवन की दूसरी महत्वपूर्ण आशा भरी सुबह हुई है।”

             “ अरे सुबह-शाम तो ऐसे ही होती रह जाती हैं।”

        “तब तो आपने मुझे पहचाना ही नहीं, आपने तो अपनी रुचियों पर जंग लगा कर सब गुड़-गोबर कर लिया पर मैं ऐसा करने वाली नहीं। बच्चे के लिए नौकरी छोड़ी है, देखना इसे अपने ढंग से बड़ा करते हुए अपने सपनों का आकाश अपनी रुचियों के रंग से रंगते हुए इतना विस्तृत करूँगी कि चारों ओर इंद्रधनुष ही खिलते दिखाई देंगे”……कहते हुए संध्या ने अपने आठ माह के बेटे को गोद में उठाया और घर के अंदर चली गई। ०००

                 ३- पहचान 

    अनन्या हुनरों की खान थी। जो कुछ भी करती धड़-फड़ में उल्टा-सीधा करके छुट्टी पा लेती। इसी कारण किसी भी काम में उसे किसी की भी प्रशंसा प्राप्त न होती।

              अपनी बचपन की सहेली के घर में जब उसने उसे अपने कार्यों में अतिव्यस्त देखा, उसके घर में सजी ट्रॉफियों को देख वह उनके आकर्षण से खिंचती चली जा रही थी और वह सोचने को विवश हो गई कि कक्षाओं में सदा पीछे बैठने वाली, पढ़ने में भी औसत और आज उसका यह रूप!

           अब तो दिन-रात अनन्या का आत्मविश्लेषण चलने लगा और उसने यह पाया कि उसने अपनी रुचियों को पहचाना तो नहीं, समय भी नहीं दिया और मन लगा कर कोई काम भी कभी नहीं किया। सारा खाली समय तो वह लोगों की ताक-झाँक करने में बिता देती थी।

                  घर में आए अतिथि जब उसके बनाए खाने की प्रशंसा करते, बच्चों के प्रोजेक्ट के लिए पर लिखे पर जब बच्चे पुरस्कार पा कर उसे सराहते तो वह उसे साधारण सी बात समझती थी, पर अब उसे समझ आया कि ये तो उसके मनचाहे काम थे जिन्हें वह केवल कर्तव्य समझ कर करती थी।

              अब तो अनन्या एक अलग ही अनन्या बन गई थी। वह अपनी बनाई स्वादिष्ट चीजों की फोटो खिंचती,  विडियो बनाती, फेसबुक पर डालती। अपने बच्चों की सहायता से यू ट्यूब पर अपने विडीयो डालने और अपने मन के भाव डायरी में लिखने शुरू किए।  फिर तो जैसे अनन्या को पँख लग गए। ताका-झाँकी तो छूट ही गई थी।

                 एक साहित्यिक कविता प्रतियोगिता में जब उसे  वरिष्ठ कवि जितेंद्र कमल आनंद जी के हाथों प्रथम पुरस्कार,स्मृति चिह्न और व्यंजन प्रतियोगिता में  द्वितीय पुरस्कार और स्मृति चिह्न कुनाल कपूर के हाथों मिला जिनकी कविताएँ वह पढ़ती और बनाए व्यंजन  रूचिपूर्वक देखती और अपना कुछ मौलिक मिला कर बनाती आ रही थी तो उसकी प्रसन्नता का पारावार नहीं था।

                  ट्रॉफियों के आकर्षण ने अनन्या को उसकी रुचियों का चुनाव करवा कर उसे अपनी एक पहचान दिलवा ही दी थी। ०००

                  ४- दिशा 

   आज वह बेहद दुखी था। सारी बातें एक-एक करके याद आ रही थीं।

           एक बड़ी संस्था से जुड़ कर उसके लिए निस्वार्थ भाव से पूरे समर्पण से काम किया। जब भी कोई काम होता उसका फोन टनटनाया जाता था पर दूध-मलाईं खाने में सब सफेदपोश बने अधिकारियों के सामने सबसे आगे रहते थे।

            समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी तो एक बाल आश्रम के लिए भी जी-जान लगा कर समाज से सहायता लेकर वहाँ पहुँचाने कितने ही चक्कर काटता था।

            अपने मोहल्ले का कोई भी काम हो…समिति का, वृक्षारोपण का, सड़क बनवाने में भागदौड़ करने का…सबसे आगे रहता। एक आवाज पर खाना तक छोड़ कर निकल जाता था। पत्नी गुस्सा करती तो उससे भी लड़ पड़ता था।

             ह्रदयाघात क्या हुआ….. ठीक होने के बाद भी इस दुनिया के लिए मैं ऐसा हो गया जैसे मैं हूँ ही नहीं। और आज मोहल्ले वालों ने बुलाना तो दूर बताने की जरूरत तक नहीं समझी!

