स्वामी विवेकानंद स्मृति सम्मान - 2026

        आलोचना  दो तरह की होती है एक सार्थक व दूसरी निरर्थक। दोनों, समाज में देखने को मिल जाती है। सार्थक आलोचना से जीवन में तथा समाज में सुधार की ओर कदम बढ़ता है। निरर्थक आलोचना से आपसी मेलजोल खत्म हो जाता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
        आलोचना सुधार का अवसर देती है, क्योंकि यह गुणों और दोषों को उजागर करती है, जिससे व्यक्ति या रचनाकार बेहतर बन सकते हैं; लेकिन, निरर्थक या अनुचित आलोचना, जो सिर्फ दोष निकालने या नीचा दिखाने के लिए होती है, वह संबंधों यानि मेल-जोल में कड़वाहट घोलती है और व्यक्ति को ठेस पहुँचाती है, जिससे रिश्ते बिगड़ते हैं। यह रचनात्मक और विनाशकारी आलोचना के बीच का अंतर है। आलोचना रचनात्मक होती है और निरर्थक आलोचना विनाशकारी। आलोचना का लक्ष्य किसी चीज़ को बेहतर बनाना होता है, न कि उसे तोड़ना। यह रचनात्मक प्रतिक्रिया देती है, गलतियों को सुधारने में मदद करती है और प्रदर्शन को उत्कृष्ट बनाती है।

- लीला तिवानी 

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

      आलोचना से सुधार का अवसर मिलता है, नहीं जी। समालोचना हो तो सुधार का अवसर मिलता है। आलोचना में सिर्फ बुराइयों को गिनाया जाता है,जबकि समालोचना में तारीफ होती है, सकारात्मक पक्षों को उभारा जाता है और नकारात्मक पक्ष को इंगित करते हुए सुझावात्मक, सहयोगात्मक चर्चा की जाती है। इससे सुधार का वातावरण बनता है।निरर्थक आलोचना से मेलजोल घटता है, आलोचना करनी या सुन्नी ही नहीं चाहिए। वास्तव में आलोचना करने वाले और सुनने वाले दोनों के लिए ही नुकसान दायी होती है क्योंकि यह नकारात्मकता को बढ़ाती है। सकारात्मकता को कम करती है और जब नकारात्मकता बढ़ती है तो विभिन्न शारीरिक मानसिक विकार उत्पन्न कर देती है। इसलिए आलोचना से हर तरह से बचना चाहिए। हां समालोचना सुनने करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

     आलोचना शब्द का अर्थ , अक्सर लोग कार्य की निंदा व  कमियों से लगाते हैं , जबकि इसका अर्थ निंदा भी है , और प्रशंसा भी ! आलोचना से कमियों , त्रुटियों , का पता चलता है , व इन्हें यदि सकारात्मक ढंग से लिया जाए , तो, किए गए कार्य में, त्रुटियों को समझकर , सुधार लाया जा सकता है !! आलोचना जब केवल किसी को नीचा दिखाने के लिए की जाए , तो ऐसी आलोचना निरर्थक होती है , व रिश्तों को खराब करती है , क्योंकि इसका उद्देश निंदा करना होता है , सुधार नहीं ! ऐसी आलोचना , करनेवालों के साथ  व्यक्ति मेल जोल भी नहीं रखना चाहता , जिसने कार्य सिद्ध करने के लिए , यथासंभव सार्थक प्रयास किए हों ! अतः इस प्रकार मेल जोल भी घटता है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन -हिमाचल प्रदेश

