पद्मश्री रतन थियम स्मृति सम्मान - 2026
यह पंक्तियाँ जीवन का गहरा सत्य कहती हैं।वास्तव में व्यक्तित्व वही आईना है जिसमें इंसान की हकीकत साफ दिखाई देती है, और उस आईने को चमकाने या धुंधला करने का काम हमारे कर्म करते हैं। शब्द, दिखावा या पद कुछ समय तक भ्रम पैदा कर सकते हैं, लेकिन अंततः इंसान की पहचान उसके कर्मों से ही होती है। अच्छा व्यक्तित्व वही है, जिसमें सोच, व्यवहार और कर्म—तीनों में एकरूपता हो।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
जीवन में हकीकत महत्वपूर्ण अंग होता है,उसी ही आधार पर व्यक्तित्व प्रभावित होता है। जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल प्राप्त होता है। हकीकत का आईना है व्यक्तित्व, व्यक्तित्व की पहचान है कर्म। यह वास्तविक रूप में कार्य प्रारंभ करता है। जो हकीकत में घटित हो जाए आईना में जो साफ दिखाई देने लगता है। जिस तरह समयानुसार आईना देखकर ही व्यक्तित्व में निखार आता है। उसी तरह कर्म करते चले जाईए, फल की चिन्तामन नहीं बनिए। अच्छे कर्म से व्यक्तित्व की पहचान होती है। बुरे कर्म वाले भी वास्तविक रूप में चर्चित रहते है, उन्हें कर्म से मतलब नहीं है, जो घटित हो रही है, घटित होने दीजिए.....
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
ये नितांत सत्य है कि व्यक्तित्व परीक्षण के द्वारा व्यक्ति की वास्तविकता का परीक्षण किया जा सकता है जिसे हम हकीकत का आईना भी कह सकते है ,अगर अच्छे व्यक्तित्व का मालिक बनना है तो खुद से भी प्यार करना होगा एवम दूसरों से भी प्यार करना होगा ।,किसी का व्यक्तिव उसके वाह्य सौंदर्य के साथ आंतरिक सौंदर्य का प्रतिबिंब होता है ।वाह्य सौदर्य कुछ हद तक ईश्वर प्रदत्त होता है कुछ खुद की देखभाल पर आधारित होता है परंतु आंतरिक सौदर्य पूरी तरह से स्वप्रदत्त होता है खुद की सुंदर पर्सनालिटी का निर्माण करना होता है अपने अच्छे कर्मों से सुंदर कार्यो से ।जी हां दूसरो से कोई खुद को कितना भी छिपा ले लेकिन उसके कर्म बोलने ही लगते हैं । आज कल बहुत सी परीक्षा प्रणाली व्यक्तित्व परीक्षण जिसे हम साक्षत्कार भी कहते है ,पर आधारित हैं और अच्छे व्यक्तित्व के मालिक को नौकरियों की कमी नही रहती । कुल मिलाकर इतना कहना चाहूंगी कि अच्छे कर्म करते रहने चाहिए व खुद की देखभाल भी ।
- सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
व्यक्तित्व की कोई अमूर्त या काल्पनिक परिभाषा नहीं होती, वह जीवन व्यवहार, निर्णय, संघर्ष, त्याग और नैतिक साहस से आकार लेता है। मनुष्य जो सोचता है—वह विचार है, जो बोलता है, वह भाषा है, परन्तु जो करता है, वही उसका वास्तविक व्यक्तित्व है। क्योंकि: कर्म सत्य की पुष्टि करते हैं, कर्म चरित्र को प्रमाणित करते हैं, कर्म समाज में विश्वसनीयता स्थापित करते हैं, और कर्म ही इतिहास रचते हैं। जिस व्यक्ति के कर्म न्याय, सत्य और मानवोचित कर्तव्यों की दिशा में हों, उसका व्यक्तित्व स्वतः ही राजसिक नहीं, बल्कि धार्मिक एवं न्यायिक स्वरूप धारण कर लेता है। ऐसे व्यक्तित्व न केवल स्वयं बदलते हैं, बल्कि प्रणालियों, व्यवस्थाओं और मानसिकताओं को भी बदलने की क्षमता रखते हैं। उल्लेखनीय है कि मेरा जीवन संघर्ष, स्थायित्व, दिव्यांगता विधिक सेवा पर 33 