            दुनिया को मेरी परवाह नहीं तो मैं क्यों दुनिया की परवाह करूँ? मेरे पास तो वह अनमोल खजाना है जिसे मैं आने वाली भावी पीढ़ियों को देकर जा सकता हूँ।

            वह उठा और अपना रजिस्टर खोल कर लिखने बैठ गया।०००

               ५- लिफाफे

       पड़ोस की महिलाओं का सजा-धजा समूह बड़े ठसके और नजाकत से चलते हुए सजे विवाह समारोह स्थल में भिन्न-भिन्न मुद्राएँ बना मोबाइल से चित्र लेने में तल्लीन हो गया।

           शोभना की पक्की सखी के बेटे का विवाह था। कई बार उसने पति को साथ लेकर आने को कहा था। तो उसने सोचा पंद्रह मिनट में वह सखी को बधाई देकर और शगुन लिखवा कर लौट आएँगे। लगभग दो साल के कड़े संघर्ष के बाद आज पहली बार वह पति के साथ किसी विवाह समारोह में गई थी।

           जैसे ही पहुँची पड़ोस की महिलाओं ने जैसे लाम बंद ही कर लिया। 

           बड़ा अच्छा लगा आज भाई साहब और आपको देख कर। बस सब ईश्वर की कृपा है।

          तभी एक आवाज आई पहले खाना निबटा लेते हैं फिर शगुन लिखवा लेंगे।

         दूसरी आवाज आई नहीं पहले खाना ठीक नहीं लगेगा शगुन ही लिखवा लिया जाए।

         शोभना भी अपने पर्स से पैसे निकाल कर पति को एक कुर्सी पर बैठा कर उनके साथ चली।

         तभी एक मोटी सी थुलथुली महिला बोली अरी शोभना! इतना शगुन लिखवा रही है तो शगुन के लिफाफे में ही डाल कर ले आती। ऐसी भी क्या कंजूसी?

           सोचा सखी सबसे मिलने में व्यस्त रहेगी 

तो हाथ में शगुन दे पाना कठिन होगा और लिखवाने में लिफाफे का कोई काम मुझे नहीं लगा।

              सारी महिलाओं के दिए लिफाफे पैसे निकालने के लिए बेदर्दी से फटे हुए मायूस से मानो शोभना को कह रहे थे तुम ही सही हो। ०००

 सकारात्मक संदेश का सुंदर समन्वय 

            डॉ.भारती वर्मा बौड़ाई जी की पाँचों लघुकथाएँ समकालीन जीवन की घटनाओं को सामाजिक और मानवीय सत्य उद्घाटित करती हुई प्रतीत होती हैं। इन सभी लघुकथाओं में कथाकार बिना किसी उपदेशात्मक शैली का सहारा लिए सहज संवाद और जीवन के यथार्थ प्रसंगों के माध्यम से पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ देती हैं :-

'ताई जी' 

लघुकथा भारतीय पारिवारिक संस्कृति, बुज़ुर्गों के अनुभव और अपनत्व का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहाँ बुज़ुर्गों को अक्सर बोझ समझ लिया जाता है, वहीं ताई जी अपने स्नेह, कौशल और व्यवहार से यह सिद्ध कर देती हैं कि परिवार की सबसे बड़ी पूँजी उनका अनुभव और प्रेम है। कथा का अंत पाठक के मन में बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान का भाव जगा देता है।

'जंग' 

एक सशक्त स्त्री-विमर्श प्रस्तुत करती है। संध्या का चरित्र यह संदेश देता है कि नौकरी छोड़ना सपनों का अंत नहीं होता। परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन यदि इच्छाशक्ति जीवित हो तो जीवन की नई दिशा स्वयं बनाई जा सकती है। कथा नारी के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और सकारात्मक सोच को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती है।