       किसी भी कार्य में हम सफल तभी हो सकते हैं जब हम अपने कार्य में हो रही कमियों और खामियों को समझ सकें। यह कार्य या तो हमारे गुरु बखूबी बना सकते हैं या हमारे आलोचक। इनके द्वारा हमारे कार्य में जो नकारात्मक पहलू हैं,वे उजागर होते हैं। जिनके सुधारने का हमें अवसर मिलता है और वक्त रहते हमें इन्हें दुरुस्त कर लेना चाहिए। गुरु की महिमा और गरिमा अलग होती है, वे हमें जतलाते भी हैं और उन्हें दुरुस्त भी कराते हैं। मगर आलोचक सिर्फ इंगित करते हैं। यह हमारी समझ पर निर्भर है कि हम कितना समझ पाते हैं और किस हद तक उन्हें दुरुस्त कर पाते हैं। असल में आलोचक के भी प्रकार होते हैं। कुछ सही मायने में आलोचक होते हैं, उनकी आलोचना विशुद्ध होती है किंतु कुछ आलोचकों की आलोचना पूर्वाग्रह या अन्य कोई वजह से विशुद्ध नहीं कही जा सकती। कुछ  आलोचक की आलोचना निरर्थक किस्म की होती है। मगर उन्हें मीन-मेख निकालने की आदत है तो वे कुछ न कुछ खामी निकाल ही लेते हैं। अत:  भावातिरेक में न बहकर धैर्य से निष्कर्ष निकालने में ही समझदारी होती है।यहाँ आलोचकों के लिए भी एक सुझाव है,आलोचना तभी करें जब आवश्यक हो या चाही जा रही हो या जो सुझाव को माने भी वरना मौन रहना ही उचित होगा। 

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       आलोचना एक दर्पण की तरह है। जब हम अपने कार्य, विचार या व्यवहार पर आलोचना स्वीकार करते हैं, तो यह हमें सुधार और आत्मनिरीक्षण का अवसर देती है। सकारात्मक आलोचना हमें हमारी कमियों को समझने, दृष्टिकोण को परिष्कृत करने और कौशल को निखारने का मार्ग दिखाती है।वहीं निरर्थक आलोचना, जो तटस्थ या असंवेदनशील होती है, केवल मेल-जोल और सहयोग में बाधा डालती है। यह व्यक्ति के मनोबल को कमजोर कर सकती है, प्रेरणा को घटा सकती है और सामाजिक या कार्यस्थल संबंधों में तनाव उत्पन्न कर सकती है।इसलिए आलोचना को समीक्षा और समाधान के नजरिए से लेना चाहिए, और आलोचक को भी संवेदनशीलता और तथ्यपरक दृष्टि अपनानी चाहिए। सही आलोचना और सकारात्मक संवाद से ही व्यक्तिगत विकास और सामूहिक मेल-जोल सम्भव है।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर -  राजस्थान

      स्वस्थ आलोचना हो तो निश्चित ही सुधार की संभावना बढ़ जाती है। व्यक्ति अपनी गलती पर विचार करता है और गलती को सुधार करके वह अपने उद्देश्य में पुनः संलग्न हो जाता है। लेकिन यदि आलोचना  ईर्ष्या और द्वेष से परिपूर्ण है तो फिर संबंधों में दरार उत्पन्न हो जाती है। आलोचना में विद्वेष की भावना नहीं होनी चाहिए। यदि आलोचना ईमानदारी से की जा रही है तो निश्चित ही वह प्रेरणा दायक होगी। और ऐसी आलोचना पर गौर जरूर करना चाहिए एवं जहाँ चूक हो हुई है, वहाँ सुधार करना बहुत जरूरी है। जब हम गलती सुधार लेंगे तो सफलता अवश्य ही मिलेगी। 

