प्राचीन काल में ऋषियन अपने गुरुकुल से शिष्यों को कुशल प्रशिक्षित करते थे, उनके ज्ञान के प्रकाश से पूर्ण रूप से उन्हें ज्ञान प्राप्त होता था। ज्ञान मेरी शक्ति है, कर्म मेरा भाग्य है। यह सत्य है, जिसके परिप्रेक्ष्य में जीवन प्रसंग सुगमता के साथ व्यतीत होते रहता था। जब तक हमारी ज्ञान शक्ति प्रबल नहीं होगी, तब तक कर्म हमारा भाग्य नहीं हो सकता है। प्रतिदिन प्रातःकाल की बेला सूर्योदय से जब तक हम विश्राम नहीं कर लेते, तब तक हमारे साथ-साथ ज्ञान, शक्ति, कर्म, भाग्य साथ ही साथ चलते है। जैसे ही अचानक अप्रशिक्षित घटनाचक्र घटित हो जाए, तो सब कुछ परिवर्तित हो जाता है। इसलिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक हमें सोच समझकर ही चलना चाहिए, तभी ज्ञान शक्ति और कर्म भाग्य प्रबल दावेदार हो पाता है.........।
- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"
बालाघाट - मध्यप्रदेश
ज्ञान मेरी शक्ति है, कर्म मेरा भाग्य ....यह एक प्रेरणादायक विचार है यहां ज्ञान का प्रकाश हमें बिना फल की इच्छा लिए कर्म करने को प्रेरित करता है अर्थात भाग्य का निर्माण स्वयं की मेहनत और परिश्रम से करने को कहता है। बिना ज्ञान के कर्म व्यर्थ है और बिना कर्म के ज्ञान। यानी दोनों ही पूरक हैं... ज्ञान हमें सही निर्णय पर लाता है अर्थात उचित, अनुचित का बोध कराता है वहीं कर्म हमारे भविष्य का निर्माण करता है और यही रेखा है जिनके मिलते ही हम अपने मकसद में सफल होते हैं।
- चंद्रिका व्यास
मुंबई - महाराष्ट्र
मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन दो मौलिक स्तम्भों ज्ञान और कर्म पर आधारित होता है। ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य के मन, बुद्धि और अंत:करण को दिशा देता है, जबकि कर्म वह शक्ति है जो उस दिशा को वास्तविकता की भूमि पर उतारता है। जीवन तभी सार्थक बनता है जब मनुष्य जानने के साथ-साथ करने की दिशा में भी आगे बढ़ने का साहस रखता है, क्योंकि केवल विचार और इच्छाएँ ही नहीं, उनके अनुरूप कर्म भी आवश्यक हैं। ज्ञान को आन्तरिक दिव्य शक्ति माना गया है। यह मात्र सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि वह चेतना है जो अज्ञान के अंधकार को दूर करती है और मनुष्य को आत्मविश्वासी, विवेकपूर्ण और दूरदर्शी बनाती है। जिस व्यक्ति के पास सही ज्ञान होता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित बना रहता है, क्योंकि उसे निर्णय लेने की क्षमता और उपयुक्त दिशा प्राप्त होती है। इसी कारण ज्ञान को प्रकाश कहा गया है और वही मनुष्य की वास्तविक शक्ति भी है। ज्ञान वह दीपक है जो जीवन की अनिश्चितताओं और संघर्षपूर्ण राहों में मार्ग दिखाता है तथा व्यक्ति को परिस्थितियों के अनुसार सही विकल्प चुनने की सामर्थ्य प्रदान करता है। दूसरी ओर कर्म मनुष्य के जीवन का वास्तविक प्रेरक और भाग्य का सृजनकर्ता है। सामान्यतः भाग्य को किसी अदृश्य शक्ति या संयोग का परिणाम माना जाता है, किन्तु वस्तुतः भाग्य हमारे कर्मों का ही प्रतिफल है। मनुष्य