'पहचान' 

आत्मविश्लेषण और आत्मबोध की कथा है। अनन्या के माध्यम से लेखिका यह बताती हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई विशिष्ट प्रतिभा होती है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और सही दिशा देने की होती है। सोशल मीडिया और साहित्यिक मंचों का सकारात्मक उपयोग कर अपनी पहचान बनाने की प्रेरणा इस कथा को समकालीन संदर्भ प्रदान करती है।

'दिशा' 

समाजसेवा और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर प्रश्न उठाती है। जब तक व्यक्ति उपयोगी प्रतीत होता है, समाज उसे महत्व देता है; किंतु कठिन समय में वही व्यक्ति उपेक्षित हो जाता है। इस कटु अनुभव के बाद नायक का अपनी ऊर्जा को लेखन और भावी पीढ़ी के निर्माण की ओर मोड़ना अत्यंत सार्थक और प्रेरणादायी संदेश देता है। यह कथा निराशा से आशा की ओर बढ़ने का सुंदर उदाहरण है।

'लिफाफे' 

सामाजिक दिखावे और औपचारिकताओं पर तीखा किंतु संयमित व्यंग्य है। विवाह समारोहों में रिश्तों से अधिक प्रदर्शन को महत्व देने वाली मानसिकता पर लेखिका ने बहुत सहज ढंग से प्रहार किया है। अंत में फटे हुए लिफाफों का मानवीकरण कथा को प्रभावशाली प्रतीकात्मकता प्रदान करता है और पाठक को सोचने के लिए विवश कर देता है।

        भाषा की दृष्टि से सभी लघुकथाएँ सरल, प्रवाहमयी और संवादप्रधान हैं। कथानक प्रभावपूर्ण है तथा प्रत्येक कथा अपने अंत में एक गहरी अनुभूति छोड़ जाती है। कहीं-कहीं भाषा और कथ्य का कसाव इन्हें और अधिक प्रभावशाली बना सकता है, किंतु समग्र रूप से ये रचनाएँ जीवन-मूल्यों, पारिवारिक संवेदनाओं, आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना का सशक्त दस्तावेज़ हैं। डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की ये पाँचों लघुकथाएँ पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देतीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती हैं। यही किसी सफल लघुकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। संवेदना, सामाजिक सरोकार और सकारात्मक संदेश का सुंदर समन्वय इन रचनाओं को उल्लेखनीय बनाता है। 

- नूतन गर्ग 

    दिल्ली

 सभी लघुकथाएं  पात्रों के अनुकूल है 


ताई जी 

विषय वस्तु सामयिक है। संवाद लघुकथा के अनुरूप हैं। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों से उकताने वालों पर, अच्छी टिप्पणी की गई है। लेकिन उन्हीं के कारण, समस्या चुटकियों में सुलझ भी जाती है। सनातन के पर्वों पर बनने वाले, विशिष्ट व्यंजनों में कितना स्वाद निहित होता है, दिखाई दे रहा है। शीर्षक सटीक है। कहानी अच्छी है। 

जंग

नई पीढ़ी की बहू, नौकरी से त्यागपत्र देकर भी, पूर्ण रूप से सक्रिय रहकर, संतान का पालन पोषण सुचारू रूप से कर सकती है। नौकरी वाली माताओं की समस्या का, समाधान भी दिख रहा है। लघुकथा अच्छी है। कथोपकथन लघुकथा का को आगे बढ़ाने वाले हैं। शीर्षक उचित है। 

पहचान 

अनेक कामों में कौशल रखते हुए भी, किसी को भी पूरे मनोयोग से न करना, एक मानव की कमी होती है। कोई भी कार्य हो, पूर्ण विशेषज्ञता से करके, हम अनेक दिशाओं से लाभान्वित हो सकते हैं। लघुकथा अच्छी है। शीर्षक उचित है। संवादों का अभाव है। 