- डॉ अवधेश कुमार चंसौलिया

 ग्वालियर - मध्यप्रदेश 

    आज के दौर का कटु सत्य है कि कोई भी इंसान आलोचना सुनना पसंद नहीं करता। यह मनोविवैज्ञानिक विकार बहुत ही आम हो चुका है। दो साल का बच्चा भी झिड़की उत्तर मुँह फुलाकर या चीजें फेकफांक कर करता है। लेकिन सच ये भी है कि अपनी आलोचना सुनलें तो स्वंय को सुधारने का अवसर मिलता है। अपने गुण-दोषों पर मनन करके स्वयं को सुधारने का मौका मिलता है - - लेकिन उससे बड़ा सच है कि व्यर्थ की आलोचना से दूरियाँ बढती है। लोग आलोचकों के साथ संबंध नहीं रखना चाहते। घटता मेलजोल उनके भीतर मनोविवैज्ञानिक समस्याएं उत्पन्न करतीं हैं। उचित यही है कि व्यर्थ की आलोचना से बचे - - ना स्वयं आलोचना ना करें ना दूसरों की आलोचना करें । कहते हैं कि इंसान एक सामाजिक प्राणी है कभी कभी पीत पत्रकारिता के दौर में सामाजिक स्तर तक आलोचना सुनाई पड़ती है लेकिन सच्चाई पर चलें - - आलोचना समालोचना को सच्चाई से स्वस्थ मन से स्वीकारें और स्वयं को सच्चा सामाजिक प्राणी बनायें। 

- हेमलता मिश्र "मानवी"

नागपुर - महाराष्ट्र

         अगर आलोचना ‌की‌‌ बात करें तो‌आलोचना किसी‌ व्यक्ति वस्तु या‌ कार्य के‌ गुणों ‌व दोषों का‌ विश्लेषण कर सुधार के‌  लिए दी जाने वाली प्रतिक्रिया है जिसका उदेश्य उन्नति की तरफ होता है दुसरी तरफ निरथर्क आलोचना वो होती है जो केवल नीचा दिखाने,अपमानित‌ करने, या‌ बचाव  करने‌‌ के‌ लिए की‌ जाती है और यह अक्सर ईर्ष्या या‌ गलतफहमी  पर आधारित होती है जिससे सकारात्मक बदलाव नहीं आता  उल्टा नकारात्मकता ही जन्म लेती है तो आईये आज का रूख इसी चर्चा पर करते हैं कि आलोचना से सुधार का अवसर मिलता है और निरर्थक आलोचना से मेल जोल घटता है,मेरा तर्क है  आलोचना का उदेश्य सुधार,प्रगति और विकास करना होता है तथा यह रचनात्मक होती है जिसमें ताकत  और कमजोरियों  को उजागर किया जाता है ताकि व्यक्ति के कार्य में सुधार हो सके तथा इसमें व्यावहारिक सुझाव शामिल होते हैं,जिससे किसी भी कर्मचारी की‌ कार्यकरणी में सुधार हो सकता है,जबकि निरर्थक आलोचना में सिर्फ नीचा दिखाना,मनोवल तोड़ना या दुसरों को गलत साबित करना ही उदेश्य होता है इसमें केवल कमियां या बुराइयां बताई जाती हैं या व्यक्तिगत हमले किये जा सकते हैं जिससे व्यक्ति का मनोबल गिरता है, क्योंकि बिना किसी ठोस कारण के किसी के काम में दोष निकालना कीचड़ उछालना और समाधान न बताना इत्यादि से व्यक्ति अपने मनोवल का गिरा देता है और आपसी मेल जोल से दूर होने लगता है, अगर सही तरीके से देखा जाए तो आलोचना एक ऐसा हथियार है जो सुधार के लिए प्रयोग किया जाता है जबकि निरर्थक आलोचना एक हमला है जो केवल चोट पहुंचाने का कार्य करता  है लेकिन वोही व्यक्ति समझदार  होता है जो रचनात्मक आलोचना को स्वीकार कर आगे बढना जानता है और निरर्थक आलोचना को नजरअंदाज करता है, आखिरकार ‌यही‌ कहुंगा कि आलोचना सुधार और उन्नति की तरफ  ले जाती है क्योंकि यह कमियों को उजागर करती है जिन्हें ठीक करने का अवसर मिल जाता है इसलिए आलोचना को सीखने और विकास  के लिए एक सकारात्मक मौके के तौर पर देखना चाहिए,यह हमें हमारी गलतियों से‌‌ सीख देकर सुधार देने के लिए  लाभदायक सिद्ध होती‌ है जिससे हम मजबूत और सफल बनते हैं जबकि नकारात्मक आलोचना संबंधों को कम करती है क्योंकि यह लोगों में अविश्वास पैदा करती है संवाद बंद कर देती है और नकारात्मक माहौल‌ को जन्म देती है जिससे लोग दूर होने लगते हैं और् सहयोग ‌करने‌ से बचते हैं जिससे मेल जोल में कमी आती है।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा 

