लाला लाजपत राय स्मृति सम्मान - 2026

       जो व्यक्ति दिल से समंदर होते हैं वह राजा की तरह जीवन जीते हैं। ऐसा जीवन हर कोई ज़ीना चाहता है। ये सब कर्म का खेल है। कर्म अच्छे होने चाहिए। जीवन अपने आप दौड़ता है। जीवन में संघर्ष की कहानी हिम्मत वाला ही लिखता है। जो संघर्ष में सहज़ रहता है। वहीं सफलता के रास्ते पर चलता है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :-
       अगर गहराई से सोच विचार करें  तो इंसान में इंसानियत जिंदा रहनी चाहिए ताकि एक नेक,शांत और प्रेमपूर्ण जीवन गुजारा जा सके और इंसान के मन में दुसरों के प्रति निस्वार्थ प्रेम और विशालता के साथ साथ आंतरिक शांति और पवित्रता बनी रहनी चाहिए तो आईये आज  की चर्चा को इसी बात के  साथ आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि दिल से समंदर होना चाहिए मन से तो मंदिर होना चाहिए, मेरे ख्याल में हृदय में विशालता , क्षमा और गहराई का होना जरूरी है इसके साथ अगर मन को पावित्र और शांत रखा जाए तो सोने पे सुहागे का काम होगा जिससे दुसरों के प्रति उदारता, दयालुता और विशालता  दिखने लगेगी और इंसान के दिल में समंदर जैसी गहराई दिखने लगेगी मानो की उसने सबकुछ अपने अंदर समा लिया हो चाहे दुसरों की गलती हो,दुसरों का गुस्सा या बड़ा, छोटा‌ कहने की  बात हो जब क्षमा दान मनुष्य में आ जाए तो मानो उस मनुष्य का हृदय समंदर सा विशाल है और मन मंदिर सा पावित्र है और शांत है ऐसे मनुष्य में  सकारात्मकता के लिए कोई जगह नहीं होती और ऐसा इंसान हमेशा संतुलन जीवन जीता है, अगर इंसान का दिल समंदर सा विशाल होगा तो उसके दिल में दुसरों के प्रति उदार,दयालुता  और अच्छाई  जैसी नींव होगी जो सब कुछ समा लेने  से अपने आपको एक महान समंदर की तरह  शांत और उदारता वाला ‌समझेगा जिस‌से   आपसी भाईचारे में  विकास होगा और इंसान ,इंसान ‌की कद्र करता हुआ नजर आऐगा ,आपसी‌ प्रेम का विकास होने से सारे संसार में इंसानियत ‌का अपना ही  मोल होगा जो  गिरावट की‌ तरफ लुटक रहा है, देखा जाए दिल से समंदर और मन से मंदिर इंसान असीम सहनशक्ति, गहरा प्रेम,पावित्र व शांत विचारों का धनी होता है ऐसे व्यक्ति विशाल हृदय  के साथ मानसिक रूप से स्थिर होते हैं जो पावित्रता और शांति को महत्व देते हैं जैसे समंदर में असीम गहराई होती है वैसे ही इनका दिल बड़ा होता है और भावनाओं से भरा होता है यही नहीं मंदिर में जैसे ईश्वर की मूरत होती है वैसे ही इनके मन में प्रेम और सच्चाई का  वास होता है जो इन्हें निस्वार्थ बनाता है, अन्त में यही कहुंगा कि मनुष्य का ऐसा‌‌ व्यक्तित्व जो बाहर से शांत और अंदर से गहरे विचारों से धनी हो जिससे‌ सभी को सम्मान,प्रेम,इज्जत का एहसास हो  वोही महान व्यक्ति कहलाता है तभी तो कहा है दिल से समंदर मन से मंदिर होना चाहिए ताकि हम सब में इंसानियत दिखे और हम इंसान कहलाने के हकदार बनें।

 - डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर 

         सोच को विस्तार दें विशालकाय हृदय में स्थान समुद्र की लहरों कीं तरह नकारात्मकता को हमेशा दिल से दूर रखना चाहिए ।जब हम दूसरों के लिए भी अच्छी सोच लेकर आते हैं ।दिल सबसे बड़ा गवाह होता है ।जिस तरह पवित्र मन लेकर मंदिर जाते हैं तो दुवाओं से भंडार भर लेते हैं ।हम अपने साथ सबों के लिए । दुआ करते हैं ।मन को पवित्रता से भर लें । हरि नाम का जप कर सारे कल्मष को दूर कर देता है ।संस्कार से ही संस्कृति का रूप बदलता है ।

