यह निःसंदेह सत्य है कि हर मनुष्य को अपने जीवन में प्रत्येक चीज को पाने के लिए प्रतीक्षा बनी रहती है। हम जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन में जितने भी कार्य करते हैं तो उस कार्य को क्रियान्वित करने के बाद उसके फल की इच्छा भी बनी रहती है। हर कार्य करने पर कभी कभी तो मनुष्य को मनमाफिक चीज मिल जाती है।पर कभी कर्म या किसी कार्य के प्रतीक्षा करने के बाद भी मंशा माफिक परिणाम नहीं मिलता ।इसके लिए यही कहा जाएगा हमने उस कार्य को करने में धैर्य , शांत मस्तिष्क ,अनुकूल परिस्थितियां और वातावरण नही देखा । आनन फानन में बहुत अधिक उतावला होकर कार्य तो किया पर उसका फल सुखद और सफल नहीं हुआ तो इसके लिए यही कहा जाएगा कि हर कार्य जो हम करते हैं उसके लिए सोच कर विचार कर स्थिति वातावरण को ध्यान में रखते हुए ही उसके फल का इन्तजार करना चाहिए । वैसे तो आध्यात्म यही कहता है कि कर्म किए जाओ, फल की इच्छा मत करो, जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान.।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
ये बात बिलकुल सत्य है कि कोई भी चीज अच्छी या बुरी हो उसका इंतजार हरेक प्राणी को रहता है। यदि लाभ दायक है तो इंतजार समाप्त होने पर प्रसन्नता होती है और यदि नुकसान देह होगी तो उससे होने वाली हानि को समय रहते न्यूनतम किया जाता है। ठीक ऐसे ही हर कर्म का फल भी अवश्य ही प्राप्त होता है। कर्म दो प्रकार के होते हैं। अच्छे कर्म करने के परिणाम भी सुखद ही मिलते हैं ये तय है और यदि व्यक्ति बुरे कर्म करता है तो उसे उसका फल भी दुखद ही मिलेगा। कहते हैं कि जब बोए बीज बबूल के तो आम कहां से होये। भाव ये कि हम यदि कर्म अच्छे करेंगे तो फल कभी बुरा नहीं मिल सकता, अच्छा ही फल प्राप्त होगा। और यदि हम बुरे कर्म करते हैं तो अच्छे फल की आशा करना व्यर्थ है क्योंकि बुरे कर्म का फल भी बुरा और कष्ट दायक ही होगा।।
- सुरेन्द्र मिन्हास
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
जीवन में कुछ भी तुरंत नहीं मिलता। बीज बोने और फसल काटने के बीच जैसा समय लगता है, वैसे ही हर प्रयास, हर सपना और हर बदलाव को पकने के लिए धैर्य चाहिए। इंतज़ार हमें सहनशील बनाता है, आत्मसंयम सिखाता है और यह समझ देता है कि समय भी जीवन का एक आवश्यक घटक है।इसी तरह कर्म और फल का संबंध अटल है। हम जो सोचते हैं, जो बोलते हैं और जो करते हैं—वही किसी न किसी रूप में हमारे पास लौटकर आता है। अच्छा कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता, भले उसका फल तुरंत न दिखे। और गलत कर्म भी समय लेकर ही सही, अपना परिणाम अवश्य देता है। इसलिए जीवन में न्याय की सबसे बड़ी शक्ति समय और कर्म ही हैं।
इन पंक्तियों का संदेश साफ़ है—
जल्दबाज़ी नहीं, निरंतर प्रयास करें;
निराशा नहीं, सही कर्म करें।
क्योंकि समय आने पर हर इंतज़ार रंग लाता है और हर कर्म अपना फल देता है।
- रंजना वर्मा उन्मुक्त
रांची - झारखंड