आज जो करता है, कल वही उसका भाग्य बनकर सामने खड़ा होता है। इसीलिए कर्म को भाग्य को भोगने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि भाग्य को गढ़ने की कला कहा जाना चाहिए। कर्म व्यक्ति को आलस्य, भ्रम और भय से मुक्त करता है तथा उसे संघर्ष, आत्मनिर्भरता और सफलता की दिशा में प्रेरित करता है। कर्मशील मनुष्य कभी निराश नहीं होता, क्योंकि कर्म स्वयं ऊर्जा का स्रोत है। यही ऊर्जा जीवन को संबल देती है और आगे बढ़ने का साहस प्रदान करती है। ज्ञान और कर्म दोनों को पृथक करके देखना अधूरा दृष्टिकोण है। यदि ज्ञान के साथ कर्म न हो तो ज्ञान केवल कल्पना बनकर रह जाता है, और यदि कर्म के साथ ज्ञान न हो तो वह अंधी दौड़ बन जाता है। जब ज्ञान दिशा प्रदान करता है और कर्म गति, तभी जीवन सार्थक बनता है। दिशाहीन गति विनाशकारी होती है और गतिहीन दिशा निष्फल। इसलिए दोनों के संयुक्त होने पर ही मनुष्य अपने जीवन का वास्तविक निर्माता बनता है और अपनी नियति स्वयं गढ़ता है। जिस मनुष्य के पास ज्ञान होता है वह वास्तव में हारकर भी हारता नहीं, क्योंकि वह हार को अन्त नहीं बल्कि सीख समझता है और सीख पुनरुत्थान का साधन बनती है। इसी प्रकार जो व्यक्ति कर्म करता रहता है, वह अशक्त होकर भी अशक्त नहीं होता, क्योंकि उसके भीतर कल को बेहतर बनाने का साहस और आशा जीवित रहती है। यही कारण है कि यह सत्य केवल व्यक्ति के हित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रनिर्माण, चरित्रनिर्माण और आत्मनिर्माण की त्रिवेणी को भी स्पर्श करता है। अतः "ज्ञान मेरी शक्ति है, कर्म मेरा भाग्य है" कोई साधारण वाक्य नहीं, बल्कि क्रांतिकारी जीवनसूत्र है जो मनुष्य को जागरूक सोच, साहसिक निर्णय और जिम्मेदार कर्म की दिशा में अग्रसर करता है। यही सूत्र मनुष्य को आत्मनिर्भर, आत्मदीप्त और आत्मविजयी बनाता है।
- डॉ. इंदु भूषण बाली
ज्यौड़ियॉं(जम्मू) - जम्मू और कश्मीर
“ज्ञान मेरी शक्ति है, कर्म मेरा भाग्य है।” – इस वाक्य में जीवन-दर्शन का पूरा तंत्र समाया हुआ है।ज्ञान – शक्ति का आधार है।ज्ञान केवल सूचना नहीं, बल्कि समझ, अनुभूति और दृष्टि है। जब बुद्धि में प्रकाश होता है, तब मनुष्य: सही और गलत का भेद करता है निर्णयों में स्थिर होता है,भ्रम और भय से मुक्त होता है, नव-सृजन की ओर अग्रसर होता है। अज्ञान वही है जो मनुष्य को बाँधता है; ज्ञान वह है जो मनुष्य को मुक्त करता है। इसलिए ज्ञान शक्ति है — क्योंकि शक्ति वहीं है जहाँ स्वतंत्रता है। कर्म – भाग्य का निर्माता है। भाग्य को अक्सर लोग नियति समझ लेते हैं, पर वास्तव में: भाग्य = कर्म का परिणाम + समय का उपहार है। कर्म वही क्षेत्र है जहाँ हमारी इच्छा, संकल्प और पुरुषार्थ काम आते हैं। जब कर्म सजग होता है, तो भाग्य संवरता है। यही कारण है कि वेदों से लेकर गीता तक संदेश मिलता है:कर्म करो, फल स्वतः आएगा। यहाँ कर्म केवल क्रिया नहीं, बल्कि कर्तव्यबोध, नैतिकता और समर्पण से जुड़ा है। ज्ञान व कर्म का परस्पर संबंध है।ज्ञान बिना कर्म — सूखा विचार है। कर्म बिना ज्ञान — अंधी दौड़ है। दोनों मिलकर ही जीवन में समरसता पैदा करते हैं। यह वही सूत्र है जिसने सभ्यताओं को आगे बढ़ाया:
विज्ञान (ज्ञान) + तकनीक (कर्म)
नीति (ज्ञान) + प्रशासन (कर्म)
अध्यात्म (ज्ञान) + साधना (कर्म)
यदि कोई कहे —“भाग्य ऐसा था इसलिए ऐसा हुआ” तो यह दृष्टि अधूरी है। सही दृष्टि यह होनी चाहिए —“मैं जैसा कर्म करूँगा, वैसा भाग्य बनेगा।” यह मनुष्य को जिम्मेदारी, आत्मबल और स्वप्रेरणा देता है। समाज का निर्माण भी इन्हीं दो तत्वों से होता है:- शिक्षा (ज्ञान) समाज को दिशा देती है और श्रम (कर्म) समाज को गति देता है। दिशा + गति = विकास। जहाँ एक भी तत्व कमजोर हो, वहाँ विकास रुक जाता है। आध्यात्मिक स्तर पर यह वाक्य अद्भुत है, क्योंकि यह कहता है:- “मैं निर्माता हूँ — अपने भीतर भी और बाहर भी।” ज्ञान से मनुष्य भीतर की वास्तविकता जानता है और कर्म से वह बाहरी जगत से सामंजस्य करता है। ज्ञान और कर्म दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्ञान बिना कर्म केवल विचार बनकर रह जाता है और कर्म बिना ज्ञान अंधी गति बन जाता है। जब दोनों का मेल होता है, तब व्यक्ति अपने जीवन की दिशा और गति दोनों निर्धारित कर पाता है। ऐसे व्यक्ति न केवल अपना भाग्य संवारते हैं, बल्कि समाज, परिवार और राष्ट्र के विकास में भी योगदान देते हैं। इस प्रकार उक्त वाक्य मनुष्य को आत्मनिर्भर, कर्मशील और जागरूक बनने का संदेश देता है और यह सत्य स्थापित करता है कि मनुष्य अपने भाग्य का लेखक स्वयं है।
- डाॅ. छाया शर्मा
अजमेर - राजस्थान
ज्ञान मेरी शक्ति है, कर्म मेरा भाग्य है। आज की परिचर्चा का विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह विषय मनुष्य के जीवन में बहुत ही अहम भूमिका निभाता है। इन दोनों के कारण ही मनुष्य की प्रारब्ध का निर्धारण हो जाता है। जहाँ ज्ञान के साथ कर्म चल पड़ता है। मनुष्य के भाग्य के साथ सारी भूमिकाएं चाहे, वह सामाजिक, राजनैतिक क्षेत्र में हों, सांस्कृतिक क्षेत्र में हों या आर्थिक में, सभी एक सशक्त छाप छोड़ती हैं। क्योंकि ज्ञान व्यक्ति को योग्य ,सक्षम,आत्मविश्वासी, दृढ़निश्चय वाला, दूरदर्शी विवेकशील और प्रभावशाली बनाता है। जिससे वह सही निर्णय लेने वाले विवेक का स्वामी बन जाता है। समस्याओं का हल निपुणता से कर सकता है। अपने साथ सभी के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। ज्ञान, अज्ञानता के अंधकार को दूर करके मन-मस्तिष्क को ज्ञान रूपी प्रकाश से आलोकित कर देता है। जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल हो पाता है। इसी कारण वह समाज में महत्वपूर्ण साकारात्मक योगदान देता है। इसके अतिरिक्त ज्ञान की शक्ति से हम समस्या समाधान, सही समय पर सही निर्णय लेने से नेतृत्व की क्षमता व योग्यता पाते हैं। ज्ञान,आत्मविश्वास, आत्मबल बढ़ाता है। व्यक्ति को अपने जीवन पर अनुशासित नियंत्रण पाने में मदद करता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र के ज्ञान से व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझता है। यही वह अक्षय संपत्ति है, जिसे कोई भी व्यक्ति छीन नहीं सकता। इसी संचित ज्ञान संपत्ति से, वह समाज में महत्वपूर्ण साकारात्मक और रचनात्मक बदलाव ला सकता है। लोगों तथा अपने लिए, न्याय के लिए लड़ सकता है। इसीसे समाज व देश में प्रगति, विकास स्वास्थ्य,शिक्षा,विश्लेषण, समालोचना,अनुसंधान एवं अन्य क्षेत्रों में अनुभव और कर्म के माध्यम से प्रगति लाता है। वास्तव में यही गुण प्रजातांत्रिक नेतृत्व के लिए जरूरी होते हैं। इन्हीं कर्मों को जो व्यक्ति वर्तमान में संचित करता है। भविष्य में इन्हीं से उसके भाग्य का उदय होता है। क्योंकि आत्मिक और शतपथ का ज्ञान मन-मस्तिष्क को शांत व एकाग्रचित करता है। जिससे सांसारिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले व्यवधानों और तनाव को कम करता है। यही ज्ञान की वह कर्मशक्ति है जो भाग्य के द्वार खोलती है। इसलिए ज्ञानार्जन और निष्काम कर्म भाग्य के द्वार खोलता है, यह कहना गलत नहीं होगा। उपर्युक्त विश्लेषण से कहा जा सकता है कि ज्ञान मनुष्य की शक्ति है और कर्म उसका भाग्य है।
- डॉ. रवीन्द्र कुमार ठाकुर
बिलासपुर - हिमाचल प्रदेश
ज्ञान शक्ति का द्योतक होता है... ज्ञान अर्जित करने की कोई सीमा नहीं होती ! ज्ञान न केवलपुस्तकों से मिलता है , अपितु ये स्वयं के अनुभव , व दूसरों के अनुभव से भी प्राप्त किया जा सकता है ! ज्ञान मेरी शक्ति का प्रतीक है ! कर्म मेरा भाग्य है क्योंकि जैसे मेरे कर्म होंगे , वैसा मेरा भाग्य होगा ! मेरे प्रयास अथवा कर्म सार्थक होंगे , और सफलता दिलाने मैं यदि सहायक होंगे, तो ममेरा भाग्य उज्वल होगा ! अपने भाग्य को हम स्वयं , अपने कर्मों से , परिवर्तित कर सकते हैं ! कर्म व्यक्ति का भाग्य निर्धारित करने में , अहम भूमिका निभाते हैं !!
- नंदिता बाली
सोलन - हिमाचल प्रदेश
ज्ञान ही शक्ति है। ज्ञान न हो तो शक्ति होते हुए भी उसका इस्तेमाल नहीं हो सकता। ज्ञान के बल पर, कम शक्तिशाली भी बड़े शक्तिशाली को परास्त कर सकता है। उस खरगोश की कथा इसका श्रेष्ठ उदाहरण है जिसने ज्ञान के बल पर शेर को कुएं में कुदा दिया और सभी निरीह जानवरों को उसके आतंक से छुटकारा दिलाया। इसी ज्ञान से किये कर्म, भाग्य बनाते हैं। ज्ञान पूर्वक सही दिशा में किये गये कार्य भाग्य का निर्माण करते हैं। ज्ञान ही हमारे व्यवहार आचार विचार को प्रभावित करता है और इसके अनुरूप ही हमारे कर्म होते हैं।इसलिए ज्ञान मेरी शक्ति है और कर्म मेरा भाग्य है।यह बात बिल्कुल सही है।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर - उत्तर प्रदेश
यह विचार जीवन का गहरा सत्य कहती है। ज्ञान मनुष्य को सही-गलत की पहचान देता है, दिशा दिखाता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है यानि वही हमारी वास्तविक शक्ति है। पर केवल जान लेना ही पर्याप्त नहीं होता। कर्म उस ज्ञान को जीवन में उतारने का माध्यम है, और वही हमारे भविष्य को आकार देता है। ज्ञान बिना कर्म के निष्क्रिय है, और कर्म बिना ज्ञान के दिशाहीन। जब दोनों साथ चलते हैं, तभी भाग्य भी साथ देता है। इसलिए कहा जा सकता है कि ज्ञान हमें सक्षम बनाता है और कर्म हमारे भाग्य को गढ़ता है।
