फकीरमोहन सेनापति स्मृति सम्मान - 2026

      सुख सभी चाहते हैं। परन्तु भाग्य से मिलता है। यही सत्य है। भाग्य में सुख है तो अवश्य मिलेगा। जो संसार यानी प्रभु का नियम है। कर्म अपनी सम्पत्ति  होता है। जैसा आप का कर्म वैसी आपकी सम्पत्ति होती है। यही कुछ जैमिनी अकादमी की चर्चा परिचर्चा का प्रमुख विषय है। अब आयें विचारों में से कुछ विचार पेश करते हैं:-
     सुख भाग्य की देन है !मतलब ख़ुद के मेहनत से कमाई संपत्ति फिर पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से अर्जित करता है उसे वह अपने कारोबार में लगाता है । अपना भाग्य चमकता है उस साधारण से व्यवसायी के दो बेटे करोड़पति होते है ! उन्हें पिता द्वारा कमाई दौलत मिली!और करोड़पति बेटे का भाग्य उज्ज्वल होता है और वह अरबपति बन जाता है इस तरह संपत्ति कर्म की देन होती है ! जिसमें भाग्य का महत्व , हमें सुख और दुख के अनुभव प्रदान करता है, जो हमारे जीवन को रंगीन बनाते हैं।सुख अनिश्चिता पर भाग्य निर्भर करता है, इसलिए हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। सुख की प्राप्ति के लिए संतुष्टि आवश्यक है! जो हमें भाग्य के अनुसार जीवन जीने में मदद सफलता प्रदान करता है। हमारे जीवन को सुरक्षित और समृद्ध बनाता है !लक्ष्यों को प्राप्त करने में भाग्य मदद करता है।कर्म की शक्ति अपने जीवन को बदलने में मदद करती है और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। प्रत्यक्ष उदाहरण देश के सफल व्यवसायी बने जिन्होंने अपनी लगन मेहनत से एम्पॉयर खड़े किया !भाग्य ने उसका साथ दिया मेहनत करने वालों की हमेशा जीत होती है। आम के वृक्ष फलदार राहों में आम जन को भी इसका फायदा मिले इसलिए लगाते ! हर इंसान उसका फल उसे ही मिले ! यही संपत्ति उसके कर्म की देन है !भाग्य से लड़ कर आगे बढ़ते है! 

- अनिता शरद झा

रायपुर - छत्तीसगढ़ 

      अगर  सुख और  सम्पत्ति की बात करें तो तो यह किसी एक की देन नहीं है किन्तु यह कड़ी मेहनत सही मानसिकता, संतुलन, शांत जीवन और सही कर्मों का परिणाम है क्योंकि असली सुख तो संतोष, प्रेम और  ज्ञान  से आता है जिसे भगवान के भजन या ध्यान जैसे तरीकों से पाया जा‌ सकता है इसके साथ साथ यहां मनुष्य प्रयास करता है वहाँ ईश्वर व प्रकृति उसकी मदद जरुर करती है,तो आईये आज का रूख सुख और भाग्य की और ले चलते हैं और इसी पर चर्चा  करते हैं कि सुख भाग्य की देन है और सम्पति कर्म की देन है, मेरा मानना है कि सुख और  दुख मुख्य ‌रूप से हमारे अपने कर्मों का फल है और भाग्य ‌केवल परिस्थितियों को प्रभावित करता है जो कर्मों से बनती हैं देखा जाए सच्चा सुख अपने कर्मों और इरादों से मिलता है न केवल भाग्य के भरोसे बैठ कर क्योंकि भाग्य भी कर्मों का परिणाम है,देखा जाए भाग्य वह जमीन है जिस पर हम खड़े होते हैं लेकिन उस जमीन पर फसल हमारे कर्मों से उगाई जाती है इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, यहां तक सुख संम्पति की बात है यह तो अक्सर आंतरिक शांति,संतोष, प्रेम,धर्म अच्छे कर्म,दान ,परोपकार कड़ी मेहनत,अनुशासन और अच्छी ‌सोच से  आते हैं वास्तव में सच्चा सुख स्वंय को समझने और दुसरों को प्रेम देने से मिलता है इसलिए मन में प्रेम और विश्वास और दुसरों के प्रति दया रखना ही सच्चा आनंद है, इसके साथ साथ सत्य,सेवा का भाव,दान और परोपकार और ईश्वर पर विश्वास करने से भी  सुख और संम्पति का विस्तार होता है, अन्त में यही कहुंगा कि सुख और शांति के स्रोत बाहरी और आंतरिक भी हो सकते हैं जैसे संतोष, प्रेम,सकारात्मक सोच इत्यादि  सच्ची शांति देते हैं जबकि  धन,संपति,जैसे भूमी,भवन अच्छा करियर और अच्छे संबंध बाहरी स्रोत हैं जो मन को शांत करते हैं इसके साथ धर्मशील रहने‌ से सुख संम्पति मिलती है,  माना की धन और संम्पति जीवन को आरामदायक बनाते हैं लेकिन सच्चा सुख आंतरिक होता है जो अपनी सही सेहत,संतोष, प्रेम और मानवीय गुणों से मिलता है इसलिए सुख संपति दोनों के लिए जीवन में संतुलन और सही मुल्यों का होना जरूरी है, यही‌ नहीं सुख और शांति बाहरी चीजों से‌ कम, मन की‌ स्थिति और सही दृष्टिकोण से अधिक मिलते हैं और  दान,प्रेम धर्म के मार्ग पर चलकर तथा कड़ी मेहनत करने से ही‌ व्यक्ति सच्चा‌ सुख और समृद्धि पा‌ सकता है।

