सिद्धेश्वर प्रसाद स्मृति सम्मान - 2026

       क्रोध कभी किसी का भला नहीं कर सकता है। यह वास्तविकता है। जिससे सभी जानते हैं। फिर भी सच्चाई से दूर भागते हैं।  क्रोध पर नियंत्रण करना , बहुत मुश्किल होता है। परन्तु प्रयास अवश्य करना चाहिए। तभी क्रोध से निपटा जा सकता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:-
       यह निर्विवाद सत्य है कि परिस्थिति चाहे अच्छी हो या बुरी क्रोध करना कभी भी फलदायक नहीं हो सकता। क्रोध बनता काम बिगाड़ सकता है, रिश्तों में गलतफहमी पैदा कर सकता है, अपनों के बीच दूरी पैदा कर सकता है। इतना ही नहीं क्रोध बुद्धि का हरण कर व्यक्ति को अपने वश में करके बुरे और गलत काम करवा सकता है। सोचने-समझने की शक्ति समाप्त कर देता है। क्रोध में कही गई बातें भुलाने पर भी भुलाई नहीं जा सकती और इसके कारण व्यक्ति के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ने लगता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को इतना शक्तिशाली अवश्य होना चाहिए कि वह अच्छी-बुरी कैसी भी परिस्थिति में अपने ऊपर नियंत्रण रख सके। यह भी उतना ही सत्य है कि जो अपना और अपनों का नहीं होता वह किसी का भी नहीं होता। क्रोध सबसे बड़ा शत्रु होता है और शत्रु कभी अपना होता, किसी का नहीं होता।तो जो अपना नहीं है और अपना अपना हो भी नहीं सकता है ऐसे क्रोध रूपी शत्रु से दूर रहना ही श्रेयस्कर है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून -  उत्तराखंड

      जीवन में मन स्थिति को स्थिर करना बहुत ही मुश्किल का काम है। हम किसी न किसी रूप में, न चाहते हुए भी समय पूर्व क्रोधित हो ही जाते है। जिसे हम मानसिकता परिदृश्य ही कह सकते है। क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता है, जो अपना नहीं है वह किसी का नहीं होता है। सच है नियंत्रण और नियंत्रित करना अपने बस में नहीं है। एक कहावत है अपने-अपनों को कितना भी खिलाओं-पिलाओं कब किस समय पासा पलटवार कर दे, कह नहीं सकते है। ताली दोनों ही हाथ से बजती है और क्रोध को हम ही आमंत्रित करते है, वह चलकर नहीं आता है। हम समयानुसार ऐसा काम कीजिए, सामने वाले को क्रोध ही न आये। क्रोध ऐसा भयानक शब्द है, जो अपना भी नहीं हो सकता, दूसरों का क्या होगा.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

       बालाघाट - मध्यप्रदेश

     क्रोध वास्तव में एक ऐसा भाव है जो हमें अंधा बना देता है और अक्सर हमें ऐसे निर्णय लेने के लिए प्रेरित करता है जिन पर हमें बाद में पछताना पड़ता है। संयम और शांति से काम लेना हमेशा बेहतर होता है। और "जो अपना नहीं है वह किसी का नहीं होता" यह बात तो बिल्कुल सच है। जब हम किसी चीज को जबरदस्ती पकड़ने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर हम उसे खो देते हैं। जो चीज हमारे लिए है, वह हमारे पास आएगी ही।

- सुनीता गुप्ता

 कानपुर - उत्तर प्रदेश 

        क्रोध अशान्ति का कारक है। क्रोध से बुद्धि और विवेक का ह्रास होता है। जब ये दोनों समाप्त हो जाते हैं। तो फिर सोचने - समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है। जब सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो जाती है तो व्यक्ति क्या अच्छा है और क्या बुरा है। हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह वह समझ नहीं पाता। सामान्य अवस्था में किसी काम करने के पहले दस बार सोचना चाहिए और जब हम क्रोध में हों तब हमें सौ बार सोचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो हम नुकसान में रहेंगे। अब दूसरी पंक्ति पर आते हैं तो जो अपना नहीं है वह किसी का नहीं हो सकता। यह कथन पूर्णतः सत्य है। ऐसे व्यक्ति स्वार्थी होते हैं। उनकी मित्रता केवल तभी तक होती है जब तक उनका स्वार्थ रहता है। स्वार्थ पूर्ण होने पर वे अलग हो जाते हैं। ऐसे लोगों से हमें सावधान रहना चाहिए। 