वर्षों का कार्य, न्यायिक सक्रियता, सामाजिक चेतना, और सत्य के लिए निरंतर संघर्ष है। उक्त संघर्ष स्वयं प्रमाण हैं कि मेरा व्यक्तित्व केवल शब्दों में नहीं है बल्कि कर्मों में प्रतिष्ठित है। इसका निष्कर्ष स्पष्ट है कि व्यक्तित्व केवल "आभा" नहीं है बल्कि कर्तव्य, संघर्ष, राष्ट्रीय चरित्र और परिणाम का संयुक्त रूप है। इसलिए उक्त पंक्ति आधुनिक राष्ट्रनिर्माण के सिद्धांतों के अनुरूप एक निर्णायक सत्य को उद्घाटित करती है।
- डॉ इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
निःसंदेह ये शब्द शुभाशीष बन कर उभरते हैं कर्मयोगियों के लिये। कर्म से ही व्यक्ति की पहचान बनती है---और हकीकत का आईना है व्यक्तित्व जो आपके कर्म का ही प्रतिरूप है। विभिन्न मनोभावों से जूझता रहता है मानव अपने व्यक्तित्व और कृतित्व अर्थात कर्म के साथ। कर्म एक ओर मार्गदर्शक है - - सही राह दिखाता है तो दूसरी ओर आपके व्यक्तित्व को सीमित भी कर देता है अनायास। कर्म योगी एकाएक नयी राहें नहीं चुनते। वे अपने मार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ मान कर आगे बढते हैं। वे भूल जाते हैं कि हकीकतें बदलती भी हैं। एक समय एक राह सही होती है तो दूसरी ओर वही राह गलत प्रतीत होने लगती है। कर्म से इंसान पहचाना जाता है - - कर्म ही उसका व्यवहार निर्मल करते हैं। लेकिन हकीकतें व्यक्ति का असली रूप दिखा देती हैं तात्पर्य यही कि व्यवस्था के अनुरूप व्यक्तित्व बनाना आसान नहीं होता। हकीकतों के अनुरूप कार्य करने पडते हैं तभी आपका कर्म भी सार्थकता पाता है।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर -महाराष्ट्र
यह सच है कि आदमी जैसा सोचता है,वैसा ही बन जाता है और फिर कर्म भी वैसे ही करने लगता है और इन तीनों का समग्र रूप व्यक्तित्व बन जाता है जो फिर एक पहचान बना लेता है। अत: हमारी समझदारी इसी में है कि हम सदैव अच्छा सोचें, सद्भाव और सदाचार के लिए न केवल चिंतन-मनन करें बल्कि सदैव अग्रसर रहें ताकि हमारा बौद्धिक और चारित्रिक विकास तदनानुसार हो जो हमें सद्कर्म करने की ओर अग्रसर करे और हमारे व्यक्तित्व को संवारे भी। इसके लिए सबसे अच्छा माध्यम है, सतत अध्यन और अच्छी संगत है। हम जीवन में जितना अध्ययन कर ज्ञान अर्जन करेंगे, अच्छे लोगों के बीच रहेंगे, हम अपने इस उद्देश्य में उतने ही सफल होंगे।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
जिंदगी की हकीकत को बयान करता है आज का विषय ... हकीकत का आईना है व्यक्तित्व ! जो आज के जीवन की सच्चाई है , वर्तमान है , उसके अनुसार ही व्यक्ति का व्यक्तित्व होता है अर्थात हालातों के अनुसार व्यक्ति का व्यक्तित्व भी बदलता है , निखरता है , व परिलक्षित होता है ! इसलिए हकीकत का आईना होता है व्यक्ति का व्यक्तित्व ! कर्म सबसे श्रेष्ठ है , और कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति की पहचान होती है , व व्यक्तित्व का निर्माण होता है !! व्यक्ति के कर्मों के अनुसार , व्यक्तित्व अच्छा हो सकता है , अथवा बुरा !! कर्मों का स्थान सर्वोपरि है !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