दिशा 

बहुत परोपकारी, निस्वार्थ भाव से काम करने वालों को भी, लोग केवल मतलब से ही याद रखते हैं। परिवार की नाराजगी, खाना-पीना छोड़कर दूसरों के लिए, हर समय उपलब्ध रहने वालों को भी, लोग उनके मुश्किल समय में,उपेक्षित करते हैं। भुला देते हैं। कहानी अच्छी है। मानव के हृदय की निराशा हताशा को, अच्छी तरह स्पष्ट किया है। उसने आगामी जीवन की दिशा भी निश्चित कर ली, और लेखन आरंभ कर दिया। शीर्षक एकदम सही है। 

लिफाफे

लघुकथा में एक अलग ही विषय को उठाया गया है। शगुन के रुपए लिखने वाले को, ये लिफाफे खोलने पड़ते हैं। इसलिए लिफाफा एकदम व्यर्थ की वस्तु है। भले ही कोई कंजूस कहे, ऐसा लगता है, मानो फटे हुए लिफाफे भी, नायिका के विचारों की पुष्टि करते हुए- से लगते हैं। शीर्षक उचित है। वर्तमान लिफाफे की संस्कृति की, अनुपयोगिता दर्शायी गई है। भाषा सभी लघुकथाएं के पात्रों के अनुकूल है

 - उषा कंसल

 बैंगलोर - कर्नाटक 

   तराशने की आवश्यकता

 ‌     डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की सभी लघुकथाओं का विषय घर के अंदर से ही लिया गया है। इनकी रचनाओं को अभी भी तराशने की आवश्यकता है :-

         1. ताई जी

इस रचना में सास -बहू के संबंधों की चर्चा की गई है। यह घटना एक ही दिन की है, इसलिए लघुकथा के मानक में सही उतरती है। संवाद से प्रारंभ हुई रचना प्रवाहमय थी, परंतु उसमें बिंदुओं के प्रयोग से लेखिका की अनभिज्ञता नजर आ रही है। बीच में (my) शब्द की आवश्यकता समझ नहीं आई।  शुरू में अवनि का बड़बड़ाना - *"इलाज के नाम पर जमे हुए हैं तुम्हारे गाँव से आए ताऊ-ताई..."*इस पंक्ति को छोटा किया जा सकता है। इस तरह शब्दों के कसाव पर ध्यान देना जरूरी है।अंत सकारात्मक है, दोनों के बीच के संबंध की मधुरता दिखती है। पांच पंक्ति का अभाव खटकता है।

           2. जंग

यह रचना भी सास-बहू के बीच ही जन्म लेती है। पात्र दो ही हैं, लेकिन संवाद बताते हैं कि सास पुरानी सोच रखती हैं। शोभना नए जमाने की सोच रखती है। कथानक में बहू द्वारा नौकरी से इस्तीफा देने पर सास द्वारा राहत की साँस लेना भी अप्रत्याशित लगता है। जब दोनों साथ हैं तो यह संवाद -*अब मेरी तरह बच्चे को पालने के साथ घर-बार देखो...*अजीब लगता है, क्योंकि बहू पहले से काम करती थी तो सास का खुद से बहू की तुलना करना, ऐसा नहीं होता है। संवाद भी काफी लंबे हैं, जिसकी आवश्यकता नहीं है। इस रचना में भी स्पष्ट नहीं हो पता है की सास की क्या प्रतिक्रिया है। इससे यह अधूरी लगती है। इसमें सामाजिक संदेश की भी कमी है।

       3. पहचान

  यह रचना एक दस्तावेज की तरह है। यानी स्वरूप लघु कहानी का है। दूसरी सखी से प्रेरित होकर खुद को ऊपर उठाने का प्रयास किया गया है। काल - दोष के साथ अन्य कई मानकों की कमी इसे लघुकथा की श्रेणी से अलग करती है।

         4. दिशा

यह रचना एक बीमार व्यक्ति द्वारा नई दिशा खोजने की है। उद्देश्य अच्छे लिये गए हैं, लेकिन उनका ट्रीटमेंट सही तरीके से नहीं किया गया है। इसमें अगर इसका एकदम उल्टा दृश्य दिखाया जाता तो रचना दमदार होती। हृदयाघात छोटी बीमारी नहीं है। इसमें किसी व्यक्ति का अकेले मानसिक तनाव से लड़ना अनपेक्षित है। 

