रमणलाल देसाई की स्मृति में चर्चा परिचर्चा
अगर चरित्र, व्यक्तित्व और विचार की बात करें तो यह किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व के तीन प्रमुख स्तंभ हैं जो मिलकर उस व्यक्ति के व्यवहार और पहचान का निर्माण करते हैं जबकि चरित्र नैतिक मुल्यों ईमानदारी और नैतिकता का आंतरिक सार है और व्यक्तित्व बाहरी व्यवहार और स्वभाव है जो दुसरों को दिखाई देता है तथा विचार वह मानसिक प्रक्रिया है जो चरित्र और व्यक्तित्व को आकार देती है तो आईये आज की चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं कि हमारा चरित्र ही हमारा व्यक्तित्व है और हमारे विचार ही हमारी पहचान हैं मेरे ख्याल में व्यक्ति का चरित्र उसके नैतिक मुल्यों, विश्वासों और आंतरिक गुणों का संयोजन है जो यही दर्शाता है कि आप दुसरों के सामने कैसे दिखते हैं या कैसा व्यवहार करते हैं, यहाँ तक विचारों की भूमिका की बात है तो हमारे विचार ही हमारे कार्यों को जन्म देते हैं और जब विचार बार बार दोहराए जाते हैं तो वे आदत बन जाते हैं यही आदतें हमारे व्यक्तित्व और चरित्र की नींव रखते हैं, इसके साथ साथ चरित्र हमारे नैतिक मुल्यों विश्वासों और आंतरिक गुणों का समूह है जो यह तय करता है कि आप वास्तव में कौन हैं यही नहीं चरित्र का अर्थ ईमानदारी, दयालुता और विपरीत परिस्थितियों में भी नैतिक सिद्धांतों पर टिके रहने को कहा जाता है, दुसरी तरफ हमारे विचार ही हमारी बातों और कार्यों से झलकते हैं जिससे समाज में पहचान बनती है और व्यक्ति का चरित्र ही उसकी स्थायी संपत्ति है कहने का भाव व्यक्ति का चरित्र ही आंतरिक सदाचार को दर्शाता है जबकि उसके विचार उसकी बाहरी प्रतिष्ठा को, आखिरकार यही कहुँगा कि व्यक्ति का चरित्र और विचार ही उसके जीवन का आधार हैं वास्तव में विचार ही हमारे कर्मों को आकार देते हैं और उन्हीं कर्मों से हमारा चरित्र बनता है तथा चरित्रवान व्यक्ति को ही समाज में सम्मान, विश्वास और सफलता पाने में कामयाबी मिलती है जिससे उसके विचारों की पवित्रता और आचरण की दृढ़ता को समझा जाता है, इसलिए हमारा चरित्र ही हमारा व्यक्तित्व है और हमारे विचार ही हमारी पहचान हैं ।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके वस्त्रों, पद, धन या बाहरी आडंबर से नहीं होता, अपितु उसके चरित्र और विचारों से होता है। यही कारण है कि कहा गया है, “हमारा चरित्र ही हमारा व्यक्तित्व है और हमारे विचार ही हमारी पहचान हैं।” चरित्र वह दर्पण है जिसमें मनुष्य का वास्तविक स्वरूप दिखाई देता है। व्यक्ति अकेले में कैसा है, दूसरों के प्रति उसका व्यवहार कैसा है, सत्य और असत्य के बीच वह किसे चुनता है यही उसके चरित्र की नींव बनाते हैं। चरित्रहीन व्यक्ति चाहे कितना भी विद्वान या संपन्न क्यों न हो समाज में स्थायी सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरी ओर सच्चरित्र व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में रहकर भी लोगों के हृदय में विशेष स्थान बना लेता है। विचार मनुष्य की पहचान बनाते हैं। जैसा व्यक्ति सोचता है वैसा ही उसका व्यवहार और जीवन बनता जाता है। सकारात्मक विचार व्यक्ति को आशा, संवेदना और मानवता की ओर ले जाते हैं जबकि नकारात्मक सोच उसे भीतर से कमजोर कर देती है। महान व्यक्तियों की महानता उनके विचारों से ही प्रकट होती है। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के विचारों से पूरे विश्व को प्रभावित किया, वहीं स्वामी विवेकानंद ने अपने ओजस्वी विचारों से युवाओं को नई दिशा दी। आज के भौतिकवादी युग में व्यक्ति बाहरी आकर्षण को व्यक्तित्व समझ बैठा है, जबकि वास्तविक व्यक्तित्व भीतर की सच्चाई, विनम्रता, संवेदनशीलता और नैतिक मूल्यों से निर्मित होता है। सोशल मीडिया के इस दौर में लोग अपनी छवि बनाने में अधिक व्यस्त हैं परंतु सच्ची पहचान दिखावे से नहीं प्रत्युत विचारों और कर्मों से बनती है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
ऐसा माना जाता है कि हमारे सिर के पीछे एवं बायीं-दायीं ओर एक आभा मंडल होता है जो हमारे चारित्रिक विशेषताओं का प्रतीक होता है। महान संत,ज्ञानी और ध्यानी में यह सामर्थ्य होती है कि हमारे इस आभा मंडल को देख भी लेते हैं और समझ भी लेते हैं। इसी आभा मंडल का संक्षिप्त रूप हमारा व्यक्तित्व होता है। जो हमारे चेहरे , पहनावे और बातचीत करने की शैली से झलकता है। एक बात और, बातचीत की शैली हमारे व्यक्तित्व की पहचान कराती है, वहीं दूसरी ओर बातचीत से हमारे विचार भी प्रगट हो जाते हैं जो हमारी पहचान बतला देते हैं कि हम कैसी सोच, कैसी भावना, कैसे स्वभाव वाले हैं। सार यही कि हम जैसे होंगे, हमारा हाव-भाव भी वैसा हो जाता है और यही हमारी पहचान बन जाती है। अप्रत्यक्ष रूप से माने तो यही हमारा आकर्षण होता है। अंशत: सफल और असफल होने का कारक भी। अत: हम अपनी चारित्रिक विशेषताओं एवं सुविचारों के जितने धनी होंगे, हमारे व्यक्तित्व में , हमारे आभा मंडल में उतनी ही अधिक चमक-दमक होगी। हम उतने ही कामयाब रहेंगे।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
हमारा चरित्र ही हमारा व्यक्तित्व है, हमारे विचार ही हमारी पहचान है... इसमें कोई दो राय नहीं है। वास्तव में व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसका आचरण होता है जो उसके वास्तविक स्वरूप को दर्शाता है। अपने नैतिक गुणों, और लोगों पर अपने विश्वास को बनाए रखने एवं अपने व्यवहार से व्यक्ति का चरित्र उजागर होता है। उसी तरह हमारे विचार भी उच्चकोटि के सकारात्मक एवं दूसरों के हितों के लिए हो तो हम बड़े से बड़ा कार्य कर सकते हैं चूंकि हमारे विचार ही तो हैं जो हमारे द्वारा किए गए कर्म से हमारी पहचान बनाती है। सकारात्मक विचार से हमारी अच्छी छबि बनती है यानी समाज में हमारी पहचान बनाती है और वहीं नकारात्मक विचार हमारी छबि को धूमिल कर देती है।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
जीवन में चरित्र की अहम भूमिका होती है। जब हमारा अचरित्र रहेगा, तो क्या होगा। हमारा चरित्र ही हमारा व्यक्तित्व है, हमारे विचार ही हमारी पहचान है। वास्तविक रूप में यही हकीकत है। अच्छा कर्म से ही चरित्र और व्यक्तित्व में निखार आती है। हमारे जितने अच्छे विचार होगे, तो उतनी ही पहचान निरन्तर अग्रसर होती जायेगी.......।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
हमारा अन्तर्मन जब सत्य,ईमानदारी ,सद्भाव ,नियमित- व्यवस्थित जीवन, आत्म संयम के पथ पर चलने को प्रेरित करें तदनुरूप हम क्रियाशील होकर दया, शिष्टाचार को सामाजिक, पारिवारिक, देशहित ,विश्व हित में लगाते हैं। तब यह कार्य हमें आत्मनिर्भर, धन संपदा, मान सम्मान से युक्त कर देते हैं। यह उत्तम चरित्र का आकलन ही हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। उसके आचार में उसकी श्रेष्ठ समाज उपयोगी, सर्वहिताय , सर्वोत्मुखी, मंगलमय विचार सर्वत्र परिलक्षित होने लगते हैं । उसकी सोच ,कथनी, करनी में समानता दिखती है। हमारे विचार हमारे संस्कार, परिवार, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिदृश्य में ही पनपते हैं । जिससे हमारे सच्चरित्र महान व्यक्तित्व की श्रेणी की पहचान होती है। अतः इस चौकड़ी का यही नियम है - विचार + चरित्र + व्यक्तित्व+ पहचान ।
- डॉ . रेखा सक्सेना
मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश
अपनी सोच शब्द विचारों को वश में रखेंगे वहीआपके कर्म चरित्र का निर्माण करते है . समयानुकूल उपयोग व्यवहारिकस्ता जो आपके चरित्र का अवलोकन कर प्रभावशाली बनाते हैं ! वही सतकर्म साबित कर आपके चरित्र व्यक्तित्व की पहचान बता प्रभावशाली गुणकारी औषधि की तरह आपके जीवन संसार में लाभकारी साबित होते , आपके कर्म की पहचान बताते । आप बाहर से कैसे दिखते हैं, कितने पढ़े-लिखे हैं, किस पद पर हैं - इससे आपका असली व्यक्तित्व नहीं बताता । आपका चरित्र यानी ईमानदारी, दया, सच्चाई, दूसरों के साथ बर्ताव - यही आपके व्यक्तित्व की पहचान है। लोग आपको कपड़ों या ओहदे से नहीं, आपके स्वभाव और कर्म से याद रखते हैं।आप जो सोचते हैं, वही धीरे-धीरे आपकी बातों, काम और जिंदगी में दिखता है। अगर विचार सकारात्मक, उदार और रचनात्मक हैं तो पहचान भी वैसी ही बनेगी। सोच बदलो, तो जीवन की दिशा बदल जाती है !आप "कौन हैं" ये आपके कपड़े या पैसा नहीं बताता। आप "कैसा सोचते हैं" और "कैसा बरताव करते हैं" - बस यही आपकी असली पहचान है।
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके बाहरी रूप, धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं होती, बल्कि उसके चरित्र और विचारों से होती है। व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही बनता चला जाता है। उसके विचार ही उसके व्यवहार को जन्म देते हैं और व्यवहार धीरे-धीरे उसके चरित्र का निर्माण करता है। इसलिए कहा गया है — “हमारा चरित्र ही हमारा व्यक्तित्व है और हमारे विचार ही हमारी पहचान हैं।”चरित्र मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। यह वह दर्पण है जिसमें व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखाई देता है। सुंदर वस्त्र, मधुर वाणी और ऊँचा पद कुछ समय के लिए लोगों को आकर्षित कर सकते हैं, परंतु स्थायी सम्मान केवल अच्छे चरित्र से ही प्राप्त होता है। जिस व्यक्ति का चरित्र सच्चा, ईमानदार और विनम्र होता है, वह हर स्थान पर आदर पाता है। चरित्रहीन व्यक्ति चाहे कितना भी शिक्षित या सम्पन्न क्यों न हो, अंततः समाज में सम्मान खो देता है। इसी प्रकार विचार मनुष्य की पहचान बनाते हैं। सकारात्मक और उच्च विचार व्यक्ति को महानता की ओर ले जाते हैं, जबकि नकारात्मक सोच उसे पतन की ओर धकेल देती है। जिस मन में दया, प्रेम, सहानुभूति और सद्भाव के विचार होते हैं, वही मन दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाता है। अच्छे विचार जीवन में आशा, साहस और आत्मविश्वास भरते हैं। यही कारण है कि महापुरुषों ने सदैव अपने विचारों को शुद्ध और श्रेष्ठ बनाने पर बल दिया।आज के भौतिकवादी युग में लोग बाहरी चमक-दमक को ही व्यक्तित्व समझने लगे हैं, जबकि वास्तविक व्यक्तित्व भीतर की सच्चाई और संस्कारों से निर्मित होता है। यदि विचार पवित्र हों तो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही मार्ग नहीं छोड़ता। उसके कर्म समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने विचारों को सकारात्मक रखें, सत्य और नैतिकता का पालन करें तथा अपने चरित्र को श्रेष्ठ बनाने का निरंतर प्रयास करें। क्योंकि धन और सौंदर्य समय के साथ समाप्त हो सकते हैं, पर अच्छा चरित्र और श्रेष्ठ विचार व्यक्ति को अमर बना देते हैं। अंततः यही सत्य है कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका चरित्र होता है और उसके विचार ही उसकी वास्तविक छवि प्रस्तुत करते हैं।
- अलका पांडेय
मुंबई - महाराष्ट्र
चरित्र की परिभाषा बड़ी ही व्यापक और विस्तृत है। आम तौर पर पर समाज में चरित्र को वैयक्तिक शुचिता से जोड़ दिया जाता है जो लैंगिक संबधों की ओर इशारा करती है। लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग है। "चरित्र" इतनी छोटी परिभाषा नहीं है। चरित्र में आपके विचारों से लेकर आपके व्यवहार - - आपके संस्कार - - आपके संपूर्ण व्यक्तित्व तक का समावेश होता है। हाँ हमारे विचार ही हमारा व्यक्तित्व निर्धारित करते हैं। कहते हें कि जैसा खाओगे अन्न वैसा बनेगा मन। बिल्कुल इसी तरह हमारे खान-पान का हमारे जीवन और व्यवहार पर पर्याय से व्यक्तित्व पर बहुत असर पडता है। मांसाहारी व्यक्ति थोडे बहुत हिंसक होते हैं - - तद्नुसार उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में असौंदर्य लक्षित होता है। उनका गुस्सा बहुत तेज होता है। अतः स्पष्ट है कि चरित्र एक दिन में नहीं बनता। आपके संचित कर्म और आसपास का माहौल आपके चरित्र निर्माण और विचार प्रवाह पर बहुत प्रभाव डालते हैं। आपकी संचेतक बुद्धि जितनी व्यापक और सचेत होगी उतना ही आपके विचार और आपका चरित्र अभिनंदनीय होगा। चारित्रिक विशेषता पाखंड नहीं होतीं - - उन्हें तराशने और पाने में एक पूरा जीवन भी कम पडता है। यह पूँजी जन्मों जन्मों के संचिढ कर्मों से हासिल होती है।
- हेमलता मिश्र मानवी
नागपुर - महाराष्ट्र
मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व उसके बाहरी आडंबरों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र की स्वच्छता, संवेदनशीलता और नैतिक दृढ़ता से निर्मित होता है। चरित्र वह दर्पण है जिसमें व्यक्ति का आंतरिक सत्य दिखाई देता है। उसी प्रकार विचार केवल शब्द नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य की चेतना, संस्कार, दृष्टिकोण और जीवन-दर्शन की पहचान बन जाते हैं। उच्च विचार और उत्कृष्ट चरित्र मिलकर ही ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं जो समाज में विश्वास, प्रेरणा और सम्मान प्राप्त करता है। धन, पद और प्रसिद्धि क्षणिक हो सकते हैं, परंतु सच्चा चरित्र और सकारात्मक विचार सदैव अमर रहते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनते हैं।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
चरित्र पहचान है सही और गलत ।आपके मन के भाव को चरित्र ही बताता है।चरित्र से पूजा भी जाता है मानव और अपमानित भी होता है ।व्यक्तित्व को उजागर करता है । मन के भीतर क्या चल रहा है वो विचार से पता चलता है।आपकी मानसिकता क्या है विचार समक्ष रखता है ।
- सुधा पाण्डेय
लंदन
" मेरी दृष्टि में " हमारे विचार ही हमारी पहचान होती है। जो कर्म से आगे बढ़ते हैं। विचारों का अरदान प्रदान में ही समन्वय स्थापित करना होता है। यही कार्य चरित्र के विश्लेषण होता है। कुल मिलाकर कार्म का रोल जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
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