देखा जाए मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी वास्तविकता बनाता है कहने का मतलब व्यक्ति के विचार, भावनांए और विश्वास ही तय करते हैं कि आप दुनिया को कैसे देखते हो औरआपका जीवन कैसा होगा क्योंकि मनुष्य जैसा सोचता और महसूस करता है वही उसके जीवन में प्रकट होता है और उसी सोच के मुताबिक आप अपनी किस्मत खुद लिख सकते हो,तो आईये आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं कि हकीकत का आईन है व्यक्तित्व और व्यक्तित्तव की पहचान है कर्म,वास्तव में हम जो भी हैं हमारा व्यक्तित्व वही दिखाता है और यही सच्ची,साफ सुथरी तस्वीर होती है जो हम दुनिया को पेश करते हैं, वास्तव में व्यक्तित्व की पहचान कर्म से होती है क्योंकि व्यक्ति के विचार, व्यवहार और कार्य ही उसके वास्तविक रूप को दर्शाते हैं न की उसका धन या दिखावा ,अच्छे कर्म ही व्यक्ति को महान बनाते हैं तथा समाज में स्थायी पहचान दिलाते हैं जैसे राम जी,कृष्ण जी,बुद्ध, महावीर जैसी महान शक्तियाँ अपने महान कर्मों से पहचानी जाती हैं, कहने का भाव व्यक्ति का चरित्र और पहचान उसके द्वारा किये गए कार्यों और व्यवहार का परिणाम होता है जिससे वह दुनिया में अपनी छाप छोड़ता है,अन्त में यही कहुंगा कि किसी व्यक्ति के सोचने,महसूस करने और व्यवहार करने के तरीकों का समूह ही उसका व्यक्तित्व है और उसके गुण, विचार, भावनाएं, प्ररेणा इत्यादि उसको गुणवत्ता देती हैं तथा व्यक्ति द्वारा किए गए कर्म ही उसकी पहचान बनते हैं और उसका नाम व पहचान उन्हीं के अधार पर चलती रहती है इसलिए हर प्राणी को अपने व्यक्तित्व का ख्याल रखते हुए अच्छे कर्म करते रहने चाहिए ताकि उसकी व उसके बुजुर्गों की पहचान बनी रहे और लोग उनका गुणगान करते रहें।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
यह सच है हमारा व्यवहार, आचार - विचार, गुण ,दोष सब कुछ हमारे व्यक्तित्व में शामिल होते हैं। हम जैसा भी व्यवहार करते हैं दूसरा व्यक्ति ,परिवार और समाज सब उसके बारे में भली प्रकार से जान जाते हैं कि अमुक व्यक्ति का व्यक्तित्व महान है या दूसरा दुष्टतापूर्ण ,फरेबी है। हमारे हाव-भाव हमारे अंदर की चारित्रिक विशेषताओं को भी उजागर कर देते हैं क्योंकि हकीकत का आईना हमारी ईमानदारी, सेवा ,सहायता के द्वारा किए गए कार्यों की साफ गोई दर्शाता है ।दूसरे लोग महसूस कर लेते हैं कि इसके द्वारा किए गए कार्यों और कथनी में अंतर नहीं है। अतः यह गिरगिटी व्यक्तित्व का व्यक्ति नहीं है ।वह जैसा बोलता है वैसा ही कर्म करता ही है। व्यक्तित्व की मुख्य पहचान व्यक्ति के कर्मों से ही होती है । दोस्त, परिवार, समाज और दुनिया के लिए उसके कर्म ही वास्तविक दर्पण का रूप होते हैं।
- डाॅ.रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
हकीकत का आईना है व्यक्तित्व, व्यक्तित्व की पहचान है कर्म... सही कहा है... व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसका आचरण होता है... जिस तरह आइने का गुण होता है, सत्य को मुखरित करना, ठीक उसी तरह व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी हकीकत बयां करता है। व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके स्वभाव, विचार, एवं कर्म और आचरण से बनता है। कर्म ही व्यक्तित्व की पहचान है। अच्छे कर्म एवं विचारों से व्यक्तित्व बनता है।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