        5. लिफाफे

इस लघुकथा का कोई अर्थ नहीं समझ आता है। पति के साथ नहीं जाती थी, कारण स्पष्ट नहीं होता है। *पति को कुर्सी पर बैठा कर* इस वाक्य से लेखिका के पति की स्थिति साफ नहीं हो पा रही है। पति की तबियत खराब है या किसी तरह की दिव्यांगता  हैं? बात केवल शगुन देने की थी उसमें अन्य घटनाओं की आवश्यकता ही नहीं थी।

- संगीता गोविल 

पटना - बिहार 

    जीवन के अदृश्य  रूप

     आदरणीया डॉ.भारती वर्मा जी की प्रस्तुत लघुकथाएं सामाजिक जीवन के अदृश्य  रूप हैं जिन्हें उन्होंने बड़ी संजीदगी से अपने सृजन कौशल से उकेरा है:-

1. ताई जी

     बहुत सुंदर लघुकथा। सकारात्मक। भाव पूर्ण। पारस्परिक सहयोग से , घर के कामकाज में हाथ बंटा लेने से आत्मीयता बढ़ती भी है और किसी एक पर काम का भार भी नहीं बढ़ता। अच्छा कथ्य।

2. जंग

    अच्छी लघुकथा।कथ्य भी सुंदर। संवाद में आकर्षण कम नजर आया। 

3.पहचान

  अच्छी लघुकथा।अच्छा संदेश निहित।  सभी में कोई न कोई प्रतिभा होती है। अनेक लोग इसे पहचानने और उसे निखार न पाने की भूल कर बैठते हैं। अच्छा कथ्य।

4.  दिशा

  अच्छी लघुकथा। अच्छा कथ्य। कहा जाता है, लोग उगते सूरज को नमस्कार करते हैं।' मौकापरस्त लोगों को लेकर सजग हो जाना,अच्छी प्रस्तुति। 

5. लिफाफे

कथ्य अच्छा। अच्छी लघुकथा।अंत में कसावट नजर नहीं आयी।       

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

 विविध रंगों का संवेदनशील दस्तावेज

        डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की प्रस्तुत पाँचों लघुकथाएँ जीवन के अलग-अलग पक्षों को स्पर्श करती हैं। कहीं पारिवारिक संबंधों में छिपी आत्मीयता है, कहीं स्त्री के सपनों और आत्मनिर्भरता का प्रश्न, कहीं आत्मपहचान की तलाश, कहीं उपेक्षित व्यक्ति की सृजनात्मक वापसी और कहीं सामाजिक दिखावे के पीछे छिपी संवेदनहीनता। लेखिका की विशेषता यह है कि वे सामान्य जीवन-स्थितियों से कथ्य उठाकर उनमें निहित असामान्य अर्थों को सामने लाती हैं :-

1. ताई जी

लघुकथा का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि ताई जी अपने त्याग का प्रदर्शन नहीं करतीं। वे चुपचाप काम करती हैं और बहू की सामाजिक प्रतिष्ठा बचा लेती हैं। दूसरी ओर किटी पार्टी में जब महिलाएँ घर के बने व्यंजनों की प्रशंसा करती हैं और अवनि गर्व से कहती है—“गाँव से आई मेरी ताई जी ने”—तो पाठक के मन में एक आत्मीय मुस्कान उभरती है।

यहाँ ताई जी केवल एक पात्र नहीं बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कृति की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं जो बिना अपेक्षा के घर को जोड़ती रही है। कथा में पीढ़ियों के बीच का अंतर, घरेलू श्रम का महत्व और आत्मीयता सुंदर ढंग से उभरते हैं। 

2. जंग

‘जंग’ स्त्री की आत्मपहचान और उसके सपनों को केंद्र में रखती है। संध्या ने नौकरी छोड़ी है लेकिन अपनी रुचियों और सपनों को नहीं। सास का दृष्टिकोण उस पारंपरिक सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें विवाह और मातृत्व के बाद स्त्री की अपनी आकांक्षाओं को गौण मान लिया जाता है।संध्या का कथन—“त्यागपत्र नौकरी से दिया है अपनी रुचियों और सपनों से नहीं”,कथा का केंद्रीय विचार है। यह पंक्ति आज की उस स्त्री की आवाज है जो परिवार और मातृत्व को महत्व देते हुए भी अपनी पहचान को समाप्त नहीं करना चाहती। शीर्षक ‘जंग’ अत्यंत प्रतीकात्मक है। जंग केवल लोहे पर नहीं लगती, सपनों और प्रतिभाओं पर भी लग सकती है यदि उन्हें समय और अवसर न मिले। यहाँ एक विचार अवश्य उभरता है कि स्त्री का आत्मविकास और मातृत्व परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

