ठाकुर रोशन सिंह स्मृति सम्मान - 2026

        खुशी हर किसी को चाहिए और मिलनीं भी चाहिए। परन्तु खुशी का कोई पैमाना नहीं होता है इसलिए खुशी तो खुशी है। सभी को खुशी पानें का अधिकार है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं :- 
      बिलकुल सही बात है। सकारात्मक सोच सदैव व्यक्ति को प्रसन्नता देती है। सकारात्मक सोच रखने वाले को सदैव  सफ़लता मिलने की पूरी उम्मीद होती है। नकारात्मक सोच बिल्कुल विपरित दिशा यानी विफलता प्रसन्नता सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। इसीलिए हर व्यक्ति को अपनी सोच सदैव सकारात्मक रखनी चाहिए भले वह विपत्ति या किसी कारण से दुखी हो अगर सकारात्मक का हाथ थामकर आगे बढ़े तो बेशक मंजिल पा ही लेता है। सकारात्मक सोच व्यक्ति को सबल और सफल बनाती है।

- डॉ पूनम देवा

पटना - बिहार 

     जीवन का परिदृश्य सकारात्मक और नकारात्मक से शुभारम्भ होता है। दोनों शब्दांश को समझना अत्यन्त कठिन होता है। तब बोलचाल में सकारात्मक हो जाए कब नकारात्मक? सकारात्मक से हमेशा खुशी मिलती है, नकारात्मक से कभी खुशी नहीं मिलती है। एक तरफ से दोनों शब्दांश जीवन प्रसंग में सुख और दुख का अनुभव कराती है, जब तक यह अनुभूति न हो तब मजा भी नहीं आता है। किसी-किसी मानव की प्रवृति होती है, अच्छा देख नहीं सकते, उन्हें उंगली करने में मजा जरुर आता और सकारात्मक को नकारात्मक में परिवर्तित कर देते है, जिससे खुशी जीवन में नहीं मिल पाता, दुख के साये में जीवन यापन करना पड़ता है.....।

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

     बालाघाट - मध्यप्रदेश

        मेरी राय में यह बात पूरी तरह व्यवहारिक और सत्य है सकारात्मक सोच और व्यवहार से मन में आशा, ऊर्जा और संतोष पैदा होता है, जिससे खुशी स्वाभाविक रूप से मिलती है। सकारात्मक व्यक्ति हर परिस्थिति में सीख और संभावना देखता है,इसलिए उसका मन हल्का और प्रसन्न रहता है। वहीं नकारात्मकता क्षणिक तृप्ति या अहं की संतुष्टि तो दे सकती है, लेकिन उससे स्थायी खुशी नहीं मिलती। नकारात्मक सोच मन में असंतोष, तनाव और दूरी बढ़ाती है। इसलिए कहा जा सकता है कि खुशी का स्थायी स्रोत सकारात्मक दृष्टिकोण ही है, जो न केवल स्वयं को बल्कि आसपास के वातावरण को भी बेहतर बनाता है।

 - सुनीता गुप्ता 

कानपुर - उत्तर प्रदेश 

      सकारात्मक सोच मात्र शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि जीवन की दिशा है। कहने का अभिप्राय है कि सकारात्मकता वह प्रकाश है, जो मन के अंधकार को भेदकर मार्ग प्रशस्त करता है। उक्त सोच मन की वह शक्ति है जो टूटे हुए मनुष्य को पुनः खड़ा कर देती है अर्थात सकारात्मक दृष्टि वह अमृत है जो कठिन परिस्थितियों को अवसरों में बदल देती है, अपमान को ऊर्जा में बदल देती है। जिस व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टि होती है, वह बाधाओं में अवसर, अपमान में शिक्षा और पराजय में तैयारी खोज लेता है। इसके विपरित जो नकारात्मकता में डूब जाते हैं, वे अपनी ही क्षमता से युद्ध करने लगते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रसन्नता का स्रोत बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि आंतरिक दृष्टिकोण में छिपा है। यही कारण है कि सकारात्मकता से हृदय हल्का होता है, बुद्धि जागृत होती है, निर्णय स्पष्ट होते हैं और जीवन रचनात्मक हो जाता है। जबकि नकारात्मकता मन को संकीर्ण, विचारों को विषाक्त और व्यक्ति को पराधीन बना देती है। क्योंकि सकारात्मक मन भविष्य का निर्माण करता है और नकारात्मक मन भविष्य को भय का कैदी बना देता है। इसलिए वर्तमान समय में समाज, राष्ट्र और व्यवस्था, यह तीनों को उस सकारात्मक ऊर्जा की आवश्यकता है,जो क्रोध नहीं, संवाद लाए; निराशा नहीं, समाधान दे, मौलिक अधिकारों से पूर्व मौलिक कर्तव्यों को निष्ठापूर्वक करे और विघटन नहीं, राष्ट्र निर्माण करे। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं (जम्मू) — जम्मू एवं कश्मीर

