वैलोपिल्लि श्रीधर मेनन की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
वैलोपिल्लि श्रीधर मेनन जी की स्मृति में यह भाव अत्यंत प्रेरणादायी प्रतीत होता है कि निस्वार्थ सेवा और सच्चे कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। मनुष्य चाहे तत्काल सम्मान पाए या नहीं, परन्तु समय, प्रकृति और ईश्वर उसके प्रत्येक सत्कर्म का लेखा अवश्य रखते हैं। जो व्यक्ति मानवता, न्याय, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हैं, उनके प्रयास देर-सवेर जीवन में प्रकाश बनकर लौटते हैं। सेवा केवल प्रशंसा प्राप्त करने का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह आत्मा की पवित्रता और मानव धर्म की पहचान बन जाती है। उसी प्रकार कर्म केवल आज का प्रयास नहीं, बल्कि आने वाले कल की दिशा निर्धारित करने वाली शक्ति है। भाग्य भी उन्हीं के द्वार पर दस्तक देता है जो संघर्ष, धैर्य और पुरुषार्थ को अपना धर्म मानते हैं। इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि जिन्होंने बिना स्वार्थ समाज, राष्ट्र और मानवता के लिए कार्य किया, समय ने अंततः उन्हें विशिष्ट स्थान प्रदान किया। इसलिए मनुष्य को परिणाम की चिंता से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य और सेवा को ही जीवन का सर्वोच्च साधन मानना चाहिए। उपरोक्त शब्द ही नहीं बल्कि विचार ही उनकी स्मृति में उन्हें सार्थक श्रद्धांजलि है।
- डॉ इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
वास्तव में कर्म के दो रूप होते हैं, एक भाव और दूसरा उसका कार्यान्वयन। इसलिए कहा जाता है, इरादतन और गैर इरादतन। ऐसा इसलिए कि कई बार हमसे कोई गलती अनजाने में या अज्ञानतावश भी हो जाती है। ऐसी गलती बहुधा क्षम्य योग्य होती हैं। इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमारी सोच गलत होती है भले ही वह कार्यान्वयन न हो पाये। माना जावे तो यह सोच अक्षम्य ही है। सार यही कि किसी भी कर्म के लिए हमारे भाव और फिर उसका कार्यान्वयन के रूप में विभक्तिकरण होता है। सोच का निर्णय या यूँ माने सोच का प्रतिफल सीधे भगवान के हाथ में होता है और कार्यान्वयन का प्रतिफल भगवान, भाग्य के रूप देते हैं। अच्छे कर्म का प्रतिफल सौभाग्य और बुरे कर्म का प्रतिफल दुर्भाग्य के रूप में मिलता है। अत: सार यही कि हमें अच्छे कर्म के साथ-साथ, अच्छी सोच भी रखना चाहिए।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
" मेरी दृष्टि में " कर्म से भाग्य बनता है। बाकी कुछ भी नहीं होता है। जैसा कर्म वैसा भाग्य । जीवन भर कर्म ही भाग्य की श्रृंखला बनता है । वास्तव में सेवा भी कर्म है। जो भाग्य में अपनी भूमिका निभाता है। यही से कर्म की परिभाषा तैयार होती है।
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