3. पहचान

‘पहचान’ आत्मविश्लेषण और आत्मखोज की कथा है। अनन्या प्रतिभावान है लेकिन उसने कभी अपनी रुचियों को गंभीरता से नहीं पहचाना। दूसरों की उपलब्धियों को देखकर उसके भीतर आत्ममंथन शुरू होता है।कथा का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अनन्या को अंततः पता चलता है कि जिन कामों को वह सामान्य घरेलू कर्तव्य समझती थी उनमें ही उसकी वास्तविक प्रतिभा छिपी हुई थी। भोजन बनाना, बच्चों के प्रोजेक्ट में सहयोग करना और लेखन—ये सब उसके भीतर की रचनात्मकता के संकेत थे। यह लघुकथा एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—प्रतिभा हमेशा बाहर से नहीं आती, कई बार वह हमारे रोजमर्रा के जीवन में चुपचाप मौजूद होती है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने की होती है।ट्रॉफियाँ यहाँ केवल पुरस्कार नहीं बल्कि अनन्या की आत्मपहचान का प्रतीक बन जाती हैं।

4. दिशा

‘दिशा’ पाँचों लघुकथाओं में सबसे अधिक विचारोत्तेजक रचनाओं में से एक है। कथा का नायक जीवन भर सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहा, लेकिन बीमारी के बाद उसे लगता है कि समाज ने उसे भुला दिया है।उसका यह प्रश्न अत्यंत स्वाभाविक है—“दुनिया को मेरी परवाह नहीं तो मैं क्यों दुनिया की परवाह करूँ?”लेकिन कथा का अंत उसे निराशा में नहीं छोड़ता। वह अपने पास मौजूद “अनमोल खजाने” को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का निर्णय करता है और रजिस्टर खोलकर लिखने बैठ जाता है।यहीं कथा का शीर्षक सार्थक हो जाता है। नायक अपनी दिशा खोता नहीं, बल्कि बाहरी सक्रियता से आंतरिक सृजन की ओर अपनी नई दिशा खोज लेता है।कथा का अंतिम दृश्य—रजिस्टर खोलकर लिखने बैठ जाना—बहुत सुंदर और प्रभावशाली है। इसमें भविष्य के प्रति आशा और सृजन की शक्ति निहित है।

5. लिफाफे

‘लिफाफे’ सामाजिक दिखावे, बनावटी सहानुभूति और संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य है। शोभना लंबे संघर्ष के बाद पहली बार अपने पति के साथ विवाह समारोह में पहुँचती है। पड़ोस की महिलाओं का व्यवहार ऊपर से आत्मीय दिखाई देता है लेकिन उनके व्यवहार में सामाजिक औपचारिकता और दिखावे की परतें स्पष्ट हैं।सबसे प्रभावी प्रसंग वह है जब एक महिला शोभना के शगुन को लेकर टिप्पणी करती है—“इतना शगुन लिखवा रही है तो शगुन के लिफाफे में ही डाल कर ले आती।”अंत में फटे हुए लिफाफों का मानवीकरण अत्यंत प्रभावशाली है। वे मानो शोभना को बता रहे हों कि वह ही सही थी। यह दृश्य सामाजिक आडंबर पर बिना किसी भारी-भरकम उपदेश के व्यंग्य कर देता है। इस लघुकथा की विशेषता है कि लेखिका ने दिखावे और वास्तविकता के अंतर को बहुत सूक्ष्मता से पकड़ा है। 

       डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की ये पाँच लघुकथाएँ जीवन के पाँच अलग-अलग आईने हैं। लेखिका की भाषा सहज, संवादप्रधान और प्रवाहपूर्ण है। पात्र जीवन से उठाए हुए लगते हैं। कथानक सामान्य परिस्थितियों से निर्मित हैं, लेकिन उनमें निहित संदेश व्यापक है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान


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