बात तो सही है लेकिन ऐसा क्यों इस पर विचार करते हुए यह बात सामने आती हैं कि हम अपनों से ऐसी अनेक उम्मीद लगा लेते हैं जो पूरी न होने पर हमें दुख का अहसास कराती हैं।जबकि दूसरों से हम कोई उम्मीद नहीं करते जैसा है सब ठीक, इसलिए उनके किसी भी व्यवहार का दुख नहीं होता बल्कि सुखद अहसास होता है। यह दुख न मिले, इसके लिए सबसे अच्छा उपाय,न किसी से करें उम्मीद,न दे किसी को बिना मांगे राय। वैसे सुख दुख हमारी मनोदशा पर भी निर्भर करता है।सकारात्मक रहना बहुत जरूरी है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
“सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है, पर दुख तो अपनों से ही मिलता है” — यह वाक्य मानवीय संबंधों का गहरा व्यावहारिक सत्य है। सुख का स्वभाव बाह्य है; वह उपहार, प्रशंसा, सुविधा, अवसर या क्षणिक प्रसन्नता के रूप में कहीं से भी प्राप्त हो सकता है। परंतु दुख का स्वभाव अंतरंग है; वह वहीं से उपजता है जहाँ अपेक्षा, भरोसा और प्रेम मौजूद होता है। अपने ही व्यक्ति हमें तब पीड़ा देते हैं जब उन्होंने हमारे हृदय में कोई स्थान पाया हो। इसी कारण अप्रिय शब्द, उपेक्षा, विश्वासघात या असहमति तब चोट करती है जब वह किसी अपने द्वारा हो। सामाजिक मनोविज्ञान में इसे घनिष्ठ संबंधों की संवेदनशीलता कहा गया है—जहाँ प्रेम जितना गहरा होता है, पीड़ा भी उतनी ही गहरी होती है। यही कारण है कि अनजान व्यक्ति का तिरस्कार हृदय पर नहीं टिकता, पर अपने का तिरस्कार आत्मा तक उतर जाता है। इसीलिए दुख का स्रोत बाहरी नहीं, संबंधों के भीतर स्थित भावनात्मक निवेश होता है। संबंधों की यही द्वैधता जीवन को पूर्ण बनाती है—क्योंकि जो हमें सबसे अधिक सुख दे सकता है, वही हमारी संवेदनाओं को सबसे अधिक पीड़ा भी पहुँचा सकता है। यह अनुभव मनुष्य को संबंधों की गंभीरता का बोध कराता है और प्रेम में धैर्य, संवाद तथा क्षमा के महत्व को उजागर करता है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
जब हम अपने लक्ष्य की ओर अग्रसारित होते जाते है, सुख का वह क्षण होता है, जिससे हम आत्मीय आनन्द की अनुभूति महसूस करते जाते है। सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है, पर दु:ख तो अपनों से ही मिलता है। यह सच है, जब हमें अपने अपनत्व से पीढ़ाऐं होने लगती है, हम दूसरों के पास अपने जीवन में जो घटित हो रहा है, सहज रूप में बता देते है, इससे मन हल्का जरुर होता है, लेकिन हम सोच नहीं पाते, वह हमारे मन स्थिति पुर्णत: सब समझ जाता, एक दिन ऐसा आता है और वही से प्रारंभ होता है,अपनों से दुख का सिलसिला.......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है, पर दुख तो अपनों से ही मिलता है.... इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनों से मिला दुख भावना से जुड़ा होता है एवं दिल की गहराई तक होता है... जब व्यक्ति अपनों के लिए अपना सब लूटा देता है और सामने वाला व्यक्ति जो अपना है, दो लफ्जों में कहता है आपने किया ही क्या है? यह दो लफ्ज़ उसकी आत्मा को झिंझोड़ उसे ऐसा घाव दे जाता है जो कभी नहीं भरता, जबकि सुख किसी से भी, कभी भी प्राप्त कर लेते हैं। अच्छे काम से, मेहनत से किंतु वह खुशी अस्थाई होती है वह इसलिए हम अपनी मेहनत से उन्नति के शिखर चूमते रहते हैं और नई नई खुशीयां मिलती रहती है। जबकि अपनों के द्वारा मिला दुख हम कभी नहीं भूला सकते चूंकि यह हमारी भावना से जुड़ा रहता है जिसकी जड़ें काफी गहरी और आत्मा से जुड़ी होती है...।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