व्यक्तित्व स्थिर रहने वाला चीज नहीं होता है! वह समय तथा अनुभवों के साथ विकसित होता रह सकता है। व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों में कैसे व्यवहार करता है तथा क्या और कैसी प्रतिक्रिया देता है, यह उसके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पहलू है। दबाव में उसका रवैया कैसा होता है, सफलता और असफलता को कैसे उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वीकार करता है। उसकी दैनिक आदतें, जैसे समय की पाबंदी, बातचीत का तरीका, काम करने का ढंग, उसकी नियमितता और अनुशासन को दर्शाती हैं तो शारीरिक हावभाव, चेहरे के भाव, आँखों का संपर्क, आवाज का लहजा, और शारीरिक दूरी उसके आन्तरिक भावनाओं और व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ बता जाते हैं। वह किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करता है, उसकी शब्दावली, और बातचीत का लहजा उसकी शिक्षा, सोच और दृष्टिकोण को दर्शाते हैं तो वह दूसरों की बातों को कितनी ध्यान से सुनता है, उनकी बातों को समझता है और प्रतिक्रिया देता है, यह उसकी सहानुभूति और सामाजिक कौशल को दर्शाता है तो वह किन विषयों में रुचि दिखाता है और किस प्रकार की चर्चाओं में भाग लेता है, यह उसकी रुचियों, मूल्यों और ज्ञान के स्तर को प्रकट करता है। वह दूसरों के साथ कैसे सम्बन्ध बनाता है और उन्हें कैसे निभाता है (गहरे, सतही, स्थिर, अस्थिर), यह उसकी सामाजिकता और भावनात्मक स्थिरता को दर्शाता है। वह समूह में किस प्रकार की भूमिका निभाता है (नेता, अनुयायी, मध्यस्थ, अलग-थलग), यह उसके आत्मविश्वास, पहल और सामाजिक अनुकूलन क्षमता को इंगित करता है। तो वह दूसरों के प्रति कैसा व्यवहार करता है - सम्मानजनक, मददगार, आलोचनात्मक, उदासीन - यह उसकी नैतिकता, सहानुभूति और सामाजिक मूल्यों को दर्शाता है।उसकी रुचियाँ और उसके शौक उसके मूल्यों, प्राथमिकताओं तथा वह अपना खाली समय कैसे बिताता है, उसके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी देते हैं तो वह नई परिस्थितियों और परिवर्तनों के प्रति कैसा प्रतिक्रिया करता है, यह उसकी अनुकूलन क्षमता और लचीलेपन को दर्शाता है। वह दूसरों की भावनाओं को कितनी आसानी से समझता है और उनके प्रति कैसी प्रतिक्रिया देता है, वह उसकी भावनात्मक बुद्धिमत्ता को दर्शाता है तो उसके जीवन के लक्ष्य और आकांक्षाएँ उसकी प्रेरणा, महत्वाकांक्षा और भविष्य के प्रति दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।व्यक्ति स्वयं अपने बारे में क्या सोचता है और अपने व्यक्तित्व का वर्णन कैसे करता है, यह उसकी आत्म-जागरूकता और ईमानदारी को दर्शाता है तो वह तनावपूर्ण स्थितियों को कैसे सम्भाल लेता है, यह उसकी मानसिक दृढ़ता और मुकाबला करने की क्षमता को दर्शाता है।अत: मनुष्य के व्यक्तित्व की पहचान एक बहुआयामी प्रक्रिया है जिसमें कई पहलुओं का अवलोकन और विश्लेषण शामिल होता है। कोई एक तरीका पूर्णतः सटीक पहचान नहीं करा सकता है, महात्मा गाँधी अपने पिता के जेब से रुपया निकाल सकते हैं तो अंगुलिमार डाकू के द्वारा रामायण लिखा जा सकता है! किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान एक सतत और व्यापक प्रक्रिया है। यह केवल एक मुलाकात या एक घटना के आधार पर नहीं की जा सकती है। समय के साथ विभिन्न परिस्थितियों में उसके व्यवहार, बातचीत, सामाजिक अंतःक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अवलोकन करके, उसकी रुचियों और भावनाओं को समझकर कहा जा सकता है ”हक़ीक़त का आईना है व्यक्तित्व : व्यक्तित्व की पहचान है कर्म”