       सकारात्मक सोच इंसान को आशावादी बनाती है - - इसके विपरीत नकारात्मक सौच इंसान को भीरु बनाती है। सकारात्मक सोच वाले लोग बेखटके कदम बढाते हैं और हर ओर सफलता पाते हैं और उन्हें हर काम करने में खुशी मिलती है जबकि नकारात्मक सोच से इंसान किसी भी कार्य को करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होते और असफलताओं से दुखी रहते हैं। पाजीटिव लोग लोकप्रिय होते है  - - खुशमिजाज होते हैं - - उनके मित्र उनपर स्नेह रखते हैं जबकि नेगेटिव लोग प्रायः अकेले होते हैं। इसलिये खुशियाँ उनके दर पर दस्तक नहीं देती। "जिंदगी एक सफर है सुहाना"ये पाजीटिव सोच है। इस सोच के साथ खुशियों के मेले होते हैं। इसके विपरीत "हे भगवान! ये क्या हुआ कैसे हुआ कब हुआ" अब क्या होगा "ये नकारात्मक सोच इंसान को दब्बू और डरपोक बनाती है। तात्पर्य यही कि हमारी सोच बुद्धि के सिद्धांत पर हो। अति सकारात्मकता के चलते असामाजिक तत्वों से धोखा न खायें और अति नकारात्मकता से जीवन को बोझ न बनायें। स्वविवेक से आगे बढें और जीवन की राहों पर समुचित बैलेंस से चलें।

- हेमलता मिश्र मानवी 

नागपुर - महाराष्ट्र 

       'सकारात्मक' और 'नकारात्मक' मानव की मानसिकता रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। जो कि मनुष्य की शारीरिक मानसिक आर्थिक और पारिवारिक स्थितियों पर काफी हद तक निर्भर करते हैं। सकारात्मक मानसिकता से मनुष्य जीवन में उन्नति करके आगे बढ़ता है और हमेशा खुश रहता है। नकारात्मक मानसिकता से ग्रस्त मनुष्य एक ही स्थान पर ठहर जाता है अथवा पीछे चला जाता है। अपनी अवनति के लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार होता है। सकारात्मक सोच से हर कोई अच्छाई को देखता है, यदि कुछ गलत भी लगता है तो उसे सही कर लेता है जबकि नकारात्मक मानसिकता से चारों ओर सिर्फ बुराई ही नजर आती है। वस्तुत: इसी लिए 

सकारात्मक से हमेशा खुशी मिलती है। 

नकारात्मक से कभी खुशी नहीं मिलती है।

-  संजीव "दीपक" 

 धामपुर (बिजनौर) - उत्तर प्रदेश 

      सकारात्मकता जीवन का वह दीपक है जो परिस्थिति चाहे जितनी भी कठिन हो, मन में आशा और शांति की रोशनी बनाए रखता है। सकारात्मक भाव से हमेशा खुशी, समाधान और सृजनात्मकता उपजती है। इसके विपरीत नकारात्मकता मन को संकुचित करती है, विश्वास को कम करती है और दुख तथा तनाव को बढ़ाती है। नकारात्मक भाव से कभी स्थायी सुख या समाधान नहीं मिलता, क्योंकि वह ऊर्जा को क्षीण करता है और दृष्टि को सीमित कर देता है। अतः जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना केवल विकल्प नहीं बल्कि जीवन का आवश्यक संस्कार है; इसी में विकास, स्वास्थ्य, संबंध और आंतरिक संतोष की राह छिपी होती है।