- डॉ सुदर्शन कुमार शर्मा

जम्मू - जम्मू व कश्मीर 

     सुख वास्तव में भाग्य की देन ज्यादा लगता है। कितने लोग मेहनत करते हैं, फिर भी आंतरिक शांति या खुशी से वंचित रह जाते हैं। भाग्य यहाँ जन्मजात स्वभाव, पारिवारिक पृष्ठभूमि या अप्रत्याशित घटनाओं के रूप में आता है—जैसे स्वस्थ शरीर, प्रेरणादायक रिश्ते या सकारात्मक दृष्टिकोण। उदाहरणस्वरूप, दो भाई एक जैसे संघर्ष करें, लेकिन एक को सुख मिले तो भाग्य का हाथ स्पष्ट है। दूसरी ओर, संपत्ति कर्म की देन है—यहाँ कोई शक नहीं। कड़ी मेहनत, बुद्धिमत्ता और अवसरों का सदुपयोग ही धन जोड़ता है। इतिहास गवाह है: धीरूभाई अंबानी या jack Ma जैसे लोग भाग्य के बजाय कर्म से चमके। भले ही भाग्य प्रारंभिक अवसर दे, लेकिन संपत्ति बनाए रखना शुद्ध कर्म पर निर्भर है।

 - सुनीता गुप्ता

 कानपुर - उत्तर प्रदेश 

     यह कथन जीवन के दो महत्त्वपूर्ण पक्षों—सुख और संपत्ति—के भिन्न स्रोतों को स्पष्ट करता है। भारतीय दर्शन में माना गया है कि सुख केवल भौतिक साधनों से नहीं मिलता, बल्कि यह मनःस्थिति, संतोष और पूर्वजन्मों के संचित संस्कारों से जुड़ा होता है। कई बार व्यक्ति के पास पर्याप्त साधन होते हुए भी वह दुखी रहता है, जबकि सीमित संसाधनों में रहने वाला व्यक्ति भी आनंदित दिखाई देता है। इससे स्पष्ट होता है कि सुख भाग्य, दृष्टिकोण और मानसिक संतुलन का परिणाम है। वहीं संपत्ति का संबंध मुख्यतः कर्म से है। परिश्रम, ईमानदारी, लगन और निरंतर प्रयास से व्यक्ति धन, प्रतिष्ठा और साधनों का अर्जन करता है। जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, वह जीवन में उन्नति करता है। कर्म के बिना संपत्ति की कल्पना अधूरी है।अतः कहा जा सकता है कि सुख और संपत्ति दोनों जीवन के आवश्यक तत्व हैं, परंतु उनके प्राप्ति मार्ग भिन्न हैं। संतुलित जीवन के लिए शुभ कर्म के साथ सकारात्मक सोच और संतोष भी आवश्यक 