- डॉ अवधेश कुमार चंसौलिया

 ग्वालियर - मध्यप्रदेश 

       क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता, जो अपना नहीं किसी का नहीं हो सकता... । इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रोध करना किसी के लिए अच्छा नहीं होता...यह एक मानसिक वेदना है। यदि क्रोध गांठ बनकर या यूं कहो कुंडलीन लगाकर विष-संग मन पर बैठ गया तो वह दूसरों के लिए तो धातक होता है...स्वयं पर भी विष का प्रहार कर घातक सिद्ध हो सकता है चूंकि क्रोध में वह अपना विवेक, मानसिक संतुलन खो देता है... इसीलिए तो कहते हैं क्रोध का अस्त्र चालक को घायल करता है। जो क्रोध से स्वयं को घायल होने से नहीं बचा पाता वह दूसरों को क्या देखेगा... किसी की उन्नति, खुशी देख जलन की भावना से क्रोध आता है तो व्यर्थ है चूंकि उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है और जो हमारे दायरे से बाहर हो उसपर क्रोध करना व्यर्थ ही है...।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

      क्रोध मनुष्य के विवेक का अपहरण कर लेता है। क्षणिक आवेश में वह ऐसे निर्णय करा देता है, जो दीर्घकाल में न केवल समाज के लिए, बल्कि स्वयं व्यक्ति के लिए भी घातक सिद्ध होते हैं। जो मनुष्य क्रोध के वश में होकर बोलता है, वह अपने ही शब्दों का कैदी बन जाता है, और जो क्रोध से प्रेरित होकर कार्य करता है, वह परिणामों का दास हो जाता है। क्रोध मनुष्य को खंडित, समाज को अस्थिर और राष्ट्र को अशक्त कर देता है। अतः यह निर्विवाद सत्य है कि क्रोध किसी भी स्थिति में उत्तम नहीं होता है। इसके विपरीत, शांत चित्त, संयमित विचार, दृढ़ संकल्प और न्यायपूर्ण तर्क राष्ट्रनिर्माण की मूल आधारशक्ति हैं। महापुरुषों ने इतिहास में अपनी छाप शक्ति से नहीं, बल्कि संयम और तप से छोड़ी है। क्रोध से जन्मी ऊर्जा विनाश का कारण बनती है, परन्तु अनुशासन से जन्मी ऊर्जा निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है। उसी प्रकार यह भी अटल सत्य है कि जो अपना नहीं है, वह किसी का नहीं होता। इस संक्षिप्त वाक्य में स्वामित्व, दायित्व एवं नैतिकता का सार निहित है। जो व्यक्ति अपने चरित्र, अपने वचनों, अपने कर्तव्यों और अपने राष्ट्र को अपना नहीं मानता, वह दूसरों के प्रति भी ईमानदार नहीं रह सकता। जो नागरिक अपने संविधान को अपना नहीं समझता, वह न्याय की अपेक्षा कैसे कर सकता है? जो समाज अपने नैतिक मूल्यों को अपना नहीं मानता, वह एकता की कल्पना कैसे करेगा? और जो राष्ट्र अपने इतिहास को अपना नहीं मानता, वह भविष्य की महानता की आकांक्षा कैसे करेगा? अतः अपनत्व, दायित्व और आत्मानुशासन तीनों स्तम्भ व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक उन्नति एवं प्रगति का मार्ग निर्मित करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनमानस में यह चेतना जागृत हो कि अधिकार तभी सार्थक होते हैं जब कर्तव्यों को अपनाया जाए। क्रोध का स्थान संयमित संघर्ष ले, और भावुक शोर का स्थान तार्किक तर्क। इसी परिवर्तन से न केवल समाज में शांति आएगी, बल्कि न्याय और समता की वास्तविक स्थापना भी संभव हो सकेगी। सकारात्मक परिवर्तन वही व्यक्ति ला सकता है, जो संयमित मानसिकता के साथ न्यायपूर्ण दृढ़ता रखता है और वही राष्ट्र को प्रकाशमान करता है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर

         मैं पूर्णतः इस कथन से सहमत हूं कि क्रोध किसी भी स्थिति मैं अच्छा नहीं होता ! क्रोधित व्यक्ति क्रोधवश होकर स्वयं पर नियंत्रण खो देता है , व वो उस बात को सहजता से कह देता है , जो उसे नहीं कहनी चाहिए , व सही गलत की पहचान भी भूल जाता हैं! क्रोध में व्यक्ति , संबंधों को भी खराब कर लेता है !! क्रोध के कारण व्यक्ति शब्दों के ऐसे तीर चल देता है , जो कमान से निकलने के बाद वापिस नहीं आते! ऐसे क्रोध से स्वयं को बचाना चाहिए ! जो व्यक्ति स्वयं का नहीं , जिसका ईमान बिन पेंदी के लौटे की तरह डोलता रहता है , किसी का भी नहीं हो सकता ! ऐसे व्यक्ति तो.... 

गंगा गए तो गंगाराम 

जमना गए तो जमना राम 

प्रकार के होते है व इस प्रकार के व्यक्तियों से बचकर रहना चाहिए !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

        क्रोध के संबंध में नीतिकार कहते हैं कि- क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां, देहस्थितो देहविनाशनाय । यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः, स एव वह्निर्दहते शरीरम् ॥ अर्थात क्रोध मनुष्यों का पहला शत्रु है, जो शरीर के भीतर रहकर उसे नष्ट करता है। जिस प्रकार लकड़ी में लगी आग लकड़ी को ही जला देती है, उसी प्रकार शरीर में स्थित क्रोध शरीर को भस्म कर देता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं - काम वात,कफ लोभ अपनाया।क्रोध पित्त नित छातिहि जारा।अब तो सुनिश्चित है कि क्रोधाग्नि जलाने का ही काम करती है। नुकसान करती है समग्र स्वास्थ्य का।और जब यह क्रोध हमारा स्वयं का ही इतना नुकसान करता है तो फिर दूसरों को कितना नुकसान दे सकता है। हत्याएं तक हो जाती हैं क्रोध में। इसलिए किसी भी स्थिति में क्रोध न करके हमें क्रोध से बचना चाहिए।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

    मनुष्य का क्रोध प्रायः परिस्थितियों से नहीं, अपने भीतर के असंतुलन और अपेक्षाओं से उपजता है। क्रोध का परिणाम कभी भी रचनात्मक नहीं होता—यह निर्णय को धुंधला करता है, संवाद को कठोर बनाता है और रिश्तों को घायल करता है। क्रोध में व्यक्ति क्षण भर के लिए स्वयं को विजयी समझ लेता है, परंतु वही क्षण अक्सर दीर्घकालिक पश्चाताप में बदल जाता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा—कबीर से लेकर गीता तक—ने क्रोध को मोह और अहं की संतान बताया है, जो ज्ञान की ज्योति को ढँक देती है। दूसरी ओर, “जो अपना नहीं है, वह किसी का नहीं होता” — यह वाक्य स्वामित्व से आगे जाकर स्वभाव और संबंध—दोनों पर लागू होता है। जो वस्तु, भाव, व्यक्ति या विचार भीतर से अपनापन नहीं बनाता, वह बाहरी स्तर पर चाहे जितना सजाया जाए, टिकता नहीं। यही कारण है कि चोरी किया गया धन सुख नहीं देता, उधार ली गई पहचान देर तक नहीं चलती, और मजबूरी में निभाए गए संबंध स्थायी नहीं रहते। अपनापन ही किसी चीज़ को सार्थक और स्थिर बनाता है। इन दोनों सूत्रों में सूक्ष्म सेतु यह है कि क्रोध वहाँ जन्म लेता है जहाँ स्वार्थ, अहं और अधिकार की भावना होती है—और जहाँ वस्तुओं या संबंधों को “अपना” मानने की धुन इतनी प्रबल हो कि व्यक्ति नियंत्रण खो दे। परंतु जब यह समझ आ जाए कि संसार में किसी पर भी पूर्ण अधिकार संभव नहीं, और जीवन में केवल वही स्थायी है जिसे आत्मा अपना बना ले — तब क्रोध के लिए कोई भूमि शेष नहीं रहती। अतः समाधान यही है—स्वभाव को संतुलित करना, संबंधों में अपनापन जोड़ना, और परिणामों को सरलता से स्वीकार करने की कला सीखना। यहीं से मनुष्य की गरिमा और जीवन की शांति आरंभ होती है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