- डाॅ. छाया शर्मा

 अजमेर - राजस्थान

       सकारात्मकता अर्थात एक अच्छी , हितकारी , सहयोगात्मक सोच !! सकारात्मकता जब सदा अच्छे के लिए होती है , तो उसका परिणाम सदा हितकारी होता है , व सदा उस से खुशी ही मिलती है ! जब सकारात्मकता भले के लिए , होती है , सुख प्रदान करती है , तो निश्चित रूप से , उस से खुशी, व संतुष्टि ही मिलती है !! नकारात्मकता अर्थात किसी का बुरा सोचना , किसी के जीवन की राह में रोड़े बिछाना , दूसरों के दुखों का कारण बनना , दूसरों को हानि पहुंचाना !! इन सब नकारात्मक कृत्यों  का परिणाम सदा दुख होता है , व इनसे खुशी कभी नहीं मिल सकती ! जीवन मैं हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखना चाहिए , न कि नकारात्मक क्योंकि नकारात्मकता का परिणाम दुख ही होता है !! 

- नंदिता बाली 

सोलन - हिमाचल प्रदेश

     सकारात्मक का भाव निर्मलता का प्रतीक होता है,विशुद्ध का संकेतक है। जिसे सामान्य रूप में अच्छे,उचित और सही दिशा  में होने को माना और समझा सकता है। निश्चित ही जब दिलो-दिमाग में सकारात्मक  भाव रहेंगे तब इससे जो ऊर्जा का संचार होगा वह सुख-चैन करने वाला होगा, खुशी देने वाला होगा। सकारात्मकता के विस्तार से नकारात्मकता का ह्रास होता जाता है। यानी हम जितने अधिक सकारात्मक होंगे, उतने कम नकारात्मक होते जावेंगे। इसका सीधा कारण यह है कि हम जब सकारात्मक सोच रखेंगे तो हम में स्नेह,त्याग और क्षम्य का भाव होगा जिससे हमारा व्यवहार सौहार्द्रमय होगा। हम में आकर्षण होगा। मैत्रेय होगा। यही सुख-चैन स्थापित करेगा और इसी से खुशी मिलेगी, मन प्रफुल्लित और तन पुलकित होगा। इसके ठीक यानी सकारात्मक का विपरीत नकारात्मक होता है, जिसके परिणाम में, ऊपर जिन विशेषताओं का उल्लेख किया है,उसके विरुद्ध की तमाम खामियाँ ,कमियां और दोष के विकार उत्पन्न होंगे जो हमारी सौहार्द्रता का हनन करेंगे हमारे आकर्षण को खत्म करेंगे,संबंधों पर घात करेंगे। हमारा सुख-चैन छीने॔गे यानी सार यह कि नकारात्मक से कभी खुशी नहीं मिल सकती। अत: हमें सदैव सकारात्मक सोच रखना चाहिए। छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना चाहिए।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

       सकारात्मक से हमेशा खुशी मिलती है, नकारात्मक से कभी खुशी नहीं मिलती...। इसमें कोई दो राय नहीं है... सकारात्मक होना  हमारे जीवन को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाता है वहीं नकारात्मकता अंधेरे की ओर ...यदि हमारे सम्मुख कोई चुनौती आती है तो सकारात्मक सोच  हमें उसका सामना करने को कहती हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में यदि हमारी सोच सकारात्मक है तो बिना किसी शारिरिक तनाव के चुनौती पर खरा उतरना ही है, वहीं हमारी सोच में हमारे काम में, नकारात्मकता भरी हो तो हम किसी भी काम को शुरू करने से पहले ही हार जाते हैं । चूंकि पहले ही हम सोच लेते हैं कि इस काम को, सामने आई हुई चुनौति को मैं नहीं कर सकता...जिसके चलते वह तनाव में रहता है जो स्वास्थ के लिए हानिकारक होता है .. नकारात्मक होने की वजह से हम खुश नहीं रहते और जीवन की कीमती समय र खुशी को देते हैं। हमेशा हमें सकारात्मक होना चाहिए ना कि नकारात्मक।