- सुधा पाण्डेय

 पटना - बिहार 

     हम न चाहते हुए भी अनावश्यक रूप से क्रोधित हो ही जाते है। हमारे शब्दांश से सामने वाले पर क्या बीता हम सोचते नहीं है, इसका दुष्प्रभाव भी हो ही जाता है। दिल से समंदर होना चाहिए, मन से मन्दिर होना चाहिए। यह सत्यता कि है, झलक दिखाई देती है। हमें कोशिश यही करनी चाहिए कि अगले व्यक्ति को हमारे शब्दांशों का बुरा नहीं लगना चाहिए, यही बुद्धिमान की पहचान है। 

-आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

       बालाघाट - मध्यप्रदेश

       दिल से समंदर होना चाहिए .... एकदम सत्यवचन ! दिल इतना बड़ा होना चाहिए कि जरूरतमंद की सहायता कर सके , सहयोग कार्य जहां वांछित हो , सामर्थ्य के अनुसार ! इस मानव जीवन मे किसी के काम आ सकें , तो जीवन सफल हो सकता है !! ये एक आदर्श स्थिति है और वास्तव मैं बिरला ही मिलता है आजकल की स्वार्थी दुनियां में!! मन से मंदिर होना चाहिए , अर्थात भावनाएं पवित्र होनी चाहिए , छल कपट , पाप इत्यादि से दूर !! ये भी एक आदर्शवादी स्थिति है !! आजकल अधिकांश लोगों के मन में, धोखा , फरेब , षडयंत्र आदि का वास होता है , व अधिकांश लोग दूसरों की राह मैं कांटे ही बिछाते हैं , अपवादों को छोड़कर !! दिल यदि समंदर की तरह बड़ा हो , व मन मंदिर की तरह पवित्र हो तो जीवन सफल हो जाए !! 

- नंदिता बाली

सोलन - हिमाचल प्रदेश

         दिल से समंदर होना चाहिए,यह एक अच्छी बात है. संकुचित दिल वाले व्यक्ति हमेशा परेशान रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते रहते हैं. जिस तरह से समुद्र से एक लीटर पानी लेने से समुद्र का पानी घट नहीं जाता है उसी तरह जिनका दिल समुद्र जैसा होता है उन्हें दरिया दिल कहा जाता है. जिनका दिल समुद्र जैसा होता है उनसे कुछ भी मांग लो दिल खोलकर कर देते है. कुछ कह तो तो वह किसी बात का बुरा नहीं मानते हैं. जिनका दिल बड़ा होता है वह हमेशा सुखी होते हैं. किसी चीज़ का गम नहीं होता है.  इसलिए मनुष्य को अपना दिल समन्दर जैसा रखना चाहिए. मन तो अवश्य मंदिर होना चाहिए. अपने प्रिय को अपने मन मंदिर में ही लोग बसाते है. मनुष्य का मन ही सब कुछ होता है. इसलिए तो कहा जाता है मन ही देवता मन ही ईश्वर मन से बड़ा न कोई. भगवान या अपने प्रिय को याद करने का सुंदर तरीका है आपने मन मंदिर में उन्हें बसा कर रखें. 

- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "

कलकत्ता - पं. बंगाल 

     दिल से समन्दर होना चाहिए का अर्थ है कि दिल में विशालता हो: क्षमा, करुणा, धैर्य और प्रेम की अथाह गहराई। जैसे समन्दर सब कुछ अपने भीतर समा लेता है, वैसे ही इंसान का दिल भी लोगों की गलतियों, दर्द और अलग-अलग भावनाओं को स्वीकार करने वाला होना चाहिए। और मन से मन्दिर होना चाहिए यह बात भीतर की पवित्रता की ओर इशारा करती है। मन अगर शांत, सच्चा और सकारात्मक हो, तो वही असली पूजा है। बाहर के मंदिर तो मार्ग दिखाते हैं, लेकिन भीतर का मंदिर हमें इंसान बनाता है। कुल मिलाकर, यह पंक्तियाँ सिखाती हैं कि दिल में विशालता हो और मन में पवित्रता। यही संतुलन इंसान को सच में श्रेष्ठ बनाता है। 