कहा गया है " जल्दी का काम शैतान का " , " धीरज का फर मीठा होता है ", "दुर्घटना से देर भली "... संदर्भ भले ही अलग-अलग हों परंतु इनमें भाव धैर्य और इंतजार का ही निहित है। अत: जीवन में इंतजार करना आना चाहिए। कहा भी गया है जो मजा इंतजार में वो हकीकत में नहीं। यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, उसका फल भी हमें देर-सबेर मिलेगा ...जरूर मिलेगा। इसके लिए भी इंतजार करना पड़ता है। क्योंकि हर कर्म का फल होता है जो मिलता ही है। जीवन चक्र में यह निहित है और यह नियति भी है। सार यह कि कोई भी कर्म करने से पहले हमें उससे मिलने वाले फल यानी परिणाम का भी ध्यान रखना चाहिए। उस पर विचार करना चाहिए। मंथन करना चाहिए।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
इंतज़ार: समय का अनुशासन l जीवन में कोई भी परिवर्तन तात्कालिक नहीं होता। बीज बोने के बाद फसल उगने तक धैर्य चाहिए । यही नियम संबंधों, शिक्षा, साधना और समाज पर भी लागू होता है।इंतज़ार हमें संयम, आत्मनियंत्रण और विश्वास सिखाता है। जो समय से पहले फल चाहता है, वह अक्सर अधपका परिणाम पाता है।कर्म केवल क्रिया नहीं, भाव और नीयत सहित किया गया चुनाव है। एक ही कर्म अलग भाव से किया जाए तो उसका फल भी अलग होता है। गीता कहती है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते…
अर्थात हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं;
पर यह भी सत्य है कि फल से कोई कर्म बच नहीं सकता।
फल हमेशा तुरंत नहीं मिलता,
पर अनिवार्य रूप से मिलता है।
कभी सुख बनकर, कभी सीख बनकर,
कभी आशीर्वाद, तो कभी चेतावनी बनकर।
यही कारण है कि जीवन में अन्याय स्थायी नहीं होता।
आज का मनुष्य “त्वरित परिणाम” का अभ्यासी हो गया है— इंस्टेंट सफलता, इंस्टेंट प्रसिद्धि, इंस्टेंट समाधान। पर प्रकृति और कर्म का विधान आज भी
धीमे पर सटीक नियमों पर चलता है। यही टकराव तनाव और अधैर्य को जन्म देता है।
इंतज़ार हमें पकाता है,
कर्म हमें पहचान देता है,
और फल हमें दर्पण दिखाता है।
इसलिए जीवन की सार्थकता इसी संतुलन में है कि—
हम कर्म ईमानदारी से करें,
इंतज़ार श्रद्धा से करें,
और फल को स्वीकार करने का साहस रखें।
- डा. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
यह सत्य है कि इंतजार करना कर्मफल का एक हिस्सा है जो हर व्यक्ति को उस प्रक्रिया के लिए तैयार करता है जो हमें सही समय पर हमारा फल देती है क्योंकि कर्म का फल तुरंत नही मिलता और सही समय आने पर ही फल मिलता है, तो आईये आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं कि हर चीज का इंतजार होता है और हर कर्म का फल होता है, मेरा मानना है कि इंतजार करने से धैर्य बढता है और यह जीवन में सबसे अच्छे अवसर लाने के लिए जरूरी है क्योंकि सही समय का इंतजार करना हमें सही रास्ते पर ले जाता है, तभी तो कहा है , धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आऐ ही फल होये, कहने का भाव , हर चीज समय पर आधारित है लेकिन इंतजार का फल मीठा होता है बशर्ते की हमारे कर्म अच्छे हों, क्योंकि अच्छे कर्म ही सुख शांति, समृद्धि और संतोष देते हैं लेकिन यह सब वक्त के साथ अवश्य मिलता है, इसके अतिरिक्त