- डॉ अमित कुमार बिजनौरी

 बिजनौर - उत्तर प्रदेश

      मनुष्य अपने जीवन में दो प्रकार की उपलब्धियों का अनुभव करता है — सुख और सम्पत्ति। दोनों दिखने में समान लगते हैं, परन्तु दोनों की जड़ें भिन्न होती हैं। सम्पत्ति अर्थात् धन, संपदा, पद, सुविधा, सफलता आदि, प्रायः कर्म, प्रयास, योजना, कौशल, परिश्रम और अवसर का परिणाम होती है। यहाँ “अर्जन” मुख्य है। इसलिए संपत्ति मनुष्य बनाता है। परंतु सुख केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं मिलता। सुख कभी-कभी न्यून साधनों में भी भरपूर मिलता है और संपन्न लोगों में नदारद मिलता दिखता है। सुख का संबंध भाग्य, प्रकृति, मानसिकता, संतोष, संबंध, तथा आन्तरिक रसायन से है। यह अर्जित नहीं, बल्कि अनुभूत होता है। इसलिए सुख मनुष्य पाता है। यही कारण है कि धनवान होना आवश्यक नहीं कि सुखी होना भी हो। अतः मनुष्य को सम्पत्ति हेतु कर्म का आश्रय लेना चाहिए और सुख हेतु मन और भाग्य के समन्वय को समझना चाहिए।

- डाॅ. छाया शर्मा

अजमेर - राजस्थान

     जीवन में सुख के साथ भाग्य भी जुड़ा रहता है, उसी के साथ हम अपने लक्ष्य की ओर अग्रसारित होते चले जाते है, जो सबसे बड़ी देन होती है। जिसके बिना हम रह नहीं सकते है। इसी तरह से हम चल-अचल सम्पत्ति अर्जित करने के लिए कर्म करते चले जाते है, उसी के आधार पर हमारा सुख और कर्म टिका रहता। यह सच है, सुख भाग्य की देन है, सम्पत्ति कर्म की देन है। दोनों का जीवन में अभिज्ञान बढ़ता है, घटता नहीं है......

- आचार्य डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार "वीर"

       बालाघाट - मध्यप्रदेश

       एक बहुत पुराना एक गीत है "दाता एक राम भिकारी सारी दुनिया" - - सच है सुख दुख दोनो राम की दुनिया की सौगातें हैं। सुख दुःख संपत्तियों कर्म और भाग्य से ही मिलती हैं। शर्त बस यही होती है कि जो करें पूरी लगन और निष्ठा से करें। सुख पाना समी के भाग्य में नहीं होता लेकिन कोशिश करना सभी का कर्म होना चाहिए - - कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। कोशिशें सफल होती हैं हताशा असफल कर देती है। मन के हारे हार है मन के जीते जीत। मन की लगाम थाम कर आगे बढें तो कुछ भी असंभव नहीं है Nothing is impossible in this world..! गीता में कृष्ण ने कहा है "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" - - तो चलिये सुख पाना है तो "कर्म"और "करम" दोनों की आराधना करें   सच्चे मन से। सिर्फ संपत्ति की चाह ना रखें कर्म को प्रधानता दें - - पायेंगे कि आपका करम आपके कर्म का भरपूर मोबदला देगा। 

- हेमलता मिश्र "मानवी"