जम्मू - जम्मू व कश्मीर 

     चाहे कोई कृति हो या मनुष्य या कोई भी पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक , धार्मिक विषय हो ; जब हम उसके गुण- दोष का बिना किसी दबाव के निरूपण करते हैं। विवेचना या मूल्यांकन करते हैं, तो उसमें हमारा लक्ष्य सुधार करना होता है । पर कुछ ना समझ लोग इस आलोचना को बुराई की दृष्टि से आंकने लगते हैं । समझना होगा यह निंदा नहीं है, समीक्षात्मक आलोचना है। इसमें यदि तर्क देकर आलोचना की जाती है तब मूल्यांकन उच्च कोटि का होता है क्योंकि तर्क हमेशा एकांगी ना होकर निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक होता है । निरर्थक आलोचना तो अनुपयोगी प्रभाव हीन, निष्फल होती है ; जहां व्यर्थ का महिमामंडन होता है जो कुछ समय के बाद मूल्यहीन हो जाती है ।कोई भी विचार,व्यक्ति, वस्तु, कृति ,पक्ष या विपक्ष सही आलोचना से सुधारात्मक  स्थिति से गुजरता उत्तरोत्तर कालजयी हो जाता है ।

 - डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

      "निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, 

       बिन पानी, साबुन बिना,निर्मल करे सुभाय।"

प्रसिद्ध क्रान्तिकारी समाज सुधारक एवं संत कवि महात्मा कबीर जी द्वारा कही गई यह पंक्तियाँ आलोचना करने वाले व्यक्ति को किसी के जीवन में सुधार लाने का अवसर अवश्य प्रदान करती हैं बशर्ते वह आलोचना सार्थक हो अन्यथा बिना किसी आधार या अर्थहीन आलोचना द्वैष, ईर्ष्या का कारण बनती है। आपसी सौहार्द को खत्म कर देती है। प्रेम भाव को नष्ट करके वैर भाव को जन्म देती है। मन का साफ व्यक्ति हमारी बुराईयों की ओर इंगित करके उनमें सुधार का मौका देता है। जिसके हृदय में खोट होता है वह यह कभी नहीं चाहता कि किसी के जीवन में सुधार हो। निश्छल भाव से की गई आलोचना वास्तव में सुधारात्मक प्रवृत्ति ही मानी जाती है और छल कपट की भावना से की गई आलोचना यदि आधारहीन है तो आपसी मेलजोल व विचारों की एकरूपता में कमी आती है। विरोधाभास होता है। 

- शीला सिंह 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश

     आलोचना एक दर्पण की तरह है अगर कोई हमारी गलतियाँ हमसे बताता है तो वो हमें सुधारने में मदद करता है।बिना वजह, बिना उद्देश्य, सिर्फ बुराई करने के लिए जो हमारी आलोचना सबके सामने करते है वो सुधार नहीं लाते… बल्कि:- मन में घृणा पैदा करते है जिससे आत्मविश्वास टूटता है। जिस कारण हमारा उनसे बात करने का मन नहीं करता, धीरे धीरे मेलजोल कम हो जाता है, आलोचना से सुधार तब होता है , जब वो सही  हो, उद्देश्यपूर्ण हो और सम्मान से की गई हो।* '"आलोचना एक औजार की तरह है — ठीक से इस्तेमाल करो तो सुधार लाती है, गलत इस्तेमाल करो तो  मनमुटाव" जिससे रिश्ते टूट जाते हैं। जो बार-बार आलोचना करते हैं, वो अक्सर खुद के अंदर की कमी छुपाते हैं। ऐसे लोगों से दूरी बनाना ही बुद्धिमानी है।