- चंद्रिका व्यास 

 मुंबई - महाराष्ट्र 

       अक्सर देखा गया है कि सकारात्मकता खुशी की और ले जाने वाला एक शक्तिशाली मार्ग है जो मनुष्य की भीतर की शांति और संतोष को  बढ़ावा देता है जिससे जीवन की चुनौतियों का‌ सामना करते हुए भी इंसान खुश रहता है क्योंकि सकारात्मक दृष्टिकोण से  मन शांत रहता है जिससे तनाव कम होता है,तो आईये आज की‌ ‌चर्चा इसी बात पर करते हैं कि सकारात्मक से हमेशा खुशी मिलती है और नकारात्मक से कभी खुशी नहीं मिलती,मेरे विचार में खुशी‌और सकारात्मकता का आपस में गहरा सबंध है क्योंकि सकारात्मक सोच खुशी के हार्मोन को बढाती है,तनाव को कम करती है और मानसिक तथा शरीर‌‌ का सुधार करती है जबकि नकारात्मक विचारों से खुशी नहीं मिलती क्योंकि ऐसे विचार चिंता,तनाव और निराशा बढाते हैं जिससे‌ जीवन का आनंद खत्म हो जाता है तथा मानसिक और शारीरिक समस्याएं बढ़ती हैं,इस से‌ चिंता डिप्रेशन और आत्मविश्वास की‌ कमी जैसी‌ बिमारीयां हो सकती हैं, इसलिए सकारात्मकता महत्वपूर्ण है लेकिन नकारात्मक विचार भी मानवीय अनुभव का हिस्सा हैं मगर इनको हावी नहीं होने देना चाहिए,सकारात्मक बनने का प्रयास करना चाहिए जिसके लिए ‌सकारात्मक लोगों के‌‌ साथ रहना जरूरी है  इसके‌‌ साथ स्वस्थ जीवन शैली अपनानी जरूरी है और‌ लक्ष्य को ‌रख‌‌ कर अपने कदम बढत‌‌ की और‌‌‌ लेने का प्रयास करना  ,नियमित व्यायाम,स्वस्थ भोजन  और पर्याप्त नींद सेहत‌‌ के लिए जरूरी है,ताकि सकारात्मकता बनी रहे और हम हर तरह‌‌ से। चुस्त व दुरुस्त दिखें,अन्त में यही कहुंगा कि सकारात्मक विचार हमेशा खुशी देते हैं जबकि नकारात्मक विचार  व्यक्ति को दुख  में धकेलने का प्रयास करते ‌हैं लेकिन व्यक्ति को दुख  में परेशान नहीं होना‌‌‌ चाहिए ‌ताकि नकारात्मक विचार न बनें और  हमारा जीवन खुश मिजाज रहे जिसके लिए अकेलापन में न रहना ,संगीत सुनना,सकारात्मक लोगों के‌‌ साथ बातचीत करना‌‌ व‌‌ समय ‌गुजारना फायदेमंद ‌रहता है जिससे जीवन खुशहाल  रहता है‌‌।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर ‌

       मेरे में ज़ज़्बा है कि मैं कोई भी काम कर सकती हूँ। ऐसी विकसित भावना मुझे साकारात्मकता की ओर प्रेरित करती है। हर दिन अपने आप से ये कहना ज़रूरी होता है कि-

“मैं सक्षम हूँ।”

“मैं पर्याप्त हूँ।”

“मेरे पास बदलाव लाने की शक्ति है।”

शुरु-शुरू में यह थोड़ा बनावटी लग सकता है, लेकिन जैसे-जैसे हम इसे दोहरायेंगे, हमारा दिमाग उसे सच मानने लगता है! यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि हमारा दिमाग वही मानता है, जो हम बार-बार दोहराते हैं। तभी हमें ख़ुशी मिलती है-नकारात्मक सोच कोई जन्मजात से नहीं बनता है। यह समय के साथ, परिस्थिति, अनुभव, परवरिश, समाज और बार-बार दोहराए गए विचारों की देन होती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, वैसे-वैसे हमें अपनी आलोचना, असफलता, तुलना, डर और असुरक्षा जैसे अनुभव मिलते हैं जो हमें खुद पर शक करना सिखलाते जाते हैं। हमें दु:खी होने पर मजबूर कर देता है।इसलिए सकारात्मक से हमेशा खुशी मिलती है। 