आज के जीवन की कटु सच्चाई वर्णित करता है आज का विषय !! सुख की प्राप्ति किसी से भी मिल सकती है .….. जैसे जान पहचान के लोग , सहयोगी कार्यस्थल के अथवा अर्जित किए हुए संबंधों से !! पर ये बात शत प्रतिशत सही है कि दुख केवल अपनों से ही मिलता है !! अपनों को कभी आपकी तरक्की रास नहीं आती , सदा ईर्ष्या से परिपूर्ण रहते हैं तथाकथित अपने !! जहां संभव हो , ताने मारते हैं , लोगों के जीवन में कमियां ढूंढकर , उनका प्रचार करते हैं , व कोई मौका नहीं छोड़ते दुखी करने का ! आपके सुख में सुखी , बेगाने तो हो सकते हैं , पर अपने कभी नहीं !! अपने तो सदा दुख का कारण बनते हैं !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
अक्सर नकारात्मकता से ही ऐसी सोच निकलती है कि
सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है
पर दुःख तो अपनों से ही मिलता है
वास्तव में सुख या दुःख अपनों या दूसरों से नहीं मिलता, अपने व्यवहार से ही मिलता है. अपना व्यवहार अच्छा और विवेकपूर्ण हो तो सुख किसी से भी मिल सकता है. कहा गया है कि-सबसे बड़ा दुख मूर्खता है और सबसे बड़ा सुख विवेक है.अब मूर्खता होगी तो व्यवहार भी तर्कसंगत नहीं हो सकता फिर सुख न अपनों से मिल सकता है न दूसरों से. वास्तव में अपने तो फिर भी किसी हद तक मूर्खता या गल्तियों को सह लेते हैं, लेकिन दूसरों से यह उम्मीद कम ही होती है. वास्तव में हम दूसरों से व्यवहार में नम्रता और सावधानी से काम लेते हैं. यही नम्रता और सावधानी अगर हम व्यवहार में बरतें तो अपनों से सुख-ही-सुख मिल सकता है. सुख या दुःख हमारे व्यवहार से मिलता है, अपनों या दूसरों से नहीं.
अपना व्यवहार उचित और तर्कसंगत रखिए,
अपनों से भी सुख पाइए, दूसरों से भी!
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
सुख दुख कहीं से भी मिल सकता है, पर जब दुख मिलता है तो हम ज्यादा लोड में आ जाते हैं और जब दुख अपनों से मिलता है तो ज्यादा पीड़ा दायक हो जाता है इसलिए हमें यह लगता है की दुख अपनों से ही मिलता है। सुख दुख जीवन में उतार-चढ़ाव की तरह आते रहते हैं इसलिए सुख में ज्यादा आनंदित नहीं होना चाहिए और दुखआने पर धैर्य रखकर समता भाव से दुख का समय गुजारना चाहिए।
- रविंद्र जैन रूपम
धार - मध्य प्रदेश
निश्चित रूप से सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है। उनसे हमारी अपेक्षाएं नहीं रहतीं। जिससे जितना मिल गया वही पर्याप्त है। लेकिन अपनों के लिए हम सब कुछ कुर्बान करते हैं, पूर्ण दायित्व के साथ। इसीलिए कुछ अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से मन में कहीं चाहत के रूप में रहती हैं। उस स्थिति में हम कह सकते हैं कि दुख तो अपनों से ही मिलता है। जैसे कि वृद्ध माता- पिता अपेक्षा करें या न करें, मगर संतान का दायित्व होता है उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का, सार संभाल करने का। अगर वे अपना कर्तव्य नहीं निभाते तो कोई कुछ कहे या न कहे पर वेदना तो अपनों से ही मिलती है।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश
अगर सुख और दुख की बात करें तो सुख प्रसन्नता,शांति और संतुष्टि की भावना है और दुख असंतोष, बेचैनी या कष्ट की स्थिति है ये दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं जो जीवन के साथ साथ चलते हैं जबकि सुख और दुख का अनुभव हमारे मन,कर्म दृष्टिकोण और इच्छाओं से मिलता है तो आईये आज की चर्चा सुख, दुख को लेकर इस बात पर आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि सुख तो दुसरों से भी मिल सकता है पर दुख तो अपनों से ही मिलता है, मेरा मानना है कि सुख दुसरों से उस समय अनुभव होता है जब हम दुसरों की मदद करते हैं,प्रेम और दया बांटते हैं जिससे आंतरिक शांति और खुशी मिलती है तथा अच्छे रिश्ते बनते हैं इसके अतिरिक्त अपनों से दुख मिलना जीवन का एक कठिन अनुभव है जो अक्सर उम्मीदों के टूटने तथा अत्याधिक लगाव के कारण होता है ऐसे में हमें भावनाओं को समझना और स्वीकारणा आना चाहिए भले ही यह बहुत कष्टदायक हों देखा जाए दुख अक्सर मन की परिस्थितियों से पैदा होता है ऐसे में हम अगर संयम और आत्मबल बनाये रखें तो दुख कम हो सकता है, यह सत्य है कि अपनों से मिला दुख बहुत गहरा होता है लेकिन इसे जीवन का हिस्सा मानकर और अपनी भावनाओं को समझ कर दूर किया जा सकता है अन्त में यही कहुंगा कि दुसरों से सुख मिलने के कारण,परोपकार और सेवा भाव,समाजिक जुड़ाव, संतोष की भावना और आंतरिक शांति हो सकती है और अपनों से दुख के कारण अपेक्षाएं, अंहकार, अधूरी इच्छाएं ,अतीत के अनुभव इत्यादि हो सकते हैं मगर हमें सुख और दुख में संतुलन बना कर चलना चाहिए ताकि जिंदगी अच्छे ढंग से गुजर सके तथा अपने मन से अपना ,पराया,गैर इत्यादि को दूर रखने का प्रयास करना चाहिए और मन में यही विचार रखने चाहिए कि हम सब ईश्वर कीऔलाद हैं और भलाई करने के लिए पैदा हुए हैं फिर हमें कोई अपना या पराया नहीं दिखेगा हमें अपना मन साफ रख कर अच्छे कर्म करने चाहिए तभी तो कहा है,
बुरा जो देखन में चला बुरा न मिला न कोये,जो खोजा मन अपना,मुझ से बुरा न कोये, ऐसे भाव रखने से सुख का ही अनुभव होगा।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
एक पुराना गीत है - - "सुख के सब साथी दुःख में न कोय " बिलकुल सच हैं ये बोल। दुःख में अपने भी अपने नहीं होते बल्कि दुख का बड़ा कारण भी अपने ही होते हैं। सतयुग त्रेतायुग द्वापर कलियुग से लेकर आज "कलयुग" में मानव मात्र मशीन जैसे हो गये हैं। भावनायें मर चुकी हैं। स्वार्थ ही एकमात्र भाव स्वभाव बन गया है। ऐसी स्थिति में दुख अपनों से ही अधिक मिलते हैं।। परायों से सुख मिलता है यह भावना सच्चाई से अधिक मृगतृष्णा सिद्ध होती है। आज के "कलयुग" में भावनाओं का कोई मोल नहीं होता। "सपने हैं सपने कब हुयेअपने" इस पंक्ति की तरह दुनिया और अपने पराये सबके सुख सिर्फ सपना बन कर रह गये हैं। सगे रिश्तों मे भी अपनापन ढूँढने से भी नहीं मिलता। आर्थिक स्थिति ही बस स्नेहप्रेम की एकमात्र तुला रह गई है। "समरथ को नहिं दोष गुसाईं" इस तरह अपने समर्थ हैं तो उन्हें आपको दुखी और अपमानित करने का लाइसेंस मिल जाता है। अर्धसत्य हो सकता है कि सुख दूसरों से मिल सकता है लेकिन पूर्ण सत्य यही कि आज के दौर सुख-दुख ढूंढ़ना बेमानी है। "जाहि बिधि राखे राम ताहि बिधि रहिये" इसी भावना को लेकर चलें और जीवन का अभिनंदन करें।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
मानव जीवन सुख और दुःख के दो छोरों पर चलने वाली सतत यात्रा है। सुख क्षणिक भी हो सकता है और चिरस्थायी भी, परन्तु दुःख का प्रभाव अक्सर अधिक गहरा, स्थायी और रूपान्तरणकारी होता है। विशेषकर वह दुःख जो अपने ही लोगों से मिलता है, वह व्यक्ति के मन, विचार और जीवन-दृष्टि पर स्थायी छाप छोड़ता है। इस संदर्भ में यह कथन केवल भावुकता नहीं, बल्कि सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक सत्य है कि सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है, पर दुःख तो अपनों से ही मिलता है। वर्णननीय है कि सुख किसी भी व्यक्ति को अपने मित्रों, सहकर्मियों, परिचितों, अवसरों और उपलब्धियों से भी मिल सकता