- सुनीता गुप्ता 

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

       यहाँ कोई भी अमर होकर नहीं आया है  जो जन्मा है उसका समाप्त होना भी निश्चित है।  बचपन नादानी में और बुढ़ापा जर्जर देह लिए गुजर जाता है अत: कुलमिलाकर बहुत छोटी सी जिंदगी हमारे पास होती है, इसलिए इस छोटी जिंदगानी में लड़ने-झगड़ने में बिताना निरर्थक ही है। समझदारी इसी में है कि हम मिलजुलकर, सौहार्द्र वातावरण में अपना जीवनयापन करें और इसके लिए हम अपना दिल त्याग और उदार रखें यानी समंदर की तरह और अपना मन पवित्र यानी निश्चल और निश्छल अर्थात मंदिर की तरह तो बात बने। ऐसे में जीवन सुखद और सार्थक होगा,मान-सम्मान मिलेगा। खुद भी खुश भी रहेंगे, औरों को खुश भी रखेंगे। वर्ना छोटी सी जिंदगी तू...तू, मैं...मैं में करके बिता दी तो क्या मिला? सिर्फ संघर्ष,तनाव और मनमुटाव के पूरा जीवन बिता देने का कोई औचित्य नहीं। न सुख से रहे, न रहने दिया। अत: सार यही कि जीवन मूल्यवान तभी है जब लोगों से हमें सम्मान मिले, स्नेह मिले। यह न हो कि लोग आपको देखकर मुँह फेर लें।

 - नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

     दिल से समंदर होना चाहिए. समंदर विशाल होता है, असीम, नेक होता है. वह स्वयं में अच्छा-बुरा सब समा कर संशोधित कर देता है. हमारा दिल भी समंदर-सा नेक होना चाहिए. किसी की अच्छाई को सराहना दिल के समंदर होने की निशानी है. हमारे सहित बुराइयां सबमें हो सकती हैं, बुराइयां देखनी हों तो खुद की पहले देख कर संशोधित करनी चाहिएं. औरों की बुराइयों को हम विनम्रतापूर्वक संशोधित कर सकें तो अच्छा है, अन्यथा चुप रहना ही भला है. हम किसी और को सुधार नहीं सकते, खुद में ही सुधार करना या किसी की बुराइयों को स्वीकार करना बेहतर है. इसी तरह मन और मन के विचार ही साफ न हों तो मंदिर जाना सिर्फ एक दिखावा है. मानव जीवन का सबसे पवित्र और शक्तिशाली मंदिर बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित है. मन ही वह स्थान है जहाँ विचार जन्म लेते हैं, संस्कार बनते हैं और कर्मों की फसल उपजती है. संस्कार अच्छे होंगे तो विचार अच्छे होंगे. विचार अच्छे होंगे तो कर्म अच्छे होंगे. कर्म अच्छे होंगे तो मन ही मंदिर हो जाएगा. 

- लीला तिवानी 

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

       दिल से समंदर होना चाहिए मन से तो मंदिर होना चाहिए। वाह क्या सुंदर बात कही है दिल से समंदर ही होना चाहिए जिस तरह समंदर की गहराई में अनेकानेक रत्न होते हैं,उसी तरह हमारे दिल में मानवीय गुण रुपी रत्न भरे रहने चाहिए।दिल हमेशा मानवीयता से भरा रहना चाहिए।दिल दरिया होना चाहिए जिसमें हमेशा निर्मल जल की तरह निर्मल भावनाएं प्रवाहित होती रहनी चाहिए।अब रही मन की बात तो वह हमेशा मंदिर की तरह पावन रहना चाहिए और उसमें परमेश्वर की छवि हमेशा रहनी चाहिए।मन की पावनता जीवन में एक अलौकिक सौंदर्य सम्पन्न व्यक्तित्व का निर्माण करती है।पावन मन मंदिर की चमक सहज ही आकर्षित कर लेती है।मेरी एक कविता का अंश है -

दिल समंदर की तरह रहे सदा मनमीत।

मन के मंदिर में बसे ईश छवि संगीत।।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश 