नागपुर - महाराष्ट्र

     सुख मिलना न मिलना भाग्य के आधीन होता है। सम्पत्ति वास्तव में हमारे कर्मों की देन ही होती है। कुछ जातक धनी परिवार में जन्मे होते हैं लेकिन फिर उस सम्पत्ति से हाथ धो बैठते हैं। जबकि कुछ नितांत गरीबी में जन्मते हैं और फिर अपने उद्यम से सम्पत्ति के स्वामी बनते हैं।यह हमारे संचित कर्मों का प्रतिफल होता है।यह भी उल्लेखनीय है कि कर्म के साथ भाग्य जुड़ा होता है। अब बात करते हैं सुख की तो सुखी होना न होना नितांत भाग्य अनुसार होता है। सुख की सबकी अपनी अपनी परिभाषा हो सकती है।एक को धूप में सुख अनुभव होता है, दूसरे को छाया में सुखानुभूति होती है। एक को त्याग में सुख होता है, दूसरे को संचय में सुखद लगता है।जब उपलब्ध सुविधा का लाभ न ले पाये तो यह सुख नहीं होता। एक चावल का व्यापारी,चावल खाने का सुख अनुभव नहीं कर पाता क्योंकि डॉक्टर ने मना किया होता है।यह भाग्य ही तो है। सब कुछ होते हुए भी संन्यास ले लेना,यह भाग्य ही तो है। इसीलिए परमात्मा से सुख और सम्पत्ति एक साथ ही मांगा जाता है,सुख संपत्ति घर आवै कष्ट मिटे तन का। वैसे इस कर्म प्रधान संसार में भाग्य का निर्माण भी कर्मानुसार ही होने की बात कही गयी है।अपने कर्म सही रखें हम, भाग्यवान होंगे और सुख संपत्ति दोनों ही मिलेंगे।

- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'

धामपुर -  उत्तर प्रदेश

     कर्म भी कोई इंसान तब ही कर पायेगा जब वह कर्म करना उसके भाग्य में होगा. कर्म इस लोक का शब्द है जबकि भाग्य परलोक का. दरअसल, भाग्य का निर्माण कर्म से ही हुआ है. आपने अच्छे कर्म पहले किए तो आपका भाग्य अच्छा बना और बुरे कर्म किए थे तो आपका भाग्य बुरा बन गया. कहने का तात्पर्य ये है कि सबसे बड़ा कर्म ही है. संपत्ति भी कर्म की देन है. कर्म करने से ही संपत्ति भी मिल सकती है. कर्म में सामर्थ्य है कि आपके बुरे भाग्य को भी अच्छा कर सकता है और बुरा कर्म करते हो तो आपके अच्छे भाग्य को भी बुरा बना सकता है.

- लीला तिवानी

सम्प्रति - ऑस्ट्रेलिया

     जीवन की गहन वास्तविकताओं को समझने की श्रेष्ठ दृष्टि वही है, जो सरलता से गूढ़ अर्थ समेट लेती हो। यही सन्देश उक्त कथन में व्यक्त है। सुख भाग्य का फल है जो हमें यह सिखाता है कि हमारे जीवन में अनगिनत परिस्थितियाँ और अवसर हमारी इच्छा से परे भी घटित होते हैं। इस विचार से मन में विनम्रता, सन्तोष और समय की विवेकपूर्ण भूमिका की अनुभूति होती है। भाग्य के बिना सुख अधूरा है, और सुख के अनुभव से व्यक्ति जीवन भर अपने जीवन की अनिश्चितताओं को स्वीकार करना सीखता है। इसके विपरीत, सम्पत्ति कर्म की देन है। यह सिद्धान्त हमें सतत प्रयास, नैतिकता और सत्यनिष्ठा के महत्व को स्मरण कराता है। मात्र इच्छा या भाग्य से सम्पत्ति प्राप्त नहीं होती। कर्म ही स्थायी सफलता और आत्मसन्तोष की नींव है। यह दृष्टिकोण हमारे जीवन में सक्रियता, अनुशासन और दायित्व की भावना को जाग्रत करता है। इस प्रकार यह कथन न केवल दर्शन की गहराई प्रस्तुत करता है, बल्कि व्यवहारिक जीवन में मार्गदर्शक भी है। भाग्य और कर्म का संतुलन जीवन की उच्चतम कुन्जी है। जहाँ भाग्य से मिलने वाले सुख को स्वीकार करना हमें मानसिक शांति देता है, वहीं कर्म द्वारा अर्जित सम्पत्ति हमें प्रयास और परिश्रम की महत्ता सिखाती है। वर्तमान युग में यह सन्देश और भी प्रासंगिक है। तेज़ी से बदलती परिस्थितियों और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में यह हमें याद दिलाता है कि केवल भाग्य की प्रतीक्षा करना पर्याप्त नहीं है, और केवल मेहनत करना भी तब तक सार्थक नहीं जब तक उसे उद्देश्य और नैतिकता के प्रकाश में न रखा जाए। संक्षेप में, यह कथन जीवन को संतुलन, अनुशासन और परिपक्व दृष्टि प्रदान करता है। यही इसे आलेख की दृष्टि से उत्कृष्ट और कालजयी बनाता है। यह पाठक को जीवन में दार्शनिक समझ, व्यवहारिक मार्गदर्शन और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। अन्ततः यही मानसिक स्थिरता व्यक्ति, परिवार, राज्य और राष्ट्र को विकास के पथ पर अग्रसर करती है और श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी अर्थात गुरुवाणी को सार्थक बनाती है कि "सवा लख नाल इक लड़ावां तां गुरु गोबिंद सिंह कहलावां"। 