नकारात्मक से कभी खुशी नहीं मिलती है।

- विभा रानी श्रीवास्तव 

  पटना - बिहार 

        यह सच है जब हम मन वचन कर्म से सकारात्मक रहते हैं तो निसंदेह जीवन के हर क्षेत्र में खुशी मिलती है। मनुष्य जीवन अपने आप में महत्वपूर्ण है ।हर पल अनमोल है। अत: हर पल खुश रहना चाहिए। इसके लिए हमें हर स्थिति में हमेशा अच्छाइयों पर ध्यान केंद्रित करना है। इससे हमारा मन मस्तिष्क सदैव बेहतर और सहज सफल रहेगा । माना जीवन है घटनाएं भी होगीं, पर हर परिस्थितियों से तालमेल बैठाते हुए  क्रोध को नियंत्रण करते हुए, जो हमें प्राप्त है, उससे ही खुशियों का आनंद लें, क्योंकि यदि हमने विषम परिस्थितियों या समय प्रतिकूलता पर अपने को आपे से बाहर कर दिया तो यह स्थिति समाज परिवार और स्वयं के जीवन के लिए दुखदाई हो जाएगी ।जो कार्य होना था वह भी नहीं होगा। अतः हमेशा अच्छा है ,अच्छा हो रहा है और अच्छा ही होगा, यही सोचें और क्रियात्मक भी रहें।

- डॉ.रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

      खुशी ऐसा भाव है जिसमें सकारात्मकता समाहित होती ही है। नकारात्मकता में तो खुशी का मिलना,या खुशी खोजना बेमानी ही है। जब सकारात्मक विचार ही नहीं होंगे तो फिर भला सकारात्मक, सर्जनात्मक काम कैसे होगा और कुछ सर्जनात्मक नहीं होगा तो फिर खुशी का क्या काम? खुशी तो कुछ सर्जन में ही मिलती है,टूटने में नहीं। इसलिए नकारात्मकता से दूर रहना बहुत जरूरी है। बहुत जरूरी है कि हम हमेशा सकारात्मक रहे,तो स्वत: ही प्रसन्नता के भाव बने रहेंगे।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर - उत्तर प्रदेश

      सकारात्मक सोच और सकारात्मक लोग… ये दोनों सफल और खुशहाल जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। नकारात्मक लोग आपके जीवन में आते हैं, आपकी सोच को दूषित करते हैं। आपके सही सोचने के दृष्टिकोण को बदल देते हैं। निराशा के भँवर में फँसने के लिए छोड़ देते हैं। खुशियाँ आपसे दूर हो जाती हैं और बीमार मानसिकता लिए हुए सही करने की क्षमता समाप्त होने लगती है। इसका दूसरा पक्ष है सकारात्मक सोच और सकारात्मक लोगों का जीवन में होना। यह होना भी जीवन को प्रभावित करता है लेकिन अच्छे रूप में। इससे आशान्वित बनते है, सही निर्णय लेने सही करने की क्षमता बढ़ती है। स्वस्थ मानसिकता बनती है और लोग आपको पसंद करते हैं, बात करना चाहते हैं। जीवन खुशियों से परिपूर्ण रहता है।सकारात्मकता ही सफल जीवन की भूमिका लिखती है।नकारात्मकता स्वयं को भी बर्बाद करती है और आसपास को भी प्रभावित करती है।

- डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई 

देहरादून - उत्तराखंड

          सकारात्मक कार्य में हमेशा शुभ भाव का समाहार होता है। वह कार्य अच्छाई के लिए किया जाता है। इसलिए उस कार्य से हमेशा खुशी मिलती है स्वयं को भी और अगले व्यक्ति को भी। नकारात्मक कार्य हमेशा विप्लव की जड़ बनते हैं। वह सोच कभी अच्छी नहीं होती इसीलिए परिणाम गलत मिलते हैं और इस स्थिति में खुशी का मिलना तो दुर्लभ ही है। इसीलिए हमेशा सकारात्मक सोच बनाकर चलें और नकारात्मकता का परित्याग करें।तभी खुशी ग्रहण कर पाएंगे।

- गायत्री ठाकुर 'सक्षम' 

नरसिंहपुर - मध्य प्रदेश 

 " मेरी दृष्टि में " खुशी में सकारात्मक बहुत जरूरी है। बिना सकारात्मक के खुशी असम्भव है। खुशी का कोई अंत नहीं है। खुशी कभी भी खत्म हो सकती है। जो समाज से अधिक स्वयं को अधिक अनुभव होती है। समाज हर खुशी को महत्व नहीं देता है। यह सच्चाई है।

               - बीजेन्द्र जैमिनी 

           (संचालन व संपादन)

Comments

  1. खुशी के लिए सकारात्मक भाव जरूरी है। नकारात्मकता कभी खुशी नहीं दे सकती।

    अमर क्रांतिकारी रोशन सिंह जी को शत-शत नमन

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