- सुनीता गुप्ता
कानपुर - उत्तर प्रदेश
हम जितने ज्ञानवान होंगे जीवन की जटिलताओं को समझने के साथ-साथ, स्वयं,परिवार, समाज और राष्ट्र के उत्थान एवं समग्र विकास में उतने ही सामर्थ्यवान बन सकेंगे। ज्ञान हमारे बौद्धिक स्तर को निखारता भी है और संवारता भी है। यह तर्क-वितर्क करने, सही-गलत, उचित-अनुचित को पहचानने की सामर्थ्य देता है। उलझनों को सुलझाने, न्यायोचित कार्य करने की ,जीवन मूल्यों की धारण और प्रसारण की चेतना पैदा करता है। अत: हमारा ध्येय सदैव ज्ञान अर्जन करने का रहना चाहिए जो हमें सतत अध्ययन, सत्संग और सद्कर्म से मिलता भी है और परिमार्जित करते हुए सशक्त भी करता है। यानी यह स्वीकार्य होना ही चाहिए कि ज्ञान, मेरी, हमारी,सभी के जीवन जीने की कला है, शक्ति है। यही कर्म की न केवल प्रेरणा देता है,बल्कि कर्म कराता भी है और फिर भाग्य के रूप का निर्माण करता है। जीवन का दर्शन, जीवन का आध्यात्म, जीवन का मर्म, जीवन का गणित,जीवन का चक्र सब कुछ इसी में निहित है। हमें प्राथमिकता से इसे समझना और अनुशरण करना चाहिए।
- नरेन्द्र श्रीवास्तव
गाडरवारा - मध्यप्रदेश
ज्ञान, कर्म और भाग्य का अन्योन्याश्रित संबंध है. ज्ञान कर्म करने के लिए मार्गदर्शक होता है, ज्ञान से ही कर्म की दिशा निर्धारित होती है. दिशा सही हो तो दशा भी सही होती है अर्थात कर्म अच्छे होते हैं. यही कर्म आगे चलकर भाग्य बनाते हैं. इसलिए मेरा कर्म ही मेरा भाग्य है, ऐसा मानकर काम करने वाला कभी हारता नहीं क्योंकि, वह निरंतर अपना ज्ञान वर्धित कर सही दिशा में सही कर्म करते हुए अपना सौभाग्य प्राप्त करने में कार्यरत रहते हैं.
- लीला तिवानी
सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया
देखा जाए ज्ञान वह शक्ति है जो सही गलत अच्छे बुरे का भेद बताती है जिससे हम समझदारी और विवेक से निर्णय ले पाते हैं तथा कर्म हमारे भविष्य का निर्माण करते हैं इसलिए भाग्य हमारे वर्तमान और पिछले कर्मों का परिणाम है, यही नहीं जो व्यक्ति कर्म को महत्व देता है और अच्छे कार्य करता है वह अपने भाग्य को स्वयं बनाता है और कभी हारता नहीं क्योंकि कर्म ही जीवन की दशा और दिशा तय करता है, तो आईये आज की चर्चा इसी बात पर करते हैं कि , ज्ञान मेरी शक्ति है कर्म मेरा भाग्य है, यहां तक ज्ञान की बात है यह हमें सही गलत का अंतर समझने और सोच समझकर निर्णय लेने में मदद करता है,जिससे हम जीवन की बाधाओं को पार किया जा सकता है यही नहीं,इसी से हम आत्मविश्वासी बनते हैं ,कोई भी हमें दबाव में नहीं डाल सकता, इसके अतिरिक्त ज्ञान वो शक्ति है जो मनुष्य को किसी भी कार्य को सही निपटाने में मदद करती है, इससे निर्णय लेने की क्षमता ,समस्या का समाधान,आत्म सुधार, आत्मज्ञान जैसी बातों में सुधार होता है और सबसे बड़ी बात यह है कि न इसे कोई बांट सकता है न चुरा सकता है इसलिए यह मनुष्य का सबसे ज्यादा शक्तिशाली खजाना है जो जिंदगी भर खत्म नहीं होता, यहां तक