है। यह सुख बाहरी हो सकता है जैसे किसी की प्रशंसा, सम्मान, आर्थिक लाभ या सुविधाएँ हो सकती हैं। बाहरी सुख का महत्व है, परन्तु उसका प्रभाव अक्सर क्षणभंगुर होता है। वहीं इसके विपरीत, दुःख का प्रभाव व्यक्ति की आत्मा को छू जाता है। अपनों से मिलने वाला दुःख इसलिए अधिक पीड़ादायक होता है क्योंकि उनसे अपेक्षाएँ, विश्वास, आत्मीयता होती हैं, उनके व्यवहार में दावा और अपनापन होता है। इसी कारण जब वही सम्बन्ध चोट पहुँचाते हैं, तो यह चोट बाहर नहीं, भीतर लगती है। इससे मनोवैज्ञानिक कष्ट भी अत्यधिक होता है जो व्यक्तित्व का भी निर्माण करता है। अतः कहा जा सकता है कि सुख जीवन की सजावट है, पर दुःख जीवन की शिक्षा है। सुख हमें मुस्कुराना सिखाता है, पर दुःख हमें सशक्त होना सिखाता है। सुख हमें सन्तोष देता है, पर दुःख हमें संस्कार देता है। अन्ततः अपनों से मिला दुःख यदि हृदय को तोड़ता है, तो वही दुःख आत्मा को जोड़ भी देता है। जीवनकाल में इस सत्य को स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू एवं कश्मीर
दूसरों से मिलने वाला प्यार और सहयोग हमें सुख और संतुष्टि देता है। जिनसे हमारा खून का रिश्ता नहीं, जिनसे जमीन जायदाद का बंटवारा नहीं होता, इस प्रकार के लोग निस्वार्थ भाव से हमारे किसी काम आते हैं तो अति सुखद अनुभूति होती है। इसके अलावा यह कटु सत्य है दुःख अपनों से ही मिलता है क्योंकि अपनों से हमारी आशाऐं, अपेक्षाऐं जुड़ी होती है। इच्छाऐं दुःख की जननी है उदाहरण के लिए माता पिता अपनी संतानों को पालते हैं उनकी बहुत अच्छे से देखभाल करते है उनके भविष्य को लेकर सदैव चिंतित रहते हैं उनकी हर फरमाईश को खुशी-खुशी पूरा करते हैं, माता पिता अपने लिए कम, अपनी संतानों के लिए ज्यादा सोचते हैं। ताकि बुढ़ापे में उनकी देख भाल करे उनका ध्यान रखे। लेकिन जब परिणाम इसके विपरीत होते हैं तो वो बुरी तरह से टूट जाते हैं बहुत पीड़ा दायक होता है। परिवार में भी भाई, भाई की तरक्की से जलता है। अपने घनिष्ठ सम्बन्धी एक दूसरे को नीचा दिखाकर खुश होते हैं।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
सुख-दुख जीवन के दो हिस्से हैं। जो अतिथि की तरह होते हैं यानी ज्यादा दिन तक नहीं टिकते और कब आ जाएं कह नहीं सकते। सुक्ष्मता से देखा जावे तो इनके आने-जाने का कारण भी अनायास ही होता है। एक बात और है सुख हो या दुख दोनों के कारक भी अनेक होता है। कौनसा कारक कब सुख सुख दे जाता है कब दुख , कहा नहीं जा सकता। दोनों ही दिल से जुड़े होते हैं। इसलिए सीधे दिल पर ही असर करते हैं। सुख में गदगद और दुख में गमगीन दोनों ही भावातिरेक से लबरेज होते हैं और आँखों से बयाँ होते हैं। इसलिए कहा गया है न सुख में इतराना चाहिए और न दुख में घबराना चाहिए। बहरहाल यह कहना उचित न होगा कि सुख तो दूसरों से भी मिल सकता है पर दुख तो अपनों से ही मिलता है। मेरे अनुसार दोनों में ही अपने-पराये की भूमिका हो सकती है। ये बात जरूर है कि अपनों से मिलने वाला सुख हो या दुख,दोनों ही अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावी होते हैं। वह इसलिए भी कि उसमें रिश्ता भी निहित होता है। अपनत्व का विशेष भाव समाहित होता है। आध्यात्म की दृष्टि से देखा जावे तो इनका मिलना भी, कर्म के आधार पर चयनित भाग्य के प्रतिफल का हिस्सा होता है। अत: सार तो यही कि जीवन में सदैव सद्कर्म करने में प्रमुखता से ध्यान रखना चाहिए ताकि भाग्य के प्रतिफल में सुख की सहभागिता ज्यादा हो।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
Comments
Post a Comment