- डॉ. इंदु भूषण बाली

ज्यौड़ियॉं ( जम्मू ) -जम्मू और कश्मीर

   जैसा जिसके साथ घटित होता है वहीं व्यक्ति कभी सुखों को भाग्य की देन मानता है तो कभी अपने कर्मों के सिद्धांत को सिद्ध करता कर्म को ही सुख का कर्ता मानता है। दूसरे लोग कहने लगते हैं अरे वह बड़ा भाग्यशाली है जो सुख भोग रहा है। यह बहस का बड़ा विषय है क्योंकि शास्त्र भी कहते हैं कि "जो जस करें सो तस फल चाखा"।कर्म फल हमें ब्याज  के रूप में मिलता है यदि इस जन्म में बिना किसी का दिल दुखाए नेक कर्म किए हैं तो इसका फल कभी-कभी इस जन्म में मिल जाता है और कभी अगले जन्म में भी मिलता है। माना जाता है पाप, पुण्यात्मक कर्मों से हमारा प्रारब्ध निश्चित होता है। कभी-कभी हमें बहुत अच्छे कर्म करने के बाद भी दुर्भाग्य का दुख भोगना पड़ता है तो इसके पीछे हमारे हिंदू धर्म के शास्त्रों में भाग्य पुरुषार्थ और कर्म का सटीक वर्णन है ।सुख रूपी भाग्य और  संपत्ति रूपी कर्मपुण्य दोनों ही जीवन की अनमोल संपत्ति है ।धन आराम देता है। पुण्य कर्म संकट से बचाता है, सुरक्षा कवच देता है।अतः सुख तभी भाग्य की देन बनता है जब कर्म किसी को बिना दुख पहुंचाए किया जाए ,फल अवश्य मिलेगा। गलत कर्म करके कमाया गया धन संपत्ति नहीं भावी जीवन के लिए दुःखों का गड्ढा खोद देता है। जहां विनाश निश्चित है ।अतः सुकर्मों से भाग्य व संपत्ति प्राप्त होती है।