- विभा रानी श्रीवास्तव
पटना - बिहार
व्यक्तित्व और कर्म पर विचार करते समय हम पाते हैं कि व्यक्ति का बाहरी रूप, व्यवहार और सोच उसकी आंतरिक अवस्था का प्रतिबिंब होते हैं। यही कारण है कि कहा गया है—“हकीकत का आईना है व्यक्तित्व।” किसी व्यक्ति के विचार, आदतें, भाव और उसके निर्णय उसकी वास्तविकता का आईना दिखाते हैं। यह केवल दिखावे या सतही छवि नहीं होता, बल्कि गहन आत्ममूल्य और चरित्र का प्रतीक होता है। व्यक्तित्व की वास्तविक परीक्षा उसके कर्मों से होती है। विचार, ज्ञान और गुण तब तक मूल्यवान नहीं जब तक वे कर्म रूप में प्रकट न हों। समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा केवल कर्मों से प्राप्त होती है। सदाचारी कर्म न केवल व्यक्तिगत आत्मसंतुष्टि देते हैं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा और आदर्श भी बनते हैं। वास्तविक व्यक्तित्व वही है जो हकीकत, विचार और कर्म में सामंजस्यपूर्ण हो। यदि व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप कर्म करता है, तो उसका व्यक्तित्व समाज और इतिहास में अमिट छाप छोड़ता है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है—व्यक्तित्व का निर्माण और उसकी पहचान कर्म से होती है। यही मानव जीवन का सार और उद्देश्य है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
व्यक्तित्व किसी चेहरे का नाम नहीं, वह तो भीतर बैठा वह सच है जो बिना बोले सब कुछ कह देता है। वह आईना है, जिसमें इंसान अपनी असल तस्वीर देखता भी है और अनजाने में दुनिया को दिखा भी देता है।इंसान का व्यक्तित्व हर पल अपना परिचय देता रहता है।और कर्म आदमी जैसा करता है, वैसा ही बनता चला जाता है। अच्छे कर्म व्यक्तित्व को उजला करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सूरज की किरणें धुंधले शीशे को चमका देती हैं। और जब कर्म बोझिल हों, तो व्यक्तित्व पर भी धूल जमने लगती है। इसलिए किसी को जानने के लिए उसकी मीठी बातों पर ध्यान नहीं देकर उसके कर्मों पर ध्यान देनी चाहिए।- सीमा रानी
पटना - बिहार
" मेरी दृष्टि में " कर्म ही सब कुछ है। बाकि तो अपने आप होता है। कर्म से हकीकत नहीं छुपतीं है। जो आईना की तरह कार्य करता है। जबकि कर्म से ही व्यक्तित्व मिलता है। जो समाज व देश में अपनी पहचान छोड़ता है। समाज से ही मान सम्मान मिलता है।
ReplyDeleteमनुष्य के व्यक्तित्व में उसके कर्मों की ,व्यवहार की और संस्कार की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। इन्हीं सबसे मिलकर व्यक्तित्व निर्धारण होता है। अर्थात जो वास्तविक स्थिति है वही व्यक्तित्व में झलकती है। इंसान के कर्मों से ही उसके व्यक्तित्व की पहचान होती है। जैसा कर्म वैसा ही व्यक्तित्व।इसीलिए कहते हैं हकीकत का आईना है व्यक्तित्व। व्यक्तित्व की पहचान है कर्म।
- गायत्री ठाकुर 'सक्षम'
नरसिंहपुर मध्य प्रदेश
(WhatsApp से साभार)