 - रंजना हरित 

बिजनौर - उत्तर प्रदेश 

        आलोचना यदि सद्भावना और सुधार की भावना से की जाए, तो वह आईने की तरह होती है जो हमारी कमियाँ दिखाकर हमें बेहतर बनने का अवसर देती है। ऐसी आलोचना व्यक्ति को सोचने, सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। लेकिन निर्थक या कटु आलोचना, जिसमें न समाधान हो न संवेदना, केवल अहंकार को ठेस पहुँचाती है। इससे रिश्तों में दूरी आती है, विश्वास टूटता है और मेलजोल कम होने लगता है। ऐसी आलोचना व्यक्ति को सुधारने के बजाय उसे रक्षात्मक या नकारात्मक बना देती है।इसलिए आलोचना का मूल्य उसके उद्देश्य और तरीके में है। यदि उद्देश्य सुधार है, तो आलोचना वरदान है और यदि उद्देश्य केवल दोष निकालना है, तो वही आलोचना संबंधों के लिए अभिशाप बन जाती है।

- सुनीता गुप्ता

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

       आलोचना भी लेखनी सुधारने का गुरु मंत्र,यंत्र है लेखन तंत्र जिसमें लेखनी के विविध रूपों भाव को शब्दों के माध्यम से पिरोए जाने का प्रयास अवसर मिलता है ! जो रचनाकार की पहचान लेखनी से करता है ! सुधार तंत्र आलोचना की धार पैनी कर कलम चलाई जाती हैं जिसमे चाटुकारिता नही सच्चाई है अवलोकन होना चाहिये !तभी लेखनी कोट बौद्धिक स्तर पर सराहा जाता है ! अनेकों स्थानों पर अवसर दिए जाते है! उसकी रचनाकारों के बीच रचना से होती है ! रचना अनेकों विधाओं में कला संस्कृति कर्म योग्यता निपुणता के माध्यम से सराहा जाता है !  निरर्थक आलोचना से मेल जोल तो घटता है ! इंसान स्वार्थ के वशीभूत निरर्थक मेल जोल नही चाहता! इंसानों के बीच भरोसा ईमानदारी सेवा मेल जोल की भावना स्वभाव देख सुनकर निरर्थक मेलजोल से बचता है!पर इसका ये मतलब नही की आप अपनी ईमानदारी खुद्दारी से समझौता करे! 

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

    निष्पक्ष होकर किसी मनुष्य के चरित्र को बताना, निश्चय ही समझदार प्राणी के लिए पारस पत्थर है।वह और गहराई से स्वयं को तराशने लगता है व परिवर्तन लाने का प्रयास करने लगता है, किंतु इसके विपरीत यदि कोई मनुष्य किसी व्यक्ति की निरर्थक आलोचना करने लगता है, व्यर्थ की टीका-टिप्पणी करने लगता है तो वह व्यक्ति फिर उससे दूरियां बनाने लगता है, मेल-जोल घटाने लगता है और साथ में उस मनुष्य को दंभी भी समझने लगता है।

- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

वाराणसी - उत्तर प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " आलोचना का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है। कई बार आलोचना की आड़ में दुश्मनी तक निकाली जाती है। यही आलोचना का निम्न स्तर कहा जाता है। फिर भी इंसान की आलोचना अवश्य मानी जाती है। जो‌ संसार की दिशा तय करने में सहायक होती है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)

Comments

  1. बिल्कुल सही कहा आपने
    निष्पक्ष आलोचना जिसे नीर-क्षीर समीक्षा कह सकते हैं, हर क्षेत्र में विकास और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक है किन्तु बेवजह
    कमियाँ निकालना विद्वत्ता का अभाव दर्शाता है और हतोत्साहित तो करती ही है जिससे बेहतरी का मार्ग अवरुद्ध होता है।
    मेरा निजी मन्तव्य
    🙏🙏
    डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘
    अमेरिका
    (WhatsApp से साभार)

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