  - डॉ. रेखा सक्सेना

मुरादाबाद - उत्तर प्रदेश 

     जीवन में कर्म ही मूल आधार है। जिसके आधार पर भाग्य की दिशा तय होती है और फिर तदनानुसार परिणाम का निर्धारण होता है। ऐसे अनेक अवसर पर हमने यह महसूस भी किया है कि कोई काम बनते-बनते बिगड़ जाता है या बिगड़ते-बिगड़ते बन जाता है। कभी-कभी अनायास कुछ अच्छा या बुरा हो जाता है। इन सब के पीछे कर्म और भाग्य का खेल ही होता है।यह सुक्ष्म आध्यात्म है,जिसमें विज्ञान भी निहित होता है। ये बात अलग है कि कोई इसे सहमत हों या असहमत।  बड़े-बुजुर्ग , संत-महात्मा, ज्ञानी,महापुरुष ये सभी इसलिए सद्कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। क्योंकि सद्कर्म से भाग्य, सौभाग्य में बदलेगा और सौभाग्य से सुख की प्राप्ति होगी। यानी कर्म से सद्कर्म, सद्कर्म से भाग्य और भाग्य से सुख की यात्रा में भाग्य की भूमिका अदृश्य और अप्रत्यक्ष रूप में होती है। कर्म का यह एक पक्ष है। कर्म का दूसरा पक्ष जो दृष्टव्य और प्रत्यक्ष रूप में होता है,वह है सम्पत्ति का विस्तार। लेकिन यह विस्तार स्थायित्व तभी देगा जब उसमें सद्कर्म जुड़ेगा अन्यथा किसी न किसी कारण बनकर क्षरण हो जायेगा।अत:  सार में यही समझना उचित  होगा  कि सुख भाग्य की देन है और सम्पत्ति कर्म की देन है। लेकिन इसके साथ ही यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि सुख-सम्पत्ति के स्थायित्व के लिए सद्कर्म करना ही परम आवश्यक है।

- नरेन्द्र श्रीवास्तव

गाडरवारा - मध्यप्रदेश 

आना-जाना ज़िंदगी,सच्चा मानव धर्म।

धरती पर छूटे सभी,साथ चलेगा कर्म।।

साथ चलेगा कर्म,सदा यह भाग्यविधाता।

व्यर्थ नहीं यह देह,कर्म कर कहते दाता।।

बदले यही लकीर,कर्म की धरती जाना।

कर्म भाग्य-सम्पत्ति,इसी से उर सुख आना।।

  आदिकाल से ही यह धरती कर्मभूमि के ही नाम से जाना जाता है। जिसके जैसे कर्म होते हैं,वैसा ही अपना भाग्य लिखता है।अच्छे कर्म अर्थात अच्छा व्यवहार, मृदुभाषी, कर्मवीर,अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कायरता नहीं,मेहनती  साथ में सकारात्मक रहना ,ये सभी हमारा आज और कल सब बदल देंगे।जो जैसा बोएगा,वैसा ही काटेगा।यह विज्ञान भी कहता है।ऊपर फेंकी गयी गेंद, नीचे अवश्य उसकी दुगुनी रफ्तार से आएगी।जो आवाज पहाड़ियों से टकराती है,लौट कर आती है,यही प्रकृति का नियम है।दूसरे शब्दों में,अपने भाग्य को कोसने से बेहतर प्रयत्नशील रहना है जिससे मनुष्य अपना वर्तमान बदलता है और भविष्य में , सम्पत्ति का भी सुख भोग सकता है। हमारे अपने कर्म ही आगे का हमारा अपना भाग्य लिखते हैं। सुंदर भाग्य तो हमेशा ही सुखानुभूति ही कराते हैं। कुछ शब्दों में, हमें हमेशा अपने सुंदर कर्म करते रहना चाहिए जो सकारात्मक हो ।जिसका परिणाम सुखद हो।

- वर्तिका अग्रवाल 'वरदा'

वाराणसी - उत्तर प्रदेश 

" मेरी दृष्टि में " सुख अपने मन की प्रवृत्ति है। जिससे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। सुख का कोई पैमाना नहीं होता है। इसलिए सुख आपके अन्दर है। सिर्फ महसूस करने की प्रवृत्ति पैदा करनी चाहिए। फिर सब कुछ सुख में होगा। 

           - बीजेन्द्र जैमिनी 

       (संचालन व संपादन)

Comments

  1. सुख भाग्य से मिलता है , पर ये भी सच है कि कर्मों से भी इसे अर्जित किया जा सकता है !! संपत्ति जय लोगों को विरासत मे भी मिलती है , अर्थात भाग्य से भी मिलती है , व कर्मों द्वारा भी अर्जित की जा सकती है !
    ये मेरे व्यक्तिगत विचार है !!
    नंदिता बाली
    हिमाचल प्रदेश
    (WhatsApp से साभार)

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