कर्म की बात है तो कर्म से ही भाग्य बनता है,कर्म से ही एक अच्छा भविष्य बनाया जा सकता है,क्योंकि कर्म ही जीवन की नींव है और सही कर्मों से ही व्यक्ति सफलता और सुख को प्राप्त कर सकता है, हमारे आज के कर्म हमारे कल के भाग्य का निर्माण करते हैं और हमारे पिछले कर्म हमारे वर्तमान का भाग्य बनाते हैं अगर हम सकारात्मक कर्म करते हैं तो हम अपने भाग्य को उज्ज्वल बना सकते हैं इसलिए बिना स्वार्थ के हमें कर्म करते रहना चाहिए जिससे मन को शांति मिलती है इसके साथ अपने कार्यों में पवित्रता और ईमानदारी लानी चाहिए जिससे हमारे भाग्य में चार चांद लगें यही नहीं भक्ति और ईश्वर पर विश्वास से कर्म के प्रभाव को बदला जा सकता है,अन्त में यही कहुंगा की ज्ञान के बिना शक्ति किसी काम की नहीं है और अच्छे कर्मों के बिना भाग्य अधूरा ही रहता है,इंसान को चाहिए हर कार्य में अपनी बुद्धि का सच्चा व अच्छा प्रयोग करे और अपने कर्मों का हमेशा सदुपयोग करे इसी में महानता है।
- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा
जम्मू - जम्मू व कश्मीर
इन दो पंक्तियों में पूरा जीवनसूत्र समाया हैज्ञान मेरी शक्ति है क्योंकि जो समझता है, वही निर्भय होता है।अज्ञान में आदमी हालात का गुलाम बनता है, ज्ञान में वह अपने निर्णयों का स्वामी बनता है।कर्म मेरा भाग्य है क्योंकि भाग्य कहीं लिखा हुआ नहीं, हर दिन हमारे हाथों से लिखा जाता है। आज का कर्म ही कल की लकीर बनता है। इसलिए सच यही है ज्ञान रास्ता दिखाता है, कर्म उस रास्ते को भविष्य में बदल देता है।
- अंजू खरबंदा
दिल्ली
“ज्ञान और शिक्षा ही हमारी असली शक्ति होती है परंतु कर्म हम भाग्य के अनुसार कर पाते हैं, जो ईश्वर को मंजूर होता है वही कर्म हम करते हैं _ज्ञान और शिक्षा हमारी पावर है वो तुम्हें समझाती है कि क्या सही है, क्या गलत है। _“ज्ञान वो मशाल है जो हमारे रास्ते को रोशन करती है।”_जिसके कारण हम जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान कर लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं जो कर्म हम कर रहे है वो वास्तव में ईश्वर की मंजूरी से होता है,जो ईश्वर को मंजूर होता है, वही होता है।कर्म तो भाग्य का हिस्सा है अगर हमारे भाग्य में है कि हम डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा करें,तो अवश्य ही डाक्टर बनेगे,सेना में जाकर देश की सेवा करें .....तो यह हमारे भाग्य पर ही निर्भर है। ज्ञान और शिक्षा हमारी असली शक्ति है — लेकिन कर्म करने के लिए ईश्वर की मर्जी भी जरूरी है। इसलिए ज्ञान बढ़ाने के लिए शिक्षा और अनुभव प्राप्त करके अपने धर्म का पालन करते हुए कंर्म करना चाहिए , और ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए, प्रतिदिन चर्चा परिचर्चा में अपने ज्ञान की शक्ति से पोस्ट करना मेरा कर्म परन्तु डिजिटल सम्मान प्राप्त करना
- रंजना हरित
बिजनौर - उत्तर प्रदेश
कर्म ही भाग्य का निर्धारक होता है। आज नहीं तो कल मगर निश्चित रूप से होता है।
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