         कहते हैं जिसने क्रोध को जीत लिया, उसने दुनिया जीत ली। आशय और भाव यह कि क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता है।असल में सारे फसाद की जड़ क्रोध होता है।  क्रोध में हम सबसे पहले अपना आपा खो बैठते हैं और इससे हमारे सोचने और समझने की शक्ति तत्समय अवरुद्ध हो जाती है हमारा धैर्य, हमारा विवेक, हमारे निर्णय लेने की सामर्थ्य सब डगमगा जाती हैं, हमारा आवेश इस कदर हम पर हावी हो जाता है कि हमारा ध्यान सिर्फ जिस पर क्रोध कर रहे होते हैं उसका नुकसान पहुंचाने की ओर रहता है, तब हम भूल जाते हैं कि फिर उसके परिणाम क्या होंगे? अनेक ऐसे उदाहरण देखने मिले हैं कि इस क्रोध के आवेश में हुई नुकसानी की भरपाई पीढ़ियों तक झेलना पड़ी हैं। पूरा घर बर्बाद हो गया है।  अत: जीवन में हमें क्रोध से बचने की आदत अवश्य बनानी चाहिए। अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि हम जिस वजह से क्रोधित होते हैं वह वजह मिथ्या होती है, हकीकत कुछ और होती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मनगढ़ंत बातें बनाकर भड़काने का काम भी करते हैं। अत: हमें इन सब बातों और विकल्पों का ध्यान रखते हुए सावधानी और सजग भी रहना चाहिए। दूसरा यह भी कि हमें ऐसे परिचितों  से भी बचकर रहना चाहिए जिन्होंने उनके अपनों के साथ धोका या विश्वासघात किया हो। क्योंकि ये बात गौरतलब है कि जब वह अपनों  का नहीं हुआ तो हमारा कैसे हो सकता है...? सार यह कि जीवन सरल, सहज,सरस भी है परंतु सजग रहना भी आवश्यक है। 

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

      क्रोध में इंसान अपना आपा खो किंकर्तव्य विमूढ़ हो गलतियों पे ग़लतियाँ करता जाता है ! अपने को नुक़सान पहुचाने के साथ आस पास के वातावरण को दूषित कर मानवता भुलाता देता है ! अपनी बात पर विश्वास जता सहानुभूति बटोरता है ! क्रोध  विचारों और कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। संबंधों में खटास क्रोध कारण संबंधों में खटास आ जाती है। क्रोध के कारण स्वास्थ्य समस्याएं ,उच्च रक्तचाप, तनाव ग्रसित होता हैं !  वस्तुतः लोग यह कहने से बाज नही आते दुर्वासा ऋषि की तरह जो अपना नहीं है, वह किसी का नहीं होता है अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार , मुक्ति पाई , आंतरिक अशांति और असंतुष्टि की ओर ले जाता है। सत्य अहिंसा प्रेम नम्र स्वभाव लेकर  क्रोध त्याग कर शान्ति मार्ग अपनाया व्यावहारिक जीवन पथ अपनाया  साहस का नित नव जीवन दिमाग में बर्फ और मुँह में शहद रख पालन कर

जन जन में अपनी पहचान 

बताई ! 