        इस दिल को इतना विशाल रखना चाहिए कि यह दिल हर परिस्थिति सहने में सक्षम रह सके।हर किसी को क्षमा कर सके और हर किसी को प्रेम कर सके। क्योंकि यह धरती मात्र एक रंगमंच है ,सभी अपने  किरदार निभा रहे हैं।इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है,सब कुछ नश्वर है।अमर है तो मात्र अपने कर्म।जिस रूप का,जिस धन का,जिस नाम का हमें अभिमान है,उसे भी हमें समय से यहीं छोड़ जाना है। अतः उचित यही है कि बिना मोह के हमें कर्म पथ पर बढ़ते ही रहने चाहिए क्योंकि इस यात्रा का अंत ईश्वर ही है। ईश्वर के अतिरिक्त कुछ भी यहाँ अपना नहीं है।तो यह कहना कि हमें दिल से समंदर होना चाहिए और मन से तो मंदिर ही होना चाहिए। बिल्कुल भी अनुचित नहीं है। हमारे अंदर का जोश, जुनून, हमारी महत्वाकांक्षा ही हमें कुछ नया करने को बाध्य करती है किंतु बिना फल की प्रतीक्षा किये ईश्वर का नाम मन में ले आगे बढ़ जाना ही सच्ची तपस्या है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

वाराणसी - उत्तर प्रदेश 

       हमारा दिल जितना बड़ा हो समंदर की तरह अथाह अच्छी सोच और अच्छी बातों के लिए उतना हीं अच्छा होगा। नेकी कर दरिया में डाल वाली बात सदैव दिल में होनी चाहिए। घर एक मंदिर कहा हीं जाता है। जो घर हमारे मन मंदिर को भी सुंदर बनाता है। हमारी सोच कर्म सब समंदर की तरह विशाल और विस्तृत होनी चाहिए ना कि संकुचित। व्यक्ति की पहचान उसके कर्म और व्यवहार से होती है।अतः हमें सदैव इस बात पर ध्यान देनी चाहिए।

- डॉ पूनम देवा 

पटना - बिहार

          दिल से समंदर होना चाहिए, क्योंकि जिस प्रकार समंदर में सभी प्रकार की अच्छी और बुरी चीजे जाकर समा जाती हैं  इस प्रकार अच्छाई और बुरी बातें भी हमारे दिल को समुद्र के समान सहन करने की क्षमता होनी चाहिए , इसका मतलब है कि हमें अपने दिल को विशाल और गहरा बनाना चाहिए, जैसे समंदर। मन से तो मन्दिर होना चाहिए । यानि अपने मन को शुद्ध और पवित्र बनाना चाहिए, जैसे मंदिर। मंदिर में जैसे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है इसी प्रकार मन में भी हमें सकारात्मक विचार और ऊर्जा मंदिर के समान रहनी चाहिए हमें अपने दिल में प्रेम, करुणा, और सहानुभूति को जगह देनी चाहिए, और अपने मन को नकारात्मक विचारों से मुक्त रखना चाहिए।

 - रंजना हरित

 बिजनौर - उत्तर प्रदेश 

'बहुत गहन हिय जानिए, सागर सम जन जान। 

प्रेम धैर्य अरु शीलता, सकल गुणन की खान।'

'मन पावन नित राखिए, मन में बसते ईश। 

कर्म मनुज हित ही करें, फल देते जगदीश ।।' 

मनुष्य का हृदय समुद्र की भान्ति वृहद, विशाल होना चाहिए जिसमें धैर्य, क्षमा,उदारता, शीलता, सुख- दुःख हर भाव का समावेश हो।हमारे धर्म ग्रन्थों में भी मानव हृदय को समंदर की तरह होना बताया गया है ,जिसमें विशालता, असीम प्रेम, सहिष्णुता दूसरों के दुखों, दोषों को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता हो,तभी सांसारिक द्वंद्वो से ऊपर उठ कर सच्चा ज्ञान और शान्ति प्राप्त होती है। समुद्र मंथन की तरह जब मनुष्य हृदय अर्थात आत्मचेतना का मंथन करता है तो नकारात्मकता के मध्य से सकारात्मक श्रेष्ठ गुणों का जन्म होता है जो मानव जीवन की सार्थकता हेतु अति आवश्यक हैं।वास्तव में मानव का दिल से समुद्र होना गहन आत्म ज्ञान का प्रतीक है। इसके अलावा यह विचार भी अति महत्वपूर्ण है कि मानव को 'मन से तो मन्दिर होना चाहिए।' मानव मन भी मन्दिर समान है जिसमें ईश्वर निवास करते हैं। भौतिक संरचना में निर्मित मन्दिर में मूरत रूप में विराजमान ईश्वर हमारे मन के भावों पर अधिक निर्भर है हम चेतन मान कर उससे बतायाते हैं, याचना करते हैं, प्रार्थना करते और न जाने क्या क्या मांगें उसके सामने रखते हैं। मन्नत पूरी होने पर प्रसन्नता का भाव भर जाता है अन्यथा उसे हम अचेतन और पाषाण मूरत मान कर फिर अपने हृदय में बसे ईश्वर से अपनी व्यथा कहकर संतुष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार ईश्वर सभी जीवों के प्रति समान कृपा भावना रखते हैं। निःस्वार्थ प्रेम, समभाव, उदारता,क्षमा और जीवन चक्र। सूर्य, चाँद, बादल,वर्षा, जल, पवन आदि सभी प्राकृतिक संपदा बिना किसी भेदभाव, छोटा बड़ा सभी के लिए एक समान है। अतः मानव मन में दया, प्रेम और शुभ चिंतन भाव रखना ही मन मन्दिर की पहचान है। मन की शुद्धता ही शान्ति और स्थिरता को जन्म देती है। यही पावनता, सकारात्मकता नव उर्जित होकर मनुष्य में ईश्वर तुल्य गुणों में संचारित होती है और फिर मन ही मन्दिर बन जाता है। 