अगर हमारे कर्म अच्छे नहीं होंगे तो उनका फल भी समय के मुताबिक बुरा ही होगा और हमें दुख, अशांति कष्ट इत्यादि भोगने पड़ते हैं, इसलिए सच्चाई व अच्छाई का बीज बोने पर हमें समय के मुताबिक हमारे हर कर्म का फल मिलता है, इसलिए जीवन में धैर्य रखते हुए निष्काम भाव से अच्छे कर्म करना ही जीवन को सार्थक बनाता है यहाँ तक फल की बात है उसके मिलने का संदेह कभी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि हर कर्म का फल निश्चित है लेकिन हमें उसके लिए इंतजार करना पड़ता है, अन्त में यही कहुंगा कि इंतजार हमें भविष्य के लिए प्रेरित करता है, सराहना करना सिखाता है और हमारे चरित्र को निखारता है जिसके लिए हमें अपने कर्म सोच समझ कर करने पड़ते हैं ताकि जिस फल का हम इंतजार कर रहे होते हैं वो हमारे लिए सुखदायक हो और इंतजार के मुताबिक खरा उतरे यह तभी संभव है जब व्यक्ति फल की इच्छा न ऱखते हुए निष्काम भाव से कर्म करता रहे क्योंकि कर्मों के अनुसार फल तो अवश्य मिलेगा आज नहीं तो कल मिलेगा, अगर धार्मिक ग्रन्थ गीता की बात करें तो इंसान का अधिकार केवल निस्वार्थ कर्म करने में है न कि उसके परिणाम पर इसलिए फल का इंतजार धैर्य से करना चाहिए क्योंकि सही समय आने पर भाग्य और कर्म का फल मिलता जरूर है, कहने का भाव गीता भी हमें कर्म करते रहने और धैर्यपूर्वक सही समय का इंतजार करने की शिक्षा देती है न कि फल की चिंता की।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
जिंदगी मैं सबको , किसी न किसी चीज का इंतजार रहता ही है ! किसी को जितने का इंतजार , किसी को हराने का इंतजार , किसी को अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने का इंतजार , किसी को संपत्ति प्राप्त करने का इंतजार , किसी को उच्च पद प्राप्त करने का इंतजार !! हर व्यक्ति के इंतजार की वजह व्यक्तिगत होती है !! लम्बे इंतजार के पश्चात जब वांछित फल प्राप्त होता है , तो अत्यंत संतुष्टि मिलती है !! हर किए गए कर्म का फल मिलता है , चाहे फल सुखदाई हो या फल दुखदाई हो ! हर कर्म के पश्चात , सबको उस कर्म के फलीभूत होने का इंतजार होता है !! अतः कर्म , फल , इंतजार , सब एक दूसरे से जुड़े हैं व एक दूसरे के पूरक हैं !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
ये सौ प्रतिशत सत्य है कि हर चीज़ का इंतजार करना पड़ता है.बिना इंतजार किए कुछ नहीं होता है. बीज बोने के बाद उसे पेड़ बनने, उसमें फल लगने का इंतजार करना पड़ता है. पढ़ाई में भी एक क्लास से दूसरे क्लास में जाने के लिए साल भर इंतजार करना पड़ता है. बच्चे के जन्म के लिए भी नौ माह का इंतजार करना पड़ता है. आज इंतजार हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है. जहाँ भी जाइए आपको इंतजार करना ही पड़ेगा. यहाँ तक की मरने के बाद भी शव को जलाने के लिए परिवार को इंतजार करना पड़ता है. कहा गया है कि माली सीचें सौ घड़ा ऋतु आवे फल होय. और हर कर्म का फल तो होना ही है. क्योंकि कर्म के साथ फल जुड़ा हुआ है. चाहे कर्म कैसा भी हो. अच्छे कर्म का अच्छा फल बुरे कर्म का बुरा फल.
- दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश "
कलकत्ता - प . बंगाल
हर चीज के लिए इंतजार करना होता है पैदा होने से मृत्यु तक बिना इंतजार के कुछ हासिल नही होता !नियम और नीति का निर्धारण लक्ष्य प्राप्ति के लिए इंतजार करना होता है! कर्म फल का मतलब ये नही की आप दूसरों के साथ अच्छा करते हैं । जरूरी नही दूसरा भी आपके लिए अच्छा सोचे , पर जैसे ही उसे आपसे सम्बंधित सत्कर्म याद आता है ! चाह कर भी आपके साथ बुरा ना सोच सकता ना कर सकता चाहे इसके लिए उसे कितना भी इंतजार करना पड़े ! गीता का सार भी यही कहता है ! हर कर्म का फल अच्छाई में निहित होता है !तभी कहते साँच को आँच क्या?
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
जीवन के परिदृश्य में इतजार की अहम भूमिका होती है। जितना किसी का इतजार किया जाए, उतना आनन्द की अनुभूति होती है। हर चीज का इतजार होता है, हर कर्म का फल होता है। सत्यता की झलक दिखाई देती है। इतजार से ही कर्मता का फल प्राप्त होता है। हम बिना कर्म से अपने व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं कर सकते है। प्रभाव से प्रभावित करना बहुत बड़ी बात होती है। स्नेहिल मन को विचलित होने से बचाना चाहिए, कभी-कभी इतजार नहीं करना पड़ता है, तुरन्त काम हो जाता है, तो कभी-कभी घंटों इतजार करने उपरान्त भी काम नहीं हो पाता है, यह सब अच्छे और बुरे कर्म का ही प्रतिफल होता है......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
चाह कर भी चाहना जाती नहीं, हर चीज का इंतजार होता है. कभी किसी चीज को जिज्ञासावश देखने-जानने के लिए तो कभी लालसावश पाने के लिए इंतजार होता है. इसके साथ ही हर कर्म का फल अवश्य मिलता है. कर्म अच्छा हो या बुरा, जानकर किया हो या अनजाने में किया हो, फल मिलना अवश्यम्भावी है. कर्म का फल कभी तुरंत मिल जाता है, कभी कई जन्मों के बाद भी. कोई भी दृष्टिहीन होना या जन्मना नहीं चाहता. धृतराष्ट्र ने फूल पर बैठी एक तितली की आंखों में कांटा चुभोकर अंधा कर दिया, इसलिए 106वें जन्म में वे अंधे पैदा हुए. चाह को चाह ही रहने देना चाहिए और कर्म सोच-समझकर करना चाहिए.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
प्रत्येक कार्य का एक निश्चित समय होता है और हर मनुष्य द्वारा किया गया कर्म अपने स्वाभाविक परिणाम के साथ अवश्य लौटता है। यही जीवन का अटल सत्य है। संसार में कुछ भी निरर्थक नहीं होता और कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। समय स्वयं न्याय का संतुलन करता है और प्रत्येक कर्म का फल अपने निश्चित क्षण में प्रकट होता है। प्रतीक्षा के लिए धैर्य रखना निर्बलता नहीं बल्कि आत्मबल और विवेक का प्रतीक है। जो व्यक्ति सत्य और सद्कर्म के मार्ग पर अडिग रहता है, वह अस्थायी कठिनाइयों से विचलित नहीं होता। सकारात्मक सोच वह ज्वलंत शक्ति है जो अन्याय और संघर्ष के बीच भी आशा का दीप प्रज्वलित रखती है। इसी प्रतिज्ञाबद्ध उत्कृष्ट आचरण का अर्थ है कि व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने मौलिक कर्तव्यों का भी निष्ठापूर्वक पालन करे। जब कर्म शुद्ध होते हैं तो परिणाम भी लोककल्याणकारी होते हैं। इतिहास साक्षी है कि सत्य को समय लग सकता है, पर अन्ततः विजय उसी की होती है। अतः प्रतीक्षा को विश्वास से और कर्म को सत्यनिष्ठा से जोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन और राष्ट्र के लिए सर्वोत्तम मार्ग है। यही सकारात्मकता है, यही ज्वलंत चेतना है और यही उत्कृष्ट दृष्टि है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) – जम्मू और कश्मीर
धीरे- धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय।।
इंतजार, प्रतीक्षा,आशा अथवा फल यह सब समय/काल,वातावरण,कर्म और वस्तु के अनुकूल अवश्य होता है। एक माँ नौ महिनें भ्रूण को शिशु में बनने और प्रसव तक उसके पैदा होने का इंतजार करती है। विदेश में गये हुए अपने के आने का इंतजार उसकी प्रियतमा विशेष समय अनुसार करती है। हमारी प्रकृति में ऋतुओं अनुसार परिवर्तन आता है। पतझड़ में पत्तों विहीन पेड़ बसंत ऋतु के आगमन की आस लगाये नवल कोंपलों से सुशोभित दृश्य को अपने भीतर समाहित कर लेता है। अच्छी फसल की उम्मीद में किसान सही समय पर वर्षा का इंतजार करता है इंतजार विशेषतया कर्म और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। परीक्षा भवन में अच्छी तैयारी से पेपर करने वाला परीक्षार्थी अच्छे अंक आने की आस लगाता है। इसके अलावा हमें अपने अपने कर्मों के अनुसार फल भोगना पड़ता है। पिछले जन्म का प्रारब्ध इस जन्म में भोगते हुए अच्छा कुल, अच्छा भाग्य मिलता है ऐसा सुना गया है। यह तो ईश्वर की देन है। इस जन्म में हमारे कर्मों का विशेष महत्व है। जैसे कर्म होंगे वैसा फल मिलेगा,लेकिन मिलेगा जरूर।यह एक न्यायसंगत प्रक्रिया है जो अवश्य फलित होती है। गीता का उपदेश भी यही शिक्षा देता है कि हमारे कर्मों का फल हमें अवश्य मिलता है अतः अच्छे कर्म करने चाहिए ताकि श्रेष्ठ फल मिले। मानव जीवन की सार्थकता भी इसी में है।
- शीला सिंह
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
हर चीज का इंतजार होता है,हर कर्म का फल मिलता है। यह बात सही है। बिना इंतजार के कोई चीज नहीं मिलती।बीज से पौधा बनने में और फिर फल आने तक की प्रक्रिया में लंबा इंतजार करना ही होगा। संसार में ऐसा कुछ नहीं जो एकदम बन जाए।सभी चीजों के बनने की प्रक्रिया में समय लगता है और यह समय ही इंतजार का कारण बनता है। हर कर्म का फल होता है,यह तो ध्रुव सत्य है।कर्म कैसा भी हो उसका फल अवश्य मिलता है। हां फल मिलने में समय लग सकता है।यह समय उस कर्म रुपी बीज से परिणाम रुपी फल बनने की प्रक्रिया का समय होता है। इसलिए हमेशा सही कर्म करने चाहिए।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
सत्य है कि हर चीज की - - हर बात की प्रतीक्षा होती है और हर कर्म का फल होता है। कर्म फल हमारी भारतीय संस्कृति का प्रमुख हिसाब माना जाता है। कर्मण्येवाधिकारस्ते की अवधारणा को स्पष्ट करें तो सहज सिद्ध है कि "करम" और "कर्म" के खेल में दोनों ही इंसान के जीवन को सार्थक करते हैं। जीवन में इंतज़ार का फल इन्ही दोनों के साथ प्राप्त होता है। सच कहें तो मानव जीवन एक लंबे इंतज़ार की कहानी होती है जो प्रारब्ध के साथ चलती है। हर इक इंसान को कर्म और करम फल प्रारब्ध के अनुसार ही प्राप्त होते हैं और उनका भुगतान वर्तमान जन्म में करना ही पड़ता है। अतः गीता का उपदेश याद रखें - - कर्म करें फल की चिंता न करें - - इस गरिमामय विचार है साथ आगे बढें और अभिनंदनीय जीवन यात्रा मंगलमय बनायें।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
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