प्रकृति के संग जीवन मुस्कानो 

फ़र्ज़ इंसानियत साथ निभाया !

जो अपना है वही सभी का होता है ! इस बात नकार दिया जो अपना नही वो किसी का नही होता है !

- अनिता शरद झा 

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

     अगर क्रोध‌ की बात‌ करें तो  क्रोध एक  स्वाभाविक भावना है लेकिन इसको‌ नियंत्रण में रखना जरूरी है नहीं तो  यह सभी पहलुओं में नुक्सान पहुंचाता है, इसलिए हमें अपनी भावनाओं को सोच समझ कर समस्याओं का‌ समाधान करना चाहिए नहीं तो क्रोध हर हालत में नुक्सान होता है,इसे कभी भी हावी नहीं होने  देना चाहिए, तो आईये आज ‌की‌ चर्चा इसी ‌‌बिषय पर करते‌ हैं कि क्रोध किसी भी स्थिती  में अच्छा नहीं होता और जो अपना नहीं है वह किसी‌ का नहीं होता,मेरे ख्याल में क्रोध  पहले अपने आपको नुक्सान देता है बाद में दुसरों पर हावी होता  है‌ जिस‌ से‌ व्यक्ति खुद भी‌ परेशान रहता है और दुसरों को भी परेशान करता है,यही नहीं क्रोध से रिश्तों में दरार आती है,विश्वास ‌टूटता है और‌ स्थिति में बिगाड़ आता‌ है,इसलिए ‌क्रोध‌ किसी भी‌ स्तिथि में  अच्छा नहीं होता क्योंकि यह मानसिक,शारीरिक और रिश्तों के लिए हानिकारक है तथा यह भ्रम,तनाव और नकारात्मक उर्जा बढाता है जिससे व्यक्ति ‌की‌ सोचने,समझने की शक्ति कम होती‌ है,कहने का भाव क्रोध स्वंय को खत्म करता ही है लेकिन रिश्तों को खराब करने में भी पूरी ताकत लगा देता है जिससे व्यक्ति का खुद का नुक्सान तो होता है लेकिन वो किसी का भी नहीं रह पाता क्योंकि जो अपना नहीं होता किसी का भी नहीं हो पाता  इससे शांति और सकारात्मकता नष्ट होती है और जीवन में सिर्फ दुख ही दिखता है इसके नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं जैसे तनाव,चिंता और उच्च रक्तचाप हृदय रोग जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं अन्त में यही कहुंगा की क्रोध एक विनाशकारी भावना है जो व्यक्ति को अंदर से खोखला कर देती है तथा‌ समाजिक रूप  से अकेला कर देती है और उसे अपने आप से भी दूर कर देती है कईबार व्यक्ति अपनी जिंदगी से तंग आकर गलत कदम उठा लेता है तभी तो कहा है जो अपना नहीं होता वह किसी का नहीं होता क्योंकि क्रोधी खुद तो  खत्म होता ही है लेकिन उसके पीछे सारा परिवार खमियाजा भुगतने लगता है,इसलिए क्रोध से जितना हो सके दूर रहने का प्रयास करना चाहिए ताकि खुद जिओ और जीने दो  का मूल सिदांत कायम रहे।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू -  जम्मू व कश्मीर 

" मेरी दृष्टि में " क्रोध किसी का भी नहीं होता है। यह अटूट सत्य है। परन्तु यह मानसिक संतुलन खोने का प्रमाण अवश्य होता है। जीवन में बहुत बार ऐसे अवसर आते हैं। जो क्रोध को रोकने में असफल साबित होते हैं। अतः क्रोध की कोई सीमा नहीं होती है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

          (संचालन व संपादन)

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  1. क्रोध किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं होता, इसलिए मानसिक संतुलन के साथ क्रोध पर भी नियंत्रण बनाए रखें।

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