- शीला सिंह 

बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश 

        सुविचारात्मक  और प्रेरणादाई है । जिस प्रकार समुद्र अपनी विशालता गहराई लहरों के उतार-चढ़ाव के दर्शन का शांति प्रदाता, ईश्वरीय सत्ता की अनुपमता में विविध जीवों  के जीवन को गति एवम जीवन्तता प्रदान करता है तो इसी प्रकार की महत्वपूर्णता से आप्लावित यदि मनुष्य का दिल भी ऐसा हो जाए तो संसार के सारे राग- द्वेष मिट जाएंगे । सभी प्राणियों के प्रति मानव हृदय में मित्रता, प्रेम, दया ,करुणा, सहायता करने का विशाल भाव हो, तो उस मानव का हृदय विश्व प्रेम के सागर सा सभी के लिए प्रिय,सुंदर,  सहायक  सिद्ध होगा। फिर जिसका मन सदैव कलुषता से दूर, निर्मल भावों से परिपूरित ,उदारचरित्र हो तो वह देवालय सदृश्य ही होता है ।उसके पास सभी मन से मिलना चाहेंगे । परायेपन के भाव से कोसों दूर संपूर्ण वसुधा को कुटुंब की तरह मानने वाले मन वास्तव में मंदिर सदृश्य ही होते हैं। नमन है ऐसे मन मंदिर वाले ईश्वर स्वरूप व्यक्ति को ।

 - डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

       दिल से समंदर होना चाहिए, मन से तो मन्दिर होना चाहिए‌। यह पंक्तियाँ कवितामय अभिव्यक्ति के साथ-साथ मानव-धर्म और राष्ट्र-धर्म का साझा सूत्र प्रदान करती हैं। समंदर हृदय की विशालता, सहिष्णुता और संवेदना का प्रतीक है। वह गंदगी, कड़वाहट, मिट्टी और अपमान तक को अपने भीतर समेट लेता है और फिर भी विशाल बना रहता है। समाज और राष्ट्र तभी संतुलित हो सकते हैं जब लोगों के हृदय में ऐसा विस्तार हो कि मतभेद, कटु अनुभव और आपसी संघर्ष मानवता की सीमा को संकुचित न कर सकें। मन्दिर जैसा मन विचारों की पवित्रता, सत्य, नैतिकता और कर्तव्य-भाव का प्रतीक है। मन्दिर पत्थर और स्थापत्य से अधिक मनुष्य की अन्तरात्मा का वह स्थान है जहाँ असत्य का प्रतिरोध, अन्याय का निषेध और सत्य का समर्थन जन्म लेता है। मन यदि स्वार्थ, भ्रम, लोभ और कुटिलता से भर जाए तो समाज का नैतिक ढांचा गिरने लगता है। इसीलिए मन्दिर जैसा मन वह चेतना है जो व्यक्ति को अनुशासित, राष्ट्र को संवेदनशील और व्यवस्था को उत्तरदेह बनाती है। इन दोनों पंक्तियों का संयुक्त सन्देश यह है कि व्यक्ति का चरित्र तभी संतुलित और पूर्ण होता है जब संवेदना में समुद्र की व्यापकता और विवेक में मंदिर की पवित्रता हो। आज की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों में यह सन्देश अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि विकास केवल तकनीक, धन या शासन से नहीं होता बल्कि नागरिकों के चरित्र और सामूहिक नैतिकता से होता है। अतः इन शब्दों में साहित्य का दर्शन, समाज का मनोविज्ञान और राष्ट्र का नैतिक संविधान एक साथ प्रकट होता है। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) - जम्मू और कश्मीर

            दिल में समंदर होना चाहिए, मन से तो मंदिर होना चाहिए” — यह कथन मानव व्यक्तित्व के दो मूल आयामों को सुंदर रूपकों में व्यक्त करता है। समंदर हृदय का रूपक है, जो भावनाओं के विस्तार, गहराई, करुणा और धारण क्षमता का प्रतीक है। जिस प्रकार समंदर अपनी विशालता में नदियों, वर्षा और धरती के अनेक अंशों को समेट लेता है, उसी प्रकार मनुष्य का हृदय दूसरों के दुःख, प्रेम, स्मृतियों और अनुभवों को समाहित करने में सक्षम होना चाहिए। वहीं मन का मंदिर होना मनोवृत्तियों की शुचिता और विवेक का संकेत देता है। मंदिर स्वच्छता, शांति, संयम, नैतिकता और श्रद्धा का स्थल है, अतः मन में विचारों का कोलाहल नहीं बल्कि स्पष्टता, संतुलन और पवित्रता होनी चाहिए। इस वाक्य का मर्म यह है कि मनुष्य के भीतर भावनात्मक विस्तार और बौद्धिक शालीनता का संगम होना आवश्यक है। बिना दिल के समंदर के संवेदना सूख जाती है और मन के मंदिर के बिना विवेक विचलित हो जाता है। आज के समय में जहाँ हृदय संकुचित और मन विचलित होने लगा है, यह कथन मनुष्यत्व को पुनः उसकी वास्तविक ऊँचाई पर लौटने का मार्ग सुझाता है— करुणा से परिपूर्ण हृदय और पवित्र, शांत तथा सुचिंतित मन के साथ जीवन अधिक सुन्दर, सार्थक और मानवीय बन सकता है।

-डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

      बहुत सुंदर विषय। प्रथम पंक्ति दिल से समंदर होना चाहिए। वास्तव में दिल को समुद्र की भांति विशाल होना चाहिए जो अपने आप में सबको समाहित करके चल सके। किसी बाधा या विरोध का उस पर कोई असर न हो। विशाल दिल वाले सभी को साथ लेकर चलते हैं। द्वितीय पंक्ति मन से तो मंदिर होना चाहिए। यह भी बिल्कुल सही। इंसान का मन पवित्र होना बहुत जरूरी है। जिसका मन पवित्र होगा वह सभी को उसी दृष्टि से देखेगा।इसीलिए उसे मंदिर की तरह कहा गया। मंदिर न केवल आस्था बल्कि पावनता का भी प्रतीक है। मन का शुद्ध एवं पवित्र होना बहुत जरूरी है।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

         इंसान का दिल समंदर जैसा विशाल होना चाहिए—जहाँ अपनापन हो, क्षमा हो, दूसरों की गलतियों को समेट लेने की क्षमता हो। जैसे समंदर सब नदियों को बिना भेदभाव अपने भीतर समा लेता है, वैसे ही दिल को भी कटुता, अहंकार और द्वेष से ऊपर उठकर सबको स्वीकार करना चाहिए। वहीं मन का मंदिर जैसा होना यह सिखाता है कि भीतर पवित्रता, शांति और अनुशासन हो। मंदिर में जैसे शोर नहीं, छल नहीं, केवल श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा होती है, वैसे ही मन में भी अच्छे विचार, करुणा और आत्मचिंतन का वास होना चाहिए। जब दिल विशाल होता है और मन पवित्र, तब इंसान न केवल खुद शांत रहता है, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सुकून बाँटता है। शायद यही संतुलन एक सुंदर और सार्थक जीवन की असली कुंजी है।

- रंजना वर्मा उन्मुक्त

रांची - झारखंड 

" मेरी दृष्टि में " जैसा मन होता है। वैसा ही जीवन ‌चलता है। जैसा कर्म होता है वैसा भाग्य होता है। यही जीवन की रीत है। बाकि सब कुछ जीवन चक्र है। नियम स्पष्ट है कर्म का फल अवश्य सामने आता है। जिसे अटल सत्य भी कहां जाता है। 

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

        (संचालन व संपादन)



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