विश्वास का नाम ही ईश्वर है, विश्वास न हो तो सर्वशक्तिमान ईश्वर को भी नकारने में देर नहीं लगती और विश्वास हो तो बेजान पत्थर भी ईश्वर नजर आते हैं। इतना ही नहीं वो चमत्कारिक रुप से प्रभावित भी करते हैं।धर्म हमारी ईश्वर के प्रति आस्था का परिणाम होता है। जिस पर विश्वास, आस्था उसी के अनुसार धर्म। इसी के चलते तो विभिन्न धर्म अस्तित्व में आये।तरह तरह के विश्वास,तरह तरह की आस्था और तरह तरह के धर्म।मानो तो गंगा माता,न मानो तो बहता पानी। न मानो तो पत्थर और मानो तो माता रानी। हर धर्म में यही आस्था मूल में है।कह सकते हैं कि विश्वास और आस्था से ही धर्म और ईश्वर का नाम है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
मनुष्य जब संघर्ष से थककर भीतर की शांति खोजता है, तब उसे किसी सहारा देने वाली सत्ता की अनुभूति होती है—वही ईश्वर है। ईश्वर को देखा नहीं जाता, पर महसूस किया जाता है। यह अनुभूति तभी संभव है जब मन में विश्वास हो। अतः ईश्वर का मूल किसी बाहरी प्रमाण में नहीं, बल्कि भीतर के विश्वास में है। धर्म उसी विश्वास से जन्म लेता है। विश्वास जब नियम, विधि, मर्यादा, परंपरा और आचरण में रूपांतरित होता है, तब धर्म बनता है। इसलिए धर्म का मूल उद्देश्य भय नहीं, बल्कि आस्था और सद्भाव का विस्तार है। ईश्वर और धर्म में यही अंतर भी है—
ईश्वर — अनुभूति
विश्वास — सेतु
धर्म — परिणति
और जब यह त्रयी मनुष्य के जीवन में उतरती है, तब उसके भीतर मानवता का फूल खिलता है।अतः किसी भी धर्म का सर्वोच्च बिंदु ईश्वर नहीं, मानवता है।
- डाॅ.छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
सनातन सॅंस्कृति में एक ओर ईश्वर विश्वास का नाम है और दूसरी ओर धर्म आस्था का परिणाम है। यह कथन मानव चेतना के दो अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु शक्तिशाली आयामों को स्पष्ट करता है जिनके नाम विश्वास और आस्था हैं। विश्वास वह अदृश्य ऊर्जा है जिससे मनुष्य अपने भीतर शक्ति, शान्ति और धैर्य का संचार करता है। यह किसी रूप, किसी नाम या किसी पंथ का बंधन नहीं बल्कि मानव के अन्तःकरण में विद्यमान एक सार्वभौमिक सत्य है, जिसे हम ईश्वर के रूप में अनुभव करते हैं। जब विश्वास जीवन का आधार बनता है तब मनुष्य विषम परिस्थितियों में भी टूटता नहीं बल्कि संघर्ष के भीतर ही प्रकाश खोज लेता है। इसी प्रकार धर्म उसी विश्वास का बाहरी, संगठित और सामाजिक स्वरूप है। धर्म आस्था के फलस्वरूप जन्म लेता है, आस्था मन में उत्पन्न होती है और धर्म समाज में अभिव्यक्त होता है। धर्म मनुष्य को नीति, मर्यादा, चरित्र, अनुशासन और सहानुभूति प्रदान करता है तथा उसे समाज एवं राष्ट्र के प्रति कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनाता है। अतः सच्चा धर्म कभी विभाजन नहीं करता, बल्कि संयम, शील, करुणा, समानता और मानव कल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य ईश्वर को विवाद और प्रदर्शन का विषय न बनाकर विश्वास की ऊर्जा के रूप में स्वीकार करे तथा धर्म को कट्टरता का उपकरण न बनाकर आस्था का पवित्र परिणाम माने। जब विश्वास और आस्था का यह संतुलन स्थापित होता है तब सत्ता, व्यवस्था और समाज किसी संघर्ष में नहीं उलझते, बल्कि सहअस्तित्व, सद्भाव और मानवता के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ईश्वर मन का प्रकाश है और धर्म जीवन का संयम। जहाँ प्रकाश और संयम दोनों उपस्थित होते हैं, वहाँ मनुष्य न केवल आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- डॉ इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं (जम्मू) -जम्मू और कश्मीर
ईश्वर विश्वास का नाम है जीवन एक सुरंग बदलते रंग मौसम हालात में ईश्वर पर भरोसा कर आगे बढ़ता है ! दैनिक जीवन भी एक सुरंग बनाए टपरी वाले की अमृत तुल्य चाय समझ कर पीते हैं ! घर में रंग दिखाते चाय ज्ञान स्वरुप कहते हैं अदरक इलाइची डाल जीवन को सफल सुखमय ख़ुद को भी और सामने पिलाने वाले को भी सुखी देखना चाहते है ! पर ये हमारे मनोयोग की बात है ! हो सकता है उसके लिए रुचिकर ना हो वह आपका ईश्वर बनाई वस्तु में अनादर ना करना चाहता हो , यही अंतर स्वाद रंगीन मिज़ाज एक सुरंग बना धर्म के रास्ते चल अलग लाइन बनाता है ! उसे मानने मजबूर करता है उसके अनेक फायदे मतलब बता स्वयं रास्ते अलग कर बिस्वास जितना चाहता ही ! हथेली पर लिखे 6 -9 के समान जो सामने से देखने वालों और पीछे से एक सुरंग बनाए । अपनी संप्रभुता के रंग जमाए सुहाने पल याद कर पी ले ।चाय साथ ज़िन्दगी को सुरंग बनाए बदलते आज हाथ साथ मिलाए टपरी वाले की अमृत तुल्य चाय हर रूप में अपना रूप दिखाए मन दर्पण की सुखद अनुभूति सूरत से ज़्यादा सीरत दिखाए मानव मन सहअस्तित्व जगाए!
जीवन सत्यम सुंदरम बनाए
जनतंत्र को चरित्रवान बनाए
ख़ामियों को उजागर कर
मन से मन की बात कर
एक रंग सुंदर सुरंग बनाए !
धर्म आस्था का परिणाम है
ईश्वर और धर्म को समझने के लिए विश्वास को समझना जरूरी है!जिसमें आपकी आस्था होगी ! वही आपका कर्म धर्म होगा ! सोच इंसान अपने कर्म की ओर लग जाता है ! परिणाम को नहीं सोचता ! ईश्वर पर निर्भर हो अपने काम में लग जाता है ! जिसका परिणाम वर्तमान में इंसान भ्रमित हो भोग रहा है ईश्वर विश्वास का नाम है और धर्म आस्था का परिणाम है, यह एक सुंदर विचार है जो हमें ईश्वर और धर्म के महत्व को समझने में मदद करता है।धर्म आस्था का परिणाम है और हमें ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम को व्यक्त करने में मदद करता है।ईश्वर सृष्टि का रचनाकार है और हमें जीवन और संसार के महत्व को समझने में मदद करता है।पालन : ईश्वर हमें नैतिक मूल्यों का पालन करने और अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है।
- अनिता शरद झा
रायपुर - छत्तीसगढ़
हमारा देश धर्म और आस्था को मानने वाले देशों में प्रमुख है। यहाँ सर्व धर्म मानने वाले निवास रत हैं और अपने-अपने धर्म और आस्था के अनुसार स्वेच्छापूर्वक जीवनयापन करते हैं। हम हिन्दुओं के लिए ईश्वर आराध्य हैं।वही सब कुछ हैं, वही पालक हैं, वही रक्षक और जो कुछ भी गतिमान है, ईश्वर की मर्जी और उनकी कृपा से ही है। वे प्रार्थना से प्रसन्न भी होते हैं और गलती से अप्रसन्न भी। हमने हमारे कर्म दो श्रेणी में विभक्त हैं, अच्छे और बुरे जिन्हें क्रमश: पुण्य और पाप कहा गया है। यही नहीं कर्म के अनुसार, पाप-पुण्य कोआगे बढ़ाते हुए परिणाम में स्वर्ग और नर्क मिलने का भी विधान माना गया है। सार में कहा जाये तो सद्कर्म को प्रधानता दी गई है और इन सब की परिकल्पना का मूल उद्देश्य हमारा ईश्वर के प्रति विश्वास और धर्म के प्रति आस्था है। जिसका मुख्य आधार सद्कर्म करने की ओर प्रेरित करना है। जिसके एवज में उपहार स्वरूप स्वर्ग का आनंद है और इसके विपरीत सद्कर्म न करने पर दंड स्वरूप नर्क की यातनाएं हैं।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
ईश्वर विश्वास का नाम,धर्म आस्था का नाम है।ईश्वर कोई चीज नहीं- बल्कि हमारा एक विश्वास है। दिल कहता है “है कोई जो हमारा ख्याल रखता है जिसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता है," ईश्वर दिखता नहीं पर ईश्वर का अस्तित्व हमें महसूस होता है। विशाल सृष्टि में हम सभी जीव उनके कृतित्व के कृपापात्र हैं। जो सब कुछ देख रहा है” - वो ईश्वर है। धर्म आस्था का नाम है न कि नियमों का बोझ। धर्म जीवन जीने का एक तरीका है ने की कोई दिखावा, धर्म सिखाता है — प्यार, सच, दया, सहानुभूति,आस्था में हम बिना देखे विश्वास करते हैं ।. धर्म बिना आस्था के सिर्फ रिवाज है। आस्था के कारण ही ईश्वर को बिना देखे हम विश्वास करते हैं जिससे कि कठिन समय में हमें हौसला मिलता है। ईश्वर और धर्म के प्रति विश्वास और आस्था दोनों मन की असीम शांति के लिए जरुरी भी है। जिसके कारण हम अपने-अपने धर्म कर्तव्य का पालन करते हैं। माता है तो पुत्र के लिए धर्म, पुत्र हैं तो माता के लिए ,, शिक्षक है तो शिष्य के प्रति धर्म शिष्य का शिक्षक के प्रति धर्म आचरण करते हुए, परिवार, समाज और देश के प्रति अपने-अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
यह अटूट सत्य है कि ईश्वर को देखा तो नहीं जा सकता मगर आस्था और भरोसे से ही परमेश्वर तक पहुंचा जा सकता है,और स्वयं तथा ईश्वर पर अटूट विश्वास रखा जा सकता है और अनुभव भी किया जा सकता है क्योंकि कोई तो शक्ति है जो हमें आंतरिक शांति,और जीवन की चुनौतियों से निपटने का सहारा देती है,ठीक वैसे ही जैसे एक बूंद सागर से जुड़ कर शक्ति पाती है उसी प्रकार जो व्यक्ति ईश्वर शक्ति के साथ जुड़ जाता है उससे हर चिन्ता दूर भाग जाती क्योंकि उसे ईश्वर भक्ति पर अटल विश्वास होता है तो आईये आज का रूख इसी चर्चा की तरफ ले चलते हैं कि ईश्वर विश्वास का नाम है और धर्म आस्था का परिणाम है, मेरा मानना है कि ईश्वर पर भरोसा करना अति अनिवार्य व सच्चाई है क्योंकि ईश्वर की शरण में आकर व्यक्ति अपने आप को ऐसे सुरक्षित महसूस करता है जैसे कि एक बच्चा अपनी माँ की गोद में सुरक्षित महसूस करता है, क्योंकि यही एक आत्मविश्वास का दुसरा रूप है,जो खुद पर विश्वास करता है वही ईश्वर पर विश्वास करता है और इसी से जीवन में प्रगति संभव है देखा जाए विश्वास केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं बल्कि आत्मिक शक्ति का स्रोत भी है इसलिए जीवन का आधार ईश्वर से जुड़ने का दिव्य उपहार है, अगर धर्म की बात करें, तो आस्था वह चिंगारी है जो धर्म को प्रज्वलित करती है तथा धर्म उस अग्नि की रौशनी है जो आस्था को दिशा और उर्जा देती है जबकि आस्था ही धर्म की नींव है कहने का भाव किसी ईश्वर, सिदांत या सच्चाई पर अटूट विश्वास ही धर्म को जन्म देता है बिना आस्था के कोई धर्म नहीं गिना जाता क्योंकि धार्मिक आस्था ही जन्म,मृत्यु, संसार का जवाब देती है जिससे व्यक्ति को आत्मिक शांति,साहस सकारात्मकता मिलती है इसलिए धर्म आस्था का परिणाम है क्योंकि विश्वास और श्रद्धा ही धर्म का मूल आधार माना गया है,अन्त में यही कहुंगा कि धर्म आस्था से प्रेरित होकर जीवन को एक दिशा प्रदान करता है जिससे व्यक्तिगत आचरण, समाज और संसार को समझा जा सकता है हालांकि धर्म सिर्फ आस्था नहीं है इसमें नियम,परंपराएं भी शामिल हैं जो आस्था से मिलकर एक पूर्ण रूप धारण करती हैं, यही नियम ईश्वर पर विश्वास दिलाते हैं और आखिरकार आस्था का